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ताकत के बल पर कैसे कानून से खेलते हैं कुछ 'नेता'?

पंजाब में आप विधायक ने टोल पर किया हंगामा.

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सांकेतिक फोटो (इंडिया टुडे)

आज हम एक महामारी के बारे में बात करेंगे. कोरोना से भी बड़ी महामारी. वो, जो जाने कबसे भारत में है, और जाने कब तक बनी रहेगी. रोज़ ये महामारी हमारे नागरिक बोध को बीमार करती है, फिर उसकी जान ले लेती है. फिर इन सड़ी-गड़ी लाशों से ही एक मुर्दा लोकतंत्र तैयार होता है. जिसमें रसूख के दम पर कोई भी, कुछ भी कर सकता है. भारत में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं जो दिन रात इस रट लगाए रहते हैं कि भारत का लोकतंत्र कितना महान है. आकार के लिहाज़ से ये बात सही भी है. क्योंकि सबसे ज़्यादा मतदाता तो भारत में ही हैं. लेकिन इस लोकतंत्र की गुणवत्ता क्या है, ये आप कुछ कहानियों से समझ सकते हैं. ये कहानियां कुछ नेताओं की हैं. अलग अलग स्तर के नेता - नेता वाले नेता, विधायक वाले नेता और मंत्री वाले नेता. आइए इनकी करतूतों पर गौर करें. और देखें कि भारतीय लोकतंत्र में अगर आपके पास ताकत हो, तो आप कैसे जनता और कानून दोनों का मज़ाक बना सकते हैं.

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नोएडा

पहली कहानी नेता वाले नेता की है. और ये घटी है दिल्ली के ठीक बगल में पड़ने वाले नोएडा में. ये वीडियो आपने देख लिया होगा. काले ट्रैक सूट में एक आदमी एक महिला को धमका रहा है. जो कह रहा है, हम आपको नहीं सुना सकते. क्योंकि ढेर सारी गालियां हैं. ये घटना 5 अगस्त की है. जगह थी नोएडा की ग्रैंड ओमेक्स सोसायटी. सोसायटी के बोर्ड मेंबर्स के मुताबिक श्रीकांत ने अतिक्रमण करके एक बगीचा बना लिया था. इसी को लेकर श्रीकांत से बात शुरू की गई, लेकिन वो बहस करने लगा.
वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो जनता धड़ाधड़ राष्ट्रीय महिला आयोग, नोएडा पुलिस और भाजपा से हैंडल्स को टैग करने लगी. आरोप लगाया जाने लगा कि त्यागी भाजपा किसान मोर्चा से जुड़ा हुआ है. 6 अगस्त को पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया, लेकिन उसका कहीं अता-पता नहीं था. फतेहपुर सीकरी सांसद एवं भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार चहार ने तो एक वीडियो जारी करके दावा भी कर दिया कि त्यागी भाजपा किसान मोर्चा में कभी नहीं रहा.

लेकिन सोशल मीडिया पर श्रीकांत त्यागी की इतने भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें हैं, कि गिनती मुश्किल है. कल्याण सिंह, हृदय नारायण दीक्षित, योगी आदित्यनाथ, केशव मौर्या, जनरल वीके सिंह (रि.) और जेपी नड्डा. यहां हमने सिर्फ प्रमुख नाम ही आपको बताए हैं. ये तस्वीरें कम से कम इतना तो बता ही रही थीं कि श्रीकांत त्यागी भाजपा के लिए पूरी तरह से अजनबी नहीं था. श्रीकांत बीजेपी से जुड़े कई धरने-प्रदर्शनों में शामिल हुआ था, और यहीं से उसने संपर्क बनाना शुरु किया था. जिस वक्त वो अपने गांव भंगेल में रहा करता था, घर के बाहर बाकायदा पुलिस की बेरिकेडिंग होती थी. पिकेट के साथ बूम बैरियर लगाए जाते थे और उसके घर के अंदर जाने के लिए मेटल डिटेक्टर से गुज़रना होता था. वो घर से निकलता, तो चार गाड़ियां आगे पीछे चलती थीं. उत्तर प्रदेश पुलिस के जवान साथ चलते थे. माने पूरा भौकाल मेंटेन रहता था. ठनक का अंदाज़ा ऐसे लगाइए, कि इसने अपना एक नाम लंगड़ा त्यागी भी रख लिया था.

