हीमैन के पर्दे पर लौटने की खबर कोई ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं लगती, ये ज़्यादा एक याद दिलाने जैसा है. जैसे कोई पुराना दोस्त अचानक मिल जाए और पता चले कि बातचीत तो कभी बंद ही नहीं हुई थी. हीमैन फिर दिखेगा, तलवार उठाएगा, दुश्मनों से लड़ेगा, लेकिन सच्चाई ये है कि वो हमारे अंदर से कभी गया ही नहीं. जिस देश में करोड़ों बच्चे टीवी के सामने बैठकर एक साथ “आई हैव द पावर” बोलते थे, वहां हीमैन सिर्फ एक कार्टून नहीं था. वो भरोसा था कि कमजोर दिखने वाला भी सही वक्त आने पर ताकतवर बन सकता है. और शायद यही वजह है कि उसकी वापसी आज भी हमें उतना ही छू जाती है.
'ही-मैन' नहीं, आम आदमी है असली हीरो! भारत के हर गली-मोहल्ले में छिपा है एक 'प्रिंस एडम'
He-Man Returns on Screen: 80 और 90 के दशक के लोकप्रिय कार्टून हीमैन की बड़े पर्दे पर वापसी होने जा रही है. Masters of the Universe पर आधारित नई लाइव-एक्शन फिल्म की पहली झलक सामने आई है, जिसमें प्रिंस एडम उर्फ हीमैन की भूमिका निकोलस गालिट्ज़ीन निभा रहे हैं और स्केलेटर के किरदार में जैरेड लेटो नजर आएंगे. फिल्म जून 2026 में रिलीज़ होगी और इटरनिया की जादुई दुनिया, ग्रे स्कल का किला और अच्छाई-बुराई की वही क्लासिक लड़ाई नए अंदाज में दिखेगी, जिसे देखकर फैंस में जबरदस्त नॉस्टैल्जिया और उत्साह देखने को मिल रहा है.


जब खबर आती है कि हीमैन वापस लौट रहा है, तो ये सिर्फ एक कार्टून की वापसी नहीं होती. ये अस्सी और नब्बे के दशक में पले लाखों बच्चों के बचपन की घंटी बजा देती है. वो घंटी, जो दूर कहीं अलार्म की तरह नहीं, बल्कि स्कूल से लौटकर टीवी ऑन करने की खुशी जैसी बजती है. जैसे हीमैन का नाम सुनते ही दिमाग में एक साथ कई चीजें चलने लगती हैं. ग्रे स्कल का किला, बिजली चमकती तलवार, और वो डायलॉग, जिसे बोलते वक्त हर बच्चा खुद को दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान समझने लगता था.
हीमैन आखिर था क्याहीमैन कोई आम कार्टून कैरेक्टर नहीं था. वो था प्रिंस एडम, एक दुबला सा, सीधे-सादे चेहरे वाला राजकुमार, जो सही वक्त आने पर तलवार उठाता था और बोलता था, “आई हैव द पावर.” इसके बाद जो होता था, वही जादू था. दुबला प्रिंस एडम पल भर में मांसपेशियों का पहाड़ बन जाता था. आवाज भारी हो जाती थी, कंधे चौड़े, और चेहरे पर वो भरोसा, जो दुश्मन को देखते ही हिला दे.
ये सिर्फ ट्रांसफॉर्मेशन नहीं था. ये हर उस बच्चे का सपना था, जो खुद को कमजोर समझता था, लेकिन अंदर ही अंदर जानता था कि सही मौके पर वो भी ताकतवर बन सकता है.
इटरनिया की दुनिया और स्केलेटर का डरहीमैन की दुनिया का नाम था इटरनिया. एक ऐसी जगह जहां जादू भी था, मशीनें भी, और दोनों का अजीब सा मेल भी. वहां अच्छे थे, बुरे थे, और बीच में वो लोग थे जिनका दिमाग कभी इधर तो कभी उधर डोल जाता था.
सबसे बड़ा विलेन था स्केलेटर. हड्डियों वाला चेहरा, नीली चमड़ी और हंसी ऐसी कि रात में सुन लो तो नींद भाग जाए. स्केलेटर सिर्फ ताकत से नहीं डराता था, वो दिमाग से खेलता था. शायद इसी वजह से वो आज भी याद रहता है. वो एक कार्टून विलेन नहीं, डर का पूरा कॉन्सेप्ट था.
भारतीय टीवी और हीमैन का जादूभारत में हीमैन की एंट्री ऐसे समय में हुई, जब टीवी पर विकल्प गिने-चुने थे. न मोबाइल था, न ओटीटी, न यूट्यूब. कार्टून देखने का मतलब था एक तय समय पर टीवी के सामने बैठ जाना.
हीमैन का टाइम मतलब पूरा मोहल्ला शांत. होमवर्क बाद में, दूध का गिलास बाद में, पहले हीमैन. उस वक्त रिमोट भी माता पिता के कब्जे में होता था, लेकिन हीमैन के सामने सब हार मान जाते थे.
उस दौर में हीमैन सिर्फ कार्टून नहीं था, वो स्टेटस सिंबल था. जिसके पास हीमैन का खिलौना हो, वो क्लास का हीरो. प्लास्टिक की तलवार, एक्शन फिगर, या स्कूल बैग पर छपा हीमैन.
किसी दोस्त के घर अगर हीमैन की पूरी टीम मिल जाए, तो समझो उस दिन का खेल वहीं खत्म. बच्चे रोल बांट लेते थे. कोई हीमैन, कोई बैटल कैट, और मजबूरी में कोई स्केलेटर.

