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उस राइटर की कहानी जिसके शब्द पाखंडी समाज के लिए अंगारे थे

ऑस्कर वाइल्ड- सच्चा दोस्त सामने से वार करता है

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ऑस्कर वाइल्ड का सम्मान करते हुए आयरलैंड गे मैरिज को कानूनी शक्ल देनेवाला दुनिया का पहला देश बना.
ऑस्कर वाइल्ड. सालों पहले गंगा नदी के किनारे बनी सरकारी लाइब्रेरी में जब ये नाम देखा था, तो दिमाग में बत्ती सी जल गई थी. ऑस्कर शब्द को तो हम भारतीय अवशोषित कर चुके हैं. और एक जवान होते भारतीय लड़के के लिए वाइल्ड शब्द बड़ा ही उत्प्रेरक था. तो नाम से ही मुझे प्यार हो गया था. ठीक उसी तरह जैसे इनके सबसे फेमस नाटक 'इम्पॉर्टेन्स ऑफ बिइंग अर्नेस्ट' में नायिका नायक से कहती है कि तुम्हारे नाम अर्नेस्ट की वजह से ही मुझे प्यार हो गया. नायक पूछता है कि अगर मेरा नाम अर्नेस्ट नहीं होता तो क्या तुम मुझे प्यार करती. ठीक वैसे ही जैसे कि अगर योगी नाम नहीं रहता तो क्या जोगिया वस्त्र फबता नेताजी पर? संतोष या रमेश या फूंकन या फिर बिलोचन रहता तो क्या फबता ये? अगर महामना, नेताजी, महात्मा, गुरू, चाचा, सरदार जैसे नाम नहीं दिये जाते तो क्या जनता पायलगी करने से पहले सोचती नहीं? ये सवाल मुझे पूछने का मौका नहीं मिला.

ऑस्कर लिख कर आंदोलन करने में विश्वास रखते थे
ऑस्कर लिखकर आंदोलन करने में विश्वास रखते थे

ऑस्कर का ख्याल फिर कुछ साल बाद आया, जब एक लड़की ने मेरा चरित्र चित्रण करते हुए कहा कि तुम लॉर्ड हेनरी की तरह हो. हमेशा गलत ही बोलते हो, पर कभी गलत करते नहीं. ये बात मुझे कुछ ज्यादा ही जंच गई. हेनरी ऑस्कर वाइल्ड की किताब का एक पात्र है. मैंने ऑस्कर को पढ़ना शुरू किया. और यकीन से कह सकता हूं कि एक युवा होते दिमाग के लिए ऑस्कर वाइल्ड से अच्छी खुराक नहीं हो सकती. जब हम स्कूलों में नैतिक होने के बारे में पढ़ते हैं और बाकी दुनिया को रात तो रात, दिन के उजाले में नैतिकता की परिभाषा बदलते देखते हैं तो दिमाग पागल सा हो जाता है. सच कहूं तो ऑस्कर वाइल्ड की किताबें पढ़ के बहुत सुकून मिला. लगा कि इतने बड़े इंटेलेक्ट का आदमी मेरे सबसे ज्यादा करीब है. ये एक बड़े लेखक की पहचान भी होती है. वो आपको खींच लेता है अपनी दुनिया में. इतना कि सालों बाद इस साल एक दूसरी लड़की ने फिर मुझसे कहा कि तुम लॉर्ड हेनरी की तरह हो. पर ऐसा नहीं है.
the picture of dorian gray
ऑस्कर वाइल्ड की उपन्यास 'द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे' का कवर

हेनरी तो ऑस्कर वाइल्ड के एकमात्र उपन्यास 'द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे' का एक पात्र है. ऑस्कर ने कहा था कि दुनिया उनको हेनरी समझती है, वो खुद को बेसिल की तरह देखते हैं पर वो खुद डोरियन ग्रे बनना चाहते हैं. पर मैं इनमें से कोई नहीं था. मैं हमेशा ऑस्कर वाइल्ड बनना चाहता था. जो समाज की किसी भी चीज पर सवाल कर सकता है. जो किसी का आशीर्वाद लेने नहीं जाता. जो राष्ट्रगान के लिए खड़े होने से मना कर सकता है और जब मन करे तो राष्ट्रगान मोबाइल में बजा के खुद खड़ा सकता है. कई बार बस ये देखने के लिए कि बाकी लोग क्या कहते हैं.
आज ऑस्कर वाइल्ड का जन्मदिन है. 1854 में जन्म हुआ था इनका. आइरिश मूल के थे. ब्रिटेन में पैदाइश थी. उस वक्त ब्रितानी राज में सूरज नहीं डूबता था. और शायद इसी चीज को दिखाने के लिए उन लोगों ने इंडिया में उसी वक्त पहली ट्रेन भी चलवाई थी. ऑस्कर के माता पिता दोनों अच्छी हैसियत रखते थे. माताजी तो लिखती भी थीं. तो ऑस्कर को किसी चीज की कमी नहीं रही थी. वो दौर था जब ब्रिटिश समाज पाखंड पर जीता था. सामाजिक पाखंड कूट-कूट के भरा था. जो हमने टाइटैनिक फिल्म में देखा था. जब केट विंस्लेट को उसकी मां कपड़ा पहना रही होती है, उस समय ये चरम पर दिखा था.
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| पढ़ने में बहुत ही तेज थे. ट्रिनिटी, ऑक्सफोर्ड सबमें पढ़े थे और वहीं तय कर लिया था कि लेखक बनेंगे.


