तो, आज हम बात करेंगे,
- 1970 में पाकिस्तान सरकार ने मुजीबुर रहमान के साथ क्या किया था?
- इमरान उस इतिहास की याद क्यों दिला रहे हैं?
- और, लॉन्ग मार्च के ज़रिए इमरान करना क्या चाहते हैं?
आज हम 1970 के पाकिस्तान के आम चुनाव की बात करेंगे.
पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं.
साल 1966. पाकिस्तान पर अयूब ख़ान का शासन चल रहा था. पूर्वी पाकिस्तान को लेकर अधिकतर नीतियां पश्चिमी पाकिस्तान से ही तय होती थीं. इसमें पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की भूमिका नहीं के बराबर थी. इस वजह से उनके अंदर असंतोष पैदा हो रहा था. जून 1966 में उनके सब्र का बांध टूट गया. अवामी लीग पूर्वी पाकिस्तान की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी थी. उसने देशभर में हड़ताल बुलाने का फ़ैसला किया. इसमें पूर्वी पाकिस्तान की दूसरी छोटी-मोटी पार्टियां भी शामिल हुईं. उन्होंने छह मांगें पेश कीं.
मसलन,
फ़ेडरेशन ऑफ़ पाकिस्तान के अंतर्गत दो स्टेट्स की स्थापना की जाए.
केंद्र सरकार सिर्फ़ विदेश और रक्षा संबंधी मामलों को डील करे.
दो अलग करेंसी बनाई जाए. अगर ये संभव ना हो तो पूरे देश के लिए एक करेंसी बने.
पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान में अलग-अलग सेंट्रल बैंक की स्थापना हो.
विदेशी मुद्रा में होने वाली कमाई के लिए अलग-अलग अकाउंट्स बने.
टैक्स का अधिकार फ़ेडरल स्टेट्स को मिले.
और, पूर्वी पाकिस्तान के पास अपनी सेना रखने का अधिकार मिले. साथ ही, पाकिस्तानी नौसेना का मुख्यालय ईस्ट पाकिस्तान में बनाया जाए.
पाकिस्तान सरकार ने इन मांगों को सिरे से खारिज कर दिया. लेकिन आगे चलकर ये बड़ा गुल खिलाने वाला था. मोहम्मद अब्दुल वदूद भुइयां ने अपनी किताब ‘इमर्जेंस ऑफ़ बांग्लादेश एंड रोल ऑफ़ अवामी लीग’ में लिखा,
‘अवामी लीग की छह-सूत्रीय मांगों के प्रति अयूब सरकार का रवैया दमनकारी था. अयूब सरकार एक बार फिर से राजनैतिक मांगों के सामने फ़ेल साबित हुई थी.’
अयूब ने अवामी लीग के आंदोलन को विभाजनकारी और अलगाववादी बताकर टालने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि अगर मांगें मानी गईं तो बंगाली मुस्लिमों पर हिंदुओं का दबदबा हो जाएगा. ये भी बोले कि अगर ज़रूरत पड़ी तो हम हथियारों की भाषा में बात करेंगे.
उस दौर में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो पाकिस्तान के विदेश मंत्री हुआ करते थे. भुट्टो एक कदम और आगे निकल गए. उन्होंने शेख़ मुजीब को बहस की चुनौती दी. मुजीब के नंबर दो ताजिउद्दीन अहमद ने चुनौती स्वीकार कर ली. बाद में भुट्टो अपनी बात से पलट गए.
अयूब सरकार ने 1966 वाला प्रोटेस्ट तो दबा दिया था. उन्होंने शेख़ मुजीब को फ़र्ज़ी केस में फंसाकर जेल में रखने की कोशिश भी की. लेकिन ये बहुत काम नहीं आया. 1969 की शुरुआत में पूर्वी पाकिस्तान में प्रोटेस्ट का सिलसिला ज़ोर पकड़ने लगा. कई जगहों पर सेना और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प की रपटें भी आने लगी. इन घटनाओं ने राष्ट्रपति अयूब ख़ान की कुर्सी सरका दी. अयूब को इस्तीफा देना पड़ा. जाते-जाते उन्होंने अपनी कुर्सी एक और मिलिटरी जनरल याहया ख़ान को सौंप दी. उन्हें चुनाव कराने का ज़िम्मा दिया. लेकिन याहया को चुनाव से कोई मतलब नहीं था. उन्होंने संविधान भंग कर पूरे मुल्क़ में मार्शल लॉ लगा दिया. ख़ुद मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बन गए.
याहया चुनाव कराने के इच्छुक नहीं थे. लेकिन उनके ऊपर दबाव बढ़ रहा था. उन्हें ये बताया गया था कि चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा. सिर्फ गठबंधन सरकार बन सकती है. इसे याहया आसानी से कंट्रोल कर सकते थे. जब उन्हें भरोसा हो गया कि अवामी लीग कुछ नहीं कर पाएगी, तब उन्होंने चुनाव कराने का ऐलान कर दिया. ये पाकिस्तान के इतिहास का पहला आम चुनाव होने वाला था.
इसमें नेशनल असेंबली की 300 सीटों के लिए मतदान होना था. इनमें से 138 सीटें पश्चिमी पाकिस्तान में थीं, जबकि 162 सीटें पूर्वी पाकिस्तान में. चुनाव में टोटल 24 पार्टियों ने हिस्सा लिया. लेकिन मुक़ाबला दो मुख्य पार्टियों के बीच था. ये दो पार्टियां थीं - ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) और शेख़ मुजीब की अवामी लीग. PPP का दबदबा पश्चिमी पाकिस्तान में था, जबकि अवामी लीग पूर्वी पाकिस्तान में मज़बूत थी. ये पैटर्न चुनाव में साफ-साफ दिख रहा था. PPP ने पूर्वी पाकिस्तान में एक भी कैंडिडेट खड़ा नहीं किया था. जबकि अवामी लीग ने वेस्ट पाकिस्तान में जगह खाली छोड़ दी थी.
