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क्या पाकिस्तान में बांग्लादेश जैसी जंग फिर होगी?

अवामी लीग से PTI की तुलना में कितना दम?

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पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद हिंसा करते लोग (AFP)

“पाकिस्तानी अफ़वाहों की सबसे बड़ी ख़राबी ये है कि सच निकलती हैं.”

ये पंक्ति व्यंग्य की दुनिया के बेताज बादशाह मुश्ताक़ अहमद युसुफ़ी ने लिखी थी. युसुफ़ी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका लिखा पाकिस्तान के माथे पर चस्पा है.
कुछ हालिया उदाहरण देख लीजिए.

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नंबर एक. अक्टूबर 2021 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और पाक आर्मी के बीच विवाद हुआ. खुफिया एजेंसी ISI के मुखिया की नियुक्ति को लेकर. अफ़वाह उड़ी कि इमरान सरकार कुछ दिनों की मेहमान रह गई है. छह महीने बाद अफ़वाह सच हो गई. अप्रैल 2022 में नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार गिरा दी गई.

नंबर दो. जब इमरान सरकार गिरी, तब आरोप लगे कि सारा खेल तत्कालीन आर्मी चीफ़ क़मर जावेद बाजवा के इशारे पर रचा गया था. कहा गया, अविश्वास प्रस्ताव से पहले बाजवा और ISI चीफ़ ने मिलकर इमरान को धमकाया था. आर्मी ने इसका खंडन किया. बोली, सब अफ़वाह है. आर्मी पोलिटिक्स में दखल नहीं देती. फिर नवंबर 2022 आया. जनरल असीम मुनीर ने बाजवा की जगह ली. पहले ही भाषण में बोले, आर्मी अभी तक पोलिटिक्स में दखल दे रही थी. अब ऐसा नहीं होगा.

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नंबर तीन. मार्च 2023 में इमरान को कई बार अरेस्ट करने की कोशिश की गई. उनके लाहौर वाले घर पर पुलिस और पैरामिलिटरी भेजी गई. मगर कामयाबी नहीं मिली. तब अफ़वाह उड़ी कि उन्हें अरेस्ट कर लंबे समय तक जेल में रखने की साज़िश हो रही है. सरकार बोली, कोई साज़िश नहीं है. पूरी कार्रवाई कानून के दायरे में रहकर की जाएगी. मगर 09 मई 2023 को पाक रेंजर्स भेजकर इमरान को इस्लामाबाद हाईकोर्ट के अंदर से उठा लिया गया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस गिरफ़्तारी को अवैध ठहरा दिया.

और, अब एक नई अफ़वाह उड़ रही. वो ये कि इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीके इंसाफ़ (PTI) के नेताओं पर सेना दबाव डाल रही है. उन्हें पार्टी छोड़ने के लिए मज़बूर किया जा रहा है. उन्हें आर्मी ऐक्ट का डर दिखाया जा रहा है. इमरान आरोप लगाते हैं, पूरी कवायद उनकी पार्टी पर बैन लगाने के लिए रही है. PTI के साथ वैसा ही सलूक हो रहा है, जैसा 1971 में अवामी लीग के साथ हुआ था. अगर ऐसा ही चलता रहा तो पाकिस्तान फिर से टूट जाएगा. अवामी लीग की स्थापना बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर रहमान ने की थी. इसी पार्टी ने आंदोलन कर पूर्वी पाकिस्तान को आज़ादी दिलाई थी. जिसके बाद बांग्लादेश के गठन का रास्ता साफ़ हुआ था.

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर रहमान का टंगा बैनर 

तो आइए जानते हैं,

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- इमरान ख़ान बार-बार अवामी लीग की दुहाई क्यों दे रहे हैं?

- क्या नेताओं को इमरान का साथ छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है?

- और, पाकिस्तान के कुख्यात आर्मी ऐक्ट की पूरी कहानी क्या है?

