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ये कौन सी स्कीम है जिसमें कर्मचारियों को जॉब से निकालो तो वो गरियाते नहीं, दुआ देते हैं

शर्तें सुनकर आप भी कहोगे- मुझे भी जॉब छोड़नी है.

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होंडा के एक लेटेस्ट विज्ञापन में अक्षय कुमार. (यू ट्यूब स्क्रीनग्रैब)
होंडा मोटरसाइकिल एंड स्कूटर इंडिया (HMSI) अपने कर्मचारियों को लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (Voluntary retirement scheme, VRS) लेकर आई है. कंपनी के अनुसार,ऑटो सेक्टर की हालत पिछले तीन साल से ही ख़राब चल रही है लेकिन कोविड-19 के चलते परेशनियां बढ़ती जा रही हैं. इसी के चलते उसे इस ऑफ़र का सहारा लेना पड़ा है ताकि कॉस्ट कटिंग की जा सके और प्रोडक्ट को कंपटिटिव बनाए रखा जा सके. HMSI के VRS की ये योजना-
# 5 जनवरी, 2021 से लेकर 23 जनवरी, 2021 तक लागू रहेगी. मतलब, स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के इच्छुक कर्मचारी इस विंडो के दौरान अपनी इच्छा कंपनी को बता सकते हैं.
# इसमें सिर्फ़ स्थाई कर्मचारी भाग ले सकेंगे. वो भी जिनकी आयु 40 साल से अधिक हो या जिन्हें 31 जनवरी, 2021 तक  कंपनी में काम करते हुए कम से कम 10 साल हो गए हों.
# VRS लेने वालों को दिया जाने वाला कंपनसेशन (पैसा और अन्य सुविधाएं) उनके ओहदे के हिसाब से तय होगा. साथ ही VRS के लिए अप्लाई करने वाले पहले 400 कर्मचारियों को पांच लाख रुपए एक्स्ट्रा भी मिलेंगे.
# ये VRS डायरेक्टर स्तर के कर्मचारियों के लिए नहीं है.
ये सभी जानकारियां कंपनी ने अपने मानेसर प्लांट के कर्मचारियों को भेजे गए एक नोटिस में कही हैं. यूं ये निश्चित नहीं है कि क्या ये ऑफ़र या स्कीम होंडा के सभी कर्मचारियों के लिए है या सिर्फ़ मानेसर प्लांट के कर्मचारियों के लिए.
होंडा का मनेसर प्लांट. (तस्वीर: PTI) होंडा का मनेसर प्लांट. (तस्वीर: PTI)
प्राइवेट कंपनियों में Voluntary Retirement Scheme को लेकर क्या नियम-क़ानून हैं - जैसा नाम से ज़ाहिर है, VRS में सब कुछ स्वैच्छिक है. कंपनी आपको फ़ोर्स नहीं करती कि जॉब छोड़ दो. बस विकल्प देती है कि अगर कंपनी छोड़ दोगे तो ये-ये मिलेगा. अब अगर आप इस कंपनी के कर्मचारी हैं तो आप इस ऑफ़र को स्वीकार भी कर सकते हैं और अस्वीकार करके या इग्नोर करके उसी कंपनी में अपना काम करना जारी रख सकते हैं.
लेकिन अगर कंपनी VRS लेकर आ रही है, तो मतलब ये है कि वो चाहती है कि लोग कंपनी छोड़ें. और इसके लिए, ज़ाहिर है, कंपनी बेहतर से बेहतर ऑफ़र लेकर आएगी. जिससे कि कर्मचारी को नौकरी छोड़ना भी कोई उतना बुरा विकल्प न लगे.
इसलिए VRS को लेकर कोई क़ानून या नियम न होने के बावज़ूद कंपनियां ख़ुद ही काफ़ी अच्छा कंपनसेशन ऑफ़र करती आई हैं. वो भी इस विकल्प के साथ कि ये ‘स्वैच्छिक’ है. केवल कर्मचारी के लिए ही नहीं, कंपनी के लिए भी. मतलब अगर होंडा के पास किसी ऐसे कर्मचारी की VRS की अर्ज़ी आए, जिसके लिए वो नहीं चाहती कि छोड़कर जाए, तो होंडा को पूरा अधिकार है कि वो कर्मचारी की VRS रिक्वेस्ट ख़ारिज कर दे.
दरअसल 1 अप्रैल, 1947 से अस्तित्व में आए ‘औद्योगिक विवाद अधिनयम’ के अनुसार ‘लेबर यूनियन’ के अंतर्गत आने वाली कोई भी भारतीय कंपनी (फिर चाहे वो सरकारी हो, पब्लिक या प्राइवेट) किसी कर्मचारी को ऐसे ही नहीं निकाल सकती और न ही कर्मचारियों की छंटनी कर सकती है.
तो फिर अगर छंटनी के बिना कंपनी का काम ही न चले तो, य उसे नुक़सान होता रहे तो. तो, ऑफ़ कोर्स वो अपने कर्मचारियों को लुभाकर, ख़ुद जॉब छोड़ देने के लिए मोटिवेट ज़रूर कर सकती है. यही मोटिवेशन VRS है.
कर्मचारियों को निकालने का सबसे मानवीय तरीक़ा है ये. जिसमें कर्मचारी निकलते हुए भी ख़ुश रहता है और कंपनी तो ख़ुश होती ही है. इसलिए ही VRS को ‘गोल्डन हैंडशेक’ भी कहते हैं. और दिए जाने वाले कंपनसेशन को ‘एक्स-ग्रेशिया’ कहा जाता है.
"attachment_300813" align="aligncenter" width="700"SBI भी बीते साल अपने कर्मचारियों के लिए VRS लेकर आने वाली थी. लेकिन फिर पीछे हट गई. (तस्वीर: PTI) SBI भी बीते साल अपने कर्मचारियों के लिए VRS लेकर आने वाली थी. लेकिन फिर पीछे हट गई. (तस्वीर: PTI)

