लेकिन असल बात ये है कि हम में से किसी को भी नहीं पता की इस खेल की हमारे देश में क्या हालत है. ये बात समझने के लिए आप किसी भी अखाड़े में जाकर देख सकते हैं. अखाड़े मतलब वो जगह जहां रेसलिंग सिखाई जाती है. जहां से पहलवान निकलते हैं. इन अखाड़ों की हालात इतनी बुरी है कि कोई भी पैरेंट अपने बच्चे को चाहकर भी वहां नहीं भेज पाता. काबिल कोच हैं, लेकिन समस्या है इंफ्रास्ट्रक्चर की. कई अखाड़ों की तो बंद होने तक की नौबत आ गई है और जो कुछ चल रहे हैं वो भगवन भरोसे हैं. ज़्यादातर अखाड़ों का यही हाल है.
किस हालत में हैं अखाड़े ?
नॉर्थ दिल्ली अखाड़ों का गढ़ है. वहां कई अखाड़े हैं - छत्रसाल स्टेडियम का अखाड़ा, चंदगीराम अखाड़ा, गुरु हनुमान अखाड़ा वगैरह. इनके अलावा कुछ छोटे अखाड़े भी हैं, जिनका नाम ज़्यादातर लोगों को नहीं पता है. सरकारी लोगों को भी नहीं. तो होता ये है कि बड़े अखाड़ों को तो सरकारी मदद मिल जाती है लेकिन छोटे वाले छोटे ही रह जाते हैं, माने उन्हें सरकारी मदद नहीं मिल पाती.

चंदगी राम अखाड़ा में हर साल दंगल का आयोजन होता है.
इन छोटे अखाड़ों में जाने पर पता चलता है कि ये लोग कितनी मुश्किल से ट्रेनिंग और कोचिंग दे रहे हैं. इनके लिए रेसलिंग मैट और एयर-कंडिशन्ड हॉल भी अफोर्ड कर पाना मुमकिन नहीं हैं. ये अपने यहां के बच्चों को अभी भी मिट्टी में ही अभ्यास करवाते हैं. कुछ अखाड़े हैं जिन्होंने मैट तो खरीद लिए हैं लेकिन एयर-कंडिशन्ड हॉल बनवाने की हालत में नहीं हैं, जिसके चलते वो मैट भी पड़े-पड़े बर्बाद हो रहे हैं. ऐसे मैट्स का एक बंडल हम अर्जुन अवार्ड से सम्मनित संजय पहलवान के अखाड़े में देख सकते हैं. इन अखाड़ों में कुश्ती के लिए ज़रूरी उपकरणों और बेसिक फैसिलिटी तक की दिक्कत है.

रेसलिंग मैट पर प्रैक्टिस करते पहलवान.
सरकार का भी नहीं है ध्यान
मेल टुडे से बात करते हुए संजय पहलवान अखाड़े के कोच जगबीर सिंह ने बताया,
'अब खेल बदल चुका है. हमें बच्चों को ट्रेन करने के लिए मैट और एयर-कंडिशन्ड हॉल चाहिए. क्योंकि दिल्ली में 8 महीने तो गर्मी ही रहती है. और इस गर्मी में इन बच्चों को टिन की छत के नीचे ट्रेनिंग दे पाना संभव नहीं है. हमें सरकार और फेडरेशन से भी कोई मदद नहीं मिलती. वो सिर्फ बड़े और नामी अखाड़ों को सुविधाएं और मदद देते हैं.'इंटरनेशनल रेफरी जगबीर सिंह ने मेल टुडे से आगे बात करते हुए कहा,
'अखाड़े से बच्चे कम होते जा रहे हैं. क्योंकि हमारे पास फैसिलिटी नहीं है. यहां पर सिर्फ हरियाणा से बच्चे आते हैं क्योंकि लोकल पैरेंट्स अपने बच्चों को हमारे यहां नहीं भेजते हैं. हमने अपने पैसों से मैट तो खरीद ली हैं लेकिन उन्हें बिछाने के लिए एयर-कंडिशन्ड हॉल कहां से लाएं?'45 साल पुरानी आर्यावर्त व्यायामशाला की हालत इतनी ख़राब है कि इसके बंद होने की नौबत आ गई है. इस अखाड़े के एक पहलवान ने बताया कि
'आज की जनरेशन के बच्चों को लगता है कि मिट्टी में कुश्ती लड़ना ओल्ड-फैशन्ड और वेस्ट ऑफ़ टाइम है. इसीलिए आज-कल बहुत सारे अखाड़ों ने अपने यहां पर मॉडर्न जिम बनवा लिए हैं.'

मिट्टी में कुश्ती लड़ते बच्चे. (Source:Christian Science Monitor)
यहां से कुछ ही दूरी पर मशहूर चंदगी राम अखाड़ा है. यहां हाल ही में रेनोवेट करवाकर एसी हॉल और मैट लगवाया गया है. इसके मालिक और चंदगीराम जी के बेटे जगदीश ने बताया कि
'बदलाव समय की मांग है. अगर हमें इंटरनेशनल रेस्लर्स से लड़ना है तो उनकी ही तरह अपडेटेड रहना होगा. नियम बदल गए हैं और रेसलिंग भी. इसलिए हमें खुद को भी समय के साथ ढालना होगा ताकि इंडियन रेस्लर्स इंटरनेशनल इवेंट्स में और मेडल जीत सकें. सरकार ने हमें मैट और कोच के लिए पैसे दिए हैं लेकिन हमें आपने हॉल खुद ही बनवाए हैं. जो मॉडर्न तरीके के हैं.'

जगदीश कलिरमन ने ही सलमान खान को उनकी फिल्म 'सुल्तान' के लिए कुश्ती की ट्रेनिंग दी थी (फोटोःट्विटर).
भारत केसरी जगदीश ने आगे बात करते हुए कहा कि 'अाज-कल रेसलिंग खासी पॉपुलर हो गई है तो फेडरेशन को इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने पर ज़ोर देना चाहिए ताकि और भी युवा इस खेल से जुड़ें.'
क्या कहते हैं अधिकारी?
इस मामले पर 'रेसलिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया' (Wrestling Federation of India) के असिस्टेंट सेक्रेटरी विनोद तोमर का ये कहना है, 'फेडरेशन कुश्ती को सपोर्ट करने के लिए हर कदम पर तैयार रहता है. हमें जैसे ही पता चलता है कि किसी अखाड़े को किसी चीज़ ज़रूरत है तो हम उन्हें तुरंत वो मुहैया करवाते हैं. हमें उन्हें मैट भी देते हैं.'
ओलंपिक और कोलंबिया जैसे मंचों पर मेडल्स का सूखा कुश्ती ने दूर किया है. लेकिन अभी भी हमें इस खेल के बुनियादी लेवल पर बहुत काम करने की जरुरत है. जिससे हम इस खेल को वो दे सकें जो इसने हमें दिया है.
ये स्टोरी श्वेतांक शेखर ने की है.
























