The Lallantop

एक नई ट्रेन शुरू करने में कितना तामझाम लगता है?

एक नई ट्रेन को शुरू करने की A से Z तक की कहानी.

Advertisement
post-main-image
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साथ ही 8 नई ट्रेनें चलाने की घोषणा कर दी है. क्या आपको पता है कि एक नई ट्रेन शुरू करने में कितनी मशक्कत लगती है.
ट्रेन की टिकट ऑनलाइन बुक की और चढ़ गए ट्रेन पर. जब लेट हुई तो रेलवे को मन ही मन कुछ खरी खोटी भी सुनाई. लेकिन घर पहुंचकर सारा गुस्सा काफूर हो गया. ट्रेन में हम भले ही सैकड़ों बार चले हों लेकिन शायद ही कभी एक ट्रेन की इससे ज्यादा याद हमारे जेहन में बाकी रह जाती हो. क्या आपने कभी सोचा है कि जिस ट्रेन में आप यात्रा करके घर पहुंचे हैं उसको शुरू करने का क्या सिस्टम होता है. मतलब जब एक नई ट्रेन शुरू की जाती है तो उसके पीछे कितनी मशक्कत होती है. इसको जानने के लिए हमने ट्रेन के ऑपरेशनल और मैनेजमेंट से जुड़े कई रेल अधिकारियों से बात की. उन्होंने जो सिस्टम बताया उसके सहारे पेश है एक नई ट्रेन को शुरू करने की A से Z तक की कहानी. आज हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं आपको भी लग रहा होगा कि आखिर आज के दिन यह कहानी क्यों. रविवार(17 जनवरी) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को नए साल का तोहफा दिया. पीएम मोदी ने 8 नई ट्रेनों को हरी झंडी दिखाई और साथ ही एक नए रेलवे स्टेशन का उद्घाटन भी किया. यह काम उन्होंने गुजरात के केवड़िया में किया. यहां सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा है, वहां के लिए पीएम ने ट्रेनें शुरू कीं. इससे स्टेचू ऑफ यूनिटी तक सफर अब आसान होगा. आइए इन 8 ट्रेनों को चलाने की खबर के बहाने जानते हैं कि आखिर कोई ट्रेन शुरू कैसे होती है.
Narendra Modi New Trains
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 नई ट्रेनों की शुरुआत की है. (फोटो-पीटीआई)
गाड़ी बुला रही है... आपने गाड़ी बुला रही है वाला गाना तो जरूर सुना होगा. इसमें तो गाड़ी आम लोगों को बुलाती दिखती है लेकिन रेलवे के लिए किसी भी नई गाड़ी को शुरू करने का सिस्टम उसे बुलाने के साथ ही शुरू होता है. इस गाड़ी को बुलाने के दो तरीके हैं.
# सरकार किसी गाड़ी को शुरू करने का बुलावा दे
# किसी खास डिमांड पर गाड़ी को शुरू करने का बुलावा आए
मतलब ये कि गाड़ी चलाने की बात दो जगह से उठती है. पहली तो सरकार के रेल मंत्रालय से और दूसरा किसी क्षेत्र विशेष के जनप्रतिनिधि (सांसद) की तरफ से. कहने का मतलब यह कि एक नई ट्रेन चलानी है इसकी जरूरत या तो देश की सरकार समझती है या फिर किसी खास क्षेत्र के लोगों की मांग होने पर उस इलाके का जनप्रतिनिधि. दोनों ही तरह की डिमांड सबसे पहले रेलवे बोर्ड के पास भेजी जाती हैं. रेलवे बोर्ड इन पर विचार करता है कि क्या करना है. विचार करने के दो ही मापदंड होते हैं. सरकार किसी खास एरिया को सहूलियत देने के लिए ट्रेन चलाना चाहती है या किसी रूट पर गाड़ी की डिमांड बहुत ज्यादा है. इसके बारे में रेलवे के कमर्शियल और ऑपरेशन डिपार्टमेंट से जुड़े लोग रिपोर्ट देते हैं. फिर शुरू होता है हिसाब-किताब अमूमन रेल मंत्रालय जो डिमांड रेलवे बोर्ड को भेजता है उस पर पहले से काफी गुणा-भाग और प्लानिंग मंत्रालय के स्तर पर हो चुकी होती है. मिसाल के तौर पर अगर भारत सरकार को लगता है कि किसी खास एरिया में ट्रेन चलानी है तो मंत्रालय अपने स्तर पर काफी होमवर्क कर चुका होता है. इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से भी निर्देश शामिल होते हैं. इसके बाद जो प्रस्ताव रेलवे बोर्ड को जाते हैं उसे बोर्ड स्वीकार कर ही लेता है. किसी खास एरिया के सांसद की तरफ से आए प्रस्ताव को फिजीबिलिटी पता करने के लिए रेलवे बोर्ड आगे बढ़ा देता है. सबसे पहले रेलवे का कमर्शियल विभाग गुणा-गणित लगाता है कि क्या ट्रेन चलाना फायदा का सौदा होगा या नहीं. अगर नहीं तो इस प्रस्ताव को होल्ड पर डाल दिया जाता है.