हीमैन की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण था उसका नैतिक संसार. हर एपिसोड के आखिर में वो बच्चों को कुछ सिखाता था. कभी दोस्ती की अहमियत, कभी सच बोलने की ताकत, कभी गुस्से पर काबू.
आज के कई कार्टूनों की तरह सिर्फ मारधाड़ नहीं. कहानी के बाद एक छोटी सी सीख. जैसे कोई बड़ा भाई टीवी के अंदर से निकलकर समझा रहा हो.
सुपरहीरो, लेकिन अकेला नहींहीमैन उस जमाने का सुपरहीरो था, जब सुपरहीरो का मतलब सिर्फ शक्तियां नहीं होता था. वो जिम्मेदारी भी होती थी. हीमैन लड़ता था, लेकिन बेवजह नहीं. वो ताकतवर था, लेकिन घमंडी नहीं.
और सबसे जरूरी बात, वो अकेला नहीं था. उसके साथ थे बैटल कैट, टीला, मैन एट आर्म्स. एक पूरी टीम. शायद अनजाने में हीमैन हमें टीमवर्क का मतलब भी समझा गया.
आज हीमैन की जरूरत क्यों हैआज का दौर बहुत तेज है. बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं, और बड़े लोग अंदर से जल्दी टूट रहे हैं. आज के सुपरहीरो ज्यादातर या तो बहुत डार्क हैं या बहुत उलझे हुए. हर किरदार ट्रॉमा से भरा है, हर कहानी भारी है.
ऐसे वक्त में हीमैन की जरूरत इसलिए है क्योंकि वो सीधा है. वो कहता है कि ताकत का मतलब सिर्फ मारना नहीं, सही के लिए खड़ा होना है. वो बताता है कि हर कोई अंदर से प्रिंस एडम होता है, लेकिन हालात आने पर हीमैन बन सकता है.
आज जब बच्चे स्क्रीन पर सब कुछ देख रहे हैं, पर सीख कम ले रहे हैं, तब हीमैन जैसा किरदार जरूरी है. जो ताकत के साथ जिम्मेदारी भी दिखाए. जो बताए कि हीरो होने का मतलब अकेले सब कर लेना नहीं, बल्कि सही लोगों के साथ खड़े होना है.

और सिर्फ बच्चों के लिए नहीं. आज के बड़े भी अंदर से थके हुए हैं. जॉब, रिश्ते, जिम्मेदारियां. ऐसे में हीमैन हमें याद दिलाता है कि कमजोर महसूस करना गलत नहीं, लेकिन हार मान लेना गलत है.
क्या नई पीढ़ी को छू पाएगा नया हीमैनफ्रेंचाइजी की वापसी की खबर इसलिए भी खास है क्योंकि ये सिर्फ रीमेक नहीं है. ये एक कोशिश है उस कहानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की. सवाल यही है कि क्या नया हीमैन वही एहसास दे पाएगा.
शायद दे, शायद नहीं. लेकिन इतना तय है कि कोशिश जरूरी थी. क्योंकि कुछ कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं होतीं, वो पीढ़ियों को जोड़ती हैं.
हीमैन कभी पूरी तरह गया ही नहीं था. वो हमारे अंदर कहीं रहा. कभी जिम में भारी वजन उठाते वक्त, कभी मुश्किल हालात में खुद को समझाते वक्त कि ताकत सिर्फ मांसपेशियों में नहीं होती.
हर हिन्दुस्तानी के मन में एक हीमैन इसलिए बसता है क्योंकि वो हमें याद दिलाता है कि हम साधारण हो सकते हैं, लेकिन हमारे अंदर असाधारण बनने की ताकत होती है.
बस सही वक्त पर तलवार उठाने की जरूरत होती है. और जब वो वक्त आता है, तो कहीं न कहीं अंदर से आवाज आती है, बहुत पुरानी, बहुत जानी-पहचानी. आई हैव द पावर.
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