साल 1970. तब भारत के पूरब और पश्चिम, दोनों तरफ़ पाकिस्तान हुआ करता था. पश्चिम की तरफ़ जो हिस्सा है, उसे वेस्ट पाकिस्तान और जो आज का बांग्लादेश है, उसे ईस्ट पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था. दोनों हिस्से कई मायनों में एक-दूसरे से अलग थे. आबादी, भाषा, जातीयता, संस्कृति आदि. इन्हें उदारता के साथ बरते जाने की ज़रूरत थी. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. पाकिस्तान बनने के कुछ समय बाद ही आर्मी ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी. और, आर्मी में पंजाबियों और पश्तूनों का वर्चस्व था. वे ख़ुद को बाकियों से ऊपर मानते थे. उनके लिए ईस्ट पाकिस्तान के बंगाली नागरिकों की कोई हैसियत नहीं थी. आबादी में अधिक होने के बावजूद ईस्ट पर वेस्ट का वर्चस्व था. सारे नियम-कानून वेस्ट पाकिस्तान से तय होते थे. और, उन्हें ईस्ट पर थोप दिया जाता था. इसका विरोध होना लाज़िमी थी. हुआ भी. 

26 जनवरी 1952 को पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन ढाका में थे. उन्होंने मुस्लिम लीग के सेशन में बोला, उर्दू पाकिस्तान की राष्ट्रीय भाषा होगी.
ये ईस्ट पाकिस्तान की जनता को रास नहीं आया. उन्हें लगा, ये उनकी बांग्ला भाषा को खत्म करने की साज़िश है. उन्होंने प्रोटेस्ट किया. सरकार ने बैन लगाया. मगर लोग नहीं माने. फिर सरकार ने सेना बुला ली. 21 फ़रवरी को मुठभेड़ हुई. बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई. सैकड़ों घायल हुए. हज़ारों लोगों को अरेस्ट किया गया.

प्रोटेस्ट का कोई नतीजा तो नहीं निकला, लेकिन इस घटना ने ईस्ट पाकिस्तान में दो अभूतपूर्व परंपराओं की नींव रखी.

पहली, स्वतंत्र पहचान के लिए आंदोलन.

और दूसरी, आंदोलनों को दबाने के लिए सेना का इस्तेमाल.

समय के साथ इन दोनों का दायरा बढ़ता चला गया.

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद रिश्ते और भी बिगड़ गए थे. ईस्ट पाकिस्तान की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी अवामी लीग ने आर्थिक भेदभाव का आरोप लगाया. फ़रवरी 1966 में लाहौर में ऑल-पार्टी कॉन्फ़्रेंस बुलाई गई. इसमें युद्ध के बाद के पाकिस्तान के हालात पर चर्चा होनी थी. इसमें अवामी लीग के नेता शेख मुजीबुर रहमान ने भी हिस्सा लिया था. कॉन्फ़्रेंस में उन्होंने ईस्ट पाकिस्तान के लिए छह मांगें रखीं.

- पाकिस्तान में संसदीय सरकार का रास्ता साफ़ किया जाए. और, संसद में आबादी के आधार पर प्रतिनिधित्व मिले.
- फ़ेडरेशन ऑफ़ पाकिस्तान के अंतर्गत दो स्टेट्स की स्थापना की जाए. केंद्र सरकार सिर्फ़ विदेश और रक्षा संबंधी मामलों को डील करे.
- दोनों प्रांतों के लिए अलग करेंसी बनाई जाए. अगर ये संभव ना हो तो पूरे देश के लिए एक करेंसी बने. वेस्ट और ईस्ट पाकिस्तान में अलग-अलग सेंट्रल बैंक की स्थापना हो.
- विदेशी मुद्रा में होने वाली कमाई के लिए अलग-अलग बैंक अकाउंट्स बनाए जाएं. 
- टैक्स जमा का अधिकार फ़ेडरल स्टेट्स को मिले.
- और, ईस्ट पाकिस्तान को अपनी सेना रखने का अधिकार मिले.

उस समय पाकिस्तान पर जनरल अयूब ख़ान का शासन चल रहा था. अयूब और वेस्ट पाकिस्तान की राजनैतिक पार्टियों ने इन मांगों को सिरे से खारिज कर दिया. मुजीबुर रहमान को विभाजनकारी बताया गया. ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने आरोप लगाया कि मुजीबुर भारत की भाषा बोल रहे हैं. अयूब ख़ान इससे एक कदम आगे निकल गए. ढाका की एक रैली में बोले, अगर ज़रूरत पड़ी तो हम हथियारों की भाषा में बात करेंगे.