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ये भौकाल ही था, कि नोएडा अथॉरिटी में अवैध निर्माण की लिखित शिकायत के बावजूद तीन साल तक कार्रवाई नहीं हुई. ये भौकाल ही था, कि नोएडा में श्रीकांत के खिलाफ गैर इरादत हत्या और हत्या के प्रयास जैसी संगीन धाराओं में पहले से FIR दर्ज थीं, लेकिन उसे कानून का डर नहीं था. तभी तो 7 अगस्त को देर शाम उसके भेजे गुंडे पीड़िता को खोजते हुए ओमेक्स सोसायटी पहुंच गए, गुंडागर्दी करने लगे. वो तो भला हो सोसायटी वालों का, जो इन्हें घेरकर पुलिस के हवाले कर दिया गया. रात को ही स्थानीय सांसद महेश शर्मा भी मौके पर पहुंचे. और उन्होंने पुलिस को जमकर लताड़ लगाई

इसके बाद जाकर नोएडा पुलिस ने पीड़ित परिवार को सुरक्षा मुहैया कराई, त्यागी के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट में मामला दर्ज किया और उसपर 25 हज़ार का इनाम भी रख दिया. नोएडा फेज़ 2 थाने के एसएचओ सुजीत उपाध्याय सहित सोसाइटी की सुरक्षा के लिए तैनात किए एक सब इंस्पेक्टर और चार सिपाहियों को भी ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में सस्पेंड कर दिया गया. 8 अगस्त की सुबह त्यागी के द्वारा किए गए अतिक्रमण पर बुलडोज़र चलने लगा. भंगेल में बने उसके मार्केट पर GST की टीम का छापा भी पड़ गया. चौतरफा दबाव पड़ा है, तो अब त्यागी ने नोएडा की एक अदालत में आत्म समर्पण के लिए याचिका लगाई है. यहां से उसे 10 अगस्त की तारीख मिली है. कार्रवाई हो रही है, उसका स्वागत है. लेकिन इस बात का जवाब कौन देगा, कि श्रीकांत त्यागी जैसे लोगों को पनपने किसने दिया?

पंजाब

दूसरा मामला पंजाब का है. एक लेवल बढ़ाते हुए, अब नेता की जगह विधायक महोदय के मामले की चर्चा की जाएगी. आप जानते ही हैं कि भारत में टोल देना या नहीं देना, प्रतिष्ठा का प्रश्न होता है. आपकी इज़्ज़त इस बात से भी आंकी जाती है कि टोल वाला आपकी गाड़ी आते आते नाका उठाता है या नहीं. विधायक जी वाली कहानी आपको इसी संदर्भ में सुननी होगी.

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होशियारपुर ज़िले में पड़ती है दसूआ विधानसभा सीट. यहां से विधायक हैं आम आदमी पार्टी के करमबीर सिंह ग़ुमान. 6 अगस्त के रोज़ विधायक जी जालंधर-पठानकोट राष्ट्रीय राजमार्ग से गुज़र रहे थे. इसपर पड़ता है चोलंग टोल नाका. अब केंद्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के नियम ये कहते हैं कि चुने हुए जनप्रतिनिधि की हैसियत से, करमबीर सिंह को टोल से छूट मिलेगी. उन्हें बस अपनी गाड़ी टोल बूथ तक ले जानी होगी, वहां अगर वो विधायकी का आधिकारिक परिचय पत्र दिखा दें, तो नाका ऊपर हो जाएगा.

सो करमबीर सिंह, दसूआ लौटते वक्त चोलंग टोल पर पहुंचे, तो उनकी गाड़ी VIP लेन  में दाखिल हुई. यहां टोल पर मौजूद स्टाफ से एक गलती हो गई. उन्होंने विधायक जी की शान में गुस्ताखी करते हुए VIP लेन का नाका उठाने में देर कर दी, क्योंकि वो दूसरी लेन से निकल रही गाड़ियों में व्यस्त थे. फिर क्या था, नाराज़ विधायक जी उतरे और अपने से नाका उठा दिया. इस दौरान करमबीर सिंह के साथ पंजाब पुलिस द्वारा दिए गए हथियारबंद अंगरंक्षक भी थे. फिर न सिर्फ उनकी गाड़ी निकली, बल्कि कई और गाडियां मुफ्त में टोल पार कर गईं, जो पात्र नहीं थीं. नाराज़ विधायक जी इतने पर ही नहीं रुके, उन्होंने टोल के कर्मचारियों को डांट भी पिला दी. जब टोल के मैनेजर मौके पर पहुंचे, तब विधायक जी को शांत कराया जा सका. ये सब दिन दहाड़े हुआ, सीसीटीवी में कैद भी हुआ.

