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'पद्मावती के एक-एक संवाद में वह पद्मावती की तरह ढलने की पूरी कोशिश कर रही है'

भगवानदास मोरवाल के उपन्यास 'सुर बंजारन' का एक अंश

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फोटो - thelallantop
सुर बंजारन हिंदी के देशज और लोक-मानस की अनुकृतियों को उकेरने वाले कथाकार भगवानदास मोरवाल की छठी औपन्यासिक कृति है. यह उपन्यास लगभग मरणासन्न और विलुप्त होती लोक-कला का दस्तावेज़ भर नहीं है, बल्कि एक अलक्षित और गुम होती विरासत का सांस्कृतिक इतिहास भी है. इसे हिंदी का पहला ऐसा उपन्यास कहा जा सकता है जिसके आख्यान के केन्द्र में हाथरस शैली की नौटंकी, उसकी पूरी परंपरा और सुरों की समाप्त प्रायः दुनिया है. एक ऐसी दुनिया जिसने अपना वृत्त, लोक में प्रचलित श्रुतियों, ऐतिहासिक-सामाजिक घटना-परिघटनाओं पर आधारित लोक-धुनों व सुरों से निर्मित किया है.
भारतीय इतिहास के सबसे अभागे राजकुमारों में से एक शाहज़ादे दारा शिकोह के बसाये एक छोटे-से शहर की, एक छोटी-सी गली से निकला यह कमसिन सुर जहां हिन्दुस्तान थिएटर में तप कर नौटंकी की दुनिया में अपनी गायन-क्षमता प्रमाणित करता है, वहीं अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव में आकर अभिव्यक्ति के संतोष में डूब, विडंबनाओं के बीच यह अपने आप को नितांत अकेला छोड़ देता है. पारंपरिक और आधुनिक गीत-संगीत व उनके साज़ों से छिड़े सुरों की लोक-परंपरा का अद्भुत मिश्रण है यह उपन्यास. इसकी नायिका रागिनी केवल एक पात्र नहीं है बल्कि ऐसे असंख्य अलक्षित सुरों का प्रतिनिधि-चरित्र है, जो आज गुमनामी के अंधेरे में खोए अपने-अपने सुरों के मीड़, गमक, खटका को तलाश रहे हैं. चौबोला, दौड़, दोहा, बहरतबील, दादरा, ठुमरी, छंद, लावनी, बहरशिकस्त, सोहनी जैसे छंद जब-जब ढोलक की थाप और झील-नक्काड़े की धमक पर गले को चीरते हुए रात के सन्नाटे में गूंजते हैं, तब लगता है मानो नटराज के दरबार में रागों की बारिश हो रही है. इसलिए इसे हाथरस शैली की नौटंकी की एक अदाकारा का जीवन-वृत्त कहना भी बेमानी होगा, बल्कि यह लोक से संचित विरासत की एक प्रबल अदम्यता और जिजीविषा का लोमहर्षक आख्यान के रूप में हमारे सामने आता है. यह उपन्यास नौटंकी के रूप में स्थापित हो चुकी उस विडंबना का भी करुणामयी पाठ प्रस्तुत करता है, जिसने हमारे समाज में एक हिकारत और उपहास भरा मुहावरा गढ़ लिया है. एक ऐसा मुहावरा जिसने मान्य छन्दों की खनक को बदरंग कर दिया है.
अपनी प्रखर संवेदना, पहले उपन्यासों की तरह रंगीन क़िस्सागोई और अपनी बेधक भाषा के लिए सर्वमान्य कथाकार भगवानदास मोरवाल की यह कृति एक अनूठी उपलब्धि है. अनूठी इसलिए कि नौटंकी अर्थात सांगीत को केन्द्र में रखकर आख्यान रचना एक चुनौती भरा काम है. मगर इस चुनौती और जोखिम की परवाह किए बिना लेखक इस आख्यान को अपनी परिणति तक पहुंचाने में बखूबी कामयाब रहा है. एक अलक्षित और उपेक्षित लोक-कला में समाहित जीवन की ओर लौटते हुए, इसके बहुविध रूपों और भाव-प्रवाह को लेखक ने, न केवल समृद्ध किया है अपितु इससे पाठक व हमारा साहित्य दोनों समृद्ध होंगे-ऐसा विश्वास है.