पाकिस्तान के दूसरे राष्ट्रपति जनरल अयूब ख़ान

इस वाकये ने अवामी लीग का मन खट्टा कर दिया. उन्हें अहसास हो चुका था कि अलग मुल्क ही उनकी सारी समस्याओं का हल है. मुजीबुर रहमान ने इसकी तरफ़ इशारा भी दिया था. अपने दूसरे संस्मरण ‘द प्रिजन डायरीज’ में उन्होंने लिखा है,

मैंने पाकिस्तान की रूलिंग क्लास को इसकी अहमियत समझाने की पूरी कोशिश की. वो ईस्ट पाकिस्तान के लिए करो या मरो वाली स्थिति थी. इसे बलपूर्वक दबाया नहीं जा सकता. अगर इसे दबाने की कोशिश की गई तो मुल्क में तबाही आएगी. सत्ता में बैठे लोग यही ग़लती करने जा रहे हैं. जब तक उन्हें अपनी ग़लती का अहसास होगा, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.
यही हुआ भी. लाहौर कॉन्फ़्रेंस के पांच बरस बाद ही शेख़ मुजीब का कहा सच साबित हो गया. मोहम्मद अब्दुल वदूद भुइयां ने अपनी किताब ‘इमर्जेंस ऑफ़ बांग्लादेश एंड रोल ऑफ़ अवामी लीग’ में लिखा है, 

‘अवामी लीग की छह-सूत्रीय मांगों के प्रति अयूब सरकार का रवैया दमनकारी था. अयूब सरकार एक बार फिर से राजनैतिक मांगों के सामने फ़ेल साबित हुई थी.’

मार्च 1969 का महीना अयूब ख़ान के लिए आख़िरी साबित हुआ. वेस्ट में ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) महंगाई और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर आंदोलन कर रही थी. वहीं, ईस्ट में अवामी लीग स्वायत्तता की मांग पर अड़ी हुई थी. अयूब ख़ान इसको कंट्रोल करने में नाकाम थे. आख़िरकार, उन्हें कुर्सी एक और मिलिटरी जनरल याह्या ख़ान के हवाले करनी पड़ी.

पाकिस्तान के पूर्व पीएम ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो

याह्या को पॉपुलर होने का बहुत शौक़ था. वो सर्वमान्य नेता बनने का इरादा रखते थे. इसके लिए सबसे सटीक रास्ता ईस्ट पाकिस्तान में शांति से होकर गुजरता था.
तो, याह्या ने 1970 में एक लीगल फ़्रेमवर्क ऑर्डर (LFO) तैयार करवाया. इसमें क्या तय हुआ?

- पूरे मुल्क में लोकतांत्रिक व्यवस्था लाई जाएगी.
- अगस्त 1970 में नेशनल असेंबली की 300 सीटों के लिए चुनाव कराए जाएंगे. बहुमत हासिल करने वाली पार्टी सरकार बनाएगी.
- आबादी के आधार पर सीटों का निर्धारण होगा. ईस्ट पाकिस्तान की आबादी ज़्यादा थी. उन्हें 162 सीटें दी गईं. वेस्ट के हिस्से में 138 सीटें आईं.
- ये भी तय हुआ कि नेशनल असेंबली के गठन के चार महीनों के भीतर नया संविधान बनाया जाएगा. मंज़री पर फ़ाइनल डिसिजन राष्ट्रपति लेंगे.
- और, चुनाव के बाद शेख़ मुजीब छह-सूत्रीय मांगों से पीछे हट जाएंगे.

लेकिन चुनाव आता, उससे पहले बाढ़ आई, फिर भयानक तूफान आ गया. नवंबर 1970 में साइक्लोन भोला ने भयानक तबाही मचाई. इसने पांच लाख से अधिक लोगों की जान ली. लाखों लोग विस्थापित हुए. अयूब सरकार सही समय पर राहत पहुंचाने में नाकाम रही. अवामी लीग ने इसका ख़ूब प्रचार किया. वे चुनाव की तारीख़ बढ़ाने के लिए भी तैयार नहीं हुए. अंतत:, प्राकृतिक आपदा की वीभीषिका के बीच 07 दिसंबर 1970 को पाकिस्तान में पहला लोकतांत्रिक चुनाव कराया गया. अवामी लीग ने ईस्ट पाकिस्तान में एकतरफ़ा जीत हासिल की थी. उनके खाते में 160 सीटें आई थी. वेस्ट पाकिस्तान में भुट्टो की PPP को 81 सीटें मिली थीं. बहुमत अवामी लीग के पास था. जैसा तय हुआ था, उसके हिसाब से शेख मुजीब को सरकार बनानी थी. मगर यहां पर एक बड़ा पेच फंस गया. पाकिस्तान की रूलिंग क्लास को मुजीब की जीत नहीं पची. याह्या और भुट्टो के लिए ये असहज करने वाली स्थिति थी.

