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बुलेटप्रूफ कार और जैकेट बंदूक की गोली को कैसे रोक लेते हैं?

गोली रोकने वाला शीशा बनता कैसे है?

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कार और कवच. कैसे अभेद्य बनते हैं. (गैटी/विकिमीडिया)
आनंद बक्शी लिख गए हैं- शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है.
लेकिन ये ज़रूरी नहीं है कि हर शीशा टूट ही जाए. कुछ शीशे बहुत कर्रे होते हैं. उन्हें भेदना आसान नहीं. भले ही उस शीशे की तरफ बुलेट आ रही हो. हम बात कर रहे हैं बुलेटप्रूफ शीशों की. ये अचानक हम पीजे क्यों मार रहे हैं? वजह है एक खबर. और कोशिश उस खबर के तकनीकी पहलू समझने की.
पिछले हफ्ते कोलकाता में बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हो गया. बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय को भी चोटें आई थीं. इसी के बाद उनके काफिले में एक बुलेटप्रूफ कार को शामिल किया गया है. अब वो इसी कार में बैठकर घूमा करेंगे.
जेपी नड्डा और कैलाश विजयवर्गीय. (विकिमीडिया)
जेपी नड्डा और कैलाश विजयवर्गीय. (विकिमीडिया)

अब अपने क्यूरियस मन में सवाल है. आखिर बुलेटप्रूफ कार और जैकेट में ऐसा क्या होता है कि उसे कुछ भेद नहीं पाता?
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बुलेटप्रूफ गाड़ी की चर्बी
किसी साधारण कार को बुलेटप्रूफ बनाने के लिए उसे सबसे पहले खोल दिया जाता है. दरवाज़े वगैरह अलग कर लिए जाते हैं. फिर पूरी कार की बॉडी में कई प्लेट्स लगाई जाती हैं. स्टील, नायलॉन और केवलार जैसे मटेरियल की प्लेट्स. ये कार की बॉडी को इतना मज़बूत बना देती हैं कि बुलेट इसके पार नहीं जा पाती.
बाकी की बॉडी का तो समझ आता है कि बहुत ही स्ट्रॉन्ग मटेरियल से लपेटकर बुलेट को रोका जा सकता है. लेकिन उसके शीशे को मज़बूत कैसे बनाते हैं? शीशा तो ज़रा सा पत्थर मारकर तोड़ा जा सकता है. फिर बुलेटप्रूफ कार का शीशा बुलेट को कैसे रोकता है?
जर्मनी की चांसलर इस मर्सिडीज़ में चलती हैं. ये बुलेटप्रूफ है. (विकिमीडिया)
जर्मनी की चांसलर इस मर्सिडीज़ में चलती हैं. ये बुलेटप्रूफ है. (विकिमीडिया)

पहली बार बुलेटप्रूफ ग्लास 1909 में बनाया गया था. इसे बनाने वाले फ्रेंच केमिस्ट का नाम है एडॉर्ड बेनेडिक्टस. ये एक बहुत ही बुनियादी मॉडल था. प्लास्टिक का एक वेरिंएंट होता है सेल्यूलॉइड. बेनेडिक्टस ने दो ग्लास शीट के बीच में सेल्यूलॉइड लगा दिया. ये बुलेट्स को रोक लेता था.
शीशा क्यों टूटता है?
अगर आपने क्रिकेट खेला है या ध्यान से देखा है तो आप इसकी फिज़िक्स कुछ-कुछ फील कर पाएंगे. जब एक क्रिकेट बॉल तेज़ी से किसी फील्डर की तरफ आती है, तो उसे पकड़ा कैसे जाता है? क्या वो फील्डर अपने हाथ एक जगह जमाकर झटके में बॉल पकड़ता है? नहीं. फास्ट बॉल को कैच करने के लिए फील्डर अपने हाथ बॉल के साथ थोड़ी पीछे ले जाता है.
अगर कोई फील्डर स्थिर हाथों से तेज़ बॉल को पकड़ेगा तो उसे झटका महसूस होगा. लेकिन वो अपने हाथों को बॉल के साथ पीछे ले जाएगा तो आसानी से बॉल पकड़ लेगा. ऐसा करने से धीरे-धीरे बॉल की ऊर्जा कम होती जाती है.
गेंद पकड़ने की कोशिश में लड़का फिज़िक्स पढ़ के आया है या नहीं? (गैटी)
गेंद पकड़ने की कोशिश में लड़का फिज़िक्स पढ़ के आया है या नहीं? (गैटी)