भगवानदास मोरवाल
भगवानदास मोरवाल

23 जनवरी, 1960 को नगीना, जिला मेवात (हरियाणा) में जन्मे भगवानदास मोरवाल वर्तमान में केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत हैं. ‘काला पहाड़’ (1999), ‘बाबल तेरा देस में’ (2004), ‘रेत’ (2008 तथा 2010 में उर्दू में अनुवाद), ‘नरक मसीहा’ (2014) आदि जैसे चर्चित उपन्यासों के बाद यह उनका छठा उपन्यास है.
उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं – ‘सिला हुआ आदमी’ (1986), ‘सूर्यास्त से पहले’ (1990), ‘अस्सी मॉडल उर्फ सूबेदार’ (1994), ‘सीढ़ियाँ, माँ और उसका देवता’ (2008), ‘लक्ष्मण-रेखा’ (2010) आदि. इसके अलावा उनके काव्य संग्रह और निबंध संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. कई पुरुस्कारों एवं सम्मानों से नवाज़े जा चुके भगवानदास वर्तमान में पालम, नई दिल्ली में रहते हैं.


उपन्यास 'सुर बंजारन' का एक अंश

हिन्दुस्तान थिएटर का कारवां जमालपुर के गौशाला मेले, उसके बाद प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर में अपने एक के बाद एक कामयाबी के झंडे गाड़ने के बाद आजमगढ़ की तरफ़ बढ़ रहा है. रागिनी अब रागिनी नहीं रही. कंपनी के डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा और सुल्तान असर खां ने एक तरफ़ जहां रागिनी को लफ़्ज़ों के तलफ्फुज़,और उसकी बारीकियों से रू-ब-रू कराते हुए उसके गायन को निखारने में मदद की; वहीं दूसरी तरफ़ पेटीबाजा मास्टर क़ुदरत साहब ने उर्दू-फ़ारसी के लफ़्ज़ों के पेश करने और उनके लहज़ों को समझाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी. पता नहीं रागिनी में ऐसा क्या है कि वह गायन की छोटी-छोटी बारीकियों को तुरंत पकड़ लेती. इतना ही नहीं उसने अपने ब्रज के रसिया और ध्रुपद को भी इसी थिएटर में आकर मांजा.
आजमगढ़ में हिन्दुस्तान थिएटर की पहली पेशकश स्त्री-पात्रों से भरपूर और संगीत शिरोमणि हिंदी भूषण पंडित नाथाराम शर्मा गौड़ द्वारा रचित सांगीतपद्मावती उर्फ़ फ़रियादे बुलबुल तय की गई. पूरे दो दिन इसकी जम कर रिहर्सल की गई. इस नौटंकी का क़िस्सा भी बड़ा मज़ेदार है.
मेरठ के पहले संगीतकार यानी नौटंकी मर्मज्ञ रामसहाय शाह ने मशहूर अवधी कवि मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत को आधार बना कर रत्नसेन पद्मावती नाम का सांगीत लिखा था. इस सांगीत में पद्मावती के सती होने की कथा नहीं थी. इस प्रसंग को स्वांग की पूरक-कथा के रूप में बाद में मुनीर खां ने लिखा. मज़ेदार यह है कि जायसी के पद्मावत और पंडित नथाराम शर्मा गौड़ द्वारा रचित सांगीत पद्मावती के कथानक का दूर-दूर तक आपस में कोई संबंध नहीं है. ये दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलहदा हैं. दरअसल,सांगीत पद्मावती दो भारतीय संस्कृतियों यानी उत्तर और दक्षिण की संस्कृतियों को आपस में समाहित करने की एक लेखकीय कल्पना व कोशिश है. वह इसलिए कि इसके पुरुष पात्र जैसे रणवीर सिंह और उसके मित्र चन्द्रदत्त का संबंध जहां उत्तर भारत से है, वहीं इसके स्त्री पात्र जैसे राजकुमारी पद्मावती (कर्नाटक के राजा दंतसेन की पुत्री), रानी कुसुमकली (पद्मावती की मां), पद्मावती की सहेली चन्द्रप्रभा उर्फ़ चन्द्रावती, फूलमती और दूसरी सहेलियों का संबंध कर्नाटक अर्थात दक्षिण से है.
