आज केंद्रीय चुनाव आयोग ने देश के पांच राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया.अगले महीने यानी नवंबर में इन राज्यों में चुनाव होने वाले हैं. छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी सभी राज्यों में एक चरण में चुनाव होंगे. छत्तीसगढ़ में दो चरणों में होंगे.
हमास के साथ जंग के बीच भारत का समर्थन मिलने पर इजरायल क्या बोला?
जब-जब देश पर संकट आया है, इजरायल ने भारत की कैसे मदद की है?


मिजोरम में 40 सीटें, वोट पड़ेंगे 7 नवंबर को
मध्यप्रदेश में 230 सीटें और वोट पड़ेंगे 17 नवंबर को
राजस्थान की 200 सीटों पर वोट पड़ेंगे 23 नवंबर को
तेलंगाना की 119 सीटों पर वोट पड़ेंगे 30 नवंबर को
छत्तीसगढ़ की 90 सीटों पर वोट पड़ेंगे 7 और 17 नवंबर को
सभी राज्यों के नतीजे एक साथ 3 दिसंबर को आएंगे.
चुनाव की तारीखें आईं तो आईं प्रतिक्रियाएं. कांग्रेस अध्यक्ष मलिकार्जुन खड़गे ने एक्स पर लिखा
“5 राज्यों के चुनावों की घोषणा के साथ भाजपा और उसके साथियों की विदाई का भी उद्घोष हो गया है..”
भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी लिखा,
"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा भारी बहुमत से सभी राज्यों में सरकार बनाएगी और आगामी 5 वर्षों के लिए जन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कटिबद्ध भाव से काम करेगी."
जिन राज्यों में चुनाव है, उनके मुख्यमंत्रियों की भी प्रतिक्रिया आई. किसी ने एक्स पर लिखा तो किसी ने बाइट दी. सबने कहा कि उनकी ही जीत होगी.
लेकिन जब ये तारीखें अनाउंस की जा रही थीं, उस समय दिल्ली में कांग्रेस के दफ्तर में एक मीटिंग चल रही थी.कांग्रेस वर्किंग कमिटी यानी CWC की मीटिंग.इस मीटिंग के बाद कांग्रेस सांसद राहुल गांधी मीडिया के सामने आए.उन्होंने कहा कि CWC की मीटिंग में ये निर्णय लिया गया है कि कांग्रेस पार्टी पूरे देश में जातिगत जनगणना का समर्थन करेगी. इसके लिए भाजपा पर दबाव बनाएगी.
लेकिन मीटिंग कांग्रेस के ऑफिस में ही नहीं चल रही थी, भाजपा के ऑफिस में भी चल रही थी, वहां उम्मीदवारों की लिस्ट बनाई जा रही थी.कौन-किस सीट से लड़ेगा, इसको फिक्स किया जा रहा था. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के उम्मीदवारों की इस लिस्ट में क्या था? बीजेपी ने 3 राज्यों में 162 प्रत्याशियों के नाम का ऐलान किया. राजस्थान में 41 नामों का ऐलान हुआ, जिसमें बीजेपी ने 7 सांसदों को मैदान में उतारा है. झुनझुनू से सांसद नरेंद्र कुमार को मंडावा से, राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा को सवाई माधोपुर से, अलवर से सांसद बाबा बालकनाथ को तिजारा से, अजमेर से सांसद भागीरथ चौधरी को किशनगढ़ से, जयपुर ग्रामी से सांसद राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को झोटवाड़ा से, राजसमंद से सांसद दिया कुमारी को विद्याधर नगर से और जालौर से सांसद देवजी पटेल को सांचौर से टिकट दिया है.