फिज़िक्स में एक बेसिक कॉन्सेप्ट है.
फोर्स = चेंज इन मूमेंटम. (बल = संवेग में होने वाला बदलाव.)
मूमेंटम यहां सीधे बॉल की स्पीड पर निर्भर करता है. जितनी ज़्यादा स्पीड, उतना ज़्यादा मूमेंटम. अगर बॉल को अचानक से रोक दिया जाए तो मूमेंटम एक झटके में चेंज होगा. और हाथ पर बहुत ज़्यादा फोर्स महसूस होगा. वहीं अगर बॉल का मूमेंटम धीरे-धीरे कम किया, तो हाथ पर कम बल लगेगा.
साधारण ग्लास इस तरह पीछे नहीं हो सकता. इसलिए उसे बुलेट का पूरा मूमेंटम एक साथ झेलना पड़ता है. ऐसे में शीशे पर बहुत ज़्यादा फोर्स लगता है और वो टूट जाता है. बुलेटप्रूफ ग्लास साधारण ग्लास से इस मामले में अलग होता है. वो बुलेट को धीमा करने की कोशिश करता है.
बुलेटप्रूफ ग्लास कैसे बनता है? 
साधारण ग्लास के बीच में पॉलीकार्बोनेट मटेरियल की लेयर डालने से एक सैंडविचनुमा चीज़ तैयार होती है. पॉलीकार्बोनेट मटेरियल प्लास्टिक टाइप का होता है. ये पॉलीकार्बोनेट मटेरियल मज़बूत होने के साथ थोड़ा फ्लैक्सिबल भी होता है. ऐसे ही कई साधारण ग्लास और पॉलीकार्बोनेट की लेयर चढ़ाकर बुलेटप्रूफ ग्लास तैयार होता है. इसे ग्लास के ऊपर लेमिनेट करना कहते हैं. इससे ये बुलेटप्रूफ ग्लास की मोटाई काफी ज़्यादा हो जाती है.
ग्लास(नीला) और पॉलीकार्बोनेट मटेरियल(ग्रे) का कॉम्बिनेशन.
ग्लास (नीला) और पॉलीकार्बोनेट मटेरियल (ग्रे) का कॉम्बिनेशन.

अब होता ये है कि जैसे ही बुलेट इस ग्लास की तरफ आती है, वो पहले वाले शीशे को तो तोड़ देती है. लेकिन उस बुलेट की ऐनर्जी वहां साइड में फैल जाती है. फिर बुलेट अगली लेयर की तरफ बढ़ती है, तो ऐनर्जी दूसरी लेयर में बंट जाती है. इस तरह जैसे-जैसे बुलेट आगे बढ़ती है, उसका मूमेंटम कम होता जाता है. बुलेट की ऐनर्जी ग्लास और पॉलीकार्बोनेट मटेरियल की लेयर में सोख ली जाती है. बुलेट बाहरी ग्लास की पट्टी को तो तोड़ देती है. लेकिन वो पूरी तरह इस ग्लास के पार नहीं जा पाती.
बुलेटप्रूफ कार का वज़न नॉर्मल कार से काफी ज़्यादा हो जाता है. क्योंकि उसमें कई लेयर जोड़ी जाती हैं. अलग-अलग लेवल की सिक्योरिटी के लिए अलग ग्लास होते हैं. जितना मज़बूत शीशा होगा, उसका वज़न उतना ज़्यादा होगा.
एक बात बता दें कि ऐक्सपर्ट लोग बुलेटप्रूफ ग्लास कहने से बचते हैं. वो इसके बदले बुलेट-रेज़िस्टेंट ग्लास कहना पसंद करते हैं. क्योंकि कोई भी शीशा अभेद्य नहीं होता. बुलेट रेज़िस्टेंट ग्लास आमतौर पर बुलेट के प्रभाव को कम करता है. अगर एक ही पॉइंट पर कई बुलेट मारते जाएं तो शीशे की लेयर टूटती जाती हैं. ग्लास कमज़ोर होता जाता है. ऐसे में कई इम्पैक्ट के बाद वो ग्लास टूटना तय है.
एक ज्वेलरी शॉप में चोरी की नाकाम कोशिश. ग्लास बुलेटप्रूफ था. (विकिमीडिया)
एक ज्वेलरी शॉप में चोरी की नाकाम कोशिश. ग्लास बुलेटप्रूफ था. (विकिमीडिया)

