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अमेरिका में ट्रम्प अपनी ही पार्टी के लोगों को क्यों धमका रहे हैं?

अमेरिका के मिड-टर्म इलेक्शन की पूरी कहानी क्या है?

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अमेरिका के मिड-टर्म इलेक्शन की पूरी कहानी क्या है?

“क्या डोनाल्ड ट्रंप फिर से राष्ट्रपति बनेंगे?
क्या ट्रंप को अपनी ही पार्टी से ख़तरा होगा?
क्या मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन संकट में हैं?”

ऐसे तमाम सवालों का संभावित जवाब धीरे-धीरे खुल रहा है. अमेरिका में 08 नवंबर को कराए गए मिड-टर्म इलेक्शन का रिजल्ट आने लगा है. अमेरिका में हर दो बरस पर संसद के सदस्यों का चुनाव कराया जाता है. चूंकि इस बार का संसदीय चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में आया है. इसी वजह से इसे मिड-टर्म इलेक्शन या मध्यावधि चुनाव के नाम से जाना जाता है.

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तो, आज हम समझेंगे,

- अमेरिका के मिड-टर्म इलेक्शन की पूरी कहानी क्या है?
- और, संसद के चुनाव से राष्ट्रपति की कुर्सी पर क्या असर पड़ता है?

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अमेरिका की संसद को कांग्रेस कहते हैं.

कांग्रेस के दो सदन हैं.

> निचले सदन का नाम है - हाउस ऑफ़ रेप्रजेंटेटिव्स.

इसमें 435 सदस्य होते हैं. हर एक सदस्य का कार्यकाल दो बरस का होता है. ये पूरे अमेरिका से चुने जाते हैं. इन सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है.

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> ऊपरी सदन को कहते हैं - सेनेट.
अमेरिकी कांग्रेस 

इसके सदस्यों की संख्या 100 है. इनका कार्यकाल छह बरस का होता है. दो बरस में एक-तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो जाता है. इन सीटों पर हर दो साल में चुनाव कराया जाता है. अमेरिका में कुल 50 राज्य हैं. प्रत्येक राज्य से दो-दो सेनेटर्स चुने जाते हैं. सीटों के बंटवारे में जनसंख्या की कोई भूमिका नहीं होती. अब चुनाव पर आते हैं. इस बार के चुनाव में कितनी सीटों पर वोटिंग हुई है? हाउस ऑफ़ रेप्रजेंटेटिव्स की सभी 435 सीट.

सेनेट की 35 सीट. और, 36 राज्यों के गवर्नर.

आज हमारा फ़ोकस संसद की सीटों पर रहेगा. अमेरिका में संसद की शक्तियां क्या हैं?

- अमेरिका के संविधान में संसदीय व्यवस्था का ज़िक्र पहले अनुच्छेद में किया गया है.

- सरकार की सभी विधायी शक्तियां संसद में निहित हैं.

- संसद किसी भी ज़रूरी विषय पर कानून बना सकती है.

- युद्ध की घोषणा कर सकती है.

- राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्त किए गए लोगों पर मुहर लगा सकती है या इच्छा हो तो नकार भी सकती है.

- किसी बिल को कानून पास कराने के लिए दोनों सदनों का अप्रूवल ज़रूरी होता है. इसके बाद बिल को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. अगर राष्ट्रपति वीटो कर दे तो संसद के दोनों सदन दो-तिहाई बहुमत से वीटो को खारिज कर सकती है. इसके बाद राष्ट्रपति के दस्तखत की ज़रूरत नहीं होती.

- संसद सरकार के कामकाज के लिए सालाना बजट बनाने का काम भी करती है. अगर सरकार के खजाने में पर्याप्त पैसा ना हो, तो संसद ही कर्ज़ का अप्रूवल भी देती है.

- इसके अलावा, संसद के पास किसी के ख़िलाफ़ जांच बिठाने का अधिकार भी है.

अब एक-एक कर दोनों सदनों के बारे में जान लेते हैं.

पहले निचले सदन की बात. हाउस ऑफ़ रेप्रजेंटेटिव्स को ऐसे समझिए, जैसे भारत में लोकसभा. हालांकि, दोनों में कई अंतर है. अमेरिका में निचले सदन में बहुमत दल का नेता सरकार का मुखिया नहीं होता. वहां की लोकसभा के सदस्यों का कार्यकाल पांच की बजाय दो बरस का होता है.

कौन निचले सदन का सदस्य बन सकता है?

- उम्र 25 साल या उससे ऊपर हो.
- कम से कम सात साल से अमेरिका का नागरिक हो.
- अमेरिका के किसी राज्य का निवासी हो.

निचले सदन के पास क्या शक्तियां हैं?