कई सारे पुराने चेहरे रिपीट हुए हैं तो कुछ नए चेहरों को भी मौका मिला है. जैसे टोंक जिले की देवली उनियारा सीट से गुर्जर आंदोलन के नेता किरोड़ी सिंह बैंसला के बेटे विजय बैंसला को टिकट दिया है. मध्य प्रदेश की बात करें तो पिछली लिस्ट के सरप्राइज एलिमेंट के बाद बीजेपी पुराने ढर्रे पर लौट आई है. 57 प्रत्याशियों की लिस्ट में तमाम अटकलों के बाद सीएम शिवराज सिंह चौहान सिहोर जिले की बुधनी सीट से चुनाव लड़ेंगे, दतिया सीट से होम मिनिस्टर नरोत्तम मिश्रा को टिकट मिला है. इसके अलावा 22 मंत्रियों के टिकट रिपीट हुए हैं, सिंधिया खेमे के प्रद्मुन्य सिंह तोमर, गोविंद राजपूत, तुलसी सिलावट, प्रभुराम चौधरी, हरदीप सिंह डंग जैसे चेहरों को दोबारा मौका मिला है. टीकमगढ़ जिले की खरगापुर सीट से उमा भारती के भतीजे राहुल सिंह लोधी का टिकट रिपीट हुआ है. इससे पहले एमपी में बीजेपी अपने नरेंद्र सिंह तोमर जैसे हैवीवेट मंत्रियों को उतार चुकी है. कैलाश विजयवर्गीय भी चुनाव लड़ रहे हैं. उनके आकाश विजयवर्गीय की सीट पर अभी नाम का ऐलान नहीं हुआ है.
छत्तीसगढ़ की बात करें तो बीजेपी ने एमपी की दूसरी लिस्ट के तर्ज पर 3 सासंदो को मैदान में उतार है. 64 उम्मीदवारों की लिस्ट में सांसद और केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह को कोरिया जिले की भरतपुर-सोनहत सीट से, रायगढ़ की सांसद गोमती साय को पत्थलगांव सीट से, बिलासपुर से सांसद और प्रदेश अध्यक्ष अरुण साव लोरमी सीट से चुनाव लड़ेंगे. इसके अलावा बीजेपी ने यहां फिर से ज्यादातर पुराने चेहरों पर ही दांव लगाया है, रमन सिंह, बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर, राजेश मूड़त, अमर अग्रवाल, प्रेम प्रकाश पाण्डेय जैसे चेहरों को फिर से मैदान में देखा जाएगा. ज्यादातर पुराने मंत्रियों को टिकट मिला है. इन्हीं चेहरों की एंटी इंकबेंसी पिछली बार बीजेपी को भारी पड़ी थी. इनके अलावा पूर्व IAS ओपी चौधरी को रायगढ़ से और कोंडागांव के पूर्व कलेक्टर नीलकंठ टेकाम जो हाल ही VRS लेकर बीजेपी आए, उन्हें केशकाल सीट से मैदान में उतारा गया है.
अब चलते हैं इजरायल और फिलिस्तीन की तरफ
जब उग्रवादी ग्रुप हमास ने इजरायल के इलाकों पर रॉकेट दागना शुरू किये तो भारत ने इसे आतंकवादी हमला कहा. पीएम मोदी ने 7 अक्टूबर की शाम अपने एक्स हैंडल पर लिखा
“इजरायल पर हुए आतंकी हमले की खबर से स्तब्ध हूं.हम इस कठिन समय में इजरायल के साथ खड़े हैं.”
न तो विदेश मंत्रालय से की ओर से कोई आधिकारिक बयान आया, न ही राजनयिक स्तर की कोई प्रतिक्रिया आई. ऐसे में नरेंद्र मोदी के इस ट्वीट को ही इस युद्ध में भारत के स्टैंड की तरह देख लिया गया.
भारत का स्टैंड लोगों को तब और आसानी से समझ में आने लगा, जब इजरायल के भारत में राजदूत नॉर गिलन ने लिखा
“शुक्रिया, इस समर्थन के लिए इजरायल भारत की सराहना करता है.”
इसके साथ ही भारत के इजरायल व फिलिस्तीन के साथ संबंधों को लेकर बात होने लगी. संबंध कब कैसे रहे हैं, कैसे बदले हैं टाइप सवाल उठने लगे.मोटामोटी वही सवाल जो हमने आपको इस शो की शुरुआत में बताए.अब जवाब की बारी है.ऐसे में पहला सवाल भारत के इजरायल-फिलिस्तीन के साथ संबंध कैसे शुरू हुए?
साल 1945. दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ. और दुनियाभर में ये बहस तेज़ हो गई कि हिटलर के सताए हुए यहूदियों को उनका अलग देश दिया जाए. यूरोप से भागकर यहूदी उस भूभाग में जमने लगे थे, जिसे अब इजरायल कहा जाता है. पहले फिलिस्तीन कहते थे. वहां पहले से रह रहे अरब मूल के लोगों के साथ उनके संघर्ष हो रहे थे क्योंकि यहूदी वहां पर अपने कब्जे वाले हिस्से को अपना देश बनाना चाह रहे थे. उस जमीन का बंटवारा चाह रहे थे. लेकिन भारत में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू इसके विरोध में थे. भारत की आजादी के पहले से ही.