आम आदमी पार्टी जिस आंदोलन से निकली, वो भ्रष्टाचार के साथ साथ, परंपरागत नेतागिरी में व्याप्त दादागिरी और वीआईपी कल्चर के खिलाफ भी था. वो आंदोलन कहां हवा हो गया, चोलंग टोल प्लाज़ा पर नज़र आ गया. हम आपको विधायक जी का भी पक्ष बताना चाहते थे, लेकिन प्राप्त समाचार के अनुसार अब तक उन्होंने इस खबर पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

कानपुर

तीसरे मामले के लिए पंजाब से फिर उत्तर प्रदेश की यात्रा पर चलिए. योगी आदित्यनाथ कैबिनेट में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री राकेश सचान. आज इन्होंने कानपुर की एक अदालत में सरेंडर कर दिया. उन्हें एक मामले में सज़ा भी सुनाई गई. लेकिन इस सब से पहले जो तमाशा हुआ, वो पूरे भारत ने देखा. इस तमाशे में सचान की भूमिका जानने के लिए आपको समय में 31 साल पीछे जाना होगा. साल था 1991. किदवई नगर के रहने वाले राकेश सचान तब छात्र राजनीति में थे.  ''आज तक'' पर छपी रंजय सिंह की रिपोर्ट के मुताबिक, उस साल कानपुर के नौबस्ता में तीन लोगों की हत्या हुई थी. तब नौबस्ता पुलिस ने राकेश सचान को एक रायफल के साथ पकड़ा था, जिसका लाइसेंस उनके पास नहीं था. सचान ने दावा किया कि रायफल उनके नाना की है. लेकिन ये मामला अदालत में गया और तब से लेकर अब तक अदालती कार्यवाही अपनी रफ्तार से चल रही थी.

एक तरफ अदालती कार्यवाही आगे बढ़ती रही, दूसरी तरफ सचान का राजनैतिक करियर. आर्म्स एक्ट वाला मामला बनने के दो साल के भीतर माने 1993 में वो सपा के टिकट पर पहली बार विधायक बने. 2002 में फिर विधायकी जीते. और 2009 में फतेहपुर लोकसभा से माननीय सांसद हो गए. इसके बाद सचान ने दस साल और सपा की राजनीति की. फिर खबर आई कि अखिलेश यादव से अनबन के चलते सचान कांग्रेस में चले गए. तीन साल कांग्रेस में रहने के बाद, सचान 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में आ गए. भोगनीपुर से उन्हें टिकट मिल गया. और वो जीत भी गए. चुनाव के बाद जब योगी के दूसरे कैबिनेट का ऐलान होने वाला था, उसके एक दिन पहले एक तस्वीर सोशल मीडिया पर तैरने लगती है, जिसमें सचान गृहमंत्री अमित शाह के साथ नज़र आ रहे थे. फिर जब सूची आई, उसमें न सिर्फ सचान का नाम शामिल दिखा, बल्कि उन्हें काबीना मंत्री भी बना दिया गया.

चूंकि सचान ने अनेक बार चुनाव के लिए पर्चा भरा है, इसीलिए उनपर चल रहे मामलों की जानकारी हमेशा सार्वजनिक रही. 2014 में अपने शपथ पत्र में सचान ने आठ मुकदमों का खुलासा किया था. इनमें से चार में कार्यवाही चल रही थी और एक में वो बरी हो चुके थे. सचान पर आर्म्स एक्ट का एक और मामला कानपुर कोतवाली में भी चल रहा है. बाकी मामलों में बवाल करने जैसी धाराओं का उल्लेख है. बवाल वगैरह के मामलों को सरकारें नियमित रूप से वापस भी लेती रहती हैं, क्योंकि भारत की देसी राजनीति में बवाल को मौन स्वीकृति प्राप्त है. सचान का दावा है कि उनके खिलाफ चल रहे सारे मामलों का वास्ता उनके छात्र जीवन से है, जिसे अखिलेश यादव सरकार भी वापस लेना चाहती थी और योगी आदित्यनाथ सरकार भी. बकौल सचान, योगी सरकार के आदेश पर इस संबंध में ज़िला मैजिस्ट्रेट कार्यालय में कार्यवाही चल रही थी.

वजह जो भी रही हो, 6 अगस्त 2022 तक सचान के खिलाफ सारे मामले वापस नहीं हुए थे. इस रोज़ कानपुर के अपर मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट -3 की अदालत में सचान के तीन मामलों की तारीख थी. दो में सुनवाई होनी थी. और नौबस्ता वाले आर्म्स एक्ट के मामले में जिरह पूरी हो चुकी थी. सचान को दोषी पाया गया. सज़ा के बिंदु पर सुनवाई हुई. जब जज साहब आदेश लिखने अपने चेंबर में गए, तब सचान के वकील ने उस फैसले की कॉपी मांगी, जिसमें उन्हें दोषी पाया गया था. और इसी को लेकर सचान फरार हो गए. जी हां. योगी सरकार में एक मंत्री, जिन्हें दोषी करार दिया गया था, वो फैसला लेकर ही गायब हो गए. अदालत में तैनात पुलिस क्या कर रही थी, राम जानें. मंत्री जी के साथ जो पुलिस का अमला चलता है, वो क्या कर रहा था, राम जानें. हम बस इतना जानते हैं कि ये सब दिन दहाड़े हुआ.