जब नतीजे आए तो याहया ख़ान और भुट्टो को बड़ा सदमा लगा. उनका आकलन ग़लत साबित हुआ था. भुट्टो की PPP सिर्फ 81 सीटों पर सिमट गई थी. शेख मुजीब की अवामी लीग ने बड़ा हाथ मारा था. उनके खाते में 160 सीटें आईं थी. अवामी लीग के पास स्पष्ट बहुमत था. पार्टी सरकार बनाने के लिए बुलावे का इंतज़ार कर रही थी. इन सबके बीच 17 दिसंबर 1971 को मुजीब का बड़ा बयान आया. उन्होंने कहा कि कोई भी ताक़त बांग्लादेश बनने से नहीं रोक सकती. भुट्टो तैयार बैठे थे. उन्होंने कह दिया कि उनके समर्थन के बिना ना तो कोई सरकार नहीं चलेगी, और, ना ही कोई संविधान बनेगा.
याहया ख़ान असमंजस में थे. उन्होंने नतीजों के 120 दिनों के भीतर नया संविधान बनाने का वादा कर दिया था. लेकिन वो भुट्टो की नाराज़गी भी मोल नहीं सकते थे. इससे बचने के लिए वो भुट्टो से मिलने कराची गए. मीटिंग के बाद ऐलान हुआ कि नेशनल असेंबली का पहला सत्र ढाका में होगा. उधर, शेख मुजीब ढाका को सत्ता का केंद्र बनाना चाहते ते. उनका कहना था कि जो कोई मुझसे मिलना चाहता है, वो ढाका आए.
12 जनवरी 1971 को याहया शेख मुजीब से मिलने ढाका पहुंचे. कराची लौटकर उन्होंने कहा कि मुजीब अगले प्रधानमंत्री होंगे. याहया ने फिर भुट्टो से भी मुलाक़ात की. उन्होंने सलाह दी कि ढाका जाकर शेख़ मुजीब से मिलें. इस मीटिंग में कई और विकल्पों पर भी चर्चा हुई. एक ऑप्शन ये भी था कि सारी पार्टियां मिलकर सरकार बनाएं. लेकिन ये ना होना था और ना हुआ.
बांग्लादेश की मांग तेज़ होती गई. पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने झुकने से मना कर दिया. उन्होंने चुनावी नतीजों को दरकिनार कर दिया था. 25 मार्च 1971 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन सर्चलाइट को हरी झंडी दिखाई थी. पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली राष्ट्रवाद के आंदोलन को कुचलने की शुरुआत की गई थी. आंदोलन के प्रणेता शेख़ मुजीबुर रहमान को गिरफ़्तार कर लिया गया था. इसके बाद उनके साथियों को तलाश कर बेरहमी से मारा जाने लगा. अत्याचार के शिकार लोग भागकर भारत आने लगे. भारत सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान से लगी अपनी सीमा खोल दी थी. जब पाकिस्तानी सेना ने भारत पर हमला किया, तब भारत को युद्ध का ऐलान करना पड़ा. 16 दिसंबर 1971 को ढाका में 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों ने सरेंडर कर दिया. इस तरह बांग्लादेश की स्थापना का रास्ता साफ़ हो चुका था.
युद्ध खत्म होने के चार दिनों के बाद ही याहया को कुर्सी छोड़नी पड़ी. उनके बाद ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने सत्ता संभाली. उनके शासन की व्याख्या फिर कभी करेंगे.
आज ये क़िस्सा इसलिए सुनाया, क्योंकि आज कल इमरान ख़ान इसी को याद दिलाकर पाकिस्तान सरकार को चेताने की कोशिश कर रहे हैं. इमरान ख़ान की PTI के पास नेशनल असेंबली में सबसे ज़्यादा सीटें हैं. लेकिन कुछ पार्टियों ने गठबंधन करके उनकी सरकार गिरा दी. इमरान का आरोप है कि इस खेल में सेना भी शामिल थी. सेना कहती है कि इमरान झूठे लांछन लगा रहे हैं. वो सेना को बदनाम कर रहे हैं. इस ड्रामे ने पाकिस्तान की राजनीति को दिलचस्प बना रखा है.
अब जान लेते हैं, पाकिस्तान की पोलिटिक्स में नया क्या हुआ?
- इमरान ने 28 अक्टूबर को लाहौर से लॉन्ग मार्च की शुरुआत की थी. पांचवें दिन मार्च गुजरांवाला में था. इस दिन उन्होंने नवाज़ शरीफ़ को खुली चुनौती दी. बोले, ‘नवाज़ शरीफ़, जब भी तुम वापस आओ और चुनाव लड़ो. मैं चैलेंज करता हूं, तुम्हारे हलके में जाकर तुम्हें हराऊंगा.’
- अभी तक ये साफ नहीं था कि इमरान का लॉन्ग मार्च कब तक चलेगा. 02 नवंबर को इसपर बड़ा बयान आया. एक सभा में इमरान ने कहा कि उनका आंदोलन तब तक चलेगा, जब तक कि नए चुनाव की मांग मान नहीं ली जाती. इमरान ये भी बोले कि हम जानवर नहीं हैं कि अपराधियों को अपने ऊपर शासन करने की इजाज़त दे दें.
इमरान खान ने पाकिस्तान के टुकड़े होने की चेतावनी क्यों दी?