हरिजन अखबार में अपने कई लेखों में गांधीजी ने यहूदियों के खिलाफ हुई हिंसा का विरोध किया था, लेकिन इस बात का भी विरोध किया था कि यहूदी फिलिस्तीन की जमीन पर कब्जा कर रहे हैं. नेहरू की भी यही राय थी. उन्होंने कई मीटिंग और कई लेखों में फिलिस्तीन की जमीन पर यहूदियों के कब्जे का विरोध किया था.दरअसल नेहरू और गांधी दोनों का सोचना था कि कोई देश किसी एक खास धर्म के लोगों के लिए न बने.गांधी ने तो अपने एक लेख में ये भी लिखा था कि यहूदी दुनिया के बाकी लोगों की तरह उसी देश को अपना क्यों नहीं मानते हैं जहां उनका जन्म हुआ? ध्यान रहे कि ये बातें तब हो रही थीं, जब खुद भारत का धार्मिक आधार पर बंटवारा हो रहा था और पाकिस्तान प्रकाश में आ रहा था.
साल 1947.भारत की आजादी हुई.भारत संयुक्त राष्ट्र में फिलिस्तीन की बंटवारे का प्रस्ताव आया.भारत ने अरब देशों का साथ दिया, और इस बंटवारे के खिलाफ वोट किया.इसी साल इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता का भी फॉर्म भरा, भारत ने इसका भी विरोध किया.
लेकिन साल 1950 आते-आते भारत का रुख नरम पड़ गया. भारत ने इजरायल को बतौर राष्ट्र मान्यता दे दी लेकिन तभी, जब दो मुस्लिम बहुल देशों - तुर्की और ईरान - ने ऐसा किया.
भारत और इजरायल के बीच दोस्ती पक्की होती गई.दोनों देशों के बीच बहुत सारे मुद्दों पर बातचीत शुरू हो चुकी थी.इनमें प्रमुख मुद्दा था डिफेंस का.इजरायल की ओर से भारत को ढेर सारे वादे किये गए थे. अब वादे को निभाना था और निभाने का पहला मुकम्मल मौका आया साल 1962 के अक्टूबर में. भारत और चीन में युद्ध शुरू हुआ. 27 अक्टूबर को तत्कालीन पीएम नेहरू ने इजरायल के राष्ट्रपति डेविड बेन गुरियों को तार भेजा - हथियार चाहिए. इजरायल ने बिना देर के भारत को हथियार भेज दिए. युद्ध खत्म हो गया। नतीजा जो रहा हो लेकिन उसके बाद भी नेहरू ने इजरायल को चिट्ठी लिखी और हथियार भेजने के लिए शुक्रिया कहा.
इजरायल को एक और मौका मिला. उसने हथियार देने का वादा साल 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध के समय भी निभाया. इंदिरा गांधी की सरकार ने मांग की. इजरायल ने युद्ध के बीच बिना देर के भारत को हथियार रवाना कर दिए. ध्यान रहे कि ये बस आपसी दोस्ती थी. इजरायल इस दोस्ती में अपने हिस्से को बखूबी निभा रहा था. अभी इन दोनों देशों के बीच आपसी समझौता होना था. साल 1992 में.तो उसकी बात आगे.,
अब सवाल आता है कि भारत जो तब इजरायल के करीब जा रहा था. तो क्या हमने फिलिस्तीन से दूरी बढ़ा ली थी? ऐसा नहीं है.भारत ने समय बीतने के साथ फिलिस्तीन के सबसे बड़े नेता यासीर अराफ़ात के साथ बातचीत शुरू कर दी थी.अराफ़ात तो आगे चलकर फिलिस्तीन के राष्ट्रपति बने थे, लेकिन पहले वो फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के नेता थे. ये संगठन फिलिस्तीनी लोगों का सबसे बड़ा और प्रभावशाली गुट है.साल 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उस ग्रुप को लेकर एक बड़ा फैसला लिया.भारत ने PLO को फिलिस्तीनी लोगों के मुखिया संगठन के रूप में मान्यता दे दी.यानी भारत के अधिकारियों और नेताओं को फिलिस्तीन के किसी मुद्दे पर बात करनी होगी या तो उसके लिए plo ही वो प्वाइंट ऑफ कान्टैक्ट होगा.साथ ही इंदिरा गांधी सरकार ने इस संगठन को दिल्ली में ऑफिस खोलने के लिए जगह दे दी.