निश्चित अमाउंट बोले तो निम्न दो विकल्पों में से जो भी कम होगा-
# बची हुई नौकरी में मिलने वाली तनख़्वाह का 50%. या कहें कि VRS वाले दिन से लेकर रिटायरमेंट वाले दिन तक की तनख़्वाह का 50%. ‘रिटायरमेंट वाले दिन’ का अर्थ यहां पर उस दिन से है जिस दिन VRS न मिलने की स्थिति में कर्मचारी को अन्यथा भी रिटायर होना ही था.
# पिछले 18 महीने की तनख़्वाह.
इसके अलावा कर्मचारियों को ग्रैच्युटी और हेल्थ इंश्योरेंस का बेनिफिट भी मिलना तय हुआ था और दो साल कूलिंग ऑफ पीरियड भी. कूलिंग ऑफ पीरियड मतलब, अगर कर्मचारी वापस नौकरी जॉइन करना चाहते हैं तो वीआरएस लेने के दो साल के अंदर वापस जॉइन भी कर सकते हैं.
हालांकि SBI ने बाद में ये VRS स्कीम नहीं लॉन्च की. कारण बताया कि इससे कई ऐसे पद ख़ाली हो जाएंगे, जो ज़रूरी हैं.
ऐसे ही BSNL (एक सरकारी संस्था) जब VRS स्कीम लाई थी तो उसके नियम अलग थे. और ये वाली स्कीम इतनी सफल रही थी कि MTNL (जो बाद में BSNL में जुड़ गया था) के क़रीब 80% कर्मचारियों ने इसके लिए अप्लाई कर डाला था.  BSNL के कुल 1 लाख 53 हज़ार कर्मचारियों में से 78,569 ने VRS ले लिया था. स्कीम प्रथम दृष्टया ही इतनी लुभावनी लग रही है.
हालांकि इसकी सफलता का कारण ‘गोल्डन हैंड शेक’ के साथ इस तथ्य को भी माना जा सकता है कि इस स्कीम से पहले कई महीनों तक BSNL के कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली थी. तो क्या ये सफलता ‘दाम से पहले दंड’ टाइप कोई काउंटर इंट्यूटिव एप्रोच के चलते तो नहीं थी?
VRS और ले-ऑफ़ (निकाल दिए जाने) में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है. जैसे ‘परमानेंट एम्प्लॉई’ और ‘कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉई’ के बीच. तो आप समझ जाइए कि अब भी आंदोलन कर रहे ये कौन लोग हैं. (तस्वीर: PTI) VRS और ले-ऑफ़ (निकाल दिए जाने) में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है. जैसे ‘परमानेंट एम्प्लॉई’ और ‘कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉई’ के बीच. तो आप समझ जाइए कि अब भी आंदोलन कर रहे ये कौन लोग हैं. (तस्वीर: PTI)

कारण जो भी हो, हमें लॉजिक समझ में आ गया कि VRS अपने नाम के अनुरूप ही पूरी तरह और दोनों पक्षों के लिए स्वैच्छिक है. एक दूसरे तरह का VRS - आप देख रहे हैं कि जब कंपनी को ज़रूरत है कि कर्मचारी जॉब छोड़कर जाएं तो वो लुभावनी स्कीम्स लेकर आती है. और ये पर्याप्त रूप से तार्किक भी है. लेकिन अगर बिना किसी स्कीम के ऐसा करते हैं तो वो VRS नहीं रेजिगनेशन (इस्तीफ़ा) कहलाएगा. यूं फिर आपको कोई कंपनसेशन नहीं मिलेगा. बस जो, पीएफ, ग्रेचुटी वग़ैरह आपने कमाई है और जो अन्यथा भी रिटायर होने पर मिलती, वही सब मिलेगी.
लेकिन केंद्रीय कर्मचारियों के पास बिना किसी स्कीम के भी VRS लेने का विकल्प उपलब्ध है. इस स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए VRS लेते वक्त स्थाई कर्मचारी की आयु 55 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए. ग्रुप A, B (ऑफ़िसर रेंक) के कर्मचारियों के लिए ये आयु 50 वर्ष है. या फिर ये जरूरी है कि कर्मचारी ने 20 वर्ष की नौकरी पूरी कर ली हो.
ऐसे कर्मचारी अगर बिना किसी स्कीम के भी VRS लेते हैं तो उन्हें कुछ ज़्यादा तो नहीं लेकिन 60 वर्ष की उम्र के बाद पेंशन ज़रूर मिलने लगेगी. यूं ये भी कहा जा सकता है कि ये ऐसा रेजिगनेशन है जिसमें आपकी पेंशन बन जाती है. क्यूंकि अगर आप 55 वर्ष की कम आयु पर और 20 साल से कम के टेन्योर पर रेजिगनेशन देते हैं तो आप पेंशन के हक़दार नहीं होते.
अब इसमें भी एक कैच ये है कि OPS (ओल्ड पेंशन स्कीम) वालों के लिए तो ये स्कीम फ़ायदेमंद है. लेकिन NPS (न्यू पेंशन स्कीम) वालों की पेंशन का हिसाब-किताब तो प्राइवेट कंपनियों सरीखा है. जाते-जाते आपको OPS और NPS के बीच अंतर समझाने वाली एक स्टोरी के साथ छोड़े जाते हैं-
पढ़ें: क्यूं नेशनल पेंशन स्कीम से न सरकारी कर्मचारी ख़ुश हैं, न बाक़ी लोग इससे जुड़ रहे हैं?

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