“भाई साहब, दूसरी मंज़िल पर एक ऑफिस था. आज बंद है क्या?” “नहीं, आज तो कोई छुट्टी भी नहीं है. घंटी बजाई थी आपने?” “पर वहां तो ताला लगा हुआ है.” “ओह! वैसे उस फ्लोर पर तो बहुत से ऑफिस हैं. आपको कहां जाना था?” “वो जो लोगों को गाड़ियां दिलवाता था.” “अरे! वो लोग तो भाग गए.” “क्या? कब? कैसे?” “पिछले महीने. मालिक बता रहा था कि हिसाब भी नहीं किया. पुलिस में रिपोर्ट भी कराई पर कुछ पता नहीं चला.”जैसे ही चाय की दुकान चलाने वाले रमेश से किशन ने ये सब सुना उसका तो दिल ही बैठ गया. अब कैसे भरेगा वो हर तिमाही आने वाली क़िस्त और क्या ज़वाब देगा अपने बड़े भाई को. वह इसी उधेड़बुन में खो गया. किशन की ऐसी हालत देखकर रमेश ने उसे बैठाया और पीने के लिए चाय दी.
“आराम से पूरी बात बताओ कि क्या हुआ था? इतने परेशान क्यों हो?”, रमेश ने दिलासा देते हुआ कहा. “क्या बताऊं, अब. मैं और मेरा बड़ा भाई यहां फल का ठेला लगाते हैं. रोज़ सुबह ठेले से फल-मंडी जाना होता है. मैंने सोचा क्यों ना एक बाइक खरीद ली जाए ताकि हमको सुबह की भाग-दौड़ से आज़ादी मिल सके. इसलिए हमने अपनी सारी जमापूंजी लगाकर ये बाइक ख़रीदी.” “पर तुमको पता कैसे चला इस कंपनी के बारे में?”, रमेश ने किशन को बीच में रोककर पूछा. “सात महीने पहले, हमारी गली में एक लड़के ने नई बाइक ख़रीदी. मेरे पूछने पर उसने इस कंपनी के बारे में बताया कि हमें सिर्फ़ डाउन पेमेंट और दस हजार सिक्योरिटी के देने हैं जो बाद में वापस हो जायेंगे. सारी किस्तें ये कंपनी भरेगी. हमें केवल उनका स्टीकर लगाकर घूमना है. मुझे स्कीम अच्छी लगी. मैंने बड़े भाई को बताई. थोड़ी डांट-डपट के बाद उनको भी मना लिया. सारी जमापूंजी इकट्ठी करके डाउन पेमेंट के पच्चीस और कंपनी के दस हज़ार जुटाए. अगली सुबह पैसे लेकर पहले कंपनी के ऑफिस गए और वहां से शोरूम. बाइक किस्तों पर निकलवा दी और कंपनी को मिडिएटर बना दिया. बाद में कंपनी ने बाइक पर अपने प्रमोशनल स्टीकर चिपका दिए और बाक़ी की क़िस्तों को अदा करने का वादा किया. कल बाइक कंपनी से पहली क़िस्त जमा करने का नोटिस आया तो मुझे यहां आना पड़ा. यहां आकर कंपनी के बारे में पता चला तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन ही ख़िसक गई.” “मुझे भी बोला था पालिसी लेने के लिए. मैंने मना कर दिया.” रमेश ने कहा, “ ये लोग शहर शहर जाकर लोगों को ठगते हैं. पहली क़िस्त 6 महीने बाद आती है इसलिए ये लोग कहीं भी उससे ज्यादा नहीं रुकते. 6 महीने लोगों को ठगकर ये लोग भाग जाते हैं. आपकी बाइक पर अपना स्टीकर लगा देंगे ताकि इनका प्रचार फ्री में हो और नए ग्राहक बनें.” “हां, शक तो मुझे भी हुआ था एक बार. सिर्फ़ सात-आठ लोगों का स्टाफ था. मियां-बीबी हेड थे. रोज़ दस-बीस की भीड़ आती थी पॉलिसी लेने. पर जब सिर्फ़ दस हजार जमा करके बाइक मिल जाती है तो इतना कौन सोचता है. अब वो दस हजार तो गए ही, साथ में दुनिया भर की किस्तें भी भरनी पड़ेंगी. समझ में नहीं आ रहा है कि बड़े भाई को क्या ज़वाब दूंगा.” “कोई बात नहीं. अब पछताय का होत जब चिड़िया चुग गई खेत!”किशन दूसरे फ्लोर तक जाने वाली सीढ़ियों पर बैठकर उस लिफ़ाफ़े को देखने लगा जिस पर कंपनी का नाम बड़े फॉण्ट में लिखा था,‘ड्रीम्स ऑन द वे’.
जी रहा हूं उम्मीद है कि काफी अर्सा और जिऊंगा, ज़िंदगी काफी दिलचस्प लगती है