इमरजेंसी के बाद साल 1977 में आम चुनाव हुए, तो इंदिरा गांधी की सरकार औंधे मुंह गिर गई.जनता पार्टी चुनी गई.और पार्टी ने जीत के बाद एक विजय रैली आयोजित की थी.इस रैली में अटल बिहारी वाजपेयी ने एक भाषण दिया.और इसी भाषण का एक हिस्सा इन दिनों अच्छे-से वायरल है.इस भाषण में अटल बिहारी कह रहे हैं कि अरबों की जिस जमीन पर इजरायल कब्जा करके बैठा है, वो जमीन उसको खाली करना होगी. भारत ने तब भी फिलिसतीन के प्रति अपने रुख में कोई परिवर्तन नहीं किया था.
साल 1980 में जब इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापसी की, तो उन्होंने plo के ऑफिस को अपग्रेड करने का ऑर्डर भी दिया.ऑफिस और ऑफिस से जुड़े सब लोगों को वो सुविधाएं दी गईं, जो दूतावासों और उनके कर्मचारियों को दी जाती हैं.
इस दरम्यान अराफ़ात और इंदिरा गांधी की दोस्ती भी फेमस हुई. दोनों की भारत और भारत के बाहर कई मुलाकातें हुईं.जब इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई, तो अराफ़ात इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार में भारत आए.उनकी रोती हुई तस्वीरें दुनिया भर में घूमीं. इंदिरा गांधी के बाद जब राजीव गांधी सत्ता में आए, तब भी उनका फिलिस्तीन को लेकर अप्रोच नहीं बदला था.फिलिस्तीन और इजरायल के बीच बहुत सारे संघर्ष हो रहे थे, लेकिन भारत ने फिलिस्तीन का ही साथ दिया.
लेकिन साल 1990 आते-आते फिलिस्तीन ने एक गड़बड़ी कर दी.इस साल अगस्त के महीने में इराक ने कुवैत पर आक्रमण कर दिया.और PLO ने इराक का समर्थन कर दिया.और इराक के खिलाफ लड़ रहे अमरीका को भारत ने समर्थन दिया. जो युद्ध हुआ, उसे gulf वॉर कहा गया. फिलिस्तीन को दुनिया भर में राजनीतिक रूप से मिली बढ़त कम होने लगी.और इस घटना के दो साल बाद भारत ने इस पूरे परिदृश्य में एक बड़ा कदम उठाया.जनवरी 1992.देश में नरसिंहाराव वाली कांग्रेस की सरकार थी. भारत ने इजरायल से full diplomatic संबंध बनाने का ऐलान किया. यानी दोनों देश एक दूसरे के यहां दूतावास खोलेंगे, वहां पर अपने राजदूत और तमाम स्टाफ रख सकेंगे, राजदूतों को तमाम सुविधाएं मिलेंगी, और तमाम समझौते और डील थोड़ी ज्यादा तेजी से हो सकेंगे.
इसी दरम्यान फिलिस्तीन से यासीर अराफ़ात भी भारत आए थे और नरसिंहा राव से मिले थे.जब उन्होंने भारत और इजरायल की दोस्ती की बात छोड़ी, तो उन्हें कहा गया कि ये दोस्ती फिलिस्तीन के लिए भी जरूरी है.इस मीटिंग के बाद पत्रकारों से बात करते हुए अराफ़ात ने कहा था -
"हम भारत-इजरायल के मुद्दों में कोई दखल नहीं दे सकते हैं, बल्कि हम भारत सरकार के हर चुनाव का सम्मान करते हैं"
ये वो समय था, जब इजरायल कई देशों के करीब आ रहा था, फिलिस्तीन अलग-थलग पड़ रहा था.
