इंटरनैशनल बैकलॉरिएट. शॉर्ट में कहें तो IB. ये एक अंतरराष्ट्रीय गैरलाभकारी संस्था है, जो 3 से 19 साल के बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले शैक्षिक कार्यक्रम बनाने का काम करती है. इसका काम, ढांचा, प्रोसेस वगैरा-वगैरा किसी एजुकेशन बोर्ड की तरह है. जैसे अपने यहां CBSE या ICSE हैं. आसान भाषा में कहें तो जैसे किसी राज्य का शिक्षा बोर्ड तय करता है कि स्कूलों में क्या पढ़ाया जाएगा, कैसे पढ़ाया जाएगा, परीक्षा कैसे होंगी, वैसे ही इंटरनैशनल बैकलॉरिएट काम करता है. लेकिन क्या CBSE/ICSE और IB में कोई बुनियादी फर्क है और इसका सिलेबस कैसा है, आइए जानने की कोशिश करते हैं. इंटरनैशनल बैकलॉरिएट IB की वेबसाइट के मुताबिक़, इसका सिलेबस दुनिया के 159 देशों के 5500 स्कूलों में पढ़ाया जाता है. संस्था की स्थापना 1968 में एक ग़ैरसरकारी संस्था के तौर पर हुई थी. भारत में पहली बार IB का स्कूल 1976 में बना था. आज हमारे देश में ऐसे 195 स्कूल हैं, जो IB से अफ़िलिएटिड हैं.
IB पाठ्यक्रम में चार कोर्स पढ़ाए जाते हैं;
1) प्राइमरी यीर्स प्रोग्राम (पीवाईपी) 2) मिडल यीर्स प्रोग्राम (एमवाईपी) 3) डिप्लोमा प्रोग्राम (डीपी) 4) करियर-रिलेटेड प्रोग्राम (सीपी)
- प्राइमरी यीर्स प्रोग्राम तीन से 12 साल के बच्चों के लिए होता है. पीवाईपी ढांचा इस आधार पर शुरू होता है कि एक छात्र अपने स्वयं के सीखने के लिए ज़िम्मेदार हैं और सीखने की प्रक्रिया में भागीदार भी हैं. इस एजुकेशनल प्रोग्राम में लोगों और उनके संबंधों को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे एक मजबूत लर्निंग कम्युनिटी बन सके. इसके लिए विशेष रूप से छात्रों की 5 स्किल्स पर ध्यान दिया जाता है. सोचना, बात-चीत, रिसर्च, सेल्फ़-मैनेजमेंट और सोशल स्किल.
- वहीं मिडल यीर्स प्रोग्राम 11 साल से 16 साल के बच्चों के लिए है. इसका मूल उद्देश्य छात्रों को उनकी पढ़ाई और वास्तविक दुनिया के बीच व्यावहारिक संबंध बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है. एमवाईपी में 8 सब्जेक्ट ग्रुप शामिल हैं. कार्यक्रम के हर एक साल में हर एक सब्जेक्ट ग्रुप के लिए कम से कम 50 घंटे की पढ़ाई की ज़रूरत होती है. एमवाईपी कार्यक्रम के अंतिम दो वर्षों में छात्रों को अलग-अलग विषय पढ़ने की छूट दी जाती है. इसमें स्थानीय आवश्यकताओं और खुद की रुचि को ध्यान में रखा जाता है.
- डिप्लोमा प्रोग्राम 16 से 19 साल के छात्रों के लिए होता है. इसकी तीन मूल बातें हैं. पहला है ज्ञान का सिद्धांत. जिसमें इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि हम किसी भी विषय को कैसे समझते हैं, और समझने पर कैसे दावा करते हैं. दूसरा है विस्तारित निबंध. ये एक स्वतंत्र शोध है जो हर छात्र करता है. इसमें स्टूडेंट को 4000 शब्दों का एक पेपर लिखना पड़ता है. तीसरा और आख़िरी है रचनात्मकता, गतिविधि और सेवा. इसमें छात्र इन तीन अवधारणाओं से जुड़े एक प्रोजेक्ट को पूरा करते हैं.
इन मूल बातों के आधार पर छात्रों के पास कोर्स में 6 अलग-अलग विषय के ऑप्शन होते हैं. जैसे की भाषा और साहित्य में अध्ययन, भाषा अधिग्रहण, व्यक्ति और समाज, विज्ञान, गणित और कला.
- करियर-रिलेटेड प्रोग्राम (सीपी) की बात करें तो ये 2 डीपी से मिलकर बनता है. इसमें विशेष ध्यान ये रहता है कि स्टूडेंट काम कर करने के लिए ज़रूरी स्किल डिवेलप कर ले.
CBSE/ICSE और IB में बुनियादी फ़र्क़
सीबीएसई/आईसीएसई और आईबी तीनों ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करते हैं. लेकिन दोनों में अंतर है. सीबीएसई/आईसीएसई पाठ्यक्रम में थिअरी नॉलेज पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है. जो भारत में कॉलेज प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए उपयुक्त है. हमारे देश में जुलाई में छात्रों को कॉलेज में दाख़िला होता है. और कक्षा 12 की परीक्षा मार्च में होती हैं.वहीं, आईबी कार्यक्रम के पाठ्यक्रम में अलग-अलग विषय के माध्यम से एक वैश्विक दृष्टिकोण विकसित करने पर ध्यान दिया जाता है. छात्रों को आंकलन करने और सीखने के दौरान खुद एक्सपेरिमेंट, रिसर्च और अप्लाई करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. आईबीडीपी पाठ्यक्रम दुनिया भर के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में दाख़िला लेने के नज़रिए से एक बेहतर पाठ्यक्रम माना जाता है.

दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्कूल सिलेबस लाने की तैयारी में आप सरकार. (प्रतीकात्मक तस्वीर- इंडिया टुडे)
CBSE और ICSE दोनों ही के पाठ्यक्रम में छात्रों का आंकलन एक विषय के लिए निर्धारित कुल 100 नंबर के आधार पर किया जाता है. जबकि IB में कुल 7 नंबर पर आंकलन होता है. स्टूडेंट को 6 विषयों के नंबर दिए जाते हैं जिससे जोड़ अधिकतम 42 होता है. विस्तारित निबंध और थिअरी ऑफ़ नॉलेज के लिए 3 नंबर होते हैं. यानी कि कुल 45 अंक.
CBSE और ICSE दोनों में क्लासरूम टीचिंग पर विशेष ज़ोर दिया जाता है, जबकि IB स्कूलों में शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं पर बल होता है. और शिक्षकों के लिए फ़ेसिलिटेटर शब्द का इस्तेमाल होता है. यानी कि सीखने के लिए ज़रूरी चीजें उपलब्ध कराना सबसे ज़रूरी होता है. छात्र को अपने दम पर चीजें सीखनी होती हैं. इससे उनकी पूछताछ और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है. इसके अलावा ग्रुप डिस्कशन के ज़रिए चीजें सिखाना और कई अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल पढ़ाने के लिए किया जाता है.






















