"क्या करते हैं आप?" वह बोला "तिलक लगवा लो" "मान न मान तू मेरा मेहमान? बिना पूछे ऐसे कैसे छू सकते हैं आप?" "छुआ तो नहीं ना".....वह मुस्कुराया ईला को उसके ढीठपन पर चिढ़ हुई "ये ज़ुबान दराज़ी क्यों श्रीमान?" प्रत्युत्तर में वह कुछ देर याचनाभरी नज़रों से बस देखता रहा था फिर अचानक बोल पड़ा था "कुछ देना चाहोगी?" "हां-हां ले लो, कन्फेशन भरा पड़ा है सीने में, कहो तो उड़ेल दूं?" उसने बेहिचक प्रश्न पर पर प्रश्न किया "यू मीन कन्फेशन? राइट !" ईला चौंक पड़ी "हां...नहीं तो क्या? "या ग्लानि?" वह बोला "ग्लानि माय फुट...कह लो ग्लानि कह लो, क्या फर्क पड़ता है मुझे" वह मासूमियत से बोला "कन्फेशन, ग्लानि या भड़ास कुछ भी कह लो, तर्पण तो मुझमें ही करोगी, मिटना तो हर हाल में अंततः मुझे ही पड़ेगा मैडम"ऊपर से नीचे तक गेरुए रंग में सराबोर इस युवक को ईला ने अब ज़रा गौर से देखा था, वस्त्र, खड़ाऊ, गमछा, टोपी, कमंडल सब कुछ गेरुए रंग के थे यहां तक कि हाथ-पैर और मुंह पर भी उसने गेरुआ रंग पोत रखा था. उसके चारों ओर चमकीले गेरुए रंग की एक सुनहरी आभा फैली हुई थी....इस रंग से अछूती तो बस दो जोड़ी आंखें ही थी उसकी जो अपने-आप में हजारों-हजारों प्रश्न समेटे उस पल में ईला को एकटक ताक रही थीं. क्या तो जाने बसा था उसकी गहरी काली आंखों में जो उस वक़्त ईला को बैचेन कर गया था. अंग्रेजी बघारता है, हट्टा-कट्टा है फिर भी गेरूए रंग में लिपा-पुता यह युवक इस दयनीय स्थिति में यहां क्यों खड़ा है? ईला को उसके ऊपर सहानुभूति के स्थान पर क्रोध उमड़ आया...ऊंह भगोड़ा कहीं का ! उसकी बुदबुदाहट से गेरुआ रंग कुछ सिकुड़ा फिर समान रूप से फैल गया, ईला को महसूस हुआ कि शब्दों की चोट का असर उस रंग को भीतर तक प्रभावित कर गया था क्योंकि उस रंग के पीछे छिपे अजनबी चेहरे की नसें कुछ देर के लिए तन गई थी चाहे कुछ क्षण के लिए ही सही किन्तु उसकी याचना भरी आंखें थीं कि ज्यों कि त्यों प्रभावहीन बनी ठिठक गई थी, यानिकी यह ठीठ भी है...चोरी और सीनाजोरी. ईला कुछ प्रेक्टिकल होने लगी थी, इन्कम टैक्स का एक बड़ा हिस्सा सरकार ऐसे ही निठल्ले लोगों पर खर्च करती है जो उस जैसे ही सरकारी कर्मचारियों की जेब से जाता है. ईला ने उसे लैक्चर पिलाने की हैसियत से पूछा था "कुछ काम-धाम नहीं मिला क्या? या फिर यह पुश्तैनी धंधा है तुम्हारा?" प्रश्न को टालने की गरज से वह मुस्कुरा दिया था और समय व्यर्थ ना करते हुए दूसरे पर्यटकों की ओर मुड़ गया. ईला अपने-आपको पुनः सीढ़ियां उतारने हेतु तैयार करने लगी थी, उसने गिनती जहां से छोड़ी थी वहीं से शुरू की....इकतालीस, बयालीस.... तभी वह पीछे से चिल्लाया था "एक्सक्यूज मी मैडम...आपने चालीस तो गिना ही नहीं, दरअसल आप चालीस गिनती कि उससे पहले तो मैंने आपको"........