उर्वशी को जैसे ही पता चला कि जिस पद्मावती का किरदार इससे पहले वह निभाती आ रही थी, उसे इस बार रागिनी को दे दिया गया है. उसे अपने पांवों के नीचे से ज़मीन खिसकती नज़र आने लगी. चाहते हुए भी वह अपने डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा के इस फ़ैसले की मुखालिफ़त नहीं कर पाई. कहीं ऐसा न हो कि उसकी इस मुखालिफ़त का मतलब उसकी ख़िलाफ़त मान ली जाए, और उसे कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए.
अकेली होती तो वह यह जोख़िम जमालपुर में उसी दिन उठा लेती, जिस दिन कंपनी के डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने अपने द्वारा खोज कर लाये गए इस टेलेंट को दिल कि ख़ता, बेटे की क़ुरबानी नाटक में उसकी इजाज़त लिए बिना नात की ज़िम्मेदारी दे दी थी. चलो, गला अच्छा है तो एकाध नात गवाने में कोई हर्ज़ नहीं. मगर इंतिहा तो तब हो गई जब थिएटर की रवायत को तोड़, नात के साथ रागिनी की मर्ज़ी से एक गीत और गाने की इजाज़त दे दी. आज तो नात के साथ लोकगीत गाया जा रहा है, कल मर्सिया या नात के साथ ढूंगे मटकाए जाएंगे, और ऐसा होने लगा तो फिर सांगीत, स्वांग या नौटंकी कैसे ज़िन्दा रह पाएगी. अगर उसके साथ लाचार बूढ़ी मां, छोटा भाई और पति मोहन कुमार सहित उसका यह परिवार नहीं होता, तो अब तक वह मुखालिफ़त का झंडा बुलंद कर चुकी होती. इस पापी पेट का सवाल नहीं होता, तो वह अपने उसूलों से क़तई समझौता नहीं करती. मन मसोस कर रह गई उर्वशी. हिए में उठती बग़ावत की चिंगारी को उसने हिए में ही दफ़न कर, चुपचाप इस फ़ैसले को क़बूलने में ही अपनी और अपने परिवार की भलाई समझी.
रागिनी के लिए यह एक ऐसी चुनौती है जिसे जीतने के साथ-साथ अपने डायरेक्टर की उम्मीदों पर भी खरा उतरना है. प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर की शर्तें ख़त्म करते ही वह कंपनी के डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा, अदाकार सुल्तान असर खां और पेटीबाजा मास्टर क़ुदरत साहब से लावनी, लावनी लंगड़ी, दादरा यमन, दादरा सारंग, सोहनी, छंद सोहनी, झूलना, लावनी बहरशिकस्त के फ़र्क और उनकी बारीकियों को जी-जान से समझने की कोशिश कर रही है. दौड़, दोहा,चौबोला, बहरतबील, क़व्वाली, ग़ज़ल, शे’र और छंद की बारीकियों को तो वह जान चुकी है. मगर इनके साथ-साथ सांगीत की उन महीन गिरहों को समझना भी ज़रूरी है, जिन पर सांगीत यानी नौटंकी की बुनियाद टिकी हुई है.
उसने चन्द्रप्रभा का किरदार निभाने वाली और कंपनी की वरिष्ठ अदाकारा उर्वशी के साथ निभाए जाने वाले लावनी में वाद-संवाद में ख़ुद को एक तरह से होम दिया.