जनवरी 1971 में दोनों शेख मुजीब से मिलने ढाका गए. वहां उनकी बात नहीं बनी. मुजीब ने नेशनल असेंबली का सत्र बुलाने के लिए कहा. याह्या ने 03 मार्च 1971 की तारीख़ तय की. मगर 01 मार्च को घटनाक्रम तेज़ी से बदला. याह्या ने सत्र की तारीख़ आगे बढ़ा दी. अगले दिन भुट्टो ने वेस्ट पाकिस्तान में हड़ताल बुला लिया. नाराज़ मुजीब ने 03 मार्च को पूरे ईस्ट पाकिस्तान में बंद का ऐलान कर दिया. अवामी लीग के पास यही अंतिम रास्ता बचा था. ये प्रोटेस्ट लगातार बढ़ता गया. 

याह्या को ये चुनौती बर्दाश्त नहीं हुई. उसने अपने भरोसेमंद जनरल टिक्का ख़ान को ढाका रवाना कर दिया. इसके बाद तो दमन, सैन्य क्रूरता और नरसंहार का अकल्पनीय चैप्टर शुरू हुआ. टिक्का ख़ान ने आने वाले दिनों में ईस्ट पाकिस्तान में जो कुछ किया, उसने उसे ‘बंगाल का कसाई’ के नाम से कुख्यात कर दिया. 25 और 26 मार्च की दरम्यानी रात मुजीबुर रहमान को अरेस्ट कर लिया गया. उसी रोज़ ऑपरेशन सर्चलाइट को भी हरी झंडी दिखाई गई. पाकिस्तानी सेना ने अवामी लीग के नेताओं के साथ-साथ छात्रों, हिंदुओं और बंगाली मुस्लिमों और महिलाओं को निशाने पर लिया. वे पूरी क़ौम की पहचान मिटाने पर आमादा थे. अप्रैल 1971 तक प्रोटेस्ट को काबू किया जा चुका था.

लेकिन जो चीज़ काबू में नहीं आ रही थी, वो थीं नरसंहार की दबी-कुचली कहानियां. भारत सरकार ने बांग्लादेशी शरणार्थियों के लिए अपनी सीमा खोल दी थी. वहां लोगों का जो सैलाब आ रहा था, उसको लेकर पाकिस्तान से सवाल पूछे जा रहे थे. पाकिस्तान के लिए जवाब देना मुश्किल होने लगा था. इसके कवर-अप के लिए आर्मी ने आठ पाकिस्तानी पत्रकारों को न्यौता देकर बुलाया. उन्हें सब अच्छा-अच्छा लिखने की ताकीद की गई थी. आठ में से सात ने आर्मी की बात मान ली. लेकिन आठवें ने जो कुछ देखा था, उसने उनके होश उड़ा दिए थे. उनका नाम था, एंथनी मैस्कर्नहास. 

एंथनी का एक इंडिया कनेक्शन भी है. वो 1928 में कर्नाटक के बेलगांव में पैदा हुए थे. उनकी पढ़ाई-लिखाई कराची में हुई थी. विभाजन के बाद वो पाकिस्तान में ही रह गए. वहां वो मॉर्निंग न्यूज़ नाम के अख़बार के लिए काम करने लगे. वो ईस्ट पाकिस्तान के दौरे पर इसी अख़बार की तरफ़ से गए थे. जब वो लौटकर आए, उनका मन झूठ लिखने की गवाही नहीं दे रहा था. लेकिन पाकिस्तान में मीडिया पर सेंसरशिप थी. वो वहां सच लिख नहीं सकते थे. इसलिए, उन्होंने बीमारी का बहाना बनाया. और, बाहर निकलने का रास्ता सोचने लगे. मई 1971 में वो अपनी बहन से मिलने का बहाना बनाकर लंदन पहुंच गए. वहां उनकी मुलाक़ात संडे टाइम्स के तत्कालीन एडिटर हेरोल्ड इवांस से हुई. इवांस उनकी रिपोर्ट छापने के लिए राज़ी थे. मगर उससे पहले उनकी फ़ैमिली को पाकिस्तान से निकालना ज़रूरी था. एंथनी वापस कराची लौटे. उन्होंने फ़ैमिली को सुरक्षित तरीके से लंदन भेज दिया. लेकिन ख़ुद नहीं निकल पाए. 

