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अमरनाथ आतंकी हमला: बस ड्राइवर सलीम ने दी लल्लनटॉप को बताया उस दिन का भयानक एक्सपीरियंस

हर अफवाह के पीछे की सच्चाई भी बताई.

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सलीम
अमरनाथ यात्रा पूरी करके जम्मू लौट रहे श्रद्धालुओं की एक बस पर 10 जुलाई की शाम 8:20 पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया. अनंतनाग के पास बटेंगू गांव में हुए इस हमले में सात श्रद्धालुओं की मौत हो गई. 19 से ज्यादा घायल हो गए. जैसे-जैसे हमले की ख़बरें सर्क्युलेट होती रहीं, अफवाहों का बाज़ार गर्म होता रहा. कांस्पीरेसी थ्योरीज़ तो इतनी आईं कि पूछिए मत. कोई कहता बस ड्राइवर सलीम आतंकवादियों से मिला हुआ था, कोई कहता क्रॉस फायरिंग हुई, तो किसी ने कहा बस सलीम चला ही नहीं रहा था.
हमनें सीधे सलीम शेख से बात की. जानिए उन्हीं की ज़ुबानी उस घातक हमले का पूरा ब्योरा.


सवाल: उस दिन हुआ क्या था?
सलीम: "हम दो तारीख को निकले थे. राजस्थान होते हुए. अमृतसर घूमे. वाघा बॉर्डर घूमे. फिर जम्मू में एक रात रुके. दर्शन करने गए. 10 जुलाई को दर्शन करके निकले 2 से 4 के बीच. शाम को 4 बजे वापस चल पड़े. 5-7 किलोमीटर चलते ही गाड़ी पंक्चर हो गई. 1 ही टायर में 2 पंक्चर हुए. अनंतनाग पहुंचते-पहुंचते रात 8 से ऊपर का वक़्त हो गया.
अनंतनाग से अभी दो-ढाई किलोमीटर दूर थे कि राईट साइड से फायरिंग शुरू हो गई. गाड़ी 60-70 की स्पीड पर थी. वो लोग अंधेरे में थे. न उनका चेहरा दिखा, न ये पता चला कि कितने लोग थे. सवारियां कहती हैं कि 3 से 4 लोग थे. मिलिट्री की ड्रेस में. रात थी, तो हेडलाइट्स ऑन थी. ड्राइवर की नज़र सामने ही रहती है. उस रास्ते पर हर जगह सिक्योरिटी रहती ही है. इसलिए आर्मी वाले दिख भी जाएं तो कोई नोटिस नहीं करता.
जब हमला शुरू हुआ मैं टेढ़ा हो गया. मैंने कंडक्टर से कहा कि दरवाज़ा बंद कर लो. हर्ष (हर्ष देसाई) भाई मेरी बगल में ही बोनट पर बैठे थे. मैं टेढ़ा हो गया तो मुझे लगने वाली गोलियां उन्हें लग गईं. दो गोलियां उन्हें टच हो के निकलीं. तीसरी गोली उनके कंधे में लगी.
# हमले वाली जगह कैसी थी?
जहां हमला हुआ वो खुली सड़क थी. साइड में पेड़ थे. जब अचानक से हमला शुरू हुआ, तो समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है. मुझे अब तक यकीन नहीं आ रहा कि हम बच निकले वहां से. मुझे याद नहीं मैं कैसे ऑटोमेटिकली टेढ़ा हो गया, गाड़ी चलाता रहा.
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# गाड़ी भगाते हुए आप कहां पहुंचे?
अनंतनाग. जम्मू जाने वाली सड़क पर जब मैंने राइट टर्न लिया, वहां एक ऑफिसर खड़े थे. कुछ ही दूरी पर कुछ आर्मी वाले गाड़ी ले के खड़े थे. उन लोगों ने तत्काल मामला संभाल लिया. हमारी बड़ी मदद की. सबको अस्पताल ले गए. ज़्यादा सीरियस लोगों को श्रीनगर भेज दिया. बहुत तेज़ रफ़्तार से उन लोगों ने मदद की हमारी.
बस, जिसपर हमला हुआ.
बस, जिसपर हमला हुआ.