दांतों को भींचते हुए वह बुदबुदाया "पकड़ लिया था". झेंपती हुए ईला ने अपना मोबाइल निकाला "इस कार्टून की फोटो तो खींच ही लूं, वायरल करने के काम आएगी" और फोटो खींचते हुए ईला ने उससे पूछा था "नाम क्या है तुम्हारा?" वह मौन ही रहा था....कुछ देर बाद बोला "देव". ईला को लगा कि शायद वह झूंठ बोल रहा था या कौन जाने सच ही हो, नाम का असर काम पर पड़ गया होगा तभी बेचारा देव तो बन नहीं पाया यहां रंगा सियार बना घूम रहा है. वह बिना कुछ कहे आगे बढ़ गई थी. अगली सुबह तीन स्वेटर, जैकेट, ऊनी टोपी और ग्लव्स पहने ईला ठिठुरी जा रही थी. वह टहलती हुई बाहर बाल्कनी तक चली आई थी. काफी देर तक वह लोहे की ठंडी रेलिंग को हथेलियों से थामे सामने पसरी नैनी झील में नज़रें गड़ाए स्थिर खड़ी रही थी, होटल के कमरे के बाहर कुछ ही कदमों की दूरी पर ही हरियल पानी वाली नैनी झील किसी जिद्दी बच्चे की तरह बांहें उठाए मचल थी कि कोई आगे बढ़े और उचककर उसे गोद में समा ले बस ! रात भर की बेचैन शीत लहरें अब तक थककर शांत हो चुकी थी और अपनी हल्की-हल्की थपकियों से लहरों पर सिलसिलेवार तरंगें उत्पन्न कर रही थी जैसे सुषुप्त अवस्था में ही कोई गाल पर बोसा जड़ दे, नींद तो ना टूटे बस सिर्फ हल्की-सी एक उन्माद भरी सिहरन उठे और एकसार होती हुई अंगों पर जाकर पसर जाए. झील के बीचोंबीच बतख़ों की पंक्तिबद्ध टोली मटकती चली आ रही थी, कई सारी बिछुड़ी बतख़ें भी इधर-उधर से आ-आकर इस समूह से नाता जोड़ती चली जा रही थीं, पेड़ों की परछाई से लुकते-छिपते फिर वे दूर तक निकल गई थीं. उस कतार का पीछा करती ईला की निगाहें उन्हें झील के किनारे तक ओझल होते हुए देखती रही थीं फिर थककर जब वापस लौटीं तो कितना कुछ था जो विस्मृत होता हुआ भी तन्हा सांसों की धीमी रफ्तार के बहाने उसे उदास बना रहा था. ईला की हथेलियों के नीचे वाली रेलिंग कब से गर्म हो चुकी थी किन्तु बहुत कुछ ऐसा था जो अब भी रेगिस्तान की ठंडी रातों-सा उसके भीतर ही भीतर सर्द बनकर जकड़ा पड़ा था. एक गहरा शून्य था जो कभी ना भरने की कसम खाकर ऐंठा पड़ा था...ये शून्य का चरम बिन्दू यूं ही तो नहीं उपजा था. हजारों-हजारों बार जी भर रो चुकने के पश्चात इस शून्य को पाया था ईला ने, उसने भोगी है इस शून्य की सूक्ष्मतम पीड़ित घड़ियां और हर बार बड़ी मुश्किल हुई थी उसे अपने निढाल आस्तित्व को ढोकर फिर से सामान्य ढर्रे पर लाने में. सूर्य की आहट पाकर नैनी झील के पानी में असंख्य सूरज उत्पन्न होने लगे थे, ईला एक आलौकिक दृष्टिभ्रम से घिरने लगी थी... बरसों पहले इस सूर्य के तेज़ से घबराकर वह कितनी देरतक फूट-फूटकर रोई थी, घबराहट में उस रोज़ उसने तेज़ी मां को फोन किया था उदित के घर को छोड़ने से ज़रा पहले.... "मैं कैसे करूंगी इस दुनिया का मुक़ाबला? उदित सूर्य है और मैं उसकी दया में चमकने वाले किसी जर्रे का भी सुक्ष्मांश हूं." तेज़ी मां की सख़्त आवाज़ में उस दिन अनोखा आत्मविश्वास महसूस किया था उसने, वे फोन पर बुदबुदा रही थीं.
