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राजस्थान का लोक कलाकार जिसने रेल इंजन के साथ जैमिंग की

साकार खां के कमायचा और जैसलमेर में आई पहली ट्रेन की लय बिल्कुल एक सी ही थी.

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फोटो- फेसबुक
'सोने री धरती जठे चांदी रो आसमान, रंग-रंगीलो रस भरयो म्हारो प्यारो राजस्थान.'
गांव से ट्रेन गुजर रही थी. सब देखने के लिए दौड़ पड़े. वहीं एक लोक गायक रहते थे साकर खां मांगणियार. जो कमायचा बजाते थे. उनका किस्सा याद हो आया है. बताते हैं कि साकर खां कौन थे, मांगणियार कौन होते हैं और लोग ट्रेन देखने क्यों दौड़ पड़े थे.
जिथे तक नज़र जाती है, रेत ही रेत. बलखाते लहरदार रेतीले धोरे. इन धोरों के कण-कण में संगीत बसा है. यहां हर खुशी के मौके को गा-बजाकर सेलिब्रेट किया जाता है. जन्म, नामकरण, शादी, मिलन, विरह हर मौके के अलग गीत हैं. गीतों में ऐसी गहराई कि उनके आगे भाषाओं के बंधन खत्म हो जाते हैं. सुनते हुए लगता है जैसे आपके हींये (दिल) में कोई चाशनी घोल रहा हो.

मांगणियारों के जजमान बदल रहे हैं

गाने-बजाने के लिए यहां अलग समुदाय है. जिन्हें लंगा, मांगणियार, ढोली, मिरासी आदि नामों से जाना जाता है. वो गाने बजाने का काम पीढ़ियों से करते आ रहे हैं. उनके जन्म से ही संगीत की तालीम शुरू हो जाती है. कहते हैं कि मांगणियारों के बच्चे रोते भी हैं, तो सुर में. मांगणियारों को बचपन में खेलने के लिए भी ढोलक, हारमोनियम, खड़ताल, मोरचंग जैसे इंंस्ट्रुमेंट मिलते हैं. पगड़ी बांधे नन्हे-नन्हे बच्चों को खड़ताल बजाते देखकर हींया हरियल हो जाता है. शुरुआत में ये लोग अपने जजमानों के लिए ही गाते-बजाते थे. जजमान यानी गांव के ताकतवर राजपूत जाति के परिवार.
लेकिन हाल के सालों से इनके जजमान बदल रहे हैं. इनके नए जजमानों में बॉलीवुड, कोक स्टूडियो, म्यूजिक फेस्टिवल और फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रिया जैसे देश हैं.
जैसलमेर से ठीक अगले रेलवे स्टेशन पर एक गांव है, हमीरा.  यहां के मांगणियार गाने-बजाने में माहिर हैं. फ्रांस और ऑस्ट्रिया वाले भी उन्हें सुनने आते हैं और पड़ोस के जैसलमेर वाले भी.
इसी गांव के रहने वाले थे 'पद्मश्री' साकर खां मांगणियार. छोटे थे तभी पिता का देहांत हो गया था. और विरासत में छोड़ गये थे 'कमायचा'. उन्होंने लोक संगीत की सौंधी महक को सात समंदर पार के देशों की हवाओं में घोल दिया था. उन्हें कमायचा वादन के लिए जाना जाता है.
kamaicha कमायचा वाद्ययंत्र

कमायचा चीज क्या है?

कमायचा राजस्थान का एक तार वाला इंस्ट्रूमेंट है. सारंगी से मिलता जुलता. और यह दुनिया के पुराने इंस्ट्रूमेंट में से एक है. यह आम या शीशम की लकड़ी के एक ही टुकड़े से बनता है. ऊपर का हिस्सा खाल से मढा होता है. मोस्टली चार तार होते हैं इसमें. एक गज होता है घोड़े के बालों का. उससे यह बजाया जाता है. गज जब तारों को छूता है तो हेत (प्यार) बहने लगता है. जैसे रेगिस्तान की तपती लू में किसी ने ठंडक घोल दी हो.
यह किस्सा उन दिनों का है जब जैसलमेर में पहली बार ट्रेन आई थी. तेज आवाज करती धुआं निकालती इतनी लंबी ट्रेन को जो देखे वो भौंचक. ट्रेन जब हमीरा गांव से गुजरी तो सब देखने के लिए दौड़ पड़े. वहीं साकर खां बैठे थे. कमायचा के तार कस रहे थे. उन्होंने इंजन की आवाज़ के साथ जुगलबंदी शुरू कर दी. और इस जुगलबंदी से जो बलखाती धुन निकली उसे नाम दिया 'ट्रेन'.
https://www.youtube.com/watch?v=U0kgs1OV0n8
साकर खां का जन्म 1938 में हुआ था. 2013 में उनका निधन हो गया. उन्होंने कई फेमस संगीतकारों के साथ काम किया. अमेरिका में स्मिथसोनियन फोकवेज़ नाम की एक संस्था है. वहां के एथनोम्युजिकोलॉजी अर्काइव में उनके बजाए राग भैरवी और राग कल्याणी सहेज कर रखे गए है. दिल्ली के पुराना किला में साकर खां ने आखिरी प्रोग्राम किया था. 'मांगणियार सेडक्शन' के साथ. वो कमायचा के जादूगर थे. वो कमायचे से ट्रेन के चलने व घोड़े के दौड़ने की आवाज़ निकालते थे. साकर खां को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनकी अगली पीढ़ी में भी कई हुनरमंद कलाकार हैं. जो उनकी थाती को आगे बढा रहे हैं.

ये आर्टिकल 'दी लल्लनटॉप' से जुड़े सुमेर सिंह राठौड़ ने लिखा है. सुमेर जैसलमेर के रहने वाले हैं और साकर खां के घर उनका आना-जाना रहा है.

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