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द्रविड़ ग्लव्स पहन के बना रहे थे नोट्स!

कॉलेज के दिन में एक दिन ग्लव्स पहने पहने ही क्लास पहुंच गए राहुल द्रविड़. पूरा दिन गलाव पहन कर ही घूमे. नोट्स भी बनाये तो ग्लव्स से कलम पकड़ कर.

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फोटो - thelallantop
राहुल द्रविड़ ने अपने कॉलेज के दौरान कभी भी रेगुलर क्लासेज़ नहीं अटेंड कीं. वैसे हर खिलाड़ी ऐसा ही करता है. कुछ नया नहीं है. वो ज़्यादातर टाइम नेट्स में प्रैक्टिस करते हुए बिता देते थे. उस दौरान वो कर्णाटक की ओर से रणजी ट्राफी खेल रहे थे. एक दिन अचानक ही राहुल द्रविड़ क्लास का मुंह देख लेते हैं. वो क्लास में आये और बैठ कर नोट्स लिखने लगे. ये कम आश्चर्य की बात नहीं थी कि वो क्लास में आये हुए हैं और नोट्स लिख रहे हैं. कुछ और भी था जो उससे ज़्यादा अजीब था. वो ये था कि नोट्स बनाने के दौरान उन्होंने बैटिंग ग्लव्स पहन रक्खे थे! उन्हें लिखने में काफी परेशानी हो रही थी लेकिन वो लिखे जा रहे थे. आस पास बैठे लड़के लड़कियां मुस्कुरा रहे थे, कोई हंस रहा था तो कुछ आपस में खुसुर पुसुर करने लगे. एक आध ने तो ये भी सोच ही लिया होगा कि लड़का पागल हो गया है शायद. द्रविड़, चूंकि राहुल द्रविड़ थे, इसलिए वो इन सबकी परवाह लिए बगैर बस लिखते गए. एक घंटे तक. घंटा बीतने के बाद राहुल अपनी जगह से उठे, ग्लव्स नहीं उतारे, और अपने एक दोस्त के पास पहुंचे. उसका नाम आदर्श था. इक्ज़ाम आने वाले थे और राहुल ने नोट्स बनाये ही नहीं थे. इसलिए उन्होंने आदर्श से अकाउंट्स के नोट्स मांगे. उन्होंने कहा कि उनकी कॉपी करके वो उसे वापस कर देंगे. आदर्श को मिला मौका और उसने राहुल से पूछ ही लिया कि भइय्या ये ग्लव्स पहन कर नोट्स मांगने का कौन सा नया शौक चढ़ा है? अनुपमा को इम्प्रेस करना है क्या? अनुपमा उनकी क्लास की सबसे खूबसूरत लड़की थी. इसपर राहुल ने कहा "नहीं नहीं. मुझे अनुपमा को इम्प्रेस करने की ज़रुरत नहीं है वो ऑलरेडी मुझसे इम्प्रेस हो चुकी है." इसके बाद उन्होंने जो बताया वो शायद हम सभी को बचपन में किसी क्लास में मॉरल साइंस की क्लास में भारत की महान विभूतियों के बारे में बात करते हुए पढ़ाना चाहिए. उन्होंने कहा कि पिछले दो रणजी मैचों में वो जिस ग्लव्स को पहन कर खेल रहे थे वो थोड़े ढीले हो गए थे. इसलिए शॉट लगाते वक़्त वो थोड़ा सा हिलते हैं और जब भी कभी गेंद उनके ग्लव्स को बिना छुए पास से गुज़र जाती थी तब भी ग्लव्स के ढीले होने की वजह से उसमें एक हल्की सी स्निक की आवाज़ आती थी. ऐसे में कीपर अपील करता था और अंपायर आउट दे देता था. इसलिए उन्होंने वो नए ग्लव्स खरीदे हैं और अब वो चाहते हैं कि उन्हें अगले मैच के पहले उन नए ग्लव्स की आदत पड़ जाए. अगला मैच दो दिन बाद था. उन्होंने कहा, "मेरे पास 48 घंटे हैं इन ग्लव्स की आदत डालने के लिए."

"मैं चाहता हूं मैं इन ग्लव्स में अपना पसीना बहाऊँ. अगले दो दिन मैं इन ग्लव्स को न ही निकलूंगा और न ही किसी और को निकालने दूंगा. मैं पढूंगा, लिखूंगा, खाऊंगा, घूमूंगा तो सिर्फ इन ग्लव्स को पहन कर."

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"इसीलिए मैं इन ग्लव्स को पहन कर क्लास में नोट्स भी बना रहा हूँ. मुझे किसी भी हालत में अगले मैच में अच्छा करना है और उसके लिए ज़रूरी है कि मुझे इन ग्लव्स में कम्फर्टेबल महसूस करना चाहिए. उसके लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी है." राहुल द्रविड़ को नोट्स मिलते हैं, वो उनकी ज़ेरॉक्स करवाते हैं. शाम को नेट्स में प्रैक्टिस करते हैं. अगले दिन भी प्रैक्टिस करते हैं. तीसरे दिन कर्णाटक बनाम सौराष्ट्र का मैच. रणजी ट्रॉफी सेमीफाइनल. राहुल द्रविड़ 48 घंटे ग्लव्स पहनने के बाद उन्हीं ग्लव्स के साथ बैटिंग करते हैं. सेंचुरी मारते हैं. कर्नाटक मैच जीतता है. फाइनल में दिल्ली के खिलाफ़ राहुल फिर सेंचुरी मारते हैं. रणजी ट्रॉफी ख़त्म होने पर उनके पास फ़ोन आता है और उन्हें बताया जाता है कि उनका इंडियन क्रिकेट टीम में सेलेक्शन हो गया है. वही ग्लव्स लेकर वो इंग्लैंड में पहला टेस्ट खेलते हैं. और पहले ही मैच में सातवें नम्बर पे बैटिंग करने उतरे द्रविड़ 95 रन बनाकर आउट हो जाते हैं. इसके बाद जो हुआ वो इंडियन क्रिकेट ही नहीं बल्कि वर्ल्ड क्रिकेट के इतिहास का हिस्सा बन चुका है. Untitled-1 मुझे नहीं मालूम राहुल द्रविड़ ने इतना सारा पैशन किसके हिस्से से उधार लिया है और ज़िम्मेदारी की फीलिंग उनमें किस हद तक भरी है. आपको टेस्ट मैच बचाना हो, आप राहुल द्रविड़ को ढूंढते थे. कीपर नहीं है, राहुल द्रविड़ कीपिंग ग्लव्स लेकर कीपिंग करने लगते थे. कैप्टन बन जाते हैं तो कभी टी-ट्वेंटी मैच में टेस्ट मैच का खब्बू बल्लेबाज लगातार तीन छक्के जड़ देता है. आईपीएल की सबसे सस्ती टीम राजस्थान रॉयल्स को क्या से क्या बना देते हैं. इंडिया के अंडर 19 के लड़कों को ट्रेन करके उन्हें फाइनल खिला दिया.

राहुल द्रविड़ खिलाड़ी नहीं वो गीली मिट्टी हैं जिससे अक्सर बच्चों को खेलते देखा जा सकता है. आपको उसे जो शेप देना है दे दीजिये.


ये वो हैं जो रिटायर होते वक़्त अपनी बात क्रिकेट फैन्स पर लाकर ख़त्म करते हैं और कहते हैं कि क्रिकेट का गेम इन फैन्स को पाकर लकी बन पाया है वो खुद को हमारे सामने खेलकर किस्मती मानते हैं.

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