"सुनूं क्या सिंधु ! मैं गर्जन तुम्हारा स्वयं युगधर्म का हुंकार हूं मैं ! या, मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूं मैं उर्वशी अपने समय का सूर्य हूं मैं" (सौजन्य-प्रबंध काव्य "उर्वशी"-कविवर रामधारी सिंह 'दिनकर' जी)उस भयावह एकाकी रात में ईला एक दृढ़ निश्चय लेकर उभरी थी, जब वह बिना उदित को बताए निकल पड़ी थी अकेली इस स्ट्रेंजर दुनिया में अपने दम पर खुद को साबित करने. अपने भीतर मध्यम पड़ते हुए उस सूर्य को चमकाने. झील के आस-पास अब सैलानियों की भीड़ जुटने लगी थी. मॉर्निंग वॉक करते बुजुर्ग और कुछ अधेड़ भी तेज़ रफ्तार युवाओं के साथ भागे चले जा रहे थे. ईला अवाक थी...जाने क्या बचा लेने की फिराक में हैं ये सब? उम्र के पिछले पहर की कौनसी सिलवटें फिर से स्टार्च करके तह लगाना चाह रहे थे ये सब? पवेलियन में खेलते बच्चे धूप की मानिंद ताज़ा-ताज़ा निखरे हुए थे. उदित को भी कितना शौक था कसरत करने का, इस मामले में ईला बिलकुल बेपरवाह थी. झील के एक किनारे पर कोई बेफिक्री से पुश-अप्स कर रहा था, कद-काठी व चेहरे-मोहरे से वह जाना-पहचाना-सा लगा. कुछ देर पश्चात उसने दोनों हाथ हवा में उठाकर अपनी पतली फरफराती टी-शर्ट में हवा भरी, हवा एक बांह से होती हुई दूसरी बांह से निकल गई, नाइलोन की टी-शर्ट पिचककर उसके सुडौल बदन से जा चिपकी, उसने अपनी सीने की मछलियों को ऊपर-नीचे उचकाया और यूं ही उनसे कुछ देर खेलता रहा. ईला को इस तरह अपनी ओर ताकते पाकर वह मुस्कुरा दिया. ईला के शरीर में लहू की गर्म झुरझुरी दौड़ गई, एक पहाड़ी असली सुर्ख रंग फिज़ाओं में तैर गया था. कौन है यह? एक प्रश्न अचानक कहीं से आकर छपाक से झील में कूद पड़ा और पानी में दूर तक अर्द्ध चंद्राकार गोले बनते रहे जो बहते-बहते झील के किनारे जा लगे. कहीं पास ही एफ़॰एम रेडियो पर कोई कुमाऊं गीत बज रहा था, धुन किसी फिल्मी गाने से मिलती-जुलती लग रही थी. ईला ने दिमाग पर ज़ोर डाला फिर नकामयाबी में गुनगुनाहट से चुटकी की जुगलबंदी करती हुई निशब्द ही लय बांधने लगी थी तभी लड़के-लड़कियों की रंग-बिरंगी टोली ईला के एन सामने से झूमती-गाती हुई गुज़री (दूरी न रहे कोई आज इतने करीब आओ). अरे हां ! यही तो गाना है ईला गाने लगी 'तुम मुझमें समा जाओ मैं तुम में समा जाऊं....लड़के-लड़कियां उसे देखकर हाथ हिलाने लगे तो हिला की हथेली भी अनायास ही हवा में फहराने लगी, पर्यटक स्थल में सभी मस्ती के मूड में होते हैं बशर्ते उम्र और साथ समय और काल के मुताबिक हो. शादी से पहले दिन भर फिल्मी गाने गाना और यहां-वहां दौड़ते फिरना यही एक शगल था ईला का. तेज़ी मां जब-तब टोका करती थी "बाई सा भले घराणे री छोरियां उधम-मस्ती कोनी करे सा, सिनेमा रा गाणा शोभा कोनी देवे आपने" वह तुनककर बाबा सा से शिकायत लगा आती थी और तेज़ी मां को चिढ़ाने के लिए कूदकर रेडियो का वॉल्यूम फुल कर दिया करती थी. तेज़ी मां की डरी-छिपी चिंताएं उस चार मंज़िंली कोठी के अहाते के भीतर ही मंडराती रह जाती थी. हां, गाने का शौक बढ़ते-बढ़ते टेप-रिकॉर्डर फिर ब्लैक एंड व्हाइट टी.