इसके बाद की कहानी और दिलचस्प है. न्यायालय की रीडर ने कानपुर नगर कोतवाली में मंत्री जी के खिलाफ तहरीर दी. इसमें लिखा गया था कि सचान के वकील ने फैसला देखने के लिए फैसले की कॉपी मांगी थी, और उसी को लेकर सचान फरार हो गए. उनके साथ सुरक्षा कर्मियों के अलावा 40-50 लोग थे. इसीलिए कोई कुछ नहीं कर पाया. तहरीर की आखिरी लाइन में उचित धाराओं में FIR दर्ज करने की मांग की गई थी. 6 अगस्त से 8 अगस्त का दिन आ गया, आदेश लेकर फरार होने के मामले में मंत्रीजी के खिलाफ FIR ही दर्ज नहीं हुई.

आप इसका कारण सुनेंगे, तो आपको चक्कर आ जाएगा. FIR दर्ज न करने पर पुलिस के आला अधिकारियों से सवाल किया गया. तब संयुक्त पुलिस आयुक्त आनंद प्रकाश तिवारी ने कहा कि न्यायालय की तहरीर में अपराध संज्ञेय ही नहीं लग रहा है. पुलिस ललिता कुमारी बनाम राज्य मामले में दी गई गाइडलाइन के मुताबिक काम कर रही है. इसके मुताबिक संज्ञेय न लगने वाले मामलों में पुलिस को जांच के लिए एक हफ्ते तक का समय मिलता है. इसी आधार पर कार्रवाई की जाएगी. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि संज्ञेय अपराध माने वैसा काम होता है, जो पुलिस की नज़र में अपराध हो.

मामले में आज का अपडेट ये है राकेश सचान ने आज कानपुर की अदालत में आत्म समर्पण कर दिया. वो अपने साथ कानपुर के नामचीन वकीलों का पैनल लेकर अदालत पहुंचे थे. पिछली बार से सबक लेते हुए बंद कमरे में सुनवाई हुई. मंत्री जी को आर्म्स एक्ट के मामले में एक साल की सज़ा हो गई है. साथ में 15 सौ रुपए का जुर्माना. लेकिन सचान जेल नहीं जाएंगे क्योंकि उन्होंने पहले से ज़मानत याचिका लगा रखी थी, जो कि आज मंज़ूर भी हो गई. मंत्री जी से बस एक बॉन्ड भरवाया गया, जो उनके लिए बड़ी बात कतई नहीं थी.

सचान कह रहे हैं कि मीडिया ने गलत बयानी की है. उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया. 6 अगस्त के रोज़ वो एक आधिकारिक कार्यक्रम के लिए निकलने वाले थे, इसीलिए उन्होंने जल्द सुनवाई का आग्रह किया था. लेकिन वकील ने कहा कि अदालत में समय लग जाएगा. इसके बाद वो वहां से चले गए. सचान ने चुनौती दी कि चाहे तो न्यायालय की सीसीटीवी फुटेज चेक कर ली जाए. लेकिन सचान ने ये नहीं बताया कि उनके खिलाफ न्यायालय की रीडर ने तहरीर आखिर क्यों दी? और उसमें ये क्यों लिखा कि वो फैसले की कॉपी लेकर फरार हुए? माननीय मंत्री जी आदेश की कॉपी लेकर फरार हुए. कुछ नहीं हुआ. तहरीर दी गई, तब भी कुछ नहीं हुआ, क्योंकि पुलिस को कानूनी रूप से कुछ गलत नज़र नहीं आया. इसीलिए, अब भी कुछ नहीं हुआ. प्रक्रिया का प्रश्न अपनी जगह पर है. लेकिन हमारा सवाल ये है कि अगर मंत्री महोदय की जगह कोई और इस तरह का काम करता, तो क्या पुलिस प्रक्रिया का हवाला देती? या फिर घसीटते हुए कोतवाली ले जाती?

इस सवाल का जवाब इसलिए भी ज़रूरी है कि योगी सरकार के एक और मंत्री - डॉ संजय निषाद के खिलाफ भी एक गैर ज़मानती वॉरंट जारी किया गया है. साल 2015 में निषादों को सरकारी नौकरियों में पांच फीसदी आरक्षण की मांग के साथ एक आंदोलन हुआ था. आंदोलन के दौरान बवाल हुआ और 22 साल के एक नौजवान की जान चली गई. इसी आंदोलन के दौरान हिंसा से जुड़े मामलों में संजय निषाद का नाम भी सामने आया था. क्या कानून बनाने वाली विधायिका के सदस्य संजय निषाद कानून का पालन करेंगे. और क्या तंत्र उनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत दिखा पाएगा. ये भी राम ही जानते हैं. 

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