आपको बार-बार लग रहा होगा कि ये रेलवे बोर्ड क्या माई बाप टाइप की चीज है कि यही सब फैसले ले रही है. तो इसके बारे में भी थोड़ा जान लीजिए
रेलवे बोर्ड मतलब जानकारों की पंचायत रेल चलाना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं. भारत जैसा विशाल देश जहां करोड़ों की जनसंख्या के साथ पहाड़ से लेकर रेगिस्तान तक सब है. ऐसे देश में रेल चलाना तो और भी मुश्किल है. ऐसे में रेल मंत्रालय में ही एक रेलवे बोर्ड बनाया गया है. इस बोर्ड में भारतीय रेल की दुनिया से जुड़े 8-9 एक्सपर्ट (संख्या घट-बढ़ सकती है) रहते हैं. यह रेल चलाने के एक्सपर्ट लोगों की पंचायत होती है. इसमें प्लानिंग और इंजीनियर से जुड़े विभागों के एक्सपर्ट्स, ब्यूरोक्रेट्स आदि शामिल रहते हैं. इन सभी के अनुभव के आधार पर रेल मंत्रालय काम करता है. ऐसे में रेल चलाने की शुरुआत की महती जिम्मेदारी भी इस बोर्ड से ही शुरू होती है.
Railway Board Piyush Goyal
भारत सरकार के रेल मंत्रालय के अंतर्गत रेलवे बोर्ड ही एक्सपर्ट्स की वह पंचायत होती है जहां पर रेल से जुड़े बड़े फैसले लिए जाते हैं. (फोटो-ट्विटर)
सबसे पहले ट्रेन पर चर्चा जब रेल बोर्ड किसी रूट पर ट्रेन को चलाने की तैयारी करता है तो उस रूट से जुड़ी ऑपरेशन और मैनेजमेंट से जुड़े हर डिपार्टमेंट से चर्चा करता है. मान लीजिए लखनऊ से दिल्ली के बीच एक ट्रेन चलानी है. ऐसे में लखनऊ से दिल्ली के बीच जितने भी डिवीजन होंगे उनके ऑपरेशन और कमर्शियल से जुड़े बड़े अधिकारियों की रेलवे बोर्ड के साथ मीटिंग होगी. इनसे मीटिंग के बाद यह तय होगा कि ट्रेन को चलाना व्यावहारिक तरीके से कितना मुमकिन होगा. इस चर्चा में सब ठीकठाक रहने पर ट्रेन का प्रपोजल आगे बढ़ता है. रेल अधिकारी बताते हैं कि अगर एक बार मंत्रालय चाह लेता है तो यह प्रपोजल पास हो ही जाता है. इस पूरे प्रोसेस में रेलवे का कमर्शिल विभाग ट्रेन चलाने को लेकर रुपए-पैसे का हिसाब-किताब लगाता है. एक ट्रेन में कितने डिब्बे होंगे और उसे चलाने के लिए कितने स्टाफ की जरूरत होगी. इसका एक खाका तैयार करके रेलवे बोर्ड को भेजा जाता है. बोर्ड इस पूरे खाके के अनुसार ट्रेन की रैक (पूरी ट्रेन को तकनीकी भाषा में रैक कहते हैं) और स्टाफ उपलब्ध कराने के लिए प्रोसेस शुरू करता है. मेंटेनेंस स्लॉट सबसे जरूरी एक बार कागज़ी अप्रूवल मिलने के बाद जमीन पर काम शुरू होता है. इसमें सबसे पहले मेंटेनेस का स्लॉट देखा जाता है. मतलब सबसे पहले यह देखा जाता है कि गाड़ी को मेंटेन करने के लिए टाइम स्लॉट खाली है कि नहीं. बिना मेंटेन की गई गाड़ी चलाना रेलवे नियमों के खिलाफ है. यह स्लॉट ट्रेन शुरू होने वाले स्टेशन और खत्म होने वाले स्टेशन पर ही होता है. किसी भी ट्रेन को मेंटेन करने में 6 घंटे का वक्त लगाता है. मेंटिनेंस