वी. तक जरूर पहुंच गया था. उदित ने उसके इस शौक को डी.वी.डी. और कलर टी.वी. तक पहुंचा दिया था शायद अपने से उसका ध्यान बटाए रखने की नाकामयाब कोशिश रही होगी उसकी, किन्तु बचपन की हवेली में तो तेजी मां की डांट खाकर गाते-गाते भी वह पढ़ लिया करती थी जबकि शादी के बाद तो वह गाते-गाते स्वयं की आवाज़ भी सुन नहीं पाती थी. स्वयं से दूर हो रही अपनी आवाज़ उसे दूर पहाड़ी पे बसी ढाणी से आती टिटहरी के रुदन का आभास देती थी. सुर बंद, कंठ अवरुद्ध और जीवन निशब्द. कुल मिलाकर पुरानी डायरी के कोरे व पीले पड़े पृष्ठों का सा जीवन. लगभग इसी हालत में ईला दिल्ली पहुंची थी. अपने नाम के भग्न अवशेष, तार-तार वजूद और अपनी कुचली पड़ी कामनाओं के कुचले स्वप्न...यही सब सवांरने की लालसा मात्र ही उसमें बची रह गई थी उस वक्त सिर्फ. वह शाम बड़ी बोझिल उतरी थी गगन से, ईला उदासियों के घेरे से बाहर आना चाहती थी. पर लड़कियां कहीं जाने को तैयार ना थी और ना ही लड़कियों को अगले डेस्टिनेशन "डोरथी-सीट" में कोई रुचि थी. सो ईला अकेली ही अपना वॉटर कलर, ब्रुश व ईज़ल आदि सहेजने लगी थी. क्या वॉटर कलर अब भी "केमल" के ही आते हैं? वह स्वयं से पूछ बैठी थी तभी कलर-बॉक्स के बारह रंगों में से एक रंग कुछ अधिक बेबाक होकर निखरा. "कुछ देना चाहोगी" प्रश्न चटखकर कलर-बॉक्स से बाहर टपक पड़ा था, इस बार ईला रुआंसी होकर बोल पड़ी थी" कन्फेशन है ऊलीच सको तो ऊलीच लो तुम मुझ में से." वह भारी मन से सड़कों पर निकल पड़ी थी, अपने से ही दूर भाग जाने का अंदाज़ उसके कदमों में गज़ब की फुर्ती भर गया था. गाइड बता रहा था "डोरथी" कोई ब्रिटिश पेंटर थी, दरअसल वह जिस स्थान पर बैठकर पेंटिंग किया करती थी वहां से दूर-दूर पहाड़ियों तक फैला प्राकृतिक नज़ारा कलाकारों को हमेशा से ही आकर्षित करता रहा है, इस पार से उस पार तक आता-जाता कोहरा कृत्रिम बादलों का एहसास देता है. ईला ने ठीक उसी स्थान की सीध में अपना ईज़ल जमा लिया था. यूं ईला कोई चित्रकार तो थी नहीं, वह तो एक लंबी उम्र से अपनी जीवन का कोरा कैनवास लिए घूम रही थी. ऐसा भी नहीं था कि कोई रंग उसे रास ही ना आए थे बस नसों की टूटन को नज़र अंदाज़ कर देह करवट बदल-बदलकर सो जाने का आदी हो चुका था. जब तक वह उदित के साथ रही अपने-आपको "ऑस्ट्रिच" बुलाती रही, एस्केपिस्ट हो जाना विपत्ति से बचने का सबसे आसान मार्ग है. तूफान का