ग्रेजुएट होने के बाद ऑस्कर आयरलैंड के डब्लिन चले गए. अपनी बचपन की दोस्त फ्लोरेंस से रोमांस करने. पर फ्लोरेंस ने ब्रैम स्टोकर से शादी कर ली. स्टोकर ने बाद में बेहद प्रसिद्ध उपन्यास 'ड्रैकुला' लिखा था. 1879 में ऑस्कर वापस लंदन आ गये. और 1881 में 'पोएम्स' नाम से पहली किताब खुद ही पब्लिश की. खूब चली ये किताब. ऑस्कर का नाम प्रसिद्धि पाने लगा. इनके लेखन में व्यंग्य जबर्दस्त रहता था. उस समय उलटा बोलने वाले यही थे ब्रिटेन में. कहा था कि पत्रकारिता और साहित्य में अंतर है कि पत्रकारिता पढ़ने लायक नहीं है और साहित्य को कोई पढ़ता नहीं. फेमस इतने हो गये कि कई अभिनेत्रियों से दोस्ती हो गई. फिर नाटक भी लिखने लगे. इस चक्कर में पेरिस और अमरीका भी हो आये. बहुत सारे दोस्त और दुश्मन दोनों बना लिए. 1884 में कॉन्स्टैंस मैरी लॉयड से शादी कर ली. फिर मैगजीन में काम करने लगे. पहले लिखा, फिर एडिटर बन गये.
ब्राम की लिखी किताब और उस पर बनी फिल्म का पोस्टर.
ब्राम की लिखी किताब और उस पर बनी फिल्म का पोस्टर.


पर ऑस्कर की कहानी ये नहीं है. नौकरी पाना, नौकरी खोना, नौकरी बदलना, शादी करना, बच्चे करना और मर जाना- ये सभी लोग करते हैं. पर जो आग खाता है, वो अंगार मूतता है. ऑस्कर ने तो समाज का जहर पीना शुरू कर दिया था.इस संदर्भ में ऑस्कर वाइल्ड का लिखा एक उपन्यास और एक नाटक जरूर जिक्र करने लायक है. जुलाई 1880 में ऑस्कर वाइल्ड ने लिखा 'द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे'. ये पहले एक मैगजीन में प्रकाशित हुआ. आलोचकों ने कहा कि इस लेखन में होमोसेक्सुआलिटी है. ये उपन्यास जला देने लायक है. और जैसा कि होता है, जो किताब जला देने लायक होती है, वो भभक के बिकती है. स्टॉक खत्म होते गये इस मैगजीन के.
कला जीवन का प्रतिरूप होती है. ये बात ऑस्कर के संदर्भ में ज्यादा सच है. शुरुआत में तो ऑस्कर वाइल्ड भी वैसी ही चीजें लिखते थे, जिसमें हमेशा असत्य पर सत्य की और बुराई पर अच्छाई की जीत होती थी. पर धीरे-धीरे उनके अंदर का राक्षस उनके बाहर के संत से लड़ने लगा. जैसा कि हमारे अंदर का राक्षस हमारे बाहर के संत से लड़ता है. और तब हम ये कहके कि जमाना खराब है, साफ बच निकलते हैं. ऑस्कर ने इसे छुपने नहीं दिया. 1891 में इनका पहला और आखिरी उपन्यास आया. 'द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे'. ये इनके पुराने लिखे हुए का परिमार्जित और ज्यादा खतरनाक संस्करण था.
द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे का कवर
'द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे' का कवर

