जब देश में सब कुछ पटरी पर लौट आया था, दफ्तरों में चहल-पहल शुरू हो गई थी और बच्चे स्कूल बस के पीछे भागने लगे थे, तभी अचानक 'वर्क फ्रॉम होम' (WFH) और 'ऑनलाइन क्लास' की चर्चा फिर से गर्म हो गई. लेकिन इस बार वजह कोरोना नहीं, बल्कि वो आग है जो पेट्रोल पंपों पर लगने वाली है. प्रधानमंत्री ने जब हाल ही में राज्यों के साथ बैठक की, तो उन्होंने तेल बचाने और खपत कम करने पर जोर दिया. इसके पीछे का असली गणित ये है कि हमारी सरकारी तेल कंपनियां उस मोड़ पर खड़ी हैं, जहां से आगे सिर्फ और सिर्फ घाटे की खाई है.
वर्क फ्रॉम होम से कैसे बचेगी तेल कंपनियों की डूबती नैया? पीएम मोदी की अपील और 1.2 लाख करोड़ का खेल
कल्पना कीजिए कि आप एक दुकानदार हैं. आप सामान खरीद रहे हैं 100 रुपये में, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि आपको उसे 70 रुपये में ही बेचना पड़ रहा है. अब आप ये धंधा कितने दिन चला पाएंगे? भारत की सरकारी तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) के साथ अभी यही हो रहा है.


कल्पना कीजिए कि आप एक दुकानदार हैं. आप सामान खरीद रहे हैं 100 रुपये में, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि आपको उसे 70 रुपये में ही बेचना पड़ रहा है. अब आप ये धंधा कितने दिन चला पाएंगे? ‘रॉयटर्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की सरकारी तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) के साथ अभी यही हो रहा है. दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, लेकिन भारत में चुनाव और आम आदमी की नाराजगी के डर से दाम उस हिसाब से नहीं बढ़े. नतीजा ये कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है.
1.2 लाख करोड़ का घाटा: ये नंबर आपको डराने के लिए काफी है
आम तौर पर जब हम घाटे की बात करते हैं, तो कुछ करोड़ों में बात रुक जाती है. लेकिन यहां मामला 1,20,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है. ये वो पैसा है जो तेल कंपनियों ने अपनी जेब से भरा है ताकि आपके स्कूटर और कार का तेल महंगा न हो. ‘रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया’ के दस्तावेजों के मुताबिक इसे तकनीकी भाषा में 'अंडर-रिकवरी' कहते हैं. मतलब लागत और बिक्री के बीच का वो अंतर जो कंपनियों ने सहा है.
अगर तेल की कीमतें इसी रफ्तार से बढ़ती रहीं और भारत में खुदरा दाम (Retail Prices) नहीं बढ़े, तो इन कंपनियों की 'नेट वर्थ' यानी कुल कीमत अगले कुछ ही महीनों में नेगेटिव हो सकती है. अभी इन कंपनियों की कुल नेट वर्थ करीब 3.48 लाख करोड़ रुपये है. अगर घाटा इसी तरह हर महीने 20-25 हजार करोड़ बढ़ता रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब ये कंपनियां दिवालिया होने की कगार पर आ जाएंगी. यही वो डरावना सच है जिसकी वजह से सरकार अब हाथ-पांव मार रही है.
पीएम की अपील और अर्थशास्त्र: वर्क फ्रॉम होम ही क्यों?
अब आप सोच रहे होंगे कि तेल बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम का क्या कनेक्शन? ‘नीति आयोग’ के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का 85 परसेंट से ज्यादा कच्चा तेल आयात (Import) करता है. हमारी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ट्रांसपोर्ट पर निर्भर है. जब लाखों लोग दफ्तर जाने के लिए गाड़ियां निकालते हैं और हजारों बसें बच्चों को स्कूल ले जाती हैं, तो डीज़ल और पेट्रोल की खपत रॉकेट की तरह ऊपर जाती है.
प्रधानमंत्री जानते हैं कि अगर 20 परसेंट आबादी भी घर से काम करने लगे, तो देश के तेल आयात बिल में अरबों डॉलर की कमी आ सकती है. ये सिर्फ कंपनियों का घाटा कम करने की बात नहीं है, ये देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) को बचाने की भी बात है. रूस-यूक्रेन संकट के बाद से सप्लाई चेन टूट गई है. ऐसे में 'तेल बचाओ' ही 'पैसा बचाओ' का सबसे कारगर मंत्र बन गया है.
क्या हम फिर से घरों में कैद होने को तैयार हैं?
एक तरफ सरकार की मजबूरी है, तो दूसरी तरफ मिडिल क्लास की अपनी उलझन. दो साल के लॉकडाउन के बाद लोग बाहर निकलना चाहते थे. लेकिन अब जब पेट्रोल 100 के पार और कई शहरों में 110-115 रुपये के स्तर पर है, तो वर्क फ्रॉम होम एक 'वरदान' की तरह दिखने लगा है.
एक औसत कर्मचारी जो महीने में 10 से 15 हजार रुपये सिर्फ आने-जाने और बाहर खाने पर खर्च करता था, उसके लिए वर्क फ्रॉम होम का मतलब है सीधी बचत. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. ऑनलाइन स्कूल की वजह से बच्चों के सामाजिक विकास पर असर पड़ा है. माता-पिता परेशान हैं कि घर और दफ्तर को एक साथ कैसे संभालें.