आभास होते ही शतुरमुर्ग की तरह रेत में गर्दन गड़ा दो और वास्तविकता से पलायन कर जाओ फिर बाहरी तूफान कम से कम मस्तिष्क को तो छू नहीं पाता. ईला ने कोशिश भी की थी कि सारे तूफान वह सिर्फ देह पर झेल जाए और मस्तिष्क अछूता ही छूटा रहे पर हक़ीक़त में ऐसा हो कहां पाया था. जब स्वयं ही अपने इंटेक्ट कौमार्य को दिलासा देना था तो किसी की दया पर क्यों अपना पेट पाला जाए? बाज़ार, माल और सिनेमाघरों में जवान पुरुषों को घूरती उदित की निगाहें उसे पहले-पहल अपनी गलतफहमी ही लगी थी किन्तु अपने दोस्त पंकज के साथ शराब के नशे में रातें गुजारने वाले उदित की अप्राकृतिक हरकतें उसके लिए इस जमाने में उतनी हैरतपूर्ण भी नहीं रह गई थीं लेकिन उसके साथ रहना, यक्क....."वोमिटिंग सेन्शेसन" होने लगती थी उसे. घर फोन करके तेज़ी मां को बताया था उसने तो वे बोली थी- "तू तो आप ही घणी समझदार छोरी है, लौट आ लाड़ो !" तेजी मां तो हमेशा ईला के खिलंदड़ेपन से नाराज़ रहा करती थी, उनके जैसी परंपरावादी स्त्री से इस सहारे की उम्मीद ईला को कतई नहीं थी उसका आत्मबल बढ़ गया था. तेजी मां ने ईला को समझा दिया था कि जब मंज़िल पर ना पहुंचना ही उसकी नियति है तो लौटने में देर नहीं करनी चाहिए वरना ज़िंदगी पतंग की तरह सर्र से कटकर हाथों के सामने से गुज़र जाती है और हम उलझे मांझे के गुच्छे ही सुलझाते रह जाते हैं.
"कहां खोई हुई हो मोहतरमा?" "एक जगह टिक गई तो ज़िंदगी आगे निकल जाएगी" "आपका इरादा कहीं डोरथी पार्ट-2 बनने का तो नहीं है न?" "फिर लोग नैनीताल में आपका भी टुरिस्ट-स्पॉट देखने आया करेंगे" "अपना ईज़ल हटाइए आज मुझे किसी भी हालत में यह कैनवास पूरा करना ही है."ईला अपने-आपे में लौट आई थी और जल्दबाज़ी में अपना कोरा कैनवास समेटने लगी थी बेख्याली में ईला यह बिलकुल ही भूल चुकी थी कि वह आम रास्ते के बीच जमी बैठी थी. उसने देखा कि वह युवक उसे घूर रहा था, एक शैतानी भरी मुस्कुराहट उसके हाव-भाव के विपरीत बिलकुल ही विरोधाभासी लग रही थी. ईला ने गौर से देखा एक चमकीला शेडेड रंग उसकी कनपटी के ऊपर बेतरतीब सी लटों पर बड़ी लापरवाही से मौजूद था.
"तुम देव हो ना?" 'तुम यहां भी ?" "क्या तुम मन भी पढ़ लेते हो? और ये क्या उठा लाए आज?" वह ठठा पड़ा "होल्ड आन, मोहतरमा ये मैं उठा नहीं लाया हूं, यह तो मेरी आज की कमाई है और हां, आज मेरा नाम ए.म॰एफ॰हुसैन रहेगा".... "रहेगा? मतलब? क्या तुम रोज़ एक नया नाम और एक नया धंधा बदलते हो?"ईला सामान कंधों पर लादे धीमे-धीमे चलते हुए उसके कैनवास तक चली आई थी, किसी अर्धनग्न स्त्री की आधी-अधूरी तस्वीर थी जिसके सीने से लेकर जांघों तक का हिस्सा सफ़ेद नीले धुआं-धुआं होते बादलों की उड़ती हुई चादर से ढंका हुआ था.
