हो गया? सबने समझ लिया ना “वास्तेगाना हुईंयां”, “कुचु-पचू”, “Delulu”, “Clock It”, “Micro Clap” क्या होता है? अब तक हर इन्फ्लुएंसर, इंस्टाग्राम पेज, न्यूज़ चैनल, डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म (हां, हमने भी) ने इसका मतलब बता दिया है. आपने भी हर तीसरी रील में इसे देखकर समझने की कोशिश की. हो सकता है आप अब तक भूल चुके हों, दिक्कत आपकी नहीं है. मेरा खुद अटेंशन स्पैन कम हो गया है (रीलों का चक्कर बाबू भैया, रीलों का).
मगर ये अलबलहे शब्द, जो डिक्शनरी में खोजे नहीं मिलते, शेक्सपियर सुन ले तो शरमा जाए, आते कहां से हैं. जिन्हें सीख सीख कर आप अपना Aura +100 करना चाहते हैं, चाहते हैं कि आपको देखकर लोग कहें “कितना कूल आदमी है, इससे बात कैसे करूं”. ऐसे ज़्यादातर शब्द आते हैं Drag Culture से.
Gen-Z को थोक के भाव Slay, Serve, Tea जैसे शब्द देने वाला Drag Culture क्या है?
Gen Z आजकल जिन शब्दों का इस्तेमाल करता है, उनमें से ज़्यादातर Drag Culture से आते हैं.


क्या है Drag Culture:
Drag एक तरह की Performance Art है, जिसमें Femininity, Masculinity या Gender Expression को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है. इसमें लोग आमतौर पर अपने जेंडर से अलग जेंडर के कपड़े और लुक रखते हैं. ये खुद को एक्सप्रेस करने का एक तरीका होता है.

थोड़ा किताबी भाषा लग रही है? समझाना है तो ऐसे समझो कि ड्रैग एक Gender-bending Art Form है जिसमें आमतौर पर क्रॉस-ड्रेसिंग होती है. जैसे कोई पुरुष महिलाओं की तरह कपड़े पहन सकता है. परफॉर्म कर सकता है और खुद को एक्सप्रेस कर सकता है. Bold मेकअप, रंग-बिरंगे विग, चमकदार कपड़े यानि कुल मिलाकर पूरा लुक ही खूब फैशनेबल, रंगीन और थिएट्रिकल. जो पुरुष ये करते हैं उन्हें Drag Queen कहते हैं. महिलाएं, जो पुरुषों की तरह कपड़े पहनती हैं उन्हें ड्रैग किंग कहते हैं.
यहां पर ये भी ध्यान देना ज़रूरी है कि ऐसा आमतौर पर होता है. Drag Queen या Drag King कोई भी बन सकता है. जेंडर ज़रूरी नहीं होता. यानी एक महिला भी Drag Queen बन सकती है और पुरुष Drag King भी.

कहां से शुरू हुआ ये कल्चर?
अब जब ड्रैग कल्चर पूरी दुनिया में छा रहा है. बड़े-बड़े रॉकस्टार और सुपर स्टार इस आर्ट फॉर्म से आ रहे हैं तो ये भी जानना ज़रूरी है कि ये आर्ट फॉर्म शुरू कहां से हुई और इस Sub-Culture जैसा अपने देश में क्या है? ये समझने से पहले समझते हैं कि ये ड्रैग शब्द आया कहां से. वैसे इसके बारे में कोई सॉलिड सोर्स नहीं हैं, कहानियां हैं.
जैसे पहला यूज़ मिलता है 1870 में, जब Drag शब्द का इस्तेमाल महिलाओं के कपड़े पहनकर एक्टिंग करने वाले कलाकारों के कॉन्टेक्स्ट में यूज़ किया गया था. एक और दावा ये होता है कि ये 19वीं सदी का एक थिएटर स्लैंग था. जब नाटक करते हुए पुरुष महिला के कपड़े पहनते थे, जैसे गाउन या स्कर्ट, तो वो स्टेज पर घिसटती थी, यानी ड्रैग होती थी. वहां से ड्रैग शब्द आया.

थिएटर और ड्रैग कल्चर:
ड्रैग का थिएटर से जुड़ाव समझना है तो Thanos से उधार लेना होगा Time Stone और आना होगा समय के पीछे, बहुत पीछे… लगभग 2500 साल पहले, प्राचीन यूनान यानी Greece थिएटर में महिलाएं एक्ट नहीं कर सकती थीं. पुरुष ही ये कैरेक्टर निभाते थे.
प्लेटो की किताब Republic में सुकरात कहते हैं कि inferiors यानी जिन्हें 'निचले स्तर का' माना जाता था उनका किरदार निभाना ही चरित्र पर बुरा असर डालने वाला है. उन्हें लगता था कि नाटकों में औरतों, गुलामों या बहुत भावुक लोगों की नकल करना इंसान के चरित्र पर बुरा असर डाल सकता है.

धीरे-धीरे थिएटर और नाटक फेमस होते गए मगर महिलाओं को स्टेज पर जगह नहीं मिली. पुरुषों को महिलाओं का रोल करना पड़ता था. थिएटर के साथ पैदा हुआ ड्रैग कल्चर धीरे-धीरे बदला. जल्द ही ये कई पुरुषों, खासकर गे पुरुषों के लिए खुद को एक अलग अंदाज में एक्सप्रेस करने का जरिया बन गया. यहां पर ये भी बताना ज़रूरी है कि सिर्फ गे पुरुष ही ड्रैग नहीं करते, बल्कि हेटेरोसेक्शुअल पुरुष भी ड्रैग करते हैं. अब मज़बूरी में शुरू हुआ Cross-dressing अब खुद का एक परफॉरमेंस स्टाइल बन गया. और धीरे-धीरे ड्रैग ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी.
Ballroom culture:
अब आप कहेंगे कि आप आए थे जेन ज़ी शब्द आते कहां से हैं पढ़ने मगर ड्रैग का इतिहास क्यों बताया जा रहा है. मगर Trust Me, हम वहीं पहुंच रहे हैं. थोड़ा फ़ास्ट फॉरवर्ड करते हैं और पहुंचते हैं 1960 के दशक की शुरुआत में. ड्रैग कल्चर धीरे-धीरे एक सब-कल्चर की तरह बड़ा हो रहा था.

न्यूयॉर्क में LGBTQ+ Community के बीच "Drag Balls" होने लगे. इसे ऐसे समझिए कि ये एक LGBTQ+ Ballroom Scene एक अंडरग्राउंड पार्टी और art contest है. इसकी शुरुआत 1960 और 1970 के दशक में न्यूयॉर्क में African-American और Latin LGBTQ+ समुदाय ने की, क्योंकि उन्हें आम ब्यूटी पेजेंट और समाज में बराबरी की जगह नहीं मिलती थी. साथ ही उनके साथ रेसिज़्म यानी नस्लभेद भी होता था. Black Drag Queens से ये उम्मीद की जाती थी कि वो अपनी त्वचा को सफ़ेद करें, ताकि उनके जीतने के चांसेज़ बढ़ सकें.

यहां पर एक नाम आता है Crystal LaBeija का. रेसिज़्म के चलते उन्होंने Black और Latino LGBTQ+ कम्युनिटी के लोगों के लिए एक नया स्टेज बनाया, जिसे नाम दिया गया House of LaBeija, ये पहला Ballroom House माना जाता है. Ballroom में हाउस को बहुत ख़ास माना जाता है. House केवल एक टीम नहीं होती, बल्कि एक chosen family होती है. उस समय कई LGBTQ+ युवाओं को उनके परिवारों ने घर से निकाल दिया था. ऐसे में Houses उन्हें रहने की जगह के साथ-साथ इमोशनली भी सपोर्ट करता था. हर House में House Mother और House Father होते हैं और उनके सदस्य Ballroom प्रतियोगिताओं में अपने House का प्रतिनिधित्व करते हैं.
यही वो स्पेस था जहां लोग अलग-अलग कैटेगरी में सजते संवरते थे, डांस करते थे और ट्रॉफी के लिए मुकाबला करते थे. यह उनके लिए एक सेफ स्पेस था जहां वो खुलकर जी सकते थे.

Slangs:
Ballroom सिर्फ डांस या फैशन तक लिमिटेड नहीं था. इन Performances में अक्सर Comedy, Music, Social Satire और कई बार Political Commentary भी होती है.
वहां प्रतियोगिताओं के दौरान हिस्सा लेने वाले और कमेंटेटर एक खास तरह की भाषा इस्तेमाल करते थे. यही भाषा बाद में LGBTQ+ कम्युनिटी से निकलकर पॉप कल्चर और फिर सोशल मीडिया तक पहुंची, जिसे आज लोग Gen Z की लिंगो कह देते हैं.