जो लोग सही-सलामत थे, उन्हें सुरक्षित जगह ले गए. कुछ मिलिट्री वाले बस में चढ़ गए. लाशें देखकर वो बस को ही अस्पताल के अंदर ले गए. पता नहीं चल रहा था कि कितने लोग मर गए हैं और कितने बेहोश हैं. हर तरफ ख़ून ही ख़ून था. सब तरफ अफरा-तफरी का माहौल था. चीख़-पुकार मची हुई थी.
# ये स्टोरी आ रही है कि मिलिट्री और आतंकवादियों के बीच की फायरिंग में बस फंस गई थी. ऐसा था क्या?
नहीं, ऐसा कुछ नहीं था. ये सीधा हमला था. हां, हमसे 2-3 किलोमीटर पीछे मिलिट्री वालों की एक गाड़ी थी. आर्मी वालों ने हमें बताया कि उनका प्लान उसी गाड़ी को हिट करने का था. उनसे पहले उनके हत्थे हमारी बस चढ़ गई. हमें तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था.
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# कहते हैं वहां रात में बस चलाने की मनाही है. तो ये कैसे मुमकिन हुआ कि आपकी बस उस सड़क पर थी?
जाते वक़्त ज़्यादा पाबंदियां होती हैं. गाड़ी कॉन्वॉय में चलती है. आते वक़्त इतना कुछ नहीं होता. 2 से 4 के बीच हम वापस निकल पड़े थे. जब निकलते हैं, तो एक जगह गाड़ी का नंबर लिखा जाता है. वहां हमें किसी ने नहीं टोका. जाने दिया. मैं 4 साल से जा रहा हूं अमरनाथ. हमेशा ऐसा ही होता है. जगह-जगह तो फ़ोर्स होती है. हमें किसी ने रोका नहीं, टोका नहीं.
# एक अखबार में ख़बर छपी कि हमले के बाद जब बस रुकी, तो मदद करने की जगह स्थानीय लोग हंस रहे थे.
नहीं, नहीं, नहीं. ये बिल्कुल गलत बात है. ऐसा कुछ नहीं हुआ था. हमले के बाद जब हम आर्मी के पास पहुंचे, तो उन्होंने लोकल पब्लिक को वहां से हटा दिया था. किसी को पास नहीं आने दिया. ये बिल्कुल झूठ बात है कि लोग हंस रहे थे.
घायलों से मुलाक़ात करती जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ़्ती. इमेज: डेक्कन क्रॉनिकल.
घायलों से मुलाक़ात करतीं जम्मू-कश्मीर की सीएम महबूबा मुफ़्ती. इमेज: डेक्कन क्रॉनिकल.

# एक बात ये भी चल रही है सोशल मीडिया पर कि इस घटना में सलीम का हाथ था. आपको ये सब पढ़ के क्या लगता है?
जो-जो उस बस में मौजूद था, सबने अब तक लोगों को बता ही दिया है. हर जगह उनके बयान छपे हैं. टीवी पर दिखाए गए हैं. हर्ष भाई ने भी कहा है. ये अफवाहें तो आजकल फैलती ही हैं. क्या कर सकते हैं?
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सलीम के शहर में आतंकवाद के खिलाफ़ जुलूस निकाला गया. सलीम भी मौजूद थे.

# आपको बुरा तो लगा होगा न?
बुरा तो लगता ही है. लेकिन वहां से बच के आ गए, ये बहुत बड़ी बात है. और भी कुछ लोग बच गए, यही मेरे लिए बहुत है. मालिक ने लाज रख ली. मुझे तो उन लोगों का भी अफ़सोस है, जो चले गए. मैं उन सब लोगों के घर भी गया. सूरत, वनदेवी सब जगह.
अब तक मैं सदमे से बाहर नहीं निकला हूं. मैं तो बस इतना ही चाहता हूं कि हर जगह शांति बनी रहे.
सलीम का सम्मान करते वलसाड नगर पालिका के अधिकारी.
सलीम का सम्मान करते वलसाड नगर पालिका के अधिकारी.



अपनी बीवी संजीदा और तीन बच्चे दानिश, अयान और अमरीन के साथ गुजरात के वलसाड शहर में रहते सलीम इस हादसे से हकबका गए हैं. जिस रफ़्तार से सब हुआ उस पर उनको अब भी यकीन नहीं आता. वलसाड के मुस्लिम समाज ने उनका सम्मान करने का फैसला किया है. उनकी बहादुरी के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें छ: लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की है. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा है कि सलीम का नाम बहादुरी पुरस्कार के लिए भेजा जाएगा.


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