‘वर्ल्ड बैंक’ के मुताबिक समाजशास्त्रियों का मानना है कि ये फैसला सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है.
तेल कंपनियों की बैलेंस शीट का बिगड़ा खेल
सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) का बिजनेस मॉडल बहुत सीधा है. वे कच्चा तेल खरीदते हैं, उसे रिफाइन करते हैं और फिर बेचते हैं. लेकिन भारत में ये कंपनियां पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं. ‘मनी कंट्रोल’ के मुताबिक सरकार अक्सर महंगाई को काबू में रखने के लिए इन्हें दाम न बढ़ाने का 'अनौपचारिक' निर्देश देती है.
दिक्कत ये है कि इन कंपनियों को भी तो अपना खर्च चलाना है. नई रिफाइनरी लगानी है, पाइपलाइन बिछानी है और ग्रीन एनर्जी की तरफ शिफ्ट होना है. अगर इनका मुनाफा खत्म हो गया, तो ये भविष्य के प्रोजेक्ट्स में निवेश नहीं कर पाएंगी. जानकारों का कहना है कि अगर घाटा 1.5 लाख करोड़ पार कर गया, तो सरकार को इन्हें बचाने के लिए 'बेलआउट पैकेज' देना होगा, जो अंततः टैक्सपेयर्स यानी आपकी और हमारी जेब से ही जाएगा.
पक्ष और विपक्ष: क्या ये स्थायी समाधान है?
विपक्ष का तर्क है कि सरकार टैक्स कम क्यों नहीं करती? पेट्रोल-डीज़ल पर केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर भारी भरकम टैक्स वसूलती हैं. अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी में कटौती करे, तो तेल कंपनियों को भी राहत मिलेगी और जनता को भी. लेकिन सरकार का कहना है कि ये टैक्स का पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर, मुफ्त अनाज योजना और रक्षा बजट में जाता है.
वहीं, ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि वर्क फ्रॉम होम एक 'स्टॉप-गैप' अरेंजमेंट है, यानी कुछ समय के लिए राहत देने वाला कदम. ये लंबे समय तक अर्थव्यवस्था को नहीं चला सकता. अगर लोग घर बैठ जाएंगे, तो ऑटोमोबाइल सेक्टर, रियल एस्टेट और सर्विस इंडस्ट्री (जैसे रेस्टोरेंट और कैब सर्विस) को भारी नुकसान होगा. यानी एक छेद बंद करने के चक्कर में कहीं पूरी नाव में दरार न आ जाए.
क्या बदल सकता है: भविष्य का रोडमैप
आने वाले दिनों में हम कुछ बड़े बदलाव देख सकते हैं. पहली बात तो ये कि सरकार 'हाइब्रिड वर्क कल्चर' को कानूनी मान्यता देने पर विचार कर सकती है. दूसरी बात, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) के लिए सब्सिडी और तेज की जा सकती है. तीसरा, पब्लिक ट्रांसपोर्ट को इतना बेहतर बनाने की कोशिश होगी कि लोग अपनी निजी कारें घर पर ही छोड़ दें.
The International Energy Agency (IEA) के मुताबिक अर्थशास्त्रियों की मानें तो भारत को अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए पुराने ढर्रे को छोड़ना ही होगा. जब तक हम तेल के लिए खाड़ी देशों या रूस पर निर्भर रहेंगे, हमारी अर्थव्यवस्था इसी तरह हिचकोले खाती रहेगी. वर्क फ्रॉम होम शायद उस बड़े बदलाव की पहली सीढ़ी है, जहां हम कम ऊर्जा खर्च करके ज्यादा आउटपुट देने की कोशिश करेंगे.
आम आदमी के लिए सलाह: अब क्या करें?
अगर आप एक कामकाजी व्यक्ति हैं, तो अपने दफ्तर से हाइब्रिड मॉडल की मांग करना बुरा विकल्प नहीं है. इससे न सिर्फ आपका पेट्रोल बचेगा, बल्कि आप तेल कंपनियों और देश की अर्थव्यवस्था की भी मदद करेंगे. स्कूलों के मामले में, पूरी तरह ऑनलाइन के बजाय 'ब्लेंडेड लर्निंग' (कुछ दिन स्कूल, कुछ दिन घर) एक बेहतर रास्ता हो सकता है ताकि बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक जीवन में संतुलन बना रहे.
अंत में, सच यही है कि तेल का खेल अब सिर्फ कीमतों तक सीमित नहीं रहा. ये हमारे जीने के तरीके, हमारे काम करने के अंदाज और हमारे बच्चों के भविष्य से जुड़ गया है. सरकार की ये अपील भले ही आज कड़वी दवा लगे, लेकिन तेल कंपनियों के 1.2 लाख करोड़ के घाटे को देखते हुए ये एक मजबूरी बन गई है.
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समाधान की ओर
वर्क फ्रॉम होम सिर्फ एक सुविधा नहीं, अब एक आर्थिक ढाल है. तेल कंपनियों का घाटा अगर कम नहीं हुआ, तो आने वाले समय में महंगाई का ऐसा उबाल आएगा जिसे संभालना नामुमकिन होगा. प्रधानमंत्री की अपील के पीछे छिपा अर्थशास्त्र हमें आगाह कर रहा है कि तेल की हर बूंद अब कीमती है. हमें अपनी आदतों को बदलना होगा, वरना ये घाटा हमारी पूरी इकोनॉमी को निगल सकता है.
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