लेकिन इस समय पूरी दुनिया में एक अबोला नियम चल रहा था - हाईफनेशन का. हाइफ़न यानी वो पड़ी हुई पाई जो अक्सर दो शब्दों के बीच में लगाई जाती है. जो भी देश इजरायल के समर्थन में आता, उसे दुनिया भर में अपनी इमेज बचाने के लिए फिलिस्तीन का भी करीबी होना पड़ता था. या दिखना पड़ता था. तो दुनिया भर में इजरायल-फिलिस्तीन को साथ में लिखा जाता, बोला जाता था. दुनिया भर से कोई भी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री इजरायल जाता, उसे उसी दौरे में फिलिस्तीन भी जाना होता था. इजरायल इससे बाहर आना चाहता था. उसे अपनी अलग पहचान बनानी थी. जिस भी देश के साथ संबंध थे, उसे पूरी तरह से अपनी साइड में मिला लेना था.
इजरायल की इसी कोशिश में भारत का भी नंबर आया और इजरायल को मौका मिला साल 1999 में. इस साल पाकिस्तानी घुसपैठिए और सैनिक कारगिल में घुसकर बैठ गए. भारत ने इन्हें खदेड़ने का प्लान बनाया. युद्ध छिड़ा. लेकिन भारत को एक चीज समझ में आई.पाकिस्तानी ऊंचे पहाड़ों के ऊपर गुफा और बंकर बनाकर रह रहे थे.इंडियन एयरफोर्स को चाहिए थे ऐसे मिसाइल, जो सीधे इन ठिकानों पर दागे जा सकें.इजरायल के पास ऐसे हथियार थे.संपर्क किया गया.इजरायल ने अपने इमरजेंसी वाले खेप से हथियार निकाले और तुरंत इंडिया को भेज दिए.भारत ने यूज किये.बहुत सारे जरूरी फ़ैक्टर्स में ये भी एक फैक्टर था, जिसकी वजह से कारगिल में हमें जीत मिली.और इजरायल को वो साथ मिला, जिसकी उसे और हमें दोनों को जरूरत थी.
इस जीत के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने विदेश मंत्री जसवंत सिंह को इजरायल की पहली द्विपक्षीय यात्रा पर भेजा.इसके कुछ महीनों बाद तत्कालीन गृहमंत्री आडवाणी भी इजरायल गए.और फिर बहुत सारे नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया.रिश्तों में गर्माहट जैसी हेडलाइन लिखी जाने लगी.
लेकिन भारत और इजरायल के संबंध निर्णायक रूप से बदले साल 2017 में.साल 2017 में ये हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी पहली बार इजरायल गए.ये पहली प्राइम मिनिस्टीरीअल विज़िट थी.इजरायल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू के साथ समुद्र तट पर टहलते हुए उनकी फ़ोटो वायरल हुईं.लेकिन इस यात्रा में दो खास बातें थीं.प्रधानमंत्री मोदी का प्लेन सीधे इजरायल में उतरा था.परिपाटी के विपरीत पीएम मोदी फिलिस्तीन का चक्कर काटे बिना इजरायल गए थे.इसके पहले तक हाइफनेशन चल रहा था, पीएम मोदी के इस चक्कर से डी-हाईफनेशन की प्रक्रिया शुरू हुई.इजरायल और फिलिस्तीन से एक साथ संबंध रखना जरूरी नहीं था, उन्हें अलग-अलग चश्मे से देखा जा सकता था.इस डी-हाईफनेशन में एक और अध्याय जुड़ा साल 2018 में, जब पीएम मोदी ने फिलिस्तीन का दौरा किया, लेकिन इजरायल का चक्कर नहीं लगाया.भारत का इन देशों को लेकर स्टैंड साफ हो गया.
यानी भारत ने इजरायल से करीबी या फिलिस्तीन से दूरी नहीं बनाई है, लेकिन दोनों देशों से अलग-अलग संबंध बनाने को लेकर जोर दिया है.
ये युद्ध है या नहीं, लेकिन ये रक्तपात जरूर है. इजरायल और फिलिस्तीन दोनों ही देशों पर एक दूसरे के निर्दोष नागरिकों की हत्याएं करने के आरोप हैं, इन निर्दोषों जानों में न उम्र का भेद किया गया, न लिंग का.बस लाशें गिराई गईं. उन्हें बंदी बनाया गया.प्रताड़ित किया गया. ये हिंसा जल्द खत्म हो, इस उम्मीद के साथ खबरों का सिलसिला यहीं रोकते हैं.





















