वॉशिंगटन में एक फाइल खुलती है. नई दिल्ली में एक साइन होता है. और इसी के साथ सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो जाती है. कोई कह रहा है ये 2047 की बुनियाद है. कोई बोल रहा है ये आर्थिक आत्मसमर्पण है.
Pax Silica: चिप्स के बदले खेती दांव पर? अमेरिकी सामान भारत में आने से क्या फायदा-नुकसान?
India-US Trade Deal Impact Explainer: क्या भारत और अमेरिका के बीच होने वाली नई ट्रेड डील हमारे किसानों के लिए खतरा है या डिजिटल क्रांति का नया रास्ता? जानिए 'Pax Silica' का वो सच, जो भारत को दुनिया का 'चिप हब' (Chip Hub) तो बना सकता है, लेकिन साथ ही भारतीय डेयरी और सेब की खेती के सामने बड़ी चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है.


कोई कहता है ‘टेक वाला’ आत्मनिर्भर भारत यहीं से बनेगा. तो कोई बोलता है बाजार खुल जाएगा और देसी उद्योग दब जाएगा.
मामला है भारत और अमेरिका के बीच गहराते टेक और ट्रेड रिश्तों का. इस पूरी कहानी के बीच एक शब्द तैर रहा है- Pax Silica.
सवाल सीधा है. क्या इस डील के बाद भारतीय बाजार में अमेरिकी सेब, दूध, गैजेट और ब्रांड्स की बाढ़ आने वाली है? और दूसरा सवाल. क्या इसके बदले भारत को ऐसी टेक पावर मिलेगी जो गेम बदल दे?
Gen Z और मिलेनियल्स के लिए ये सिर्फ खबर नहीं है. ये उनके करियर, स्टार्टअप, सैलरी और मार्केट का सवाल है. ऐसे में मामले की तह तक जाना जरूरी है.
Pax Silica क्या बला है?दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया में एक शब्द चला था- "अमेरिकी वर्चस्व" (American Hegemony). आसान भाषा में कहें तो दुनिया में अमेरिकी दबदबा.
अब नया दौर है. दुनिया बंदूक से कम और चिप से ज्यादा चलती है. सिलिकॉन की चिप. वही जो आपके फोन, लैपटॉप, कार और मिसाइल सबमें लगती है. इसलिए चिप सप्लाई चेन ही नई भू-राजनीति है.
Pax Silica का मतलब है टेक्नोलॉजी के जरिए नया ग्लोबल गठबंधन. खासकर सेमीकंडक्टर को लेकर. और इसका सबसे बड़ा मकसद है चीन की टेक ताकत को सीमित करना.
यहां ये बता देना जरूरी है कि ‘Pax Silica’ कोई आधिकारिक संधि का नाम नहीं है. यह एक रणनीतिक विचार है. मतलब - सिलिकॉन यानी सेमीकंडक्टर के जरिए वैश्विक ताकत का नया संतुलन.
आज दुनिया की सबसे एडवांस चिप्स मुख्य रूप से चीन और ताइवान में बनती हैं. और कई अहम सप्लाई लिंक हैं, जो सीधे तौरपर चीन से जुड़े हैं. अमेरिका चाहता है कि ये निर्भरता कम हो. यहां एंट्री होती है Pax Silica की.

अमेरिका चाहता है कि भारत टेक सप्लाई चेन का नया हब बने. मतलब जो चिप पहले ताइवान या चीन में बनती थी, वो आगे चलकर भारत में बने.
अब इसे ऐसे समझिए. आज अगर आप कोडिंग सीख रहे हैं, डेटा साइंस कर रहे हैं, इलेक्ट्रॉनिक्स पढ़ रहे हैं, या स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं, तो आने वाले दस साल का माहौल इसी टेक पॉलिटिक्स से तय होगा.
सेमीकंडक्टर की असली ताकत कहां है?दुनिया की सबसे एडवांस लॉजिक चिप्स का बड़ा हिस्सा बनता है ‘ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी’ यानी TSMC में, जो ताइवान में है. चिप डिजाइन में बड़ी भूमिका निभाती हैं NVIDIA और Intel जैसी बड़ी कंपनियां.
अमेरिका ने 2022 में ‘चिप्स और साइंस एक्ट’ (CHIPS and Science Act) पास किया. इसका मकसद था घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना और चीन पर निर्भरता कम करना.
भारत की एंट्री कैसे?भारत सरकार ने ‘सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम’(Semicon India Programme) शुरू किया. जिसका उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना है. भारत के सेमीकंडक्टर मिशन की तय योजना के मुताबिक अगर बड़े फैब प्लांट आते हैं तो इससे हाई स्किल जॉब, सप्लाई चेन और इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम को बढ़त मिल सकती है.

डिप्लोमेसी में फ्री लंच नहीं मिलता. अगर अमेरिका, भारत को हाई टेक पार्टनर बना रहा है, तो बदले में उसे कुछ चाहिए भी. इस लेन-देन के खेल के बीच हमारे लिए ये जानना जरूरी है कि इस समझौते से हमें क्या मिल सकता है?
अगर यह साझेदारी गहरी होती है तो भारत को सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग टेक, एडवांस मशीनें, डिफेंस टेक्नोलॉजी और स्पेस कोऑपरेशन में बढ़त मिल सकती है.
पहले से भारत में मैन्युफैक्चरिंग बढ़ा रहा है. अगर बड़े चिप प्लांट भी आ गए, तो पूरा इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम खड़ा हो सकता है.
इसका मतलब साफ है. अगर सब कुछ प्लान के मुताबिक हुआ तो चार स्तर पर फायदा दिखाई देगा.
- ज्यादा फैक्ट्री
- ज्यादा सप्लाई चेन
- ज्यादा इंजीनियर
- ज्यादा हाई सैलरी जॉब
Gen Z के लिए इसका मतलब है कि उन्हें नौकरी के लिए सिर्फ विदेश की तरफ नहीं देखना होगा. उन्हें और क्या चाहिए?
अब आते हैं अमेरिकी मांग परअमेरिका चाहता है कि भारत अपने इंपोर्ट टैक्स यानी टैरिफ कम करे. खासकर कृषि और उपभोक्ता सामानों पर. यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के ‘इंडिया ट्रेड समरी’ डॉक्यूमेंट में इसकी झलक देखने को मिलती है.
मतलब अमेरिकी सेब, बादाम, डेयरी प्रोडक्ट, प्रोसेस्ड फूड और बड़े रिटेल ब्रांड आसानी से भारत में बिक सकें.
यहां पर बारी आती है वाशिंगटन सेब (Washington Apples) और कैलिफ़ोर्निया बादाम (California Almonds) जैसे बड़े नामों की. जो भारत के बड़े एग्रो और डेयरी मार्केट में घुसपैठ के लिए बेकरार हैं. यानी संदेश साफ है- टेक के बदले मार्केट.
सेमीकंडक्टर बनाम सेबअब यहीं से कहानी दिलचस्प होती है. एक तरफ हैं सिलिकॉन चिप. और दूसरी तरफ हैं सेब और दूध.
मान लीजिए अमेरिका से सस्ते सेब भारत आते हैं. तो हिमाचल, कश्मीर और उत्तराखंड के सेब किसान क्या करेंगे. अगर अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट बिना भारी टैक्स के आए, तो हमारे पशुपालक कैसे टिकेंगे.

जैसे अमूल और मदर डेयरी जैसे ब्रांड भारतीय डेयरी उद्योग की रीढ़ हैं. इनके पीछे लाखों छोटे पशुपालक हैं. सवाल ये है कि क्या वे बड़े अमेरिकी एग्रो बिजनेस मॉडल से मुकाबला कर पाएंगे.
विपक्ष और किसान संगठनों की चिंता यही है. उनका कहना है कि डिजिटल तरक्की के नाम पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अनदेखी न हो.