- राजस्व से जुड़े बिल निचले सदन में पेश किए जाते हैं.
- निचला सदन केंद्र के अधिकारियों पर महाभियोग चला सकता है.
- अगर राष्ट्रपति चुनाव में इलेक्टोरल कोलाज टाई हो जाए, तब राष्ट्रपति चुनने की ज़िम्मेदारी भी निचले सदन के पास ही आती है.

अब ऊपरी सदन यानी सेनेट की बात.

सेनेट भारत की राज्यसभा की तरह है. दोनों में कई समानताएं हैं. मसलन, दोनों सदनों के सदस्यों का कार्यकाल छह बरस का होता है. दोनों के एक-तिहाई सदस्य दो साल पर रिटायर हो जाते हैं. एक बेसिक अंतर ये है कि अमेरिका में सेनेट के सदस्य डायरेक्ट लोगों के वोट से चुने जाते हैं. जबकि राज्यसभा के सदस्य विधायकों के वोट से.

सेनेट का सदस्य कौन बन सकता है?

- उम्र 30 या उससे ऊपर की हो.
- कम से कम नौ साल से अमेरिका के नागरिक हों.
- और, जिस राज्य से चुनाव लड़ रहें हों, वहां के निवासी भी हों.

सेनेट की शक्तियां क्या हैं?
- अमेरिका के उप-राष्ट्रपति सेनेट के अध्यक्ष होते हैं.
- सेनेट दो-तिहाई वोटों से किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते में बदलाव कर सकती है.
- कैबिनेट मंत्री, राजदूत, सुप्रीम कोर्ट के जजों आदि की नियुक्ति के लिए भी सेनेट की हामी ज़रूरी है.
- महाभियोग के मामले में अंतिम राय सेनेट की ही होती है.

अमेरिकी सेनेट 

इसलिए, भले ही राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता करती हो, लेकिन उन्हें कानून बनाने, कोई नियुक्ति करने, युद्ध की घोषणा करने, अंतरराष्ट्रीय समझौते पर मुहर लगवाने जैसे अहम कामों के लिए संसद की शरण में ही जाना होता है. अगर किसी राष्ट्रपति की पार्टी संसद में कमज़ोर हो तो वो उसके सामने अनगिनत रुकावटें आएंगी. वो बस कागज़ पर ही सरकार का मुखिया बनकर रह जाएगा.

इस बार के मिड-टर्म में क्या कुछ दांव पर लगा है?
चार बड़े मुद्दे हैं.
- नंबर एक, अबॉर्शन का अधिकार.
जुलाई 2022 में अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने ऐतिहासिक रो बनाम वेड का फ़ैसला पलट दिया था. इसके बाद अबॉर्शन के संबंध में कानून बनाने का अधिकार राज्यों के पास चला गया. इससे पहले अमेरिका की सभी महिलाओं को अबॉर्शन का संवैधानिक अधिकार मिला हुआ था.
अमेरिका में दो प्रमुख पार्टियां हैं.
डेमोक्रेटिक पार्टी. जिसके नेता जो बाइडन अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति हैं.
डेमोक्रेटिक पार्टी को उदार और लोकतांत्रिक माना जाता है. ये पार्टी अबॉर्शन राइट्स के पक्ष में है.

दूसरी है, रिपब्लिकन पार्टी. ये डोनाल्ड ट्रंप वाली पार्टी है.
इसको रुढ़िवादी और कट्टर माना जाता है. ये पार्टी अबॉर्शन राइट्स का विरोध करती है.

तो, जिन राज्यों में जिस पार्टी के गवर्नर जीतेंगे, वे अपनी पार्टी की विचारधारा के अनुसार कानून बनाएंगे. अबॉर्शन अधिकारों को लेकर अमेरिका में लंबे समय तक प्रोटेस्ट भी चला. ये मुद्दा लाखों अमेरिकी महिलाओं को प्रभावित करता है.

इसके अलावा, गन कल्चर, हेल्थकेयर, क्लाइमेट चेंज, धार्मिक अधिकारों जैसे मसलों का भविष्य भी इस चुनाव पर टिका है.

- नंबर दो, जो बाइडन का पोलिटिकल कैरियर.
मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन जिन वादों के साथ सत्ता में आए थे, वो उनपर खरे नहीं उतर सके हैं. महंगाई और अर्थव्यवस्था के मुद्दे पर भी उनकी सरकार असफ़ल रही है. पिछले एक साल में बाइडन की अप्रूवल रेटिंग घटी है. रूस-यूक्रेन युद्ध और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मसलों पर बाइडन उतने प्रभावशाली नहीं दिखे. जानकार बताते हैं कि अगर इस मिड-टर्म में डेमोक्रेटिक पार्टी को ठीक-ठाक सफ़लता नहीं मिली तो, उनकी पार्टी नए लीडर को सामने ला सकती है.

- नंबर तीन, डोनाल्ड ट्रंप की वापसी.
पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप अपनी दावेदारी फिर से ठोक रहे हैं. उन्होंने 2024 का राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है. ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी में अच्छी-खासी दखल रखते हैं. मीडिया रपटों के अनुसार, उनके कहने पर पार्टी ने कई उम्मीदवारों को सेनेट इलेक्शन में खड़ा किया. मिड-टर्म का रिजल्ट ट्रंप के प्रभाव को भी निर्धारित करेगा. अगर उनकी पार्टी संसद में बहुमत के पार गई या उन्होंने पिछले चुनाव से बेहतर प्रदर्शन किया तो ट्रंप की दावेदारी पक्की हो सकती है.

हालांकि, एक चर्चा ये भी है कि अभी से ही उनकी दावेदारी को बड़ी चुनौती मिल रही है. इस चुनौती का नाम है - रॉन डिसेंटिज. रॉन फ़्लॉरिडा के गवर्नर हैं. उन्होंने इस बार का चुनाव भी जीत लिया है. पिछले कुछ समय से रॉन को रिपब्लिकन पार्टी का प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट बताया जा रहा है. मिड-टर्म में उनकी जीत उनके दावे को मज़बूत करेगी.
इससे पहले ट्रंप, रॉन को चुनाव में ना खड़े होने के लिए कह चुके हैं. उन्होंने चेतावनी के लहजे में कहा था,
‘मुझे लगता है कि वो बड़ी ग़लती कर रहा है. पार्टी का कोर वोटर उसे पसंद नहीं करता है. अगर वो चुनाव में खड़ा हुआ तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.’

ट्रंप ने ये भी कहा था कि वो रॉन की कुछ सीक्रेट जानकारियां रिलीज़ करने वाले हैं. हालांकि, उन्होंने इसके बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं दी. ट्रंप पार्टी या पार्टी से बाहर के अपने विरोधियों को धमकाने के लिए कुख्यात रहे हैं. लेकिन रॉन के मामले में उनकी दाल गलने की बहुत संभावना नहीं है.

रॉन डिसेंटिज महज 44 साल के हैं. रिपब्लिकन पार्टी का एक धड़ा उन्हें खासा पसंद भी करता है. वो ट्रंप की तुलना में गंभीर और विचारधारा के कट्टर समर्थक माने जाते हैं. अभी तक उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा नहीं की है. लेकिन बहुत संभावना है कि वो ट्रंप की वापसी रोक सकते हैं.

- नंबर चार, बदले की जांच.
2020 के संसदीय चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी ने निचले सदन में बहुमत हासिल किया था. जबकि सेनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास ज़्यादा सीटें आईं. इसी वजह से संसद का फ़ोकस कैपिटल हिल के दंगों की जांच पर रहा. रिपब्लिकन पार्टी इस जांच कमिटी पर ताला लगाना चाहती है. उनका फ़ोकस जो बाइडन के बेटे हंटर बाइडन के चाइना कनेक्शन पर है. इसके अलावा, रिपब्लिकन पार्टी बाइडन की विदेश-नीति को भी रिव्यू करना चाहती है. इसके लिए उन्हें दोनों सदनों में बहुमत चाहिए. जैसा कि पोल्स में दावा किया जा रहा है, रिपब्लिकन पार्टी मिड-टर्म में जीत दर्ज कर रही है. अगर पोल्स सही साबित हुए तो बाइडन की राह मुश्किल होनी तय है.

अभी तक क्या पता चला है?
जिस समय ये शूट चल रहा है, वोटों की गिनती जारी है.
हाउस ऑफ़ रेप्रजेंटेटिव्स की 435 में से 371 सीटों के रुझान आ चुके हैं.
रिपब्लिकन पार्टी ने 199 सीटों पर बढ़त बनाई हुई है. डेमोक्रेट्स के खाते में 172 सीटें गईं है.

सेनेट की 35 सीटों पर चुनाव हुआ था. शुरुआती रुझान के मुताबिक, पहले वाली सीटों को मिलाकर 95 सीटों का रुझान साफ हो चुका है. रिपब्लिकन पार्टी 47 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. डेमोक्रेट्स के पास 48 सीटें गईं है. यानी, यहां पर डेमोक्रेट्स बढ़त में हैं. लेकिन जब तक अंतिम परिणाम नहीं आ जाता, तब तक कोई भी भविष्यवाणी सही नहीं होगी.

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