प्रियंका के लॉन्च होने से यूपी में कितनी सीटें आएंगी?
कांग्रेस ने प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश में उतारकर अपने पत्ते खोल दिए हैं.
बकौल प्रशांत, मेरा मानना है कि यूपी में कांग्रेस अगर अपने ट्रेडिशनल तरीके से लड़ती तो भी 7 से बेहतर लाती. अगर मेरे तरीके से लड़ती तो भी सात से बेहतर लाती. लेकिन न उधर के रहे, न इधर के रहे, दोनों ओर से मिक्स कर दिया, तो बहुत हालत खराब हो गई. मेरा मानना था कि अगर 2017 में प्रियंका गांधी यूपी में लॉन्च हुई होतीं तो लंबे समय में कांग्रेस के लिए बड़ा फायदा होता. लेकिन अब 2019 के चुनाव में लड़ाई तो भाजपा और महागठबंधन में दिख रही है. प्रियंका के आने से भी कांग्रेस के भविष्य पर 2019 में कोई असर नहीं होगा? इसकी वजह ये है कि प्रियंका जी कितनी काबिल हैं, कितनी क्षमता है, कितना इम्पैक्ट कर पाएंगी, इसको दो महीने के नजरिए से देखना, न देखने वाले के लिए सही है न प्रियंका के लिए सही होगा. उनको दो साल, चार साल, पांच साल समय देना चाहिए. फिर देखना चाहिए. अगर मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये देखना हो कि वो क्या इम्पैक्ट यूपी में कर पाती हैं तो मैं यूपी का 2022 का चुनाव देखूंगा. और देखूंगा कि वो 2022 में विधानसभा चुनाव में इम्पैक्ट पैदा कर पाती हैं या नहीं. क्योंकि किसी को कुछ बनाने के लिए दो साल का वक्त तो दिया ही जाना चाहिए. दो महीने में तो आप क्या कर सकते हैं, आपमें चाहे जितन भी बड़ी क्षमता क्यों न हो. दो महीने मे वो कुछ बहुत कर पाएंगी, ऐसा मुझे लगता नहीं है. अगर मैं गलत साबित होता हूं तो मुझे एक और अध्याय सीखने को मिलेगा.
यूपी के लिए 14 सूत्री कार्यक्रम बनाया, ज्यादातर लागू नहीं करवा पाए
पीके के कहने पर राहुल गांधी ने यूपी के देवरिया से लेकर दिल्ली तक किसान सभा की थी.
प्रशांत किशोर बताते हैं कि वो तीन महीने तक यूपी की खाक छानते रहे. इसके बाद एक प्लान बनाया, जो 14 सूत्रीय कार्यक्रम था. ये तारीख थी 29 मार्च, 2016, जब इस प्लान को राहुल गांधी के सामने रखा गया. इसमें तय किया गया कि अगर यूपी जीतना है तो प्रियंका गांधी यूपी कांग्रेस की फेस बनें. इसके अलावा सोनिया गांधी से वाराणसी से कैंपेन लॉन्च करवाना. चाय पर चर्चा, खाट पर चर्चा जैसी चीजें थीं. 14 तरह के अलग-अलग कैंपेन पर तीन महीनों तक चर्चा हुई. जून में राहुल गांधी ने प्रशांत किशोर की बात मान ली. इसके बाद सोनिया गांधी ने वाराणसी से रोड शो किया, राहुल गांधी ने देवरिया से दिल्ली तर की 30 दिन की किसान यात्रा की. इसनें तय था कि अगर आप एक बार देवरिया से शुरू करते हैं, तो यहीं रहना है. बीच में यात्रा छोड़कर दिल्ली नहीं जा सकते, क्योंकि राहुल की उस समय एक छवि थी कि आते-जाते रहते हैं, सीरियस पॉलिटिशियन नहीं हैं.
इसलिए यूपी का चुनाव हार गए प्रशांत किशोर
दी लल्लनटॉप के संपादक सौरभ द्विवेदी (बाएं) को दिए इंटरव्यू में प्रशांत किशोर ने यूपी 2017 के चुनाव के बारे में तफ्सील से बताया है.
सोनिया गांधी का रोड शो हुआ और राहुल गांधी की देवरिया की यात्रा हुई. इसके बाद भी 12 मॉड्यूल बचे थे, जिन्हें लागू करना था. लेकिन कांग्रेस में ये बात होने लगी कि अब बड़ी हवा बन गई है, इसको तुरंत भंजा लिया जाए. जिस अखिलेश यादव से आज एक सीट नहीं मिल रही है, उसी अखिलेश यादव ने 110 सीट दे दी कांग्रेस को. तो थोड़ी बहुत ग्रास रूट पर कांग्रेस की जो सुगबुगाहट शुरू हुई थी, उसको उन्होंने एलायंस करके कैश करने की कोशिश की, जो बाद में डिजास्टर साबित हो गया. बकौल प्रशांत मेरी गलती ये है कि उस फैसले से सहमत न होने के बावजूद मैंने अपना नाम हटाया नहीं, मैं इसपर सहमत रहा. जो एलांयस हुआ उसमें मैं भी सहभागी था, वो गलत डीसीजन था और हार का ठीकरा मेरे सिर भी फोड़ा जाना चाहिए. इसमें कोई गलत बात नहीं है.
किस मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने छोड़ दिया था नरेंद्र मोदी का साथ?