"यह कौन है?" "तुम्हारी पत्नी?" "पहला प्यार? या कोई वो?" ब्रुश चलाते-चलाते ही उसने हंसते हुए उत्तर दिया था- "यह मेरी आज की रोटी है बस इतना समझ लीजे एक आग का दरिया है और तैरके जाना है" "वैसे जानकारी दे दूं कि अभी तक मेरी बलि नहीं चढ़ी है, यानिकी मैं अविवाहित हूं" "किसी स्त्री से कोई ना कोई रिश्ता हो ही, यह क्या जरूरी है?" उसने भौहें उठाकर ईला की तरफ एक अहम प्रश्न उछाला था. "रोमांस का भी एक रिश्ता होता है सिर्फ और सिर्फ.....ख़ालिस रोमांस, बिना किसी बंधन के सिर्फ प्यार ही प्यार हो, इन वादियों की तरह हसीन व बेफिक्र....बिना किसी परिभाषा के असीमित....अपरिमित...अपर्याप्त...." ईला को इस दफ़ा वह कुछ-कुछ दार्शनिक लगा था. "तुम क्या सारे काम पार्ट टाइम करते हो...मिस्टर देव उर्फ हुसैन?" "जी, बस वही समझ लीजिए" 'क्या प्यार भी?""शायद करता, जो अगर सच में किसी से हो ही जाता. लेकिन शर्त तब भी मेरी यही रहती कि वह प्यार बंधन रहित होता फिर चाहे उस कैद का मुरीद होकर एक दिन मैं खुद ही ठिठक जाता, उसी धुरी के चारों ओर अपनी परिक्रमा बांध लेता, वह अपने-आपको आश्वस्त करता हुआ उसी रों में बोलता गया...और क्या पता मैं वहीं रुक जाता...ठहर जाता....थम जाता." इसी खामोख्याली के अंदाज में उसने अपनी दोनों बाहें हवा में उठाई और कंधों को गोल-गोल घुमाते हुए थकान चटकाने लगा, उसकी कमीज़ के ऊपरी तीन बटन चट से खुल गए थे, सीने में तैरती मछलियां खुलकर उभर आई थी. ईला को उस तड़के कड़ाके की ठंड में नैनी झील के किनारे पुश-अप्स करता हुआ वह लड़का स्मरण हो आया था. "तो वह भी यही था." सिगरेट सुलगाते हुए उसने आंखों ही आंखों में ईला से अनुमति मांगी फिर आराम से कश लगाने लगा. आमतौर पर सिगरेट पीना ईला की आदत में शुमार ना था किन्तु उस वक़्त धुंध की नमी और सीलेपन में घुली-मिली भाप की बास और उसके नथुनों से निकला सौंधा -सौंधा धुआं उसे ललचा रहा था... "मे आई?" ईला ने हाथ आगे बढ़ाया. उसने ईला को ऊपर से नीचे तक देखा फिर बिना कुछ कहे सिगरेट उसकी ओर बढ़ा दी थी. सिगरेट के फ़िल्टर में से डियोडरेंट मिश्रित पुरुष गंध आ रही थी, ईला के मुंह में एक तुर्श स्वाद तैरने लगा था, ईला को अपने ही होठों पर उतर आया सूखापन उस वक्त बड़ा ही अजीब लगा था, उसने जुबान फिराकर अपने होठों को नम किया था, इस अपरिचित गंध से ईला प्रथम बार वाकिफ हो रही थी. कश लगाती ईला पास ही एक छोटी चट्टान पर इत्मेनान से जा बैठी थी, उसने सिगरेट वापस नहीं लौटाई थी, वह सुट्टे पे सुट्टा मारती रही जा रही थी और कुछ ही दूर वह अजनबी अपनी ही मस्ती में देर तक कैनवास पर झुका रहा था. इस बीच उसने एक बार भी नज़रें उठाकर ईला की तरफ नहीं देखा था. ईला विचारमग्न थी, सिर्फ और सिर्फ....