
हिमांशु सिंह दी लल्लनटॉप के दोस्त हैं. हमें पढ़ते रहते हैं और हमारे लिए लिखते भी रहते हैं . हमारे लिए लिखा है इसका मतलब आपके लिए लिखा है. लोकसभा चुनाव आ रहे हैं. लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है इसको. भारत को पूरी तरह से लोकतंत्र बनाने के लिए जब पहली बार चुनाव हुए थे तो क्या दिक्कतें पेश आई थीं, ये इस लेख में हिमांशु बता रहे हैं.
'ब्लडी डेमोक्रेसी!'..... हां, बिल्कुल यही. 'शौर्य' फिल्म में युद्ध अपराध का मुकदमा झेल रहा ब्रिगेडियर रुद्र प्रताप सिंह (के के मेनन) डेमोक्रेसी यानि लोकतंत्र को यही गाली देता है. वज़ह थी कि 'ब्लडी डेमोक्रेसी' उसे उसकी मनमानी करने से रोक रही थी. तमाम कमपढ़ और अति उत्साही लोगों को भी मैंने लोकतंत्र को कोसते देखा है. भाव यही रहता है कि 'देश की सारी दिक्कतें लोकतंत्र और नेताओं की वजह से हैं. इन सभी नेताओं को तो लाइन में खड़ा कर के.........'
जबकि कायदे की बात ये है कि भारत का लोकतंत्र आज पूरी दुनिया के लिये आदर्श शासन व्यवस्था की एक नज़ीर है. और भारत के लोकतंत्र को कोसने वाले ये किरान्तिकारी लोग अगर नक्शे पर डेढ़-दो इंच भी इधर-उधर पैदा हुए होते तो यही 'ब्लडी डेमोक्रेसी' पाने के लिये अपने देश में नाक रगड़ रहे होते और कत्ल किये जा रहे होते.

चुनाव प्रचार, फोटो- British Pathé
भारत को ऐसा लोकतंत्र बैठे-बिठाए विरासत में नहीं मिल गया. आजादी के बाद लगभग 3 साल तो देश का संविधान बनने में ही लग गया और जनवरी 1950 में देश में चुनाव आयोग का गठन हुआ. उस वक़्त देश में सत्रह करोड़ मतदाता थे जिनमें से साढ़े चौदह करोड़ (लगभग 85%) मतदाता निरक्षर थे, जिन्हें 3200 विधायकों और लोकसभा के लिये 489 सांसदों का चुनाव करना था. और सबसे बड़ी बात तो ये थी कि उस वक़्त यूरोप के भी बहुत सारे देशों में महिलाओं को मताधिकार नहीं मिला था, जबकि आजाद भारत में पहले चुनाव से ही महिलाओं को मताधिकार दिया गया.

महिलाओं की लिस्ट तैयार की गई थी उनके समाज में प्रचलित नामों से
रामचंद्र गुहा की किताब 'इंडिया आफ्टर गांधी' में इंडियन सिविल सर्विसेज़ के एक अंग्रेज नुमाइंदे पेनड्रेल मून का जिक्र है. जिसका दावा था कि, 'आने वाला वक़्त और अब से कहीं ज्यादा जानकार दौर बड़े विस्मय से लाखों अनपढ़ लोगों के मतदान की यह बेहूदा नौटंकी देखेगा.' एक हिन्दुस्तानी संपादक ने इसे 'इतिहास का सबसे बड़ा जुआ' करार दिया. 'ऑर्गनाइज़र' नाम की पत्रिका ने लिखा कि 'जवाहरलाल नेहरू अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे और पछताएंगे कि भारत में सार्वभौम वयस्क मताधिकार असफल रहा.'

सुकुमार सेन, पहले चुनाव आयुक्त.
सुकुमार सेन पहले चुनाव आयुक्त बने. उन्हें अनुमान था कि इतने बड़े देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना आसान नहीं होगा. चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन और वोटर लिस्ट बनाना ही अपने आप में बड़ा काम था. पहली वोटर लिस्ट आई तो पता चला कि लिस्ट में 40 लाख महिलाओं के नाम उनकी स्थानीय पहचानों के रूप में दर्ज़ थे. यानी अपने गांव या मोहल्ले में अगर वो 'चुन्नू की अम्मा' या 'रामनाथ की पत्नी' थीं तो वोटर लिस्ट में भी उनके यही नाम दर्ज़ थे. चुनाव आयोग ने पूरी लिस्ट को रिव्यू करने का फैसला किया. चुनावों के दौरान इतना बड़ा काम दुनिया में अब तक नहीं हुआ था.

कांग्रेस का चुनाव प्रचार. फोटो- British Pathé
चुनाव कराने के लिये 3 लाख से ज्यादा कर्मचारियों और अधिकारियों को ट्रेनिंग दी गई. 20 लाख स्टील के बक्सों का उपयोग हुआ. चुनावों को दो बार स्थगित भी करना पड़ा और आखिरकार 1951 के अक्टूबर से 1952 की फरवरी तक चुनाव हुए. चुनाव अभियान, मतदान और मतगणना में कुल 6 महीने लगे. चुनाव में लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की. आधे से ज्यादा लोगों ने वोट डाला. बड़ी बात तो ये रही कि चुनाव हारने वाले उम्मीदवारों ने भी परिणामों को निष्पक्ष बताया और स्वीकार किया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने माना कि चुनावों ने 'उन सभी आलोचकों के संदेहों पर पानी फेर दिया है जो सार्वभौमिक मताधिकार की शुरुआत को इस देश के लिये जोखिम का सौदा मान रहे थे.'

वोट देकर निकलती महिला. फोटो-British Pathé
दुनियाभर के समीक्षक भी हैरान थे. हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा, 'यह बात हर जगह मानी जा रही है कि भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रयोग को बखूबी अंजाम दिया.' 1952 का यह आम चुनाव दुनियाभर में लोकतंत्र के इतिहास के लिये मील का पत्थर बना. इस चुनाव ने साबित किया कि निष्पक्ष और लोकतांत्रिक चुनाव कराने के लिये मजबूत इच्छाशक्ति और पवित्र उद्देश्य की जरूरत होती है. देश में गरीबी और अशिक्षा का बहाना बनाकर चुनाव टालना धांधली है.
बाकी डेमोक्रेसी या लोकतंत्र का कोई अन्य विकल्प नहीं है. अगर है भी, तो वह है और ज्यादा लोकतंत्र. बस.