उपन्यास में डोरियन ग्रे नाम का बेहद खूबसूरत नौजवान है. जो लगातार सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में भरोसा रखता है. उसका एक पेंटर दोस्त बेसिल उसकी एक पेंटिंग बनाता है. ये इतनी खूबसूरत होती है कि ग्रे सोचता है कि वो हमेशा इस पेंटिंग की ही तरह रह जाये. वो कहता है कि ऐसा बने रहने के लिए वो सबकुछ दे देगा. अपनी आत्मा भी. और उसकी ये इच्छा पूरी हो जाती है. ग्रे धीरे-धीरे हर गलत काम करने लगता है. उसको कोई पकड़ नहीं पाता. पर इन सारे कामों का नतीजा उसकी पेंटिंग पर पड़ता है. पेंटिंग दिनों-दिन खराब और कुरूप होती जाती है. बहुत दिनों के बाद जब ग्रे जिंदगी से निराश हो जाता है तो वो पेंटिंग को खत्म करने का निश्चय करता है. पर अंत में पता चलता है कि फर्श पर बूढ़े हो चुके ग्रे की लाश पड़ी हुई है और पेंटिंग पहले की तरह जवान हो चुकी है.
अपनी कुरूप होती पेंटिंग को देखता डोरियन.
अपनी कुरूप होती पेंटिंग को देखता डोरियन.

इस कहानी में लॉर्ड हेनरी का पात्र भी बहुत महत्वपूर्ण है. वो डोरियन ग्रे को लगातार बहकाता रहता है कि जीवन में मजे के अलावा कुछ नहीं रखा है. ये अलग बात है कि हेनरी कभी खुद कुछ नहीं करता, सिवाय बोलने के. उसकी जिंदगी का मजा है कि ग्रे उसके कहने पर कुछ कुछ करता रहता है. बेसिल हेनरी के प्रभाव से ग्रे को बचाने की कोशिश करता है. पर असफल रहता है. फिर एक दिन ग्रे बेसिल को मार देता है.
फिर 1895 में आया ऑस्कर वाइल्ड का नाटक 'द इम्पॉर्टेन्स ऑफ बिइंग अर्नेस्ट'. ये उस वक्त के विक्टोरियन सोसाइटी पर एक हमला था. विक्टोरियन मतलब पाखंडी समाज. जो एकदम संकीर्ण मानसिकता का था. शादी के लिए ये लोग सिर्फ पैसे और परिवार की इज्जत पर भागते थे. लड़के-लड़की के दिल में क्या है, इससे कोई मतलब नहीं था. लड़कियों की इज्जत पर विशेष जोर था. इतना कि लड़कियां तीन-तीन किलो के अंडरवियर पहनती थीं. कॉर्सेट पहनती थीं. इतना टाइट कि शरीर खराब हो जाता था इससे. तमाम बीमारियां हो जाती थीं. सुंदर दिखने पर इतना जोर था कि भयानक डाइटिंग करती थीं. भयानक मतलब इतना कि पेट में कीड़े पाल लेती थीं जान बूझ के कि मोटापा नहीं होगा इससे. ऑस्कर ने अपने समाज का बहुत मजाक बनाया इसमें. मजाक ही वो ज़रिया था जिससे ऑस्कर ब्रिटिश समाज पर हमला कर सकते थे. और ये सही भी साबित हुआ. लोगों ने इस नाटक को खूब देखा. इस नाटक में ऑस्कर ने ये भी लिखा था कि स्वर्ग में तलाक होते हैं. ये 'स्वर्ग में जोड़ियां बनती हैं' पर किया गया व्यंग्य था. ये भी लिखा कि सच्चाई शायद ही पवित्र होती है और सिंपल तो कतई नहीं होती.
द इम्पॉर्टेन्स ऑफ बिइंग अर्नेस्ट बुक कवर और उस पर बनी फिल्म का पोस्टर
द इम्पॉर्टेन्स ऑफ बिइंग अर्नेस्ट बुक कवर और उस पर बनी फिल्म का पोस्टर