इंडियन आर्मी में ब्रिगेडियर रहे और बांग्लादेश युद्ध के वेटरन आरपी सिंह ने डेलीस्टार के आर्टिकल में लिखा, 

‘उन दिनों पाकिस्तान सरकार ने अपने नागरिकों के लिए विदेश यात्रा का क़ोटा तय कर रखा था. एक साल में एक बार से ज़्यादा नहीं. इसी वजह से एंथनी अपनी फ़ैमिली के साथ नहीं जा पाए. कराची एयरपोर्ट पर उन्हें रवाना करने के बाद वो पेशावर गए. फिर वहां से उन्होंने पैदल अफ़ग़ानिस्तान तक का सफ़र पूरा किया. 12 जून 1971 को एंथनी का प्लेन लंदन में लैंड हो चुका था. उनके पहुंचते ही हेरोल्ड इवांस ने आर्टिकल छापने का आदेश जारी कर दिया.’

इस तरह 13 जून 1971 को संडे टाइम्स के पहले पन्ने पर 16 कॉलम की रिपोर्ट छपी. इसका शीर्षक एक शब्द का था, जेनोसाइड. यानी, नरसंहार. 16 कॉलम की इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया. इसमें ईस्ट पाकिस्तान में घट रही हकीक़त का फसाना दर्ज था. किस तरह पाकिस्तानी सेना बंगालियों को पूरी तरह से मिटाने पर आमादा थी. किस तरह बंगाली महिलाओं का बलात्कार किया जा रहा था. पाकिस्तानी सैनिक कैसे नरसंहार को जायज ठहरा रहे थे.

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बाद में हेेरोल्ड इवांस को कहा था कि एंथनी के आर्टिकल ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. उसी के बाद उन्होंने ईस्ट पाकिस्तान के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए यूरोप और अमेरिका का दौरा शुरू किया था.  इसके आगे क्या हुआ? ईस्ट पाकिस्तान में विद्रोही गुटों ने प्रतिरोध का रास्ता चुना. उन्हें भारत से समर्थन मिला. 03 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान कर दिया. 13 दिनों तक चली लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान को बुरी तरह हराया. 16 दिसंबर 1971 को ढाका में ईस्ट पाकिस्तान के गवर्नर एएके नियाज़ी ने सरेंडर के कागज़ात पर साइन कर दिया. तीन दिन पहले ही उन्होंने दावा किया था कि वो किसी भी हालत में सरेंडर नहीं करेंगे. लेकिन 16 दिसंबर तक हालात पूरी तरह से बदल चुके थे.

16 दिसंबर 1971 को ढाका में ईस्ट पाकिस्तान के गवर्नर एएके नियाज़ी सरेंडर के कागज़ात पर साइन करते हुए.

इस तरह बांग्लादेश नए मुल्क के तौर पर सामने आया. भारत ने उसे मान्यता देने में तनिक भी देर नहीं लगाई. पाकिस्तान की जेल में बंद शेख मुजीब को रिहा कर दिया गया. वो कुछ समय तक बांग्लादेश के राष्ट्रपति रहे. फिर उन्होंने पहले प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले ली.

तो, ये थी अवामी लीग और शेख़ मुजीब की कहानी. क्यों सुनाई?

क्योंकि पिछले कई महीनों से इमरान ख़ान अपनी तुलना शेख़ मुजीब और अपनी पार्टी की तुलना अवामी लीग से कर रहे हैं.
इमरान ने नवंबर 2022 में एक रैली में कहा था, एक सियासतदान ने पाकिस्तान की फौज़ को सबसे बड़ी पार्टी के ख़िलाफ़ खड़ा कर दिया. नतीजा ये हुआ कि पाकिस्तान टूट गया. हमारा मुल्क आधा हो गया.

15 मई 2023 को उन्होंने फिर से बांग्लादेश युद्ध की याद दिलाई.  18 मई की रात इमरान ने लाहौर वाले घर पर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई थी. इसमें भी उन्होंने 1971 वाली स्थिति का ज़िक़्र किया. 

इमरान भले ही बार-बार 1971 वाली घटना की याद दिला रहे हों, लेकिन उनकी तुलना में बहुत दम नहीं है. क्यों? इसकी तीन बड़े कारण हैं.

