हाल ही में एक खबर आई. पंजाब में एक बाप ने अपनी बेटी से रेप के आरोपी के हाथ काट दिए. इसके बाद इंसाफ और कानून की लड़ाई की बहस एक बार भी जिंदा हो उठी. इसी मसले पर कुछ बीती घटनाएं याद दिलाते हुए पंकज रामेंदु ने हमें यह लेख भेजा है. वह पेशे से लेखक हैं. पेट के लिए डॉक्युमेंट्री वगैरह बनाते हैं. हाल ही में अपने दोस्त के साथ पेंगुइन से छपी किताब 'दर दर गंगे' लिखी है और फिलहाल फुलटाइम अपनी बेटी सादगी की देखरेख करते हैं. 1996 में एक हॉलीवुड फिल्म आई थी ‘टाइम टू किल’ - 1989 में इसी नाम से प्रकाशित उपन्यास पर आधारित इस फिल्म की कहानी एक ऐसे मजबूर अश्वेत बाप की है जिसकी 10 साल की बेटी का दो गोरे ना सिर्फ बलात्कार करते हैं बल्कि उसे पेड़ से फांसी पर लटका देते हैं. किसी तरह वह लड़की बच जाती है लेकिन बुरी तरह से ज़ख्मी होने के साथ ही उसके कई अंग बेकार हो जाते हैं, वह अब कभी मां भी नहीं बन पाएगी. इन सबके बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है. पिता का वकील एक गोरा है जो उससे साफ साफ बोलता है कि हो सकता है आरोपी जल्दी ही छूट जाएं क्योंकि दोनों लड़के गोरे हैं और वह एक अश्वेत. इस बात को सुनकर लड़की का बाप एक कड़ा फैसला लेता है और एक भीड़ भरे मॉल में दोनों लड़कों को सरेआम गोली मार देता है. पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है और उसके खिलाफ केस चलता है. अब पूरी लड़ाई उसे बचाने और फांसी पर चढ़ाने के बीच की है. पंजाब के बठिंडा में हाल में हुई घटना ने इस कहानी के बाप की हक़ीकत को सामने लाकर खड़ा कर दिया है. बठिंडा में एक पिता ने अपनी सात महीने की बच्ची के साथ बलात्कार करने वाले आरोपी के दोनों हाथ काट दिए. इस बच्ची के साथ बलात्कार की घटना दो साल पहले 2014 में हुई थी. तभी से आरोपी जमानत पर था और मामला कोर्ट में विचाराधीन था. हाथ काटने वाले पिता को गिरफ्तार कर लिया गया है, उसने अपना गुनाह मानते हुए कहा कि उसे अपने किए पर कोई अफसोस नहीं है. ईंट भट्टे में काम करने वाला मज़दूर पम्मा उस दिन अपनी सात महीने की बेटी को घर पर छोड़ कर मज़दूरी करने गया था, उसी दौरान आरोपी परमिंदर ने उस बच्ची के साथ ये दुष्कर्म किया था . आरोपी को बलात्कार की धाराओं के तहत गिरफ्तार तो किया गया लेकिन तीन महीने में ही वह ज़मानत पर रिहा हो गया और तब से आज़ाद घूम रहा था.
पम्मा ने जो किया हो सकता है उस पर हम में से कई उसकी तरफदारी करें लेकिन इस घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या वाकई में जो पम्मा ने किया वह सही था. लेकिन फिर सवाल यह भी है कि आखिर पम्मा ऐसा करने पर मजबूर क्यों हुआ?औसत से भी कम दर्जे की सामाजिक मुद्दों पर मसाला फिल्म बनाने वाले निर्देशक प्रकाश झा की फिल्म है - गंगाजल. हाल ही में इस फिल्म का सीक्वल ‘जय गंगाजल’ भी आया. पहली फिल्म जहां भागलपुर के अंखफोड़वा कांड पर बनी थी वहीं दूसरी फिल्म नितांत कल्पना थी. लेकिन दोनों ही फिल्में जनता के उस गुस्से को दिखाती हैं जो सुस्त न्याय प्रणाली के कारण पैदा हुआ है. गंगाजल फिल्म में हाथ में तेजाब लिए जब एक इंसपेक्टर से दूसरा इंस्पेक्टर पूछता है कि यह क्या है तो जवाब मिलता है – ‘गंगाजल, सब पबित्तर कर देंगे!!‘
तेजाब को गंगाजल बताकर समाज को अपने हिसाब से पवित्र करने की यह प्रक्रिया नई नहीं है. इससे पहले दीमापुर में भी बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने जेल से निकाल कर पीट पीट कर मार डाला था . निर्भया मामले में भी अगर भीड़ का आक्रोश सामने नहीं आता तो क्या निर्भया को इतनी जल्दी इंसाफ मिल पाता ?अगर पम्मा कोई रसूख वाला होता तो शायद उसे हथियार उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. यह अफसोसनाक है कि निर्भया हो या पम्मा जब इनके लिए इंसाफ की बात होती है तो या भीड़तंत्र चलता है या पीड़ित अकेले ही ऐसा कदम उठाते हैं. ‘टाइम टू किल’ के अंतिम दृश्य में आरोपी बाप का वकील जज और ज्यूरी (जो गोरे समाज की पक्षधर है और निर्णय ले चुकी है) से कहता है कि वह उन्हें एक कहानी सुनाना चाहता है और वह सब लोगों से अपनी आंखे बंद करने की अपील करता है. फिर वकील उन्हें एक लड़की के साथ किस तरह बलात्कार और क्रूरता हुई उसकी कहानी सुनाता है . कहानी खत्म होने के बाद वह सभी से अपनी आंखे खोलने के लिए बोलता है और कहता है – फर्ज़ कीजिए की वह लड़की गोरी थी... यह सही है कि समाज से बलात्कार जैसी घटनाओं को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है लेकिन न्याय करने वाले, न्याय दिलाने वाले और कानून बनाने वालों को बहुत कुछ फर्ज़ करना बेहद ज़रूरी है . उन्हें फर्ज़ करना होगा कि अगर यह घटना उनके साथ होती तो क्या होता ?
ये लेखक के निजी विचार हैं. 'दी लल्लनटॉप' इनसे सहमत हो, जरूरी नहीं.
















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