इंसानियत करतार सिंह दुग्गल
बलौच सिपाही मिल्टरी के ट्रक में मुर्गों की तरह लद गये थे. उनका सामान वैपन-कैरियर में सुबह भेज दिया गया था. हर फौजी के पास सिर्फ अपनी-अपनी बंदूक थी. समय ही कुछ ऐसा था कि बंदूकों पर संगीनें हर समय चढ़ी रहती थीं.

बलौच सिपाही मिल्टरी के ट्रक में मुर्गों की तरह लद गये थे. उनका सामान वैपन-कैरियर में सुबह भेज दिया गया था. हर फौजी के पास सिर्फ अपनी-अपनी बंदूक थी. समय ही कुछ ऐसा था कि बंदूकों पर संगीनें हर समय चढ़ी रहती थीं.

और अब उनका काम खत्म हो चुका था. कोई भी मुसलमान ऐसा नहीं रह गया था जिसे मौलवी ने पाकिस्तान की स्वर्ग-सी जमीन पर न भिजवा दिया हो. जो अपने घरबार छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे, उन्हें मौलवीजी इस्लामी राज्य के सुन्दर चित्र दिखाते और कोई भी उनका कहना टाल न पाता.
जमादार रमजान खान ऐसे ही खयालों में खोया हुआ था कि सड़क से एक खौंफनाक चीख के बाद ट्रक में सिपाहियों के हंसने की आवाज आयी. पूछने पर पता चला कि साइकिल पर जा रहे नौजवान सिख के पास से जब लारी गुजरी तो लारी के एक सिपाही ने अपनी संगीन से उसके गले को छलनी कर दिया. वह सिख साइकिल से उछलकर नाली में गिर पड़ा जैसे कोई मेंढक उछलकर गिरता है. इसी घटना पर सिपाही हंस रहे थे. जमादार भी सिख को मारने की इस तरकीब पर हंसने लगा. उसने सोचा चलो एक सिखड़ा और कम हुआ. और अपनी डायरी में दुश्मन के जानी नुकसान के ब्यौरे में उसने एक नम्बर और बढ़ा लिया.
इसी तरह गाते-गाते एक सिपाही ट्रक में ड्राइवर के दाहिने आकर बैठ गया, दूसरा जमादार से इजाजत लेकर उनके बायीं और बैठ गया. और संगीनों को उन्होंने बाहर निकालकर रख लिया जैसे कोई शिकारी की घात में बैठा हुआ हो.
और जमादार को समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी डायरी में दुश्मनों के जानी नुकसान के हिसाब में एक औरत लिखे या एक औरत और एक बच्चा. कोई एक मील बाद एक बूढ़ा सडक के किनारे बैठा पेशाब कर रहा था. लारी फिर सड़क छोड़कर कच्चे रास्ते पर आ गई. इस बार जमादार के बायीं ओर बैठे सिपाही ने बूढ़े की पीठ में संगीन को गाढ़ दिया. बूढ़ा गेंद-सा लुढ़कता खाई में गिर गया. फिर एक चीख की आवाज और फिर कहकहे. लारी फिर तेज हो गई.
