अंकिता जैन. जशपुर छतीसगढ़ की रहने वाली हैं. पढ़ाई की इंजीनियरिंग की. विप्रो इंफोटेक में छह महीने काम किया. सीडैक, पुणे में बतौर रिसर्च एसोसिएट एक साल रहीं. साल 2012 में भोपाल के एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में असिस्टेंट प्रोफेसर रहीं. मगर दिलचस्पी रही क्रिएटिव राइटिंग में. जबर लिखती हैं. इंजीनियरिंग वाली नौकरी छोड़ी. 2015 में एक नॉवेल लिखा. ‘द लास्ट कर्मा.’ रेडियो, एफएम के लिए भी लिखती हैं. शादी हुई और अब वो प्रेग्नेंट हैं. ‘द लल्लनटॉप’ के साथ वो शेयर कर रही हैं प्रेग्नेंसी का दौर. वो बता रही हैं, क्या होता है जब एक लड़की मां बनती है. पढ़िए
13वीं किश्त.
मां बनने की खबर पूरे घर को खुशियों से भर देती है. कभी-कभी मां बन रही लड़की को भी ये यकीन कर पाना मुश्किल से लगता है कि वो वाक़ई दुनिया का सबसे अजूबा जादुई काम कर रही है. आपके अन्दर एक नहीं बल्कि दो दिल धड़क रहे हैं. ये अहसास होते ही शरीर रोमांचित हो उठता है. लेकिन
इन सारी खुशियों के अलावा प्रेगनेंसी की पहली तिमाही 70 प्रतिशत से भी अधिक महिलाओं के लिए बहुत कठिन दौर होता है. शुरू के तीन महीने बहुत मुश्किल से कटते हैं. तब लगता है कि जब तीन महीने इतने कठिन हैं तो नौ कैसे कटेंगे? ये सवाल अंदर से डरा देता है. सुबह आने वाले चक्कर, जान निकाल देने वाली उल्टियां, बदलता मूड, तेज होती नाक, सीने में होने वाला दर्द ये तो कुछ कॉमन सी बातें हैं लेकिन इनके अलावा भी कई महिलाएं कई अलग-अलग तरह की तकलीफों से गुज़रती हैं. मैं भी गुज़री थी. आपने मेरे पुराने आर्टिकल्स में पढ़ा भी होगा.
“शुरू के तीन महीने प्रेगनेंसी के लिए सबसे ज्यादा रिस्की होते हैं, अभी तुम किसी को मत बताना” ये बात हम आम-तौर पर सुनते भी हैं. और मुझे मेरी डॉक्टर ने भी ये बात कही थी. किसी मिथ के चलते नहीं बल्कि पहली तिमाही की मुश्किलात को देखते हुए. पहली तिमाही में पेट भी नहीं बढ़ता इसलिए ये बात आसानी से छुपाई भी जा सकती है. वो पहली तिमाही ही होती जब प्रेगनेंसी अबॉर्ट होने के सबसे ज्यादा चांसेस रहते हैं. लेकिन एक बार शुरू के तीन महीने बीतने के बाद दूसरी तिमाही लगते ही शुरू होता है प्रेगनेंसी का हनीमून पीरियड.
हालांकि जैसे सभी अपने हनीमून पर स्विट्ज़रलैंड नहीं जा पाते वैसे भी प्रेगनेंसी की दूसरी तिमाही भी सभी के लिए आसान हो यह ज़रूरी नहीं है. लेकिन डॉक्टर्स के मुताबिक 60 से 70 प्रतिशत केस में पहली तिमाही का मुश्किल दौर दूसरी तिमाही तक आते-आते आसान हो जाता है. जैसे उल्टियां होना कम या बंद हो जाती हैं. स्मेल सेंस भी कंट्रोल होने लगता है. मॉर्निंग सिकनेस भी लगभग गायब हो जाती है. और ब्रेस्ट टेंडरिंग भी चली जाती है.
ऐसा नहीं है कि दूसरी तिमाही में ये सब मुश्किलें कम हो जाती हैं या दूसरी मुश्किलें या शारीरिक बदलाव नहीं होते. होते हैं. लेकिन शायद वो पहली तिमाही से कम मुश्किल होते हैं. थकान, बार-बार बाथरूम जाना, कब्ज, छाती में जलन, कभी-कभी सर दर्द होना, भूलने लगना, रोने का मन करना ये सब तो होता है लेकिन इसके साथ जब आपको अन्दर से पहले की अपेक्षा अधिक उर्जा महसूस होने लगे. पांचवा महीना आते ही बेबी-बंप की हल्की सी झलक दिखने लगे तो बाकी मुश्किलें आसान हो जाती हैं.
वैसे दो विशेष कारणों से भी दूसरी तिमाही को हनीमून पीरियड कहा जाता है.
1. पहला कि दूसरी तिमाही में ही बन रही मां पहली बार अपने बच्चे की हलचल महसूस करती है. तब मेरा पांचवा महीना लगा था. नहाने के बाद हर रोज़ पेट को देखना और सोचना कि क्या ये कल से थोड़ा बढ़ा है ख़ुद को भी कभी-कभी मूर्खतापूर्ण लगता है. लेकिन मेरा बच्चा बढ़ रहा है या नहीं. वो ठीक है या नहीं. नॉर्मल है या नहीं. मुझे उसकी हलचल कब महसूस होगी इसकी उत्सुकता हर वक़्त आपका ध्यान आपके पेट पर लगाये रहती है. उस दिन मैं हर रोज़ की ही तरह दोपहर में आराम कर रही थी जब मुझे पहली बार अपने पेट में कुछ महसूस हुआ. पहली बार जब हलचल महसूस होती है तो वह वाक़ई में हलचल ही है या गैस इसमें फर्क करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. लेकिन फिर जब मैंने इन्टरनेट पर इसके बारे में पढ़ा तो मालूम हुआ कि हां जो मैंने महसूस किया वो वाक़ई मेरे बच्चे की हलचल थी. वो एक लम्हा बहुत ख़ास था और ख़ास है. पहली बार अपने भीतर एक जीते-जागते इंसान को हरकत करते हुए महसूस करना, ये अहसास सिर्फ महसूस किया जा सकता है इसे बताया नहीं जा सकता. जब मैंने अपने पति को इस बारे में बताया तो उन्हें यकीन नहीं हुआ. बहुत देर तक वो मेरे पेट पर हाथ रखकर उसे महसूस करने की कोशिश करते रहे. लेकिन अभी उन तक उनके बच्चे की आवाज़ पहुंचने में शायद थोड़ी देरी थी. उसके बाद मैं बस हर वक़्त अपने अन्दर होने वाली हलचल का इंतज़ार करती रहती. मेरा एक हाथ बार-बार पेट पर जाता कि कहीं से कोई आहट मिल जाए लेकिन शुरू में बच्चा उतनी तेज़ और ज्यादा हरकतें नहीं करता है. हफ्ते बढ़ने के साथ-साथ उसकी हरकतें बढ़ीं और फिर वो दिन भी आया जब ना सिर्फ मैं बल्कि मेरे पति भी मेरे पेट पर हाथ-रखकर अपने बच्चे को महसूस कर सकते थे. पहली बार बन रहे मां-बाप के लिए वो लम्हा किसी अजूबे या जादू से कम नहीं होता. दूसरी तिमाही में ही बच्चे की सुनने की क्षमता विकसित होती है. जिससे आप उसे बेहतरीन गाने या बातें करके भी महसूस कर सकते हैं. 2. दूसरी तिमाही को हनीमून पीरियड कहने का दूसरा कारण है. पति-पत्नी अपने दाम्पत्य जीवन यानी सेक्स लाइफ में वापस लौट सकते हैं. लेकिन यह पूरी तरह आपकी मेडिकल सिचुएशन पर डिपेंड करता है. जिनकी प्रेगनेंसी पूरी तरह से सामान्य और बिना किसी कॉम्प्लीकेशन के तीन महीने बिता चुकी है उनके लिए सेक्स लाइफ में वापस लौटना मुमकिन होता है. और जो मुश्किल समय से गुजरें हैं उनके लिए डॉक्टर्स पूरे नौ महीने ब्रह्मचर्य से रहने की सलाह देते हैं. सामान्य स्थिति में शुरू के तीन और आखिरी के दो महीने सेक्स के लिए पूरी तरह से मनाही होती है. और असामान्य स्थिति में जैसा डॉक्टर कह दे.
हालांकि दूसरी तिमाही में कुछ ज़रूरी सावधानियों का ध्यान भी रखना पड़ता है. जैसे आपके सोने की सिचुएशन बदलती है. बेहतर होगा कि आप पीठ के बल नहीं बल्कि अपनी बाईं करवट से सोना शुरू कर दें. जो आपके बच्चे तक अच्छे से ब्लड फ्लो बनाए रखता है. अगर आपने एक्सरसाइज शुरू की है तो बिना डॉक्टर की सलाह के शुरू ना करें. इसके अलावा गर्मी लगना, सिर चकराना, पीठ का दर्द, आपकी त्वचा में आने वाला परिवर्तन, आपका बढ़ता वजन, ज्यादा भूख लगना, स्ट्रेच मार्कस दिखना, ठीक से नींद न आ पाना, पैरों में ऐंठन, हाथ में दर्द आदि-आदि. ये सब दूसरी तिमाही से चिपके भले रहेंगे लेकिन यकीन मानिये, जब किसी लम्हे में अन्दर से आपका बच्चा अपना हाथ या पैर चलाकर आपको अपने होने का अहसास दिलाएगा तो दूसरी तिमाही की छोटी-छोटी समस्याएं अपने आप फीकी पढ़ जाएंगी. तो चलिए फिर मनाइए अपनी प्रेगनेंसी का हनीमून. मैं फिर अगले हफ्ते आती हूं. कुछ और बातें लेकर.
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