कोविशील्ड और कोवैक्सीन, दोनों वैक्सीन को इमरजेंसी इस्तेमाल की अनुमति मिली है. फोटो- आजतक
सालभर से कोरोना वैक्सीन का पूरी दुनिया को इंतजार था. पूरा पिछला साल वैक्सीन के इंतजार में गुजरा. वो इंतजार जिसमें काश लगाकर ये कहते हैं कि अगर वैक्सीन होती ये इतनी जानें नहीं जातीं, लॉकडाउन नहीं लगाना पड़ता. अब वैक्सीनेशन यानी टीकाकरण दुनिया के कई देशों के साथ-साथ भारत में भी शुरू हो रहा है. खुशी हो रही है. लेकिन टीकाकरण पर बड़ा विवाद भी हो रहा है. प्रधानमंत्री देश को दो-दो वैक्सीन आने पर बधाई दे रहे हैं. कांग्रेस वाले कह रहे हैं कि वैक्सीन की अनुमति जल्दबाज़ी में दी गई, ख़तरनाक है ये. कोई नेता कह रहा है कि पहले प्रधानमंत्री वैक्सीन लगवाकर कर दिखाएं कि ज़हर नहीं है, दवा ही है. कोई कह रहा है कि वैक्सीन से नपुंसक हो जाएंगे. कोई नेता कह रहा है कि बीजेपी सरकार ने वैक्सीन बनवाई है तो हम नहीं लगवाएंगे. जिसे जो ठीक लग रहा है, वो कह दे रहा है. लेकिन किसकी बातें मौलिकता की श्रेणी में आएंगी और किसकी बातें मूर्खतापूर्ण मानी जाएंगी. हम इसमें नहीं जाते. हम वैक्सीन वाले विवाद पर ही विस्तार से बात करेंगे.
किन वैक्सीन को मिली है मंजूरी?
प्रधानमंत्री दो वैक्सीन की बधाई दे रहे हैं. एक का नाम कोविशिल्ड और दूसरी का नाम कोवैक्सीन. इन दोनों को ही भारत में यूज़ की मंजूरी मिल गई है. यूज़ नहीं, इमरजेंसी यूज़ की मंजूरी. शब्दावली पर थोड़ा गौर करिए. कोविशील्ड वही वैक्सीन है, जिसे ब्रिटेन में ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका कंपनी ने मिलकर बनाया है. कोरोना का दुनिया में सबसे पहला टीकाकारण ब्रिटेन ने इसी वैक्सीन से शुरू किया. अब ब्रिटेन का नेशनल हेल्थ सर्विस टीकाकरण बड़े स्तर पर शुरू कर चुका है. जब ब्रिटेन में ये वैक्सीन तैयार की जा रही थी तो भारत में पुणे के सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने इनके साथ कलैबरेशन किया. सीरम इंस्टिट्यूट टीके तैयार करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल है. ये प्राइवेट है तो सरकार से कोई सीधा वास्ता नहीं है. तो ऑक्सफॉर्ड वाली वैक्सीन का सीरम इंस्टिट्यूट ने भारत में नाम रखा कोविशील्ड. कोविशील्ड को इमरजेंसी यूज़ के लिए 3 जनवरी को ऑथराइजेशन मिल गया. देश में दवाइयों का रेगुलेटर है- Drug Controller General of India. इसने रविवार को ऐलान किया कि हमारे Central Drugs Standard Control Organisation यानी CDSCO ने सीरम इंस्टिट्यूट और भारत बायोटेक इन दोनों कंपनियों की वैक्सीन को सीमित इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है. यानी कुछ शर्तों के साथ टीकाकरण अब भारत में हो सकता है. इसके बाद सीरम इंस्टिट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने बताया कि उनकी कंपनी वैक्सीन के पहले 10 करोड़ डोज़ भारत सरकार को बेचेगी, वो भी खास क़ीमत पर. कितनी कीमत होगी, 200 रुपये की एक डोज़. 10 करोड़ डोज़ के बाद कीमत बढ़ाई जाएगी. पूनावाला ने ये भी कहा कि जैसे ही भारत सरकार से करार हो जाएगा 10 दिन में सरकार देश के जिस भी राज्य में वैक्सीन मांगेगी, हम पहुंचा देंगे. अभी सीरम इंस्टिट्यूट के पास 8 करोड़ डोज़ तैयार हैं. बाकी का प्रोडक्शन जारी है. सरकार के अलावा अगर कोई प्राइवेट कंपनी वैक्सीन का डोज़ खरीदेगी तो उसे 1000 रुपये डोज़ के हिसाब से बेचा जाएगा, ये बात भी अदार पूनावाला ने बताई. हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा था कि फर्स्ट फेज़ में फ्री वैक्सीन दी जाएगी, प्राथमिकता मिलेगी- 1 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों को, 2 करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर्स को. उसके बाद 27 करोड़ और लोगों को जुलाई तक वैक्सीन देने के लिए प्राथमिकता में रखा जाएगा.