क्या सच में अमेरिकी सामानों की बाढ़ आएगी?अब थोड़ा ठंडे दिमाग से देखते हैं. वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन (WTO) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इंपोर्ट टैरिफ कई सेक्टर में ऊंचे हैं. अगर ट्रेड डील के तहत कुछ सेक्टर में टैरिफ कम होते हैं, तो कुछ बदलाव दिख सकते हैं.
मिसाल के तौरपर शहरी युवा को क्या दिखेगा? हो सकता है कुछ अमेरिकी ब्रांड सस्ते मिलें. कुछ प्रोडक्ट की वैरायटी बढ़े. ई कॉमर्स पर ज्यादा ऑप्शन आएं.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पूरा बाजार अमेरिकी हो जाएगा. भारत का बाजार बहुत बड़ा है और यहां लोकल ब्रांड की पकड़ भी मजबूत है. एमएसएमई सेक्टर (MSME Sector) के लिए चुनौती जरूर होगी. लेकिन अगर सरकार सही सपोर्ट दे, टेक अपग्रेड कराए, तो लोकल कंपनियां भी ग्लोबल बन सकती हैं.
संप्रभुता का सवालएक बड़ा तर्क यह है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक आजादी खो देगा? भारत लंबे समय से मल्टी अलाइनमेंट की नीति पर चलता आया है. यानी सबके साथ दोस्ती, किसी को पूरी तरह हिस्सेदारी नहीं.
अगर भारत टेक सप्लाई चेन में अमेरिका के साथ गहराई से जुड़ता है, तो क्या इससे चीन के साथ तनाव और बढ़ेगा. या फिर यह भारत की सुरक्षा को मजबूत करेगा.
आज युद्ध सिर्फ बॉर्डर पर नहीं होते. साइबर अटैक, चिप सप्लाई रोकना, डेटा कंट्रोल करना भी हथियार हैं. ऐसे में टेक पार्टनर होना भी सुरक्षा का हिस्सा है.
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Gen Z के लिए असली मतलबअब सीधे ‘Gen Z’ पर आते हैं. अगर भारत सेमीकंडक्टर हब बनता है तो,
- इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की वैल्यू बढ़ेगी
- चिप डिजाइन, एआई, रोबोटिक्स में जॉब बढ़ेंगी
- हार्डवेयर स्टार्टअप को मौका मिलेगा
मतलब पहली नजर में मौका तो दिख रहा है. मगर भारत सिर्फ बड़ा बाजार बनकर रह गया, तो हम खरीदेंगे ज्यादा और बेचेंगे कम. इसका मतलब ये हुआ कि असली वैल्यू एडिशन बाहर होगा.
यानी यह डील तय करेगी कि हम टेक क्रिएटर बनेंगे या सिर्फ कंज्यूमर.
मजबूरी या मास्टरस्ट्रोक?दुनिया अब डेटा और सिलिकॉन पर चलती है. अगर भारत इस रेस में पीछे रह गया, तो आने वाले दशकों में वह सिर्फ सर्विस इकॉनमी बनकर रह सकता है.
लेकिन अगर संतुलन बनाकर चला गया तो टेक भी आएगा और किसान भी बचे रह सकेंगे. साथ ही साथ लोकल इंडस्ट्री भी मजबूत होगी.
तो यह 2047 के विजन की असली नींव हो सकती है. सौ बात की एक बात ये कि मास्टरस्ट्रोक और मजबूरी के बीच फर्क बस एक चीज से तय होगा-
नीति में संतुलन.
यह सिर्फ ट्रेड डील नहीं है. यह तय करेगा कि आने वाले 20 साल में भारत की पहचान क्या होगी? एक डिजिटल ताकत या सिर्फ एक बड़ा बाजार?
Pax Silica की बहस असल में सिलिकॉन बनाम मिट्टी की बहस है. चिप भी चाहिए और खेती भी बचानी है. मगर लाख टके का सवाल ये है कि क्या हम दोनों को साथ लेकर चल पाएंगे?
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