तीन तरह का होता है. प्राइमरी, सेकेंडरी और टर्मिनल मेंटिनेंस. प्राइमरी मेंटिनेंस में गाड़ी के पहिए से लेकर इंजन तक हर कल पुर्जे को चेक किया जाता है. सेकेंडरी में यह जांच बड़े कल-पुर्जों तक ही सीमित होती है. ये दोनों तरह के मेंटेनेंस स्टेशन के यार्ड में होते हैं. टर्मिनल मेंटेनेंस स्टेशन पर खड़ी गाड़ी में होता है. आपने शायद देखा हो कि अक्सर आखिरी स्टेशन पर खड़ी ट्रेन की सफाई और झाड़-पोछ की जाती है.
अगर यह 6 घंटे का मेंटेनेंस स्लॉट नहीं उपलब्ध है तो गाड़ी नहीं चल सकती. हमने उदाहरण के लिए लखनऊ और दिल्ली के बीच गाड़ी को लिया था. ऐसे में अगर लखनऊ और दिल्ली में स्लॉट खाली नहीं है तो ट्रेन को आगे या पीछे के बड़े स्टेशन तक बढ़ाया या घटाया जाता है. मिसाल के तौर पर लखनऊ की जगह ट्रेन को सुल्तानपुर से चलाया जा सकता है. स्लॉट के इस चैलेंज को पूरा करने के बाद ही अगले स्टेप पर बढ़ा जाता है.
Indian Train
किसी भी नई ट्रेन को शुरू करने से पहले उसके मेंटेनेंस स्लॉट को खोजा जाता है.
अब आती है मास्टर चार्ट की बारी इसके बाद मास्टर चार्ट बनाने की शुरुआत होती है. मास्टर चार्ट बोले तो इस रूट पर चलने वाली हर गाड़ी का टाइमिंग के हिसाब से एक ब्लू प्रिंट. इस मास्टर चार्ट को बनाने का काम अब भी हाथ से होता है. इसमें रूट की हर गाड़ी की टाइमिंग और एक्टिविटी का लेखा-जोखा रहता है. कोई भी गाड़ी अगर आस्तित्व में है तो उसका इस मास्टर चार्ट पर होना जरूरी है. चूंकि हमें ट्रेन लखनऊ से दिल्ली के बीच चलानी है तो इस रूट पर चलने वाली हर ट्रेन के साथ नई ट्रेन को भी मास्टर चार्ट में शामिल करते हैं. फीडिंग का काम है टाइट मास्टर चार्ट बनने के बाद फीडिंग का काम शुरू होता है. फीडिंग मतलब लखनऊ से दिल्ली के बीच की हर गाड़ी का हर स्टेशन से गुजरने का हिसाब-किताब. लखनऊ से दिल्ली के बीच का हर स्टेशन अपने यहां रुकने या गुजरने वाली ट्रेनों की टाइमिंग उपलब्ध कराता है. इसे नई ट्रेन के टाइम टेबल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. दुरुस्त टाइम टेबल जब हर स्टेशन पर ट्रेन की एक्टिविटी का हिसाब लगा लिया जाता है तो टाइम टेबल तैयार होता है. टाइम टेबल दो तरह का होता है. एक वर्किंग टाइम टेबल और दूसरा पब्लिक टाइम टेबल. वर्किंग टाइम टेबल एक फिल्म की पटकथा की तरह होता है. इसमें ट्रेन के किसी स्टेशन पर रुकने से लेकर वहां गार्ड क्या करेगा, ड्राइवर क्या करेगा, ट्रेन किस स्पीड से, किस लोकेशन से गुजरेगी जैसी महीन बातों को बताया जाता है. यह आम लोगों को देखने के लिए उपलब्ध नहीं होता. इसके आधार पर ही नई ट्रेन पर रेलवे का स्टाफ काम करता है. पब्लिक टाइम टेबल वही होता है जो हम लोगों के सामने ट्रेन शुरू होने के बाद आता है. इसमें सिर्फ आने-जाने की टाइमिंग को लिखा जाता है.