Ballroom से लोकप्रिय हुए कई शब्द आज रोजमर्रा की इंटरनेट भाषा का हिस्सा हैं. जैसे:
Slay- कमाल कर देना, शानदार प्रदर्शन करना
Yass / Yas Queen - वाह! कमाल! ज़बरदस्त!
Queen - शानदार, आइकॉनिक या बेहद स्टाइलिश इंसान
Mother - ऐसा आइकॉन जिसे सब मानते और पसंद करते हैं
Mother is Mothering - अपने आइकॉनिक अंदाज़ पर पूरी तरह खरी उतरना
Serve / Serving - अपने लुक, स्टाइल या अंदाज़ से सबका ध्यान खींच लेना
It's Giving... - कोई व्यक्ति, कपड़ा या स्थिति कैसी वाइब, एनर्जी या लुक दे रही है.
Ate - कमाल कर दिया
Ate and Left No Crumbs - इतना अच्छा किया कि कोई मुकाबला ही नहीं बचा
No Notes - कोई कमी नहीं, सब परफेक्ट
Shade - ताना मारना या छुपकर बेइज्जती करना
Read / Reading - किसी की कमी या गलती को चुटीले अंदाज़ में सबके सामने बताना
Tea / T - गॉसिप
Clock It - किसी बात या हरकत को तुरंत पकड़ लेना या पहचान लेना
Gagged - हैरान या दंग रह जाना
Face Card - इतनी खूबसूरती कि कभी फेल न हो
Period. - बस, बात खत्म
हां-हां मुझे पता है थोड़ा अजीब लग रहा है आपको पढ़ने में, लेकिन अंग्रेजी के शब्द, वो भी इस तरह के, हिंदी में इसे ऐसे ही समझाए जा सकते हैं. टीवी वाले प्रोड्यूसर्स को और सांसद जी को तो यही समझ आएगा न.

भारत और विश्व में Drag Culture और Cross-Dressing:
बिहार में अब भी होने वाला ‘लौंडा नाच’ इसका एक एक्साम्पल है जहां Cross Dressing होती है. इसे Drag नहीं कहा जा सकता है. मगर इस लोक कला में भी पुरुष महिअलों की तरह कपड़े पहनकर परफॉर्म करते हैं.
enrouteindianhistory.com के एक आर्टिकल - Woman and Indian Theatre: Shaping Identity and Narrative में लिखा गया कि “भारत में भी लंबे समय तक थिएटर में महिलाओं की एंट्री नहीं थी. कथकली और यक्षगान जैसी traditional performances में महिलाओं के मंच पर आने पर रोक थी, इसलिए उनके किरदार भी पुरुष ही निभाते थे. ये उस दौर की सोच दिखाता है, जब महिलाओं को घर तक ही सीमित रखा जाता था.
सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में यही हो रहा था. जैसे जापान में 1603 के आसपास शुरू हुआ एक तरह का जैपनीज़ थिएटर काबुकी. इज़ुमो नो ओकुनी नाम की एक महिला ने इसे शुरू किया था. इसे आमतौर पर female performers ही करती थीं. 1629 में जापान की मिलिट्री सरकार ने यह कहते हुए महिलाओं के कबुकी में प्रदर्शन पर रोक लगा दी कि ये आर्ट फॉर्म prostitution और public disorder से जुड़ गई है. फिर महिलाओं की जगह बच्चों का यूज़ किया गया, उस पर भी बैन लगा. 1600 के दशक के मध्य से पुरुष इसे परफॉर्म करते, वही महिलाओं का कैरेक्टर भी निभाते थे. यहां तक कि शेक्सपीयर के नाटकों में भी महिलाओं के रोल, पुरुष ही करते थे.

अब बात अली सलीम की. पाकिस्तान के एक TV होस्ट, एक्टर, स्क्रिप्टराइटर और बिग बॉस 4 के कंटेस्टेंट. इन सारी चीजों में बिग बॉस 4 का उनके नाम के साथ होना सबसे Low Point माना जाएगा. अली सलीम अपने क्रॉस-ड्रेसिंग कैरेक्टर 'बेगम नवाज़िश अली' के लिए जाने जाते थे. इसी पहचान के साथ Late Night Show with Begum Nawazish Ali जैसे शोज़ भी बनाए. साड़ी पहनकर बेगम बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज़, नेताओं और मशहूर लोगों का इंटरव्यू करती थीं.

इस वक़्त अपने देश में ये कल्चर अपनी जगह बना रहा है और धीरे-धीरे मेनस्ट्रीम आर्ट और पॉप कल्चर का हिस्सा बन रहा है. Drag और Cross-Dressing को लेकर बने भ्रम टूट रहे हैं. कुछ फेमस नाम की बात करें तो माया द ड्रैग क्वीन, रानी कोहिनूर (सुशांत दिवगीकर), लश मॉनसून, बेट्टा नान स्टॉप जैसे नाम सामने आते हैं. 2019 में हैदराबाद में भारत का पहला ड्रैग कन्वेंशन हुआ था. जून 2020 में ड्रैगवांती नाम का एक वेब पोर्टल शुरू हुआ.
महिलाओं को थिएटर में जगह ना मिलने से शुरू हुआ ये सफर ना सिर्फ लाखों लोगों को खुलकर जीने का मौका देता है, बल्कि आज की जेनरेशन को खूब शब्द भी दे रहा है. कुल मिलाकर इतनी सारी बातों की एक बात ये है कि अगली बार जब चुगली या “गॉसिप” करने जाओ या “टी” (वर्बल टी) लेने जाओ, तो ड्रैग कल्चर को थैंक यू बोल देना.
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