पद्मावती के एक-एक संवाद में वह पद्मावती की तरह ढलने की पूरी कोशिश कर रही है. वह जानती है कि उर्वशी के पास उस जैसा गला भले ही नहीं है मगर अदाकारी में उर्वशी उससे इक्कीस ही पड़ेगी. रागिनी के इसी डर ने उसका सारा ध्यान सुर पर लगवा दिया. उसके पास एक यही हथियार है जो उर्वशी की अदाकारी से लोहा ले सकती है. वह जानती है कि उर्वशी भी किसी तरह की उसके साथ रियायत बरतने वाली नहीं है.
रिहर्सल के लिए डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने सारे कलाकारों को स्टेज पर बुला तो लिया,मगर अंदर-ही-अंदर उन्हें यह डर भी खाए जा रहा है कि ख़ुदा-न-ख़ास्ता रागिनी पद्मावती के किरदार को उसकी उम्मीद के मुताबिक़ नहीं निभा पाई, तब क्या होगा. चौबोला और बहरतबील को लेकर उसे कोई खटका नहीं है. डर है तो इसका कि वह लावनी, दादरा यमन, दादरा सारंग और सोहनी को उस शिद्दत से निभा पाएगी भी या नहीं, जिस शिद्दत और सफ़ाई की ज़रूरत होती है. इसी डर के चलते डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा का दिल ज़ोर-ज़ोर से उछालें मार रहा है. इतना डर उसे सामने बैठने वाले दर्शक रूपी शेर का नहीं है, जितना इस टपका रूपी उर्वशी का है.
‘क़ुदरत साहब आपको क्या लग रहा है?’ डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने अपने अनुभवी पेटीबाजा मास्टर क़ुदरत साहब को एक तरफ़ ले जाकर, ज़बरन मुस्कराने की कोशिश करते हुए पूछा.
अपने डायरेक्टर की आंखों में उमड़े भय को क़ुदरत साहब ने तुरंत भांप लिया. फिर भी थोड़ा-सा मज़ा लेते हुए बोले,’मैं आपका मतलब नहीं समझा दादा.’
’यही कि रागिनी कर भी लेगी?’ पपड़ाये होंठों पर जीभ फेरते हुए सूरज प्रसाद शर्मा ने खुल कर कहा.
‘दादा, फ़िक्र मत करो. ऊपर वाले ने चाहा तो पहले से भी बेहतर होगा.’ क़ुदरत मास्टर ने अपने डायरेक्टर की हौसला अफ़ज़ाई करते हुए कहा.
क़ुदरत मास्टर के इस भरोसे और आत्मविश्वास को देख डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने संतोष की गहरी सांस ली.
‘उर्वशी जी,रिहर्सल शुरू करें?’ अपनी कंपनी की वरिष्ठ अदाकारा होने के नाते डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने एक तरफ़ बैठते हुए, सबसे पहले उसी से पूछा.
‘बिल्कुल शुरू करवाइए दादा!’ उर्वशी ने भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा.
इसके बाद डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने रिहर्सल की इजाज़त दे दी.
रिहर्सल जैसे–जैसे आगे बढ़ने लगी सूरज प्रसाद शर्मा का डर दूर होने लगा, और ख़त्म होते-होते उन्हें पूरा यक़ीन हो गया कि पद्मावती और चन्द्रप्रभा की अदाकारी आज देखने वाली होगी. आजमगढ़-वासी अरसे तक इस पद्मावती उर्फ़ फ़रियादे बुलबुल नौटंकी को याद रखेंगे.
रिहर्सल ख़त्म होते ही डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने रागिनी से यूं ही पूछ लिया,’क्या आज भी कुछ अलग से सुनाने का मन है क्या?’
‘दादा, एक छोटी-सी ग़ज़ल है.’
रागिनी का इतना कहना था कि उर्वशी के भीतर दबी बग़ावत से रुका नहीं गया, ’यह क्या दादा, पुरानी रवायतों को छोड़ आप भी किन बाज़ारू चीजों के चक्कर में पड़ गए!’