ये सारी कसरत दुरुस्त करने के बाद ही नई ट्रेन को चलाने के लिए हां बोली जाती है.
Time Table Indian Railways
नई ट्रेन चलाने से पहले उसके दो टाइम टेबल तैयार होते हैं. एक डिपार्टमेंट के लिए और दूसरा आम पब्लिक के लिए.

इन बातों को भी जानिए
क्या नई ट्रेन का ट्रायल भी होता है? पारंपरिक ट्रेन का कोई ट्रायल नहीं होता लेकिन अगर ट्रेन नई तरह की है तो ट्रायल होता है. मिसाल के तौर पर ट्रेन 18 और तेजस का ट्रायल हुआ था लेकिन आम ट्रेनों को शुरू करने पर उनका ट्रायल नहीं होता.
क्या नई ट्रेन सिर्फ एक सेट से ही शुरू होती है? ऐसा नहीं होता कि जो ट्रेन आए वही वापस जाए. किसी भी ट्रेन के अपने आखिरी स्टेशन पर पहुंचने के बाद उसे मेंटेनेंस में भेजा जाता है जिसमें घंटों लगते हैं. इसलिए हर ट्रेन के कम से कम 2 रैक तो होते ही हैं. मतलब हर ट्रेन कम से कम 2 होती हैं. मतलब लखनऊ-दिल्ली के बीच अगर नई ट्रेन चली है तो एक ट्रेन लखनऊ से दिल्ली और दूसरी दिल्ली से लखनऊ के बीच चलेगी. जिस स्टेशन से ट्रेन शुरू होती है उधर से ट्रेन को 'अप' ट्रेन कहते हैं. वापस आने पर इसे 'डाउन' ट्रेन कहा जाता है. दूरी और रूट के हिसाब से ट्रेन के रैकों की संख्या होती है. कई ऐसी ट्रेन हैं जिनकी 5-6 तक रैक होती हैं.
कुछ रूट पर कम तो कुछ पर बहुत ट्रेनें क्यों हैं? इसका सीधा कमर्शल एंगल है. रेलवे का कमर्शियल विभाग हर रूट की ट्रेनों की वेटिंग लिस्ट पर नजर रखता है. जिस रूट पर लंबी वेटिंग लिस्ट होती है मतलब उस रूट पर गाड़ी की डिमांड ज्यादा है. ऐसे में उन रूट्स पर ही ज्यादा गाड़ियां चलाई जाती हैं. रेलवे नई गाड़ी चलाने से पहले बहुत गुणा-गणित इसलिए भी लगाता है क्योंकि अगर गाड़ी शुरू कर दी तो एक पैसेंजर के आने पर भी उसे गाड़ी चलानी ही पड़ेगी. यह उसके लिए घाटे का सौदा साबित होगा.
एक नई गाड़ी को शुरू करने में कितना वक्त लगता है? एक नई गाड़ी को प्रपोजल से लेकर जमीन पर उतारने में 6-8 महीने का वक्त तो लगता ही है. हालांकि अगर भारत सरकार किसी रूट पर गाड़ी चलाने कि लिए ज्यादा दबाव बनाती है तो 2-3 महीने में भी गाड़ी चला दी जाती है. सब कुछ रेल मंत्रालय की प्राथमिकता पर निर्भर करता है.
तो इस बार जब ट्रेन के स्टेशन पर खड़े होकर अपनी गाड़ी का इंतजार करें तो जरूर याद रखें कि एक गाड़ी चलाने के पीछे सैकड़ों लोगों की मेहनत और प्लानिंग लगी है.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement