उसे S.L.E (त्वचा रोग, जिससे प्रेग्नेंसी में खतरा रहता है) है. वो हंसकर कहती है,
'ऊपर वाले ने तमाम उम्र दवाओं के पैकेज के साथ भेजा है'पर चीज़ें उतनी आसान नहीं है जितना बाहर वालों को लगता है, उसकी बीमारी अपनी कैफ़ियत मुसलसल बदलती रहती है बावजूद तमाम दवाइयों के. इस बीमारी में उसे ताउम्र दवाई लेनी पड़ेगी. 'मेरी बीमारी भी मेरी तरह अनप्रेडिक्टबल है'. उसकी मुस्कराहट अब भी कायम है, ब्लड और यूरिन रिपोर्ट में डिस्टर्ब पैरामीटर हैं. मैंने उसे उदास कम ही देखा है. इस बीमारी में जब सर दर्द से फटा हो और रेशेस पूरी बॉडी पर हों. तब भी वो कहती है 'ऐसा लगता है न जैसे किसी ने सुर्खी पाउडर लगा लिया हो वो भी सस्ता वाला.' पल्स थेरेपी के दौरान जब दूसरे मरीज निढाल पड़े होते हैं, वो हॉस्पिटल के बिस्तर पर कहती, 'अगली पल्स सन्डे को मत रखिएगा, टीवी पर मेरा कुकरी शोज आता है.' मेरा रयूमटोलॉजिस्ट दोस्त मेरी ओर देखता! कुछ महीने बाद वो ऐलान करती है, 'डॉ साहब मुझे बेबी करना है और आपके दोस्त (रिउमेटोलॉजिस्ट) मना कर रहे हैं.'
'बड़ी मुश्किल से आप रिमीशन फेज में पहुंची हैं, थोड़ा सब्र कीजिए बीमारी बढ़ सकती है.' मैं समझाने की नाकामयाब कोशिशें करता हूं.*** 7 महीने की प्रेग्नेंसी में वो तमाम मुश्किलों से जूझती है फिर अचानक बी पी शूट अप! 'आपकी टीम में एक नया प्लेयर आया है' वो नेफ्रोलॉजिस्ट को देखकर कहती है. हमेशा सीरियस रहने वाला मेरा रिउमेटोलॉजिस्ट दोस्त बाहर निकालकर कहता है, 'कमाल है ये लड़की भी.' प्री टर्म डिलिवरी, बच्चा इनक्यूबेटर में. 21 दिन बाद गाइनोक्लॉजिस्ट मुझसे कहती है, अनुराग इसकी विल पॉवर में ही ऐंटीबॉडीज़ हैं, मुझे तो खामखां क्रेडिट मिल रहा है.' बच्चा भी सर्वाइव कर जाता है. लड़ने का हुनर उसकी रगों में जो है. *** पांच रोज पहले वो फिर क्लीनिक में दाखिल हुई है. 'आप अपनी टीम दोबारा असेम्बल कीजिए, मुझे फिर मां बनना है.' मैं उसके पति को देखता हूं, कम बोलने वाला वो शख्स कितनी शिद्दत से उसके साथ है न. मैं ऐसे कितने लोगों को जानता हूं जिन्होंने अपनी तंदरुस्त ज़िंदगी, शिकायतों में बेतरतीब सी गुजार दी है, बिना किसी ख़्वाब की ताबीर किए, बिना कोई नेकी खर्च किए. और ये दिसम्बर, अपनी कैफियत नहीं भूला, तजुर्बे ठंडी हथेली पर रख रहा है, जीने के हुनर सिखा रहा है.
दिसम्बर के नोट्स-2
"वो खूबसूरत थी और उसे इस बात का इल्म भी था, हर ख़ूबसूरत शख्स को होता है. हमारे कॉलेज की छुट्टी उसके कॉलेज से कुछ पहले होती थी, उस मोड़ पर उसके आने के वक़्त से कुछ देर पहले मैं वहां पहुंच जाता, वो जानती थी मैं वहां उस कोने में किसलिए खड़ा हूं. उस उम्र में इतनी तवज़्ज़ो अच्छी लगती है. वो इस तवज़्ज़ो को एक्नॉलेज करती और तिरछी आंखों से मुझे देखते, मुस्कराते हुए अपनी सहेलियों के साथ निकल जाती. कुछ आंखों पर काजल बहुत फबता है. उसकी आंखें उसके चेहरे में सबसे ज्यादा बोलती थीं, मैं उन आंखों के लिए 5 किलोमीटर साइकिल चलाकर रोज वो कोना पकड़ता. वो, चाय के घूंट भरता है. उसका यूं 'पॉज़' लेना मुझे खलता है. मैंने इस दौरान एक इमेजनरी स्केच खींच लिया है। फिर? 'उस रोज़ मैं थोड़ा पहले पहुंच गया था, मेरी साइकिल में पंक्चर भी था, मैं कोने से थोड़ा पहले पंक्चर वाले से पंक्चर लगवा रहा था. अचानक वो आती दिखी अपनी सहेलियों के साथ, उस रोज़ उनके ग्रुप में कोई एक लड़की और थी, जिसके पैरों में उतनी चुस्ती नहीं थी. वो एक हाथ से अपने एक पैर को दबाती फिर आगे कदम बढ़ाती. वो पीछे रह गई थी, ऐसा लगा जैसे वो उन्हें आवाज़ें दे रही थी कि वे अपने कदम थामें, पर आगे वाली लड़की जैसे सुन नहीं रही थी. मैं एक खम्भे की ओट में था. उस एक पॉइंट पर सड़क एक सी नहीं थी सो पीछे रह गई वाली लड़की जैसे बैलेंस संभाल नहीं पाई और गिर पड़ी. आगे वाली तीनों लड़कियां जोर से हंसीं, वो भी. उसने अपनी दोनों सहेलियों से कुछ कहा और उसके हंसते-हंसते मेरी और उसकी आंखें मिलीं. उस रोज़ पहली दफा उसकी आंखें मुझे खूबसूरत नहीं लगीं. उस दिन के बाद से मैं कभी उस मोड़ पर दोबारा नहीं गया. वो फिर कुछ सेकण्ड के लिए खामोश हो गया है. अपनी चाय का आखिरी घूंट भरता है. मेरी चाय भी ख़त्म हो गई है.'अजीब बात है न, फ़क़त एक सेकेंड में आदमी आपके दिल से उतर जाता है, फ़क़त एक सेकेंड में'. नहीं मालूम वो मुझसे पूछ रहा है के बता रहा है.मुझे सिगरेट की तलब लगी है. दिसंबर के पास कई तजुर्बे है....