ये तो हुई गाड़ी की बात, लेकिन इंसान हमेशा गाड़ी पर तो चलता नहीं है. ज़मीन पर तो कदम रखने ही पड़ते हैं. ऐसे में बुलेट से बचने के लिए बुलेटप्रूफ वेस्ट पहने जाते हैं.
बुलेटप्रूफ कपड़े
बुलेटप्रूफ वेस्ट बनाने में सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उन्हें हल्का ही होना होगा. उन्हें इस बात को ध्यान में रखकर बनाया जाता है कि उन्हें पहनकर चलने फिरने में दिक्कत न हो. इसे मेनली सिक्योरिटी से जुड़े लोग ही पहनते हैं. तो उन्हें इसके बाद भागने दौड़ने में सहूलियत होनी चाहिए. ये कार की तरह बहुत भारी नहीं हो सकतीं.
शुरुआती वेस्ट स्टील प्लेट्स की बनाई जाती थीं. इसे पहनने वाले की मूवमेंट काफी सीमित हो जाती थी. और इसे एक अच्छा बॉडी आर्मर नहीं समझा जाता था.
1923 की एक बुलेटप्रूफ वेस्ट की टेस्टिंग. ये वाली बहुत भारी होती थी. (विकिमीडिया)
1923 की एक बुलेटप्रूफ वेस्ट की टेस्टिंग. ये वाली बहुत भारी होती थी. (विकिमीडिया)

बुलेटप्रूफ वेस्ट में 60 के दशक में एक बड़ा बदलाव आया. डूपोंट नाम की कंपनी में एक केमिस्ट काम करते थे. स्टेफनी क्वोलेक. इन्होंने केवलार नाम के एक मटेरियल का आविष्कार किया. केवलार हल्का और मज़बूत था. इससे बुलेटप्रूफ वेस्ट्स बनाई जाने लगीं.
आजकल की बुलेप्रूफ वेस्ट पॉलीइथाइलीन फाइबर से बनाई जाती हैं. इस फाइबर की कई लेयर एकसाथ बुनकर एक प्रोटेक्टिव वेस्ट की शक्ल दी जाती है. ये केवलार से ज़्यादा सस्ते और मज़बूत साबित हुए.
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आजकल सेना में इस्तेमाल होने वाली बुलेटप्रूफ वेस्ट. (विकिमीडिया)

बुलेटप्रूफ वेस्ट भी ऊर्जा बिखेरने के सिद्धांत पर काम करती हैं. कई लेयर्स के बीच बुलेट की ऐनर्जी साइड में बंट जाती है. बुलेट धीमी होती जाती है. और पूरी तरह वेस्त को नहीं भेद पाती. ये वेस्ट बुलेट से उसकी ऐनर्जी सोख लेती है

'सरकार' मूवी का एक सीन है. इसमें एक हथोड़ा मारकर कार का बुलेटप्रूफ ग्लास तोड़ दिया जाता है. उसके बाद वहां बंदूक डालकर कार में बैठे व्यक्ति को गोली मार दी जाती है. बता दें कि ऐसा मुमकिन नहीं है. अगर वो ग्लास हथोड़े से ही टूट गया, तो बुलेट से तो वो डेफिनेटली टूट जाता. और वो भी हथोड़े का सिर्फ एक ही शॉट. ऐसे में काहे का बुलेटप्रूफ ग्लास?

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