सामने दिख रहा पाकिस्तान का धर्म, सच और न्याय का प्रतीक चांद-तारे वाला झंडा लहरा रहा था. ड्राइवर ने ट्रक को और तेज कर दिया. अपने देश से आ रही प्यार-भरी तेज हवाएं जैसे बलौच सिपाहियों का स्वागत कर रही थीं और एक नशे में बलौच सिपाही 'अल्लाह हू अकबर' और 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे.बलौच फौज़ियों की इस टुकड़ी का सरदार एक रमजान खान नाम का जमादार था, जिसे सभी 'मौलवी जी, मौलवी जी' कहते थे. चलती लारी में जमादार नमाज पढ़ने के लिए खड़े हो जाते. फसादों में लाशों के ढेर के आगे मुस्सला बिछाकर लोगों ने नमाज के समय उन्हें नमाज पढ़ते देखा था. एक सिपाही उनकी दायीं तरफ बंदूक लेकर खड़ा होता और एक सिपाही उनकी बायीं तरफ. देश विभाजन के बाद अमृतसर क्षेत्र से मुसलमानों को निकाल-निकालकर वे पाकिस्तान भेजते. जली हुई मस्जिदों के सामने लारी रुकवाकर ये रोने लगते. और आज अब लारी चलने लगी तो मौलवीजी को अचानक खयाल आया भगवान तो सभी का एक है. अमृतसर के हरिमन्दिर की नींव एक मुसलमान फकीर ने रखी थी, गुरु नानक को अहले-सुन्नत भी अपना पीर मानते हैं और मौलवीजी ने दूर गुरुद्वारे के चमकते हुए सुनहरे कलशों को देखकर सिर झुका दिया. लारी चली तो ठंडी हवा के पहले झोंके साथ ही मौलवीजी की आंखें मुंदने लगीं. मौलवाजी की आंखें मुंदीं तो फसादों के वीभत्स दृश्य उनकी आंखों के सामने उभरने लगे. किस तरह मुसलमानों ने हिन्दू-सिखों के टुकड़े-टुकड़े किये थे और किस तरह हिन्दू-सिखों ने मुसलमानों से गिन-गिनकर बदले लिये थे. कोई कहता पहले हिंदुओं ने की थी, कोई कहता मुसलमानों ने की थी. ट्रक से हंसी अभी थमी नहीं थी कि सड़क से फिर एक भयानक चीख सुनाई दी. इस बार आवाज किसी औरत की थी. और लारी में कहकहों की आवाज और ऊंची हो गई. दूध बेचकर गांव जा रही किसी ग्वालिन को इस बार निशाना बनाया गया था. संगीन की नोक ग्वालिन की चोटी में जाकर लगी थी और उसके बालों की लट संगीन के साथ कट कर आ गई थी और ग्वालिन का बर्तन एक तरफ गिर गया था और ग्वालिन दूसरी तरफ ढेर हो गई थी. फिर बलौची सिपाही बारी-बारी से बालों की लट की चुमने लगे थे. जब सभी ने अरमान पूरे कर लिये तो जमादार ने बालों की लट लेकर अपनी डायरी में रख ली. काफिरों के मुल्क की यह निशानी भी अच्छी रहेगी, उसने मन-ही-मन सोचा. सुबह की ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी. अमृतसर शहर के बाहर सड़क पर कोई इक्का-दुक्का ही आ-जा रहा था. बलौच फौंजियों ने पाकिस्तान की शान में गीत गाने प्रारम्भ कर दिये पाकिस्तान आसमान में चमकता एक तारा हैपाकिस्तान दुनिया में इनसाफ का एक नमूना होगा पाकिस्तान गरीबों और अनाथों का सहारा होगा पाकिस्तान में कोई जालिम होगा, न कोई मंजलूम. सड़क पर फिर एक औरत नजर आयी, गले में गातरे वाली कृपाण, कोई सिख नजर आ रही थी. ड्राइवर ने धीरे-से ट्रक को उसके पास से निकाला और उसके दायीं ओर बैठे बलौच सिपाही ने उस गोल-मटोल गुरु की भक्तिन को जैसे नेजे पर उछाल दिया हो. सुनसान सड़क पर फिर एक चीख सुनाई दी. ट्रक में फिर कहकहे उठे. ड्राइवर ने फिर ट्रक को तेज कर लिया. और जहां जाकर वह औंधी गिरी, दूर तक सिपाही एड़ियां उठाकर उसे तड़फते हुए देखते