दुष्यंत गाना लिखते हैं. और कहानी भी. पिछले दिनों एक फिल्म आई. लाल रंग. उसका गाना बहुत चर्चित हुआ. बावली बूच. वो दुष्यंत ने लिखा था. उनका एक कहानी संग्रह भी आया है. खूब चर्चित हुआ. पेंग्विन से छपा है. टाइटल है. जुलाई की एक रात. उसी की ये कहानी है. और दुष्यंत के ही शब्दों में कहूं तो एक पिता ने अपनी सबसे लाडली बेटी सौंपी है आपको. दी लल्लनटॉप कहता है थैंक्यू. अब आप पढ़ें दुष्यंत की कहानी- संदूक
रामकौरी के मरते ही दादा ने सबसे पहले संदूक खोल डाली
एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए 'संदूक' जिसे लिखा है दुष्यंत ने.
Advertisement

फोटो - thelallantop
Add Lallantop as a Trusted Source

Advertisement
दादी रामकौरी एक चाबी को अपने छींट के घाघरे के नाड़े से बांधकर रखती थी, दादी छींट का घाघरा ही पहनती थीं. नहाते समय घाघरा बदलता तो चाबी को दूसरा नाड़ा मिलना तय होता था. घर के सारे छोरों की निगाह उस चाबी पर रहती थी, किसी ने नहीं देखा कि दादी ने दिन या रात के किसी पहर उस चाबी का किसी ताले को खोलने में इस्तेमाल हुआ हो.
एक बार दादा हरदयाल ने दादी से इस चाबी के लिए लड़ाई भी कर ली थी कि बता रांड किसकी है, कौन से ताले की है. फिर पूरे नौ दिन तक दोनों में अनबोला रहा था.कार्तिक का उतरता हुआ महीना था, जाड़ा अपने चरम पर था. उस रात काली-पीली आंधी आई थी. उस वक्त दादी दादा उस पुरानी साल (आयताकार कमरा) पे बट्ठल में खीरे (अंगारे) डालकर तप रहे थे कि रात कट जाए. दादी को दौरा पड़ा और दादी के प्राण निसर (निकल) गए, दादा ने दादी के नाड़े से बंधी चाबी खोली और सारी अलमारियों और संदूकों में लगाकर देखी. पिछली रबी की फसल के गेहूं की बोरियों की ढेरियों के बगल में रखी सबसे छोटी संदूक में चाबी लग गई. ताला जंग खा गया था, चाबी के साथ दो-चार बार हिलाया तो खुल गई. संदूक में बस एक किताब थी, गीताप्रेस गोरखपुर की श्रीमद्भगवद्गीता. और उसके बीच में एक खत. खत पीला पड़ गया था, खत खोलते हुए दादा के हाथ कांप रहे थे कि कहीं फट ना जाए. खत हिंदी में लिखा था,वर्तनी की गलतियां थीं जो बता रही थी कि लिखने वाले को ज्यादा हिंदी नहीं आती. खत में लिखा था.
"मेरी हमनफ़स रामकौरी, पूरा परिवार पाकिस्तान जा रहा है. मुझे भी जाना ही पड़ेगा. इंशाल्लाह! जिंदगी रही और कभी लौटना हुआ तो जरूर आकर मिलूंगा. तुम शादी कर लेना. तुम्हारा, रसूल"दादा ने खत को बहुत डरते हुए उसी तरह किताब में रख दिया. किताब उसी छोटी सी संदूक में रख दी और संदूक को ताला लगा दिया. चाबी अपनी धोती की गांठ में रख ली. उन्होंने बेटों को आवाज दी. पूरा परिवार शोक में डूब गया.
एक कहानी रोज़ में कल आपने पढ़ी थी विजयदान देथा की कहानी - किसान ने भगवान शंकर को शंख बजाने पर मजबूर कर दिया
Advertisement
Advertisement




