कोवैक्सीन पर उठ रहे सवाल
अब ये तो बात हुई कोविशील्ड की. दूसरी वैक्सीन की बात करते हैं जो पूरी तरह से देसी है. नाम है कोवैक्सीन. इसे Indian Council of Medical research और हैदराबाद की कंपनी भारत बायोटेक ने मिलकर बनाया है. यानी सरकारी एजेंसी और एक प्राइवेट कंपनी ने मिलकर ये वैक्सीन तैयार की है. इस वैक्सीन को भी Drug Controller General of India ने सीमित इस्तेमाल की मंजूरी दे दी है. और इसी पर विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने हंगामा बरपा दिया है. क्यों ये विवाद हो रहा है- परत दर परत गहराई में जाकर समझते हैं. पहला विवाद तो Drug Controller General of India वीजी सोमानी के बयान को लेकर है. क्या कहा उन्होंने? उन्होंने कहा था कि
'वैक्सीन 110 पर्सेंट सेफ हैं. कोविशील्ड 70 फीसदी असरदायी है और कोवैक्सीन पूरी सेफ है.'
आप सोच रहे होंगे इसमें विवाद वाली बात क्या है. सोशल मीडिया के गुणीजन कह रहे हैं कि ड्रग कंट्रोलर जनरल उस वैक्सीन को 110 फीसदी सेफ कैसे कह सकते है जिसके ट्रायल के रिजल्ट भी उपलब्ध नहीं हैं. इसी बात को पकड़ते हुए कांग्रेस के बड़े नेता कह रहे हैं कि सरकार जो कर रही है, वो ख़तरनाक है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ट्वीट किया कि “कोवैक्सीन का अभी तीसरे चरण का ट्रायल पूरा नहीं हुआ. इसे जल्दी इजाज़त दे दी, जो खतरनाक हो सकता है. स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को इस पर सफाई देनी चाहिए.” हर्षवर्धन ने जवाब में कहा कि वैज्ञानिक प्रोटोकॉल पर इस तरह से राजनीति करना अनैतिक है.
आरोपों में क्या कुछ सच्चाई है भी?
लेकिन क्या शशि थरूर जैसे कांग्रेस के नेता जो बात उठा रहे हैं, वो सही है. हां कुछ सच्चाई तो है. भारत बायोटेक वाली कोवैक्सीन के तीसरे चरण का ट्रायल अभी चल रहा है. ट्रायल के नतीजे नहीं आए हैं. तो जैसे हम सीरम इंस्टिट्यूट वाली कोवैक्सीन के लिए कह सकते हैं कि ये 70 फीसदी असरदायी है, वो बात कोवैक्सीन के लिए नहीं कह सकते, क्योंकि हमारे पास थर्ड ट्रायल का डेटा ही नहीं है. मतलब ये कि वैक्सीन को सीमित इस्तेमाल के लिए जो परमिशन दी गई है, उसमें जल्दबाज़ी दिखाई देती है. लेकिन परमिशन देने वाले Drug Controller General ने कहा है कि हमने जांच लिया है, वैक्सीन सेफ है. और परमिशन इम्यूनोजेनिसिटी के आधार पर दी है. क्या होता है ये? वैक्सीन से शरीर में बीमारी के खिलाफ प्रतिरोधकता बढ़ाने की क्षमता. भारत बायोटेक के डॉ. कृष्ण ऐला ने भी कहा-
वैक्सीन पूरी तरह से सेफ है. वैक्सीन पर राजनीति हो रही है इसलिए बता देता हूं कि हम भारत में ही नहीं यूके समेत 12 देशों में इस वैक्सीन का ट्रायल कर रहे हैं... हम वैक्सीन बनाने के पुराने और मंझे हुए खिलाड़ी हैं, 123 देश हमारी बनाई वैक्सीन खरीदते हैं.
ये वाली वैक्सीन सिर्फ बैकअप के लिए है
अब इसके दूसरे पहलू पर आते हैं. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में ICMR के डायरेक्टर डॉ बलराम भार्गव और AIIMS के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया का बयान छपा है. इनका कहना है कि भारत बायोटेक वाली कोवैक्सीन को इमरजेंसी यूज़ की मंजूरी तो मिल गई है, लेकिन हम इसका इस्तेमाल वैसे नहीं करेंगे, जैसा सीरम इंस्टिट्यूट वाली वैक्सीन का होगा. क्या मतलब है? मतलब ये कि ये वैक्सीन बैकअप के लिए रखी जाएगी. और मान लो कि बहुत ज्यादा वैक्सीन की जरूरत एकसाथ पड़ जाए, या ब्रिटेन वाले कोरोना के नए वैरिएंट से हालात बेकाबू हो जाएं तो फिर कोवैक्सीन का यूज़ किया जाएगा. पहला यूज तो सीरम इंस्टिट्यूट वाली कोविशील्ड का ही होगा. कोवैक्सीन को अगले महीने जब ट्रायल के नतीजे आ जाएंगे, उसके बाद ही नॉर्मली यूज़ किया जाएगा. यानी ICMR और AIIMS मान रहे हैं कि कोवैक्सीन सेफ़ तो है लेकिन कितनी असरदार है, ये हमें अभी इसलिए नहीं पता क्योंकि तीसरे ट्रायल के नतीजे नहीं आए हैं. और इसे एक्ट्राऑर्डिनरी सिचुएशन के आधार पर मंजूरी दी गई है. यहां तक वैक्सीन पर एक सेंसिबल डिबेट है. वैज्ञानिक आधार पर डिबेट होनी भी चाहिए. हम एक लोकतांत्रिक देश में हैं. अब इस वैक्सीन पर लिखे जा रहे मूर्खता-शास्त्र की बात करते हैं. ऐसे मूर्खतापूर्ण बयान आ रहे हैं, जिनमें नेता कह रहे हैं कि ये वैक्सीन लगा ली तो नपुंसक हो जाएंगें. इन नेताओं का नाम लें, उससे पहले एक छोटी सी कहानी.