‘उर्वशीsss, मैं तो ऐसे ही चुहल कर रहा था.’ इतना कह सूरज प्रसाद शर्मा क़ुदरत मास्टर की तरफ़ मुड़े और हल्के-से मुस्करा भर दिये.
‘ऐसा है भई, अपनी इस ग़ज़ल को आप नौटंकी में सुनाओ या ना सुनाओ, मगर मेरा तो इस वक़्त इसे सुनने का पूरा मूड है.’
‘मुझे भी लगता है सुनने में किसी को कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए. बल्कि अब तो मेरा भी मन इसे सुनने को कर रहा है. चलिए, शुरू करिए!’ क़ुदरत मास्टर ने भी अपनी तरफ़ से इजाज़त दे दी.
‘ठीक है, जब आप सब कह रहे हैं तो सुनाती हूं.’ इसके बाद रागिनी ने ग़ज़ल सुनानी शुरू कर दी –
यहां कांप जाते हैं फ़लसफ़े, ये बड़ा अजीब मुक़ाम है, जिसे इश्क़ अपना ख़ुदा कहे, उसे सजदा करना हराम है.
ये है मयकदा यहां रिंद हैं, यहां सबका साक़ी इमाम है, ये हरम नहीं है शेख़ जी, यहां पारसाई हराम है.
जो ज़रा-सी पी के बहक गया, उसे मयक़दे से निकाल दो, यहां कम-नज़र की गुज़र नहीं, यहां अहले ज़र्फ़ का काम है.
जो पतंगा लौ पे फ़िदा हुआ, तो भड़क के शमा ने यूं कहा इसे मेरे दर्द से है ग़रज़, ये तो रौशनी का ग़ुलाम है.
ग़ज़ल ख़त्म होने के बाद जब एक-एक कर सारे कलाकार जाने लगे, तो डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने क़ुदरत मास्टर को इशारे से रुकने का इशारा किया. समझ गए क़ुदरत मास्टर कि उनके डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने उन्हें क्यों रोका है.
‘क़ुदरत साहब, मान गए आपके यक़ीन को. ईमान से कहूं तो मुझे इसका बिल्कुल भी गुमान नहीं था कि रिहर्सल इतनी ज़बरदस्त रहेगी.’
अपने रहवास से उठती ख़ुशबू की तरह क़ुदरत मास्टर ने वैसी ही मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ’दादा, कभी-कभी आदमी का डर उससे उसकी उम्मीद से कहीं बेहतर काम करा जाता है.’
‘मैं आपका मतलब समझा नहीं?’ डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा ने क़ुदरत मास्टर की आंखों में झांकते हुए पूछा.
‘दरअस्ल, इन दोनों का अपना-अपना एक डर है. एक को अपने पांव उखड़ने का डर है, तो दूसरे को जमाने की फ़िक्र है. देखा नहीं उर्वशी और रागिनी, दोनों के चेहरे इस डर से किस क़दर फ़िक्रमंद और खिंचे हुए थे. रिहर्सल की यह कामयाबी दोनों के इसी डर और फ़िक्र का नतीजा है.’
‘इसका मतलब है क़ुदरत साहब कि मैं बे-वजह परेशान हो रहा था?’
‘ना दादा, आपकी परेशानी अपनी जगह सही है. ख़ुदा-न-ख़ास्ता उर्वशी जी ने अपने डर को संजीदगी से नहीं लिया होता, तो आज की इस रिहर्सल का हमारे सामने दूसरा नज़ारा होता. मुझे पूरा-पूरा यक़ीन है कि हमारा आज का शो ज़बरदस्त जाएगा.’
‘अगर आप मुतमयेन हैं तो मुझे फ़िक्र करने की ज़रुरत नहीं है. चलिए, अब आपसे स्टेज पर ही मुलाक़ात होती है.’
‘जी,अब तो उसी का इंतज़ार करिए.’ इतना कह दूसरे कलाकारों और साजिंदों की तरह मास्टर क़ुदरत भी अपने कैंप में चले आए.
