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देश को पहला दलित मुख्यमंत्री देने वाले बिहार में दलित राजनीति कैसे लड़खड़ा गई?

बिहार में दलित आंदोलन की सुगबुगाहट है क्या?

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भोला पासवान शास्त्री और पूर्व उप-प्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम
80 का दशक. देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में कांशीराम और उनकी बहुजन समाज पार्टी मजबूती से दस्तक देते हैं. पार्टी कई बार  सरकारें भी बनाती है. लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि कांशीराम और उनकी सियासत ने उत्तर प्रदेश की सियासत को इस प्रकार मथ डाला कि सारे राजनीतिक समीकरण उलट-पुलट हो गए. कांशीराम के प्रयोग ने दलित चिंतन को राजनीतिक व्यूह रचना के केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया.
अब थोड़ा और पीछे चलते हैं. दक्षिण भारत में पेरियार का उदय और महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले की सामाजिक बराबरी की लड़ाई. इन दोनों ने दक्षिण और पश्चिम भारत में समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े दलितों को मुख्यधारा में लाकर खड़ा कर दिया.
अब बात उस सूबे की, जिसने देश को पहला दलित उप प्रधानमंत्री दिया, पहला मुख्यमंत्री दिया, लेकिन दलितों की राजनीतिक चेतना और सामाजिक अवस्थिति- दोनों की आज भी कमोबेश वही हालत है, जो आज से एक शताब्दी पहले हुआ करती थी. बिहार में अनुसूचित जाति (जिसे आम बोलचाल की भाषा में दलित वर्ग कहा जाता है) की जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत है. किसी राज्य की 16 प्रतिशत आबादी यदि दो जून की रोटी की जद्दोजहद में अपनी पूरी जिंदगी खपा दे, तो उस राज्य का मानव विकास के तमाम मानकों में निचले पायदान पर दिखाई देना स्वाभाविक है. चाहे वह शिक्षा, स्वास्थ्य या प्रति व्यक्ति आय का मामला हो.
आइए इस परिस्थिति के पीछे के कारणों से रूबरू होने की कोशिश करते हैं
15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने के बाद बिहार देश का पहला राज्य बना, जिसने जमींदारी उन्मूलन कानून पारित किया था. इसके बाद यह उम्मीद जगी थी कि बिहार में समाज के दबे-कुचले तबके की सामाजिक और आर्थिक तरक्की का रास्ता खुलेगा. लेकिन सात दशकों बाद भी स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है. 60 के दशक के आखिर में भोला पासवान शास्त्री बिहार के मुख्यमंत्री बन गए थे. यह देश के किसी भी राज्य में किसी अनुसूचित जाति के नेता के मुख्यमंत्री बनने की पहली घटना थी. 1977 में बिहार के बाबू जगजीवन राम देश के उप-प्रधानमंत्री बन गए थे. लेकिन तब भी बिहार के अनुसूचित जाति के लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आ पाया.
आज जब विधानसभा चुनाव के ठीक पहले प्रवासी मजदूरों का सवाल सियासी चर्चा के केन्द्र में आकर खड़ा हो गया है, तब यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि इन प्रवासी मजदूरों में सबसे बड़ी संख्या अनुसूचित जाति के लोगों की है. इन अनुसूचित जाति के लोगों को राज्य की सरकारें अपनी-अपनी सुविधानुसार दलित और महादलित की श्रेणी में रखती हैं, तो कभी सबको महादलित बनाकर एक ही श्रेणी बना देती हैं. लेकिन क्या इस प्रकार की कवायद से दलित समाज के लोगों की सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाने में कोई मदद मिली है?
संविधान बनने के साथ-साथ इस समाज को सरकारी नौकरियों और संसद में 15 प्रतिशत आरक्षण भी दे दिया गया. दलित उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कानून बना दिए गए. लेकिन फिर भी यदि इनकी सामाजिक और राजनैतिक स्थिति में कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं आ सका है, तो निश्चित तौर पर यह 'बीमारी कुछ और इलाज कुछ' की नीति की ओर इशारा करता है.
दलितों में परिवारवाद
माना जाता है कि किसी समाज में सामाजिक और आर्थिक चेतना लाने के लिए सबसे पहले राजनीतिक चेतना के विकास की आवश्यकता होती है. ज्योतिबा फुले ने महाराष्ट्र में और कांशीराम ने उत्तर प्रदेश में इसी राजनीतिक चेतना को विकसित करने का भरसक प्रयास किया था. लेकिन जब बात बिहार की आती है, तो यहां के अधिकांश दलित नेताओं ने अपने समाज के भीतर राजनीतिक चेतना जगाने की बजाए अपने परिवार के लोगों को सियासत का ककहरा सिखाकर उन्हें आगे बढ़ाने में अपनी सारी राजनीतिक ऊर्जा खर्च कर दी. अपवाद के रूप में कुछ ऐसे दलित नेता भी हुए, जिन्होंने न कोई पैसा बनाया, न ही अपने परिवार के लोगों को राजनीति में आगे बढ़ाया. लेकिन ऐसे नेताओं ने भी सामाजिक ताने-बाने को समझते हुए किसी तरह का जोखिम लेने की जहमत नहीं उठाई.
Jyotiba Phule
ज्योतिबा फुले

दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह है कि देश के जिस किसी भी हिस्से में जब कभी भी (स्वतंत्र भारत में अथवा ब्रिटिश भारत में) दलित चेतना का विकास हुआ, उस वक्त वहां की शासन व्यवस्था पर सामान्य श्रेणी के लोग काबिज थे. जब तमिलनाडु में पेरियार का उभार हुआ या पश्चिमी भारत में ज्योतिबा फुले या अंबेडकर का उभार हुआ, तब ब्रिटिश सरकार के अधीन औपनिवेशिक सत्ता कायम थी. वहीं कांशीराम के उभार के वक्त उत्तर प्रदेश की सत्ता में भी समाज के उच्च वर्ग (श्रीपति मिश्र, वीरबहादुर सिंह और एनडी तिवारी जैसे लोग मुख्यमंत्री थे) का दबदबा था, जबकि पिछड़ा वर्ग (OBC) ने अपने लिए जगह बनाने की जद्दोजहद अभी शुरू ही की थी. इन स्थानों पर पिछड़े वर्ग के उभार की चुनौतियों से निबटने के लिए सत्तासीन लोगों ने दलित वर्ग को हाथोंहाथ लेना शुरू किया और उनकी तरक्की के लिए कुछ न कुछ योगदान भी किया. इससे इन स्थानों पर (यदि छिटपुट झड़पों को छोड़ दें तो) दलितों और समाज के अगड़े तबके के बीच एक समझदारी विकसित हो गई.
मंडल आंदोलन से क्या हुआ?
उत्तर प्रदेश में 2007 के विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी की सफलता इसी समझदारी का एक उदाहरण है. इसके ठीक उलट बिहार के हालात पर नजर डालें, तो पता चलता है कि यहां के दलितों में राजनीतिक चेतना का विकास होना तभी शुरू हुआ (70 और 80 का दशक), जब सत्ता पर उच्च वर्ग और पिछड़े वर्ग (OBCs) के बीच सत्ता का संघर्ष अपने चरम पर था. 90 के दशक में जब वामपंथी संगठनों (जिनका नेतृत्व उच्च वर्ग या सामान्य श्रेणी के हाथ में था) के नेतृत्व में यह दलित चेतना अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंची. तब तक सत्ता पर मंडल आंदोलन की कोख से जन्मे पिछड़े वर्ग के नेताओं का कब्जा हो चुका था. यह पिछड़ा वर्ग, जो खुद अपनी सामाजिक और आर्थिक हैसियत को उपर उठाने की लड़ाई कई दशकों से लड़ रहा था, अब सत्ता का इस्तेमाल अपने वर्ग की भलाई के लिए करने की बजाए जातीय आग्रहों में उलझ कर रह गया. ऐसे हालात में जब नेतृत्व की सोच की संकीर्णता का स्तर ये हो कि वह अपने वर्ग (OBC) की बजाए अपनी जाति और परिवार तक सिमट कर रह जाए, तो भला दलित वर्ग की कौन सोचता है. सरकारें बनती रहीं, बदलती रहीं.
सरकारों के लिए दलित वर्ग का मतलब सिर्फ राहत पैकेज चलाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझने तक सीमित होता चला गया. सार्वजनिक स्वास्थ्य और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता चला, जिससे गरीब लोगों (जिसमें दलित वर्ग के अधिकांश परिवार आते हैं) के लिए अवसर कम होते चले गए. सरकारें ढिंढोरा पीटती रहीं कि हमने दलितों के बीच रेडियो बांटे, कपड़े बांटे, आवास बनवाए, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को कॉन्ट्रैक्ट पर होने वाली बहालियों के भरोसे छोड़कर दलित वर्ग को रिलीफ पैकेज को ही अंतिम सत्य मान लेने की सोच विकसित करने पर मजबूर कर दिया.
दलितों में जातीय चेतना
बिहार में दलित राजनीति के विकास में बाधक बनने वाला तीसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 90 के दशक और उसके बाद अगड़े और पिछड़े वर्ग की देखा-देखी बिहार के दलितों में भी जातीय चेतना हावी हो गई. इससे एक बड़े दलित आंदोलन का अवसर दलितों के हाथ से निकल गया. अगड़े वर्गों में जातीय चेतना का विकास तब हुआ, जब वे समाज के बाकी समुदायों से आगे निकल गए. पिछड़े वर्गों की कुछ जातियों में जातीय चेतना तब विकसित हुई, जब इनमें से कुछ जातियों ने सत्ता का स्वाद चख लिया. लेकिन दलितों के बीच अपनी सामाजिक स्थिति को सुधारे बिना ही जातीय भावनाओं ने अपना बसेरा कायम कर लिया. इसका परिणाम यह हुआ कि एक प्रभावी दलित आंदोलन की संभावना ही खत्म हो गई.
आज पासवान समुदाय लोक जनशक्ति पार्टी के साथ, मुसहर समुदाय जीतनराम मांझी की पार्टी हम के साथ, जबकि रविदास समाज ने बहुजन समाज पार्टी के साथ अपनी राजनीतिक पहचान को जोड़ लिया है. ये सभी पार्टियां अपने लिए, अपने परिवार के लिए और अपनी पार्टी की राजनीतिक सौदेबाजी के लिए जाति को वोटबैंक के तौर पर इस्तेमाल करती रही हैं.
हाल के समय में मजदूरों की समस्या ने बिहार में दलित आंदोलन की एक नई संभावना जगाई है. आने वाले विधानसभा चुनाव में यह देखा जाना है कि बिहार के दलित वोटरों की गोलबंदी का आधार आर्थिक पहलू (जैसे मजदूरों की समस्या, रोजगार इत्यादि) पर हो पाता है या फिर से पुराने जातीय ढर्रे पर ही सियासत होनी है.

ये स्टोरी हमारे साथी अभिषेक ने की है.

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विडियो- चुनाव में प्रवासी मजदूरों का क्या रोल रहने वाला है?

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