रहे. फिर उसके सम्बन्ध में बातें होने लगीं. कोई कहता गुरुद्वारे से आ रही थी तो दूसरा कहता गुरुद्वारे जा रही थी. कुछ का खयाल था कि खा-पीकर मोटी हो रही थी. जमादार रमजान खान ने सोचा जाते-जाते ये अच्छे शिकार मिल गये. वह बार-बार डायरी खोलता और अपने हिसाब को अप-टू-डेट करता. शहर से जैसे-जैसे वे दूर होते जा रहे थे, वैसे-वैसे खतरा कम होता जा रहा था. बलौच सिपाहियों के हौसले बढ़ते जा रहे थे और उन्हें इस नए खेल में मजा आ रहा था. हवा से बातें करता मिल्टरी का ट्रक जैसे उड़ता जा रहा था. सामने सीमा पर पाकिस्तानी झंडा दिखाई देने लगा था. बलौच सिपाहियों ने झंडे को देखते ही 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के पांच नारे लगाये और फिर कोई नगमा गाने लगे. झंडा जरूर नजर आने लगा था, पर सरहद अभी लगभग तीन मील दूर थी. थोड़ा ही आगे जाकर बलौच सिपाहियों ने देखा कि तीन सिख सड़क पर जा रहे थे, दो-दो दायीं ओर तथा एक बायीं और. तीनों में कोई पचास-पचास कदमों का अन्तर था. ड्राइवर के पास अगली सीट पर बैठे बलौच सिपाहियों ने आंखों-आंखों से कोई योजना बनायी. और जब सारा नक्शा इशारों-इशारों से सभी की समझ में आ गया तो तीनों मुस्करा पढ़े. फिर ड्राइवर ने ट्रक को दायीं और कच्चे रास्ते पर डाल दिया. अगले ही क्षण एक नौजवान सिख संगीन की नोक से बिंध गया. ट्रक तेज हो गया. नौजवान की चीख सुनकर उसी ओर जा रही औरत ने हैरानी और घबराहट से पीछे मुड़कर देखा. ट्रक उस समय तक उसके सिर पर पहुंच चुका था और तेजी से बाहर आती संगीन उसकी छाती में गढ़ गई. ट्रक और तेज हो गया. अब बायीं ओर जा रहे बूढ़े की बारी थी. बूढ़ा जैसे ऊंचा सुनता हो, उसे कुछ भी सुनाई नहीं दिया था. ड्राइवर बड़े साहस से ट्रक को सड़क पर ले आया और फिर बायीं ओर कच्चे रास्ते पर डाल दिया और पूरी रफ्तार के साथ ट्रक को बूढे क़े पास से निकाला. बूढ़ा भूखा-प्यासा कोई शरणार्थी लग रहा था. संगीन की नोंक चुभते ही उछला और पहिये के आगे जा गिरा. उसकी खोपड़ी ट्रक के भारी पहियों के नीचे कुचल गई. ड्राइवर ने ट्रक को और तेज कर दिया. सिपाही नारे लगाते जा रहे थे, ड्राइवर ट्रक की रफ्तार को बढ़ाता जा रहा था. तभी ड्राइवर ने देखा कि अचानक एक जंगली बिल्ली कूद कर सड़क के बीच में आ गई. ड्राइवर ने बिल्ली को देखा, जमादार ने भी बिल्ली को देखा. ''इनसानियत का तकाजा...'' इस तरह हुक्म उसके मुंह में ही था कि ड्राइवर ने खुद ही ट्रक को एक तरफ करते हुए बिल्ली को बचाने की कोशिश की. बिल्ली तो बच गई, पर इतनी तेज जा रहे ट्रक कर हैंडल मुड़ा तो फिर सम्भाल न सका. ट्रक कच्चे रास्ते पर आ गया, फिर कच्चे रास्ते से उतर कर एक पेड़ से टकराकर उलट गया. ट्रक ने एक करवट ली, फिर दूसरी. पच्चीस मिली-जुली चीखें निकलीं. और फिर जैसे सभी के गले पकड़ लिए गए हों, एकदम सन्नाटा छा गया. इंजन के पेट्रोल से ट्रक को आग लग गई. सड़क पर कोई भी हिंदुस्तानी नहीं था जो बलौच सिपाहियों की मदद के लिए पहुंचता. दूर दिख रहा पाकिस्तान का झंडा वैसे ही लहरा रहा था. घबराहट में सड़क के किनारे कीकर के पेड़ पर बिल्ली चढ़ गई थी और वहीं से कांटों में से आंखें फाड़े जल रहे ट्रक को देख रही थी और हैरानी हो रही थी.