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2017 में प्रियंका को यूपी में लॉन्च करने से किसने रोका था?

अपने इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने इसका जवाब दे दिया है.

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प्रशांत किशोर चाहते थे कि 2017 में ही प्रियंका राजनीति में आ जाएं. लेकिन उस वक्त उन्हें रोक दिया गया.
प्रियंका गांधी वाड्रा अब आधिकारिक रूप से राजनीति में सक्रिय हो गई हैं. उन्हें कांग्रेस का महासचिव बनाया गया है और पूर्वी यूपी की कमान दी गई है. लेकिन एक आदमी है, जिसका वश चला होता तो प्रियंका गांधी 2017 में हुए यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में ही राजनीति में आ गईं होतीं. लेकिन उस आदमी को ऐसा करने से रोक दिया गया. उस आदमी का नाम है प्रशांत किशोर. नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के उपाध्यक्ष और पार्टी में नंबर दो की हैसियत. दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी ने प्रशांत किशोर से लंबी बातचीत की है. इस बातचीत में प्रशांत किशोर ने बताया है कि क्यों वो चाहते थे कि प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में लॉन्च किया जाए और किसने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया.
यूपी में चुनाव जिताना एक चैंलेज जैसा था
2015 में नीतीश कुमार ने लालू यादव की राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था और मुख्यमंत्री बने थे.
2015 में नीतीश कुमार ने लालू यादव की राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था और मुख्यमंत्री बने थे.

साल 2015 में नीतीश कुमार ने लालू यादव और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई थी. जब इस गठबंधन के नेता के तौर पर नीतीश कुमार ने शपथ ग्रहण किया, तो उस दिन हाई टी के दौरान प्रशांत किशोर और राहुल गांधी की मुलाकात हुई थी. बकौल प्रशांत, मैंने उनका वो ऑफर माना नहीं. 2016 के फरवरी महीने में फिर एक चर्चा हुई. उन्होंने पूछा कि यूपी आप कर सकते हैं क्या. इस ऑफर के बारे में प्रशांत बताते हैं कि जब आप यंग होते हैं, थोड़ा सक्सेसफुल हो जाते हैं तो थोड़ी हवा भी हो जाती है. ऐसे में आपको लगता है कि देश में सबसे बड़ा पॉलिटिकल चैलेंज ले लेना चाहिए. प्रशांत ने अपनी टीम से बात की और टीम के लोगों ने कहा कि यूपी में अगर कांग्रेस को जिता दिया, तो इससे बड़ी कोई जीत नहीं होगी. इसके बाद पीके और उनकी टीम को लालच आ गया और वो बिहार छोड़क यूपी चले गए.

यूपी में प्रियंका को क्यों लॉन्च करना चाहते थे प्रशांत किशोर?

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प्रियंका गांधी के आने से यूपी में राहुल और कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी?

प्रशांत के मुताबिक, जिस तरह से मैं इलेक्शन देखता हूं, प्लान करता हूं, उसमें एक बड़ा कंपोनेंट होता है समर्थकों को वॉलंटियर्स की तरह इस्तेमाल करना और वॉलंटियर्स को काडर की तरह इस्तेमाल करना. तो जिन पार्टियों के पास काडर नहीं है, आखिर वो चुनाव कैसे जीतते थे. जो आपके सपोर्टर होते हैं, आप उनमें से विलिंग लोगों को आइडेंटिफाई करते हैं और उनको काम पर लगाते हैं. वही काम हमने बिहार में भी किया होगा, वही काम मोदी जी के इलेक्शन में भी किया होगा. मेरा मानना था कि वालंटियर्स बनाने के लिए आपको ज़रूरत है चेहरे की. बड़े चेहरे की जो नैरेटिव बना सके. जो लोगों को इस बात की प्रेरणा दे सके कि वो लोग जो कर रहे हैं, उसे छोड़ दें और आगे आकर उस आदमी के लिए काम करें या पार्टी के लिए काम करें. पांच महीने, छह महीने, आठ महीने 9 महीने तक. मैंने तय किया कि लोग एक चेहरे के इर्दगिर्द निर्भर हो जाएं और वो चेहरा प्रियंका का हो. अगर प्रियंका नहीं हैं, तो काम करने के लिए उतने लोग नहीं आएंगे. वो तभी आएंगे, जब आपके पास एक चेहरा हो पीएम का या सीएम का. यूपी के प्लान में एक बहुत बड़ी आर्मी और वॉलंटियर्स खड़ा करने की बात थी, क्योंकि कांग्रेस का काडर आप छह महीने में नहीं बना सकते, किसी भी पार्टी का नहीं बना सकते. हमें पता है कि काडर नहीं था, लेकिन अगर फेस में करिश्मा है तो आप सिस्टम का इस्तेमाल करके टेंपररी काडर बना सकते हैं. और मैं यही चाहता था.

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प्रियंका के लॉन्च होने से यूपी में कितनी सीटें आएंगी?
कांग्रेस ने प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश में उतारकर अपने पत्ते खोल दिए हैं.
कांग्रेस ने प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश में उतारकर अपने पत्ते खोल दिए हैं.

