ढाई दशक पहले त्रिपुरा भी दूसरे उत्तर-पूर्व के राज्यों की तरह अलगाववादी हिंसा से पीड़ित था. हालात इतने खराब थे कि 16 फरवरी, 1997 को सूबे में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (AFSPA)को लागू कर दिया गया. इसके करीब 18 साल बाद 28 मई, 2015 के रोज त्रिपुरा सरकार ने इस कानून को अपने राज्य से हटा दिया. पंजाब के बाद ऐसा करने वाला त्रिपुरा दूसरा राज्य था. आखिरकार त्रिपुरा ने यह कमाल कैसे कर दिखाया?
इस मुख्यमंत्री ने एक-दो नहीं बल्कि 20 सर्जिकल स्ट्राइक करवाई हैं
किसी दौर में उग्रवाद से परेशान त्रिपुरा आज देश के सबसे शांत और पढ़े-लिखों राज्यों में से एक है

1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के वक़्त बड़े पैमाने पर बांग्लादेशी शरणार्थी भारत आना शुरू हुए. त्रिपुरा बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है. त्रिपुरा के आदिवासियों ने इसे उनके क्षेत्र में गैर-जरुरी अतिक्रमण की तरह लिया. बंगाली हिन्दुओं के विरोध में 1978 में त्रिपुरा नेशनल वॉलेंटियर्स फ़ोर्स बनी. इसके नेता हुआ करते थे बिजॉय हरंगखावल. दस साल यह संगठन हथियारों के दम पर त्रिपुरा को स्वतंत्र देश बनाने के लिए संघर्ष करता रहा. 1988 में हरंगखावल ने आत्मसमर्पण कर दिया और चुनावी राजनीति में आ गए.

नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ त्रिपुरा के गुरिल्ला
त्रिपुरा में अलगाववादी हिंसा का दूसरा उभार हुआ 1990 के दौर में. त्रिपुरा में बसे बंगालियों को बाहर खदेड़ने और स्वतंत्र त्रिपुरा की मांग को लेकर 80 के अंत में दो बड़े अलगाववादी संगठन उभरे. पहला था 1989 में खड़ा हुआ नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT). इस संगठन ने अपनी सशस्त्र टुकड़ी को नाम दिया नेशनल होली आर्मी (NHA). दूसरा संगठन बना जुलाई 1990 में. इस संगठन का नाम था ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (ATTF).

संजय हजारिका की किताब Strangers No More
अपनी किताब 'Strangers No More' में अलगाववादियों के खिलाफ माणिक सरकार की रणनीति के बारे में संजॉय हजारिका लिखते हैं-
"21वीं शताब्दी के पहले दशक में माणिक सरकार ने खुद की विदेश सुरक्षा नीति बनानी शुरू की. इस नीति में नई दिल्ली का हस्तक्षेप कम से कम रखा गया. माणिक सरकार ने सूबे के आला पुलिस अधिकारी जीएम श्रीवास्तव, मुख्य सचिव वीएम तुलिदास पर पूरा भरोसा जताया. सेना के खुफिया विभाग के एक अधिकारी की मदद से इन लोगों ने ऐसी रणनीति तैयार की, जिसके जरिए विद्रोहियों पर तेजी के साथ कड़ी मार की जा सके.
2003 और 2006 के बीच सुरक्षा बलों की स्पेशल यूनिट्स ने बांग्लादेश में छिपे बैठे आतंकवादियों पर 20 दफा हमले किए. इन हमलों में सुरक्षा बलों के साथ उन विद्रोहियों को शामिल किया गया जिन्होंने कुछ समय पहले ही त्रिपुरा सरकार के सामने आत्मसमर्पण किया था. इसके अलावा अलगाववादियों को ठिकाने लगाने के लिए बांग्लादेश की अपराधिक गैंग की भी मदद ली गई. त्रिपुरा सरकार ने इन्हें पैसा देने का बहकावा देकर अपने पक्ष में कर लिया."
2008 में बांग्लादेश के आम चुनावों में शेख हसीना को जबरदस्त बहुमत मिला. उनके सत्ता में आने के साथ ही साफ़ हो गया कि बांग्लादेश में बेस बनाकर बैठे आतंकवादी संगठनों के दिन लदने वाले हैं. शेख हसीना पर त्रिपुरा का एक पुराना अहसान था. 1968 में जब उनके पिता शेख मुजीब स्वतंत्र बांग्लादेश के लिए संघर्ष कर रहे थे, वो अपने कुछ साथियों के साथ अगरतला आए थे. वो उस समय त्रिपुरा के मुख्यमंत्री सचिन्द्र लाल सिंह से मदद मांगने आए थे. मुजीब चाहते थे कि पाकिस्तानी सेना से बचाने के लिए सचिंद्र लाल त्रिपुरा से सशस्त्र मदद भेजें. हालांकि मुजीब की इस यात्रा की कलई खुल गई थी और पाकिस्तानी सरकार ने उनपर राजद्रोह का मुकदमा कायम किया. इसे अगरतला कॉन्सपिरेसी केस के नाम से जाना गया.

शेख मुजीब रहमान
शेख हसीना ने सत्ता में आते ही बांग्लादेश में तंबू गाड़कर बैठे अलगाववादियों पर हमला बोल दिया. इधर भारत की सीमा में भारतीय सुरक्षा बल उग्रवादियों का जीना हराम किए हुए थे. वहीं कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता त्रिपुरा की पहाड़ियों में अपनी पकड़ फिर से हासिल कर रहे थे. ऐसे में अलगाववादी संगठनों के पास बचकर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा. ATTF और NLFT के गुरिल्ला तेजी से आत्मसमर्पण करने लगे. यह माणिक सरकार की सबसे बड़ी सफलता थी. कुछ ही सालों में त्रिपुरा में इंसर्जेंसी लगभग खत्म हो गई. ATTF और NLFT आज की तारीख में अप्रासंगिक संगठन हो गए हैं.
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