आजमगढ़ के नौटंकी रसिकों ने सचमुच गलेबाजी का ऐसा नायाब मुज़ाहिरा इससे पहले कभी नहीं देखा. पद्मावती और उसकी सहेली चन्द्रप्रभा उर्फ़ चन्द्रावती का किरदार निभाने वाली रागिनी और उर्वशी के दरम्यान ही नहीं, बल्कि रणवीर सिंह और चन्द्रदत्त की भूमिका निभाने वाले सुल्तान असर खां व मोहन कुमार के बीच चौबोले का चौबोले में, बहरतबील का बहरतबील में और लावनी का लावनी में जो वाद-संवाद हुआ, वह देखते ही बन रहा था. मीड़,गमक और खटका के साथ जब–जब मुर्की के साथ सुर पंचम में जाता, तो लगता मानो दूर गंगा की लहरों से भाप उठ रही है.
पेटीबाजा मास्टर क़ुदरत साहब के दोनों हाथों की अंगुलियों के पोर, पूरी चपलता और मनोयोग के साथ जब-जब बाजे के रीड्स पर तेज़ी-से सरसराते; नक्काड़ची इलियास खां की चौब की नोक नक्काड़े व उसके सामने रखी झील की तपती देह पर बरसती, तब-तब लगता मंच पर देवलोक से नटराज के अवतार उनके साज़ों में समा गए हैं. दमसाज़ी की इससे बेहतर मिसाल आजमगढ़ वालों को पहले कभी देखने को मिली ही, ऐसा किसी के पास कोई सबूत नहीं है.
हिन्दुस्तान थिएटर के डायरेक्टर सूरज प्रसाद शर्मा क़ुदरत मास्टर के तजरबे को मान गए. उनकी समझ में चरखारी नरेश द्वारा स्थापित रॉयल ड्रामेटिक कंपनी में क़ुदरत साहब का बरसों-बरस रहने रहस्य आज आया है. अगर यह ड्रामेटिक कंपनी बंद नहीं होती, तो इसके नाटक लेखक आग़ा हश्र कश्मीरी और पेटीबाजा मास्टर क़ुदरत साहब को शायद और शायद ता-उम्र अपने आप से जुदा नहीं करती. क़ुदरत साहब का यह बरसों का ही तजरबा था जो उन्होंने पूरे यक़ीन के साथ बड़े बे-परवाह अन्दाज़ में कह दिया कि यह शो ज़बरदस्त जाएगा. थिएटर का पहला शो पद्मावती उर्फ़ फ़रियादे बुलबुल न केवल ज़बरदस्त गया बल्कि पद्मावती का किरदार निभाने वाली रागिनी की यह सोहनी, जिसे वह रणवीर सिंह के सामने पेश करती है, अभी भी कानों में मिसरी की तरह घुली हुई है –
जिस दम से मुझको प्रेम की, बूटी पिलाई आपने, बस उसी दम से बावली, मजनूं बनाई आपने.
सदमा सहे हैं जो मैंने सो, आपसे कहां तक कहूं, ना हंसी इतनी उमर भर, जितनी रुलाई आपने.
झुर-झुर के पिंजर हो गया तन, गश पै गश आने लगा, फ़ुरकत जुदाई में मुझै,ऐसी घुलाई आपने.
सोते न कल जगते न कल, चलते न कल बैठे न कल, जो मुसीबत मैंने उठाई,क्या उठाई आपने.
ग़म सहते-सहते दम मेरे, हमदम लबों पर आ गया. बाकी रही कुछ सांस तब, सूरत दिखाई आपने.
दरशन न मिलते आज तौ, मरती चमन सर फोड़ के, इक यह किया अहसान, मरने से बचाई आपने.
दो छोड़ इन क़िस्सों को, उड़ने दो शराबे जाम अब. बाहम करें मिल ऐश क्यों, देरी लगाई आपने.



पुस्तक: सुर बंजारन
लेखक: भगवानदास मोरवाल पृष्ठ संख्या: 336 मूल्य: 695/- प्रकाशक: वाणी प्रकाशन



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