पाकिस्तान, बांग्लादेश से सबक लें
हमारे बगल में एक देश है पाकिस्तान और एक अफगानिस्तान. जब दुनिया के हर देश में पोलियो की वैक्सीन दी जा रही थी तो इन देशों के कुछ धार्मिक नेता, कुछ राजनेता पोलियो की दवा का विरोध कर रहे थे. पोलियो वैक्सीन को गैर-इस्लामिक या नपुंसक बनाने वाली दवा बताने की तकरीरें करते थे. उस वक्त इन देशों के पड़ोस में यानी भारत में एक-एक बच्चे को खोजकर दो बूंद ज़िदंगी की पिलाई जा रही थी. जबकि पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पोलियो की दवा पिलाने वालों पर हमले करवाए जा रहे थे. नतीजा आज हम सबके सामने है. भारत पोलियो मुक्त देश हो गया है, और पाकिस्तान और अफगानिस्तान आज भी वहीं खड़े हैं. विज्ञान का विकल्प जाहिलियत नहीं है. जाहिलियत का विकल्प विज्ञान है. कोरोना वैक्सीन को लेकर भी भारत में अब ऐसे ही मूर्खतापूर्ण बयान आ रहे हैं. शुरुआत की यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने. कहा कि भाजपा की वैक्सीन नहीं लगवायेंगे. 'हम बीजेपी की वैक्सीन पर भरोसा नहीं करेंगे.' ये बयान सत्तासीन किसी राजनैतिक पार्टी के विरोध के बजाय उन वैज्ञानिकों की मेहनत का अपमान है, जिन्होंने रात-दिन एक करके हमारे लिए वैक्सीन तैयार की. वैक्सीन किसी पार्टी की नहीं है. किसी पार्टी दफ्तर में तैयार नहीं हुई है. वैज्ञानिकों की बनाई लैब में तैयार हुई है. महीनों तक ट्रायल चले हैं. उनकी मेहनत पर इस तरह की ओछी बयानबाज़ी की ज़रूर निंदा होनी चाहिए. और निंदा इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि ये जनता को गुमराह करने वाला बयान है. अखिलेश यादव सूबे के मुख्यमंत्री रहे हैं, एक पार्टी के अध्यक्ष हैं, सांसद हैं. उनके लाखों में समर्थक होंगे जो उनकी बात पर भरोसा करते हैं. ऐसा कहकर उन्होंने समर्थकों की जान की कीमत हल्के में आंकी है. अखिलेश यादव की बात पार्टी में उनके जियालों तक पहुंची तो और बिगड़ गई. समाजवादी पार्टी के मिर्ज़ापुर से एमएलसी आशुतोष सिन्हा ने कहा कि- अखिलेश जी वैक्सीन नहीं लगवा रहे तो जरूर कुछ गड़बड़ है. कल को लोग कह देंगे ये वैक्सीन तो आबादी कम करने के लिए लगाई गई है, हो सकता है ये आपको नपुंसक भी बना दे. ये विशुद्ध तौर पर अफवाह फैलाने की कोशिश समझी जानी चाहिए. और अज्ञानतावश ऐसा हुआ है तो जरूरी ये है कि ये कुछ पढ़-लिखकर, सोझ समझकर नेता बोलें. और आपत्ति इस बात को लेकर भी है कि नपुंसकता को भी गाली के तौर पर क्यों इस्तेमाल किया जाना चाहिए? जो लोग नपुंसक हैं, वो भी इंसान हैं. और उतने ही इंसान हैं जिनते हम लोग. उनके प्रति ये हीनभावना या इस तरह की सोच कोरोना से भी खतरनाक बीमारी है. इलाज इसका भी जरूरी है. ऐसा नेताओं और ऐसे बयानों से खुद को दूर रखिए, जिनकी सोच में गड़बड़ हो, जो पीछे ले जाने की बात करें, जो आपको विज्ञान से दूर ले जाना चाहते हैं. आंख बंद करके किसी की बातों पर भरोसा मत करिए.