ख़ालिस रोमांस, बिना किसी बंधन के? क्या बंधनरहित प्रेम में भी कोई चाहकर कैद होना चाहेगा? जो सच में किसी से प्यार हो तो कोई ठिठककर रुक भी सकता है?" सच्चा प्यार क्या इस ज़माने में एक्जिस्ट करता है? ईला ने देखा पेंटिंग खत्म करने के पश्चात उसके चेहरे पर एक असीम सुकून मंडरा रहा था. पहाड़ों में दिन जरा जल्दी ढलने लगता है, ईला अपना सामान समेट लौटने की तैयारी करने लगी थी, घुड़सवारी उसे हमेशा से ही तकलीफ़देह लगती है, घोड़े पर हिलते-डुलते उसकी जांघें छिल जाती है. यहां आवाजाही का और कोई साधन ना होने के कारण और आंय कोई उपाय भी तो नहीं था. संकरी-पतली गलियां उस पर भी पहाड़ी क्षेत्रों की खड़ी चढ़ाई पर कारें और जीपें फिसलनें का डर रहता है ऊपर से लैंड स्लाइडिंग का खतरा मंडराता रहता है सो अलग. "क्यों ना इसी से मदद मांगूं?" "क्या तुम मेरे साथ नीचे उतरोगे?" वह बोला "क्यों? फिसलने का भय है तुम्हें ईला? और गारंटी क्या है कि मेरे साथ रही तो ये डर नहीं होगा? ईला को उसका प्रश्न द्विअर्थी लगा. "ये तो सच में ही मन पढ़ लेता है और नाम कैसे जान गया?" ईला को आश्चर्यचकित देख उसने ईला के कोरे कैनवास की ओर इशारा किया, जिसके कोने में काले रंग से ईला का नाम लिखा था. ईला ने अपना नाम लिखकर मिटा तो दिया था किन्तु रेखाओं के नीचे से उसके नाम के एल्फाबेट्स तब भी अकड़ू बने उन दोनों को झांक रहे थे. "ओह ! अच्छा....ये बात है." "अब कल क्या रूप धरोगे मिस्टर देव उर्फ हुसैन?" वह शरारती अंदाज़ में मुस्कुराया "अपन तो एडवेंचर के लिए आएं हैं मैडम कल क्या होगा किसको पता अभी ज़िंदगी का ले लो मज़ा" मुंह के आस-पास हथेलियां सटाकर वह वादियों की ओर रुख करके ज़ोर से चिल्लाया - "एंजॉय द लाइफ एज इट कम्स टू यू माय गर्ल....." इको करती हुई उसकी आवाज़ बियावान में देर तक डोलती रही थी, सामने बिखरी वादियों से टकराकर जब ध्वनि लौटी तो यहां-वहां जज़्ब होते हुए बचे-खुचे सिर्फ तीन शब्द पलटकर ईला तक पहुंचे थे एंजॉय.....लाइफ.....गर्ल....और यही शब्द टुकड़े -टुकड़े होकर फिर देर तक ईला की ईयरिंग्स पर अटके रह गए थे. घोड़े पर आगे-पीछे होते हुए ईला की ईयरिंग्स जब-जब हिलती थी ये तीनों शब्द उसके कानों में शोर मचाने लगते थे, ईला के कान गुस्से से दहकने लगे थे उस वक्त. सिर को झटका देकर स्वयं को वास्तविकता के आईना दिखाती हुई वह चिढ़कर बड़बड़ाई थी , "ऊंह....अड़तीस साला गर्ल." वह ईला के साथ-साथ ही दूसरे घोड़े पर बैठा-बैठा मुस्करा रहा था. कुहासे में सब गड्ड-मड्ड हुआ जा रहा था. क्या वह सचमुच डर रही थी? क्या इस देव उर्फ हुसैन की प्रजेंस उसे कमज़ोर बना रही थी? अगर ऐसा ही था तो वह उससे मदद क्यों मांग बैठी? एक ऐसा व्यक्ति जो एक्सीडेंटली उससे आ मिला था, जिसके ना नाम का पता था ना काम, ना उसकी जाति का पता था ना धर्म का, ना उसके इरादे पुख्ता थे ना ही उम्र. मन किया कि व्हिस्की का एक तगड़ा नीट शॉट मार ले और चेतनाशून्य शरीर को घोड़े पर लाद दे फिर इसी मूर्छित अवस्था में होटल के रूम में