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परशुराम से बदला पूरा हुआ, अब राम की बारी है

आज परशुराम जयंती है. परशुराम हमारी जिंदगी में तब से खास अहमियत रखते हैं जब गांव में रामलीला होती थी. और परशुराम के आगे लक्ष्मण को अपने डायलॉग याद रखना चुनौती होती थी.

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फोटो - thelallantop

"हे राम तुम्हारी बातों से, नरमाई मुझको आती है.

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पर देख तुम्हारे भ्राता को, छाती जलने लग जाती है."

इतना कह कर परशुराम ने अपना चाबुक उठाकर टूटे हुए धनुष के आस पास नाचना शुरू किया. जो भी रास्ते में आता था उसको एक कोड़ा सड़का देते थे. राम लक्ष्मण अपने गुरू विश्वामित्र के साथ दीवार से चिपके खड़े थे. उनके साथ में सीता के भेस में ललमुनिया बने साड़ी पहने खड़े थे बिंद्रा यादव. हमारी उम्र थी कोई 10 साल. राम लक्ष्मण भी करीब इत्ते के. विश्वामित्र के रोल में रामू तेवारी जम रहे थे. उनकी नकली दाढ़ी मूछ अगर थोड़ी भी कम सफेद होती तो फील नहीं आता. परशुराम को और गुस्सहिल दिखाने का मेला कमेटी ने नायाब तरीका निकाला था. उनको ओरेंज कलर के दाढ़ी, मूछ बाल लगाए थे. उसके अंदर से संतोष काका(सारे गांव के काका थे. सरनेम शोध का विषय है) भयंकर चिंघाड़ रहे थे. राधेश्याम रामायण के गुस्से वाले अंश बकुरते हुए उनके मुंह से झाग निकलने लगता था. हम स्कूल से जल्दी आ गए थे ये सोच कर कि अगर परशुराम-लक्ष्मण संवाद निकल गया. तो परलय हो जाएगी. ड्रेस बदलने, बस्ता उतारने घर भी नहीं गए थे. चौराहे पर परशुराम को देख कर डर लग रहा था. तो राम लक्ष्मण को देख कर आंखें नहीं भरती थी. सगरी(सारी) भीड़ ताली बजा रही थी. हम ये सोच सोच कर दिमाग मथे दे रहे थे फरसा क्यों छुड़ा लिया परशुराम का. उनको चाबुक क्यों पकड़ा दिया. ये तो ऐसा ही था जैसे एके 47 वाले को 312 बोर का भरुआ कट्टा पकड़ा दिया जाए. अब समझ में आता है कि मेला कमेटी वाले घोंघा नहीं थे. बहुत दिमाग रहिता था उनके पास. जो आदमी चाबुक से भीड़ में 8-10 को घायल कर देता था. फरसा मिल जाता तो एकाध मर्डर ही कर देता. इतना करेक्टर में बह जाने की क्या जरूरत थी? ये न पूछो. मुझे नहीं पता. परशुराम के बोल बचन के बाद सब मुंह बाए खड़े थे. लक्ष्मण की तरफ देख रहे थे. लेकिन परशुराम की ठांय ठांय सुन कर उनकी बत्ती चली गई. डायलॉग भूल गए. मेला कमेटी वाले छेद्दन भैया उनका पर्चा पकड़ा गए. लक्ष्मण ने कांपते हुए शुरू किया. "जो जितना मीठा होता है खुद अपना नाश कराता है. मीठे गन्ने को देखो तो कोल्हू में पेरा जाता है." परशुराम आंखें निकाल कर शांत होके सुनते थे. जब तक लक्ष्मण का डायलॉग पूरा न हो जाए. जैसे ही खत्म हुआ ले चाबुक. सनसनाते हुए सबको मार आए. माइक गिर गया. नीम के पेड़ पर रखे भोंपू वाले स्पीकर का तार बीच में फंस गया. भोंपू नीचे आ गया. सीता बने बिंद्रा दहशत में आकर गिर पड़े. तो बिंद्रा गिरे थे तो बेहोश नहीं थे. लेकिन उनको लगा कि बेइज्जती काफी हो गई. तो बेहोश होने की एक्टिंग कर ली. एक्टर तो थे ही. मेला कमेटी परेशान. विश्वामित्र दाढ़ी नोच के पंखा झलने लगे. रामचंद्र भगवान दौड़ के घिला में पानी लाए. लक्ष्मण के जी को फुरसत मिली. पर्चे को गुरमेच के तखत के नीचे फेंका. परशुराम का पलड़ा भारी पड़ा. ये देख हमको रात भर नींद नहीं आई थी. मन ही मन कसम खाई कि परशुराम की इज्जत का जनाजा अगले साल लक्ष्मण निकालेंगे. और उस रोल में खुद हम. अगले साल अपनी कसम पूरी की. लेकिन मेला कमेटी ने इस बार दिल तोड़ दिया था. इस बार सीता बनाने के लिए चुना था पड़ोसी गांव की लड़की को. नाम नहीं बताएंगे. नहीं तो उसका नाम ले लेकर चिढ़ाओगे. बस इतना जानो कि लड़की थी. और बहुत अच्छी लगती थी. तो हम फंस गए परशुराम को पानी पिला पिला लथेरने में. और राम बने महेश ने वर माला डाल दी. उस रात फिर नींद नहीं आई. फिर कसम खाई. कि अगली रामलीला में राम बनेंगे.

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