बकौल प्रशांत, मेरा मानना है कि यूपी में कांग्रेस अगर अपने ट्रेडिशनल तरीके से लड़ती तो भी 7 से बेहतर लाती. अगर मेरे तरीके से लड़ती तो भी सात से बेहतर लाती. लेकिन न उधर के रहे, न इधर के रहे, दोनों ओर से मिक्स कर दिया, तो बहुत हालत खराब हो गई. मेरा मानना था कि अगर 2017 में प्रियंका गांधी यूपी में लॉन्च हुई होतीं तो लंबे समय में कांग्रेस के लिए बड़ा फायदा होता. लेकिन अब 2019 के चुनाव में लड़ाई तो भाजपा और महागठबंधन में दिख रही है. प्रियंका के आने से भी कांग्रेस के भविष्य पर 2019 में कोई असर नहीं होगा? इसकी वजह ये है कि प्रियंका जी कितनी काबिल हैं, कितनी क्षमता है, कितना इम्पैक्ट कर पाएंगी, इसको दो महीने के नजरिए से देखना, न देखने वाले के लिए सही है न प्रियंका के लिए सही होगा. उनको दो साल, चार साल, पांच साल समय देना चाहिए. फिर देखना चाहिए. अगर मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये देखना हो कि वो क्या इम्पैक्ट यूपी में कर पाती हैं तो मैं यूपी का 2022 का चुनाव देखूंगा. और देखूंगा कि वो 2022 में विधानसभा चुनाव में इम्पैक्ट पैदा कर पाती हैं या नहीं. क्योंकि किसी को कुछ बनाने के लिए दो साल का वक्त तो दिया ही जाना चाहिए. दो महीने में तो आप क्या कर सकते हैं, आपमें चाहे जितन भी बड़ी क्षमता क्यों न हो. दो महीने मे वो कुछ बहुत कर पाएंगी, ऐसा मुझे लगता नहीं है. अगर मैं गलत साबित होता हूं तो मुझे एक और अध्याय सीखने को मिलेगा.
यूपी के लिए 14 सूत्री कार्यक्रम बनाया, ज्यादातर लागू नहीं करवा पाए
पीके के कहने पर राहुल गांधी ने यूपी के देवरिया से लेकर दिल्ली तक किसान सभा की थी.
पीके के कहने पर राहुल गांधी ने यूपी के देवरिया से लेकर दिल्ली तक किसान सभा की थी.

प्रशांत किशोर बताते हैं कि वो तीन महीने तक यूपी की खाक छानते रहे. इसके बाद एक प्लान बनाया, जो 14 सूत्रीय कार्यक्रम था. ये तारीख थी 29 मार्च, 2016, जब इस प्लान को राहुल गांधी के सामने रखा गया. इसमें तय किया गया कि अगर यूपी जीतना है तो प्रियंका गांधी यूपी कांग्रेस की फेस बनें. इसके अलावा सोनिया गांधी से वाराणसी से कैंपेन लॉन्च करवाना. चाय पर चर्चा, खाट पर चर्चा जैसी चीजें थीं. 14 तरह के अलग-अलग कैंपेन पर तीन महीनों तक चर्चा हुई. जून में राहुल गांधी ने प्रशांत किशोर की बात मान ली. इसके बाद सोनिया गांधी ने वाराणसी से रोड शो किया, राहुल गांधी ने देवरिया से दिल्ली तर की 30 दिन की किसान यात्रा की. इसनें तय था कि अगर आप एक बार देवरिया से शुरू करते हैं, तो यहीं रहना है. बीच में यात्रा छोड़कर दिल्ली नहीं जा सकते, क्योंकि राहुल की उस समय एक छवि थी कि आते-जाते रहते हैं, सीरियस पॉलिटिशियन नहीं हैं.
इसलिए यूपी का चुनाव हार गए प्रशांत किशोर

दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी (बाएं) को दिए इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने यूपी 2017 के चुनाव के बारे में तफ्सील से बताया है.

सोनिया गांधी का रोड शो हुआ और राहुल गांधी की देवरिया की यात्रा हुई. इसके बाद भी 12 मॉड्यूल बचे थे, जिन्हें लागू करना था. लेकिन कांग्रेस में ये बात होने लगी कि अब बड़ी हवा बन गई है, इसको तुरंत भंजा लिया जाए. जिस अखिलेश यादव से आज एक सीट नहीं मिल रही है, उसी अखिलेश यादव ने 110 सीट दे दी कांग्रेस को. तो थोड़ी बहुत ग्रास रूट पर कांग्रेस की जो सुगबुगाहट शुरू हुई थी, उसको उन्होंने एलायंस करके कैश करने की कोशिश की, जो बाद में डिजास्टर साबित हो गया. बकौल प्रशांत मेरी गलती ये है कि उस फैसले से सहमत न होने के बावजूद मैंने अपना नाम हटाया नहीं, मैं इसपर सहमत रहा. जो एलांयस हुआ उसमें मैं भी सहभागी था, वो गलत डीसीजन था और हार का ठीकरा मेरे सिर भी फोड़ा जाना चाहिए. इसमें कोई गलत बात नहीं है.

किस मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने छोड़ दिया था नरेंद्र मोदी का साथ?

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