पहुंचकर पलंग पर ढह जाए अनिश्चित काल के लिए, अनंत तक. पोंछ डाले अपने अतीत को, भविष्य को और भूल जाए अपने वर्तमान को, हो सके तो री-बर्थ ही ले ले और फिर से एक नया जिस्म लेकर उग आए. वह बेपनाह व्यथित थी उस वक़्त, अपने ही पाले दुखों के जमावड़े में डूबी जा रही थी. ईला असमंजस में थी.... जीने के लिए क्या सिर्फ दो बलिश्त बाहें, एक पुरुष गंध और ख़ालिस रोमांस की आवश्यकता होती है? वह फूट-फूट कर रोने लगी थी, वह भी घबराकर घोड़े से लगभग कूदकर ईला के पास पहुंचा था. चुपचाप उसकी पीठ सहलाता हुआ वह उसे पानी पिलाने लगा था. उस रात पास ही धुंधलके में वे दोनों शरणागत बने थे. ईला सब कुछ उड़ेल रही थी जो कुछ भी उसके भीतर था एक ऐसे अजनबी के सामने जिसे प्रेम में बंधन ही अस्वीकार्य था, जो रिश्तों की सीमाओं से परे ख़ालिस रोमांस की बातें कर रहा था. उदित तो उसके साथ था, मन से उसके अधीन भी था वो, सम्पूर्ण रूप से उसका ना सही किन्तु सभी शर्तों को मान्यता देता हुआ उसके साथ बंधा तो था एक अटूट रिश्ते में...फिर भी वह लौट आई थी. उसने दिन में हिमालय की चोटी को दूरबीन से देखा था, वहां भी जमाव रिस रहा था, मौसम की बदलाहट उस तरफ की बर्फ को पिघला रही थी. वह कनफ़ेस कर रही थी जीवन का सत्य जो अब तक उसके सीने में दफन था कि कैसे अठारह बरस का प्यार उसे बागी बना गया था, वह भाग जाना चाहती थी उसके साथ जिसकी ठुड्डी पर ढाढ़ी भी उस वक़्त तक करीने से उग नहीं पाई थी. प्यार तो तब भी ईला के लिए छलावा था...उसके सपनों के घर की कमजोर चारदीवारी बड़ी बेदर्दी से दरक गई थी यह जानकर कि उसके मासूम प्यार को दौलत के लालच में ठगा गया था, वह इकलौती जो थी. ईला रोए जा रही थी, उसके गम बेलगाम हुए जा रहे थे. उसे याद आ रहा था कि कैसे एक रोज़ गर्मियों की छुट्टियों में उसके चचेर-भाई ने एकान्त पाकर उसके अंगों पर एक गुदगुदा-सा नाबालिग अहसास थमा दिया था. वह डर के मारे घर में किसी से कुछ कह भी नहीं पाई थी. रिश्तों में अविश्वास की काली छाया उसके जीवन पर स्थाई रूप से क़ाबिज़ हो आई थी हमेशा के लिए. वह हर एक उस पुरूष से नफरत करने लगी थी जो उसके करीब था या करीब आना चाहता था फिर भी उस रात न जाने कैसे सब कुछ दो बांहों की कसावट से पिघलकर एक अंजान पुरूष गंध से घुला जा रहा था. उस रात ईला की अड़तीस साला परिपक्वता खामोशी से बहती रही थी, उसकी बोझिल सांसों का ज्वार देर तक अपनी नमी उड़ेलता रहा था. वह भी निशब्द उलीचता रहा था ईला के भीतर का दर्द. ईला के तर्पण से वह मिट रहा था क़तरा-क़तरा. एक ख़ालिस रोमांस था जो दूर-दूर तक परिभाषित हो रहा था.
एक कहानी रोज़ के अलावा हम एक कविता रोज़ भी पढ़ा रहे हैं. आपने पढ़ी क्या? 'उजाले में थोड़ा आग भी रहती तो कितना अच्छा था' और मई माने महीना मंटो का - ये कहानी पढ़िए लाहौर की हीरा मंडी से फुस्स होकर लौटी जावेद की मुहब्बत


