- नंबर एक. पार्टी विद डिफ़रेंस.

अवामी लीग और PTI की स्थापना अलग-अलग परिस्थितियों में हुई थी. PTI की शुरुआत एक चैंपियन कप्तान ने अपना स्टारडम भुनाने के लिए की थी. इसके बरक्स अवामी लीग जन आंदोलन से उपजी थी. उनके लिए हमेशा करो या मरो वाली स्थिति रही.
2018 में जब इमरान प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने ISI को फ़र्स्ट लाइन ऑफ़ डिफ़ेंस बताया था. वो तो बाद में रिश्ते ख़राब हो गए. वरना, उनकी कुर्सी के पाये मिलिटरी इस्टैबलिशमेंट ने ही संभाल रखे थे.

इसकी तुलना में अवामी लीग पूरी तरह अलग थी. पाकिस्तान आर्मी ने उनके साथ हमेशा दुश्मन की तरह बर्ताव किया. 1971 के जनसंहार में लीग के नेताओं को विशेष तौर पर निशाना बनाया गया था. अवामी लीग ने मिलिटरी शासन के दौर में अपना आंदोलन चलाया था. उन्हें कभी किसी अदालत से राहत नहीं मिली. इमरान ख़ान के पास कम से कम अदालत का रास्ता बचा है. उनकी पार्टी के पास कहने को ही सही, प्रोटेस्ट का अधिकार तो है. और तो और, इमरान सरकार को संसद में संवैधानिक प्रक्रिया के तहत गिराया गया. शेख़ मुजीब को तो कभी सरकार बनाने का मौका ही नहीं मिला. उससे पहले ही उन्हें अरेस्ट कर जेल में डाल दिया गया था.

- नंबर दो. यथास्थिति लौटाने की जद्दोज़हद.

इमरान ने कभी पूरी आर्मी में सुधार की बात नहीं कही. वो बस कुछ अफ़सरों के नाम लेते रहे. डर्टी हैरी और बाजवा पर आरोप लगाते रहे. कभी आर्मी का वर्चस्व तोड़ने पर ज़ोर नहीं दिया. पाकिस्तान में सेना नमक से लेकर अपार्टमेंट तक बनाती है. वो आम लोगों की ज़िंदगी में घुसी हुई है. इमरान को इसका अंदाज़ा है. इसी वजह से वो स्ट्रक्चर पर चोट करने से बचते हैं.
जानकार कहते हैं कि उनकी दबी इच्छा यही है कि बड़े अफ़सरों से उनका याराना दोबारा शुरू हो जाए. बाकी उन्हें कोई दिक़्क़त नहीं है.


- नंबर तीन. आगे क्या?

इमरान अपने भाषणों में कई बार कह चुके हैं कि अगर ऐसा ही टकराव चलता रहा तो पाकिस्तान फिर से टूट जाएगा. लेकिन ये कैसे टूटेगा? क्या इमरान अलग मुल्क बनाने की बात कर रहे हैं? इसको लेकर कोई स्पष्टता नज़र नहीं आती. अवामी लीग की मंज़िल साफ़ थी. वे बांग्लादेश के निर्माण को लेकर शुरुआत से ही अटल थे. उनके पास भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान जैसी मज़बूत वजहें थीं. इमरान के पास ऐसी कोई वजह नज़र नहीं आती. ये तो हुई तुलना.

अब एक और पहलू बच जाता है.

हाल में हुई हिंसा और गिरफ़्तारियों के बाद PTI के कई दिग्गज नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है. पाकिस्तानी मीडिया संस्थान डॉन ने पांच का नाम छापा है. जान लीजिए, कौन-कौन हैं?

- महमूद मौलवी, सांसद.
- आमिर कियानी, पूर्व कैबिनेट मंत्री.
- करीम बक्श गबोल, विधायक, सिंध.
- संजय गंगवानी, विधायक, सिंध.
- मलिक अमीन असलम, इमरान ख़ान के पूर्व सलाहकार.

