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एक रेप केस में कोई कोर्ट इससे वाहियात दलीलें नहीं दे सकता

अंधे बाप को बरी किया, ठीक है. लेकिन उन दलीलों का क्या.

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दिल्ली में 18 साल की लड़की ने अपने 55 साल के अंधे बाप पर रेप का आरोप लगाया. लेकिन कोर्ट ने ये कहते हुए बाप को बरी कर दिया कि वो तो अंधा है, रेप कैसे करेगा.
सुनो पहले पूरा मामला. इस लड़की के मुताबिक इसका बाप तुलसीदास महतो बचपन में नहलाते हुए उसका रेप करता था. सिर्फ नहलाते समत ही नहीं, सोते समय भी उसकी वेजाइना में उंगली डालता था.

लड़की ने बताया:

'मेरे मम्मी और पापा का डिवोर्स हो गया था. मैं और मेरा भाई पापा के साथ रहते थे. पापा ने मुझे और भाई को बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया. और हम जब भी छुट्टियों में वापस आते, मेरा बाप मेरा रेप करता था.
पहले मुझे समझ में नहीं आता था कि क्या हो रहा है. जब बड़े होने के बाद सेक्स एजुकेशन मिली, तब मालूम पड़ा कि मेरा रेप होता था. बहुत सालों तक मैंने किसी से कुछ नहीं कहा क्योंकि मुझे नहीं पता था कि अपने ही बाप पर FIR करने पर लोग मुझे कैसे देखेंगे.'
लेकिन दिल्ली कोर्ट ने तुलसीदास महतो को बरी कर दिया है.

सुनिए कोर्ट ने क्या कहा:

1.एक अंधा आदमी किसी को नहला नहीं सकता.
2. अंधा आदमी किसी को नहला भी दे, तो उसकी जांघों के बीच पीनिस नहीं डाल सकता.
3. अगर उसने ऐसा किया भी, तो लड़की के पास पर्याप्त मौका था इस बात को किसी दोस्त या रिश्तेदार को बताने का.
4. लड़की की तलाकशुदा मां जिंदा थी. लड़की ये बात उन्हें बता सकती थी.
5. दिल्ली में 100 नंबर डायल कर पुलिस को बुलाया जा सकता है. लड़की चाहती तो पुलिस को बुला सकती थी.
6. लड़की पढ़ी-लिखी थी. तो इतने साल चुप क्यों रही.

रेप के आरोप से कोई भी बरी हो सकता है, लेकिन सच कहें तो कोर्ट की एक भी दलील सही नहीं लगती.

पहली बात, अगर कोई आदमी अंधा है, तो क्या वो अपने बच्चे को नहीं नहला सकता? अपने सामने खड़े एक बच्चे के प्राइवेट पार्ट छूने में आंखों की जरूरत कैसे हो सकती है. किसी के अंग तो आप बिना देखे ही महसूस कर सकते हैं, है न?
दूसरी बात, चाइल्ड सेक्शुअल हैरेसमेंट इसीलिए इतना घिनौना होता है, क्योंकि जिस बच्चे को आप हैरेस करते हैं, उसको मालूम ही नहीं होता कि ये हैरेसमेंट है. उसे बस इतना पता होता है कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है. बच्चा डिप्रेस हो जाता है, अकेले रोता है. पर डर के मारे किसी से कुछ कहता नहीं.
तीसरी बात, मुमकिन है कि उस लड़की का कोई दोस्त न हो. या घर से दूर रहने वाली मां से बात कर पाने का कोई जरिया न हो. और जैसा कि उस लड़की ने कहा कि उसे नहीं पता था कि अपने बाप पर FIR करने पर लोग उसे कैसे देखेंगे. ये भी एक फैक्टर होता है हमारे समाज में. अपने घर में होने वाली गलत चीजों पर चुप रह जाने के पीछे.
चौथी बात, जिस देश में हम रहते हैं, उसी देश में तो कोर्ट के जज भी रहते हैं. उन्हें मालूम होना चाहिए कि हमारे यहां न रेप के बारे में जागरूकता है, न बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन है. ऐसे में एक बच्चे से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो फ़ोन उठाकर 100 नंबर डायल करेगा.
लड़की 18 साल की है. यही वो उम्र है जब बच्चों में सेक्स और रेप को लेकर समझ आनी शुरू होती है. क्योंकि उसके पहले कोई बच्चों को कुछ नहीं बताता.
तो जज साहब आप ही बताएं, कि लड़कियों को अपने साथ हुए रेप को साबित करने के लिए क्या करना चाहिए? शरीर में कैमरे इनस्टॉल कर लें, कि जब रेप हो, तो सबूत रह जाए कि हुआ था? अपने ही बाप और भाई पर शक करना शुरू कर दे. कि वो तो कभी भी रेप कर सकते हैं. इसलिए हमेशा चौकन्नी रहे. या फिर किसी डॉक्टर के पास जाए, और अपना दिमाग इस तरह से सेट करा ले कि इस तरह के हैरेसमेंट के समय वो तुरंत रियेक्ट कर सके. क्योंकि अगर पिता के बर्ताव से लड़की डरकर या शॉक होकर चुप हो जाती है, कोर्ट को लगता है वो रेप है ही नहीं. वरना लड़की ने चीखा-चिल्लाया होता.
हमारा ये कहना नहीं है कि ये केस लड़की के ही पक्ष में हो. लेकिन कम से कम जांच तो हो. वकील हों. और दलीलें ऐसी हों कि सुनने में लगे कि ये वैलिड है. वरना न्याय के रखवालों और अक्खड़, ढीठ, रूढ़िवादी, पुरुषवादी मर्दों में फर्क ही क्या रह जाएगा?


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