इसके पहले ऑस्कर वाइल्ड ने लड़कियों के कपड़ों को लेकर एक लेख लिखा था. इसमें उन्होंने कहा था कि लड़कियों को पेटीकोट की जगह मर्दों की तरह दोनों पैरों वाले कपड़े पहनने चाहिए. इस चीज को उनकी पत्नी कॉन्स्टैंस ने आंदोलन सा बना दिया था. कुछ और साल लगे, फिर लड़कियों को भी अपनी पसंद के कपड़े पहनने का हक मिल गया.
तभी एक ऐसी घटना हुई जिसने ऑस्कर वाइल्ड के जीवन को एकदम बदल दिया. बदल क्या दिया, खत्म ही कर दिया.
1895 में जब इनके नाटक चरम पर थे, उसी साल ऑस्कर वाइल्ड पर मार्कीज ऑफ क्वीन्सबरी ने सोडोमाइट होने का आरोप लगाया. एक प्लकार्ड पर लिखकर एक क्लब में छोड़ आये. सोडोमाइट का मतलब वही था कि ये आदमी लड़कों में दिलचस्पी रखता है. और विक्टोरियन समाज में ये अपराध बेहद गंभीर था. जान से भी मारा जा सकता था इस चीज के लिए. अपना वक्त भूल गया है ब्रिटिश समाज. आज सबका मजाक बनाते हैं. ये बात इतनी बढ़ गई कि ऑस्कर वाइल्ड ने मानहानि का मुकदमा ठोक दिया. मानहानि का मुकदमा भी उस दौरान खूब चला था. विक्टोरियन समाज में ही. सबसे आयरॉनिकल यही था. हर किस्म की नैतिकता पर तलवार चलाने वाले ऑस्कर वाइल्ड को कोर्ट में जाकर नैतिक बनना पड़ा.
बात ये थी कि 1891 में ऑस्कर की दोस्ती लॉर्ड डगलस से हुई थी. दोनों लोगों को प्रेम हो गया आपस में. डगलस उनके ही सुपुत्र थे, जिन्होंने ऑस्कर पर आरोप लगाये थे. पर कोर्ट में एक पॉइंट के बाद ऑस्कर ने खुद का बचाव नहीं किया. सीधा द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे से उठाकर तर्क दे दिया. कहा कि ये पवित्र प्यार है. पर बात तो घूम फिर के पवित्र होने पर ही आ गई. लेखक को दुनिया जीने नहीं दे रही थी. पिताश्री ने अपने बेटे की एक कविता का हवाला दिया. जिसमें कुछ यूं लिखा था कि 'ये वो प्यार है, जो खुद को नाम देने की हिम्मत नहीं कर सकता'. पिताजी ने पूछा कि ये कौन सा प्यार है.
अपने दोस्त डगलस के साथ ऑस्कर
अपने दोस्त डगलस के साथ ऑस्कर

इस बात पर जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति मुगाबे की याद आती है. जनवरी 2017 में मुगाबे ने दो समलैंगिकों को जेल में डाल दिया. खूब शोर मचा तो कहा कि दोनों को छोड़ दूंगा पर जेल में दोनों में से कोई एक गर्भवती होके दिखा दे तो. जब आप मान के चलेंगे कि केसरिया साहस और त्याग का प्रतीक है, तो आप ये महसूस ही नहीं कर पायेंगे कि हरा रंग आंखों को सबसे ज्यादा आराम देता है. तो कहने का मतलब है कि पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाने पर कोई तर्क काम नहीं आता. जज ने कहा कि इतना गंदा मुकदमा तो मैंने जिंदगी में नहीं देखा. ऑस्कर वाइल्ड को दो साल के सश्रम कारावास की सजा हुई. जेल में ऑस्कर ने लिखने पढ़ने का काम किया. अपराधियों के ऊपर एक बहुत ही मार्मिक कविता लिखी. पर जेल से छूटने के बाद जिंदगी खत्म हो गई. पैसा नहीं था, इज्जत चली गई थी. पेरिस के एक छोटे से कमरे में किराये पर रहने लगे. तीन साल बाद 1900 में ऑस्कर की अकेलेपन में मौत हो गई. पत्नी और बच्चों को समाज के ताने से डरकर आयरलैंड चले जाना पड़ा था.
सच तो ये है कि विक्टोरियन समाज के झूठे दंभ ने ऑस्कर वाइल्ड की हत्या कर दी थी. बाद में ऑस्कर वाइल्ड का सम्मान करते हुए आयरलैंड गे मैरिज को कानूनी शक्ल देनेवाला दुनिया का पहला देश बना.
ऑस्कर वाइल्ड के लेखन में विट, आयरनी, स्टाइल, एपिग्राम और बाकी सारे हल्के-भारी साहित्यिक तंत्र मंत्र मिलते हैं. इतने कि कोई खतरनाक सा दिखनेवाला कोट अपने आप ऑस्कर वाइल्ड के खाते में चला जाता है. ये खूबी आई इसलिए कि ऑस्कर ये मानते थे कि कला बस कला के लिए होती है. कला का मकसद सुधार करना नहीं है. कला बस रचने के लिए है. इसके लिए उन्होंने आंदोलन भी चलाया था. आंदोलन मतलब अकेले कहते रहते थे. साहित्यिकों ने इसे आंदोलन कहा था. वो धरना-प्रदर्शन नहीं करते थे. लिखनेवाला लिख के ही प्रतिरोध करेगा.



ये आर्टिकल ऋषभ ने लिखा है.


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