18 मई की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में इमरान ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर भी चर्चा की. बोले, हमारे लोगों पर प्रेशर डाला जा रहा है. 09 मई को इमरान की गिरफ़्तारी के बाद हिंसा शुरू हुई. आरोप हैं कि PTI के समर्थकों ने सेना और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया. सरकार ने कहा है कि दोषियों पर आर्मी ऐक्ट और ऑफ़िशियल सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी. पुलिस ने PTI के बड़े नेताओं को हिंसा भड़काने के आरोप में अरेस्ट भी किया है. कहा जा रहा है कि उनके ऊपर भी मिलिटरी ऐक्ट के तहत कार्रवाई का ख़तरा मंडरा रहा है. ये कानून हमेशा से कुख्यात माने जाते हैं. इस डर से भी PTI के नेता पार्टी छोड़ने और सेना की तरफ़दारी करने में भरोसा दिखा रहे हैं.

वैसे, आर्मी ऐक्ट है क्या?

ये कानून 1952 में लाया गया था. मिलिटरी के लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए. मिलिटरी के लीगल कोड के तहत. विशेष हालात में ये आम नागरिकों पर भी लागू हो सकता है. 1966 में अयूब ख़ान की सरकार ने इस ऐक्ट में कुछ संशोधन किए. सिविलियंस पर मिलिटरी कोर्ट में मुकदमा चलाने के लिए तीन और अपराध जोड़े गए.

- नंबर एक. लिखकर या बोलकर सेना के अंदर विद्रोह भड़काना.
- नंबर दो. दुश्मन देश के साथ सीक्रेट्स साझा करना.
- और, नंबर तीन. सेना के ठिकानों को जान-बूझकर निशाना बनाना.

मिलिटरी कोर्ट जेल से लेकर मौत की सज़ा तक सुना सकती है. आरोपी अपने लिए वकील हायर कर सकते हैं. जो नहीं कर सकते, उन्हें वकील कोर्ट मुहैया कराती है. दोषी करार दिए जाने पर 40 दिनों के अंदर आर्मी कोर्ट में अपील का अधिकार होता है. अगर व्यक्ति उससे भी संतुष्ट नहीं है तो वो ऊंची अदालत का रुख ले सकता है.

जानकारों का कहना है कि, किसी भी सिविलियन सोसायटी में आर्मी कोर्ट का दखल सही नहीं माना जाता. ये अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के भी ख़िलाफ़ है. शहबाज़ सरकार के फ़ैसले की पाकिस्तान के अलावा विदेशों में भी आलोचना हो रही है. मगर सरकार ने इससे पीछे हटने का कोई संकेत नहीं दिया है. कहा जा रहा है कि ये तिकड़म PTI को हताश करने और अंत में बैन लगाने के लिए भिड़ाया जा रहा है. इस हालात पर एक और व्यंग्यकार और टीवी होस्ट अनवर मक़सूद का कहा याद आता है.

'75 सालों में तकरीबन 35 साल फौज ने हम पर हुकूमत की, 35 साल भी नहीं बल्कि 74 साल फौज ने हम पर राज किया, आज भी कर रही है. इसमें फौज से कहीं ज्यादा हमारा कसूर है. फौज हमारी ज़रूरत है. इस लोकतंत्र के दौर में न जाने क्यों हम फौज की ज़रूरत बन जाते हैं.  चुनाव होंगे या नहीं, ये बात न चुनाव आयोग जानता है, न सरकार, न अदालत न खुदा जानता है. सिर्फ फौज जानती है मगर वो बता तक नहीं रही है.'

कमोबेश यही पूरे पाकिस्तान की नियति है.

पाकिस्तान से और क्या अपडेट है?

- 18 मई को दोपहर 02 बजे पंजाब सरकार की दी हुई डेडलाइन खत्म हो गई. पंजाब सरकार ने इमरान पर अपने घर में आतंकियों को छिपाने का आरोप लगाया था. 24 घंटे में उन्हें सौंपने का अल्टीमेटम भी दिया था. डेडलाइन खत्म होने के बाद पंजाब पुलिस ने इमरान के घर के बाहर घेराबंदी की. लेकिन वे घर के अंदर नहीं घुसे. 19 मई को पंजाब पुलिस ने अपना डेलिगेशन भेजा. इस डेलिगेशन ने इमरान की इजाज़त लेकर घर की तलाशी ली.

- पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ़ अल्वी ने कहा है कि इमरान को 09 मई के बाद हुई हिंसा की निंदा करनी चाहिए.

वीडियो: दुनियादारी: पाकिस्तानी आर्मी के डॉक्टर ने मुंबई अटैक की साजिश रची थी? क्या भारत में सज़ा होगी?

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