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हॉलीवुड के बहुब्बड़े डॉयरेक्टर पर केस हो गया, गोपाल सिंह नेपाली को नहीं जानता था

आज जन्मदिन है गोपाल सिंह नेपाली का. पक्का आवाम का शायर. सच्चा दिलेर कवि.

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फोटो - thelallantop
पैसा, पॉवर और ग्लैमर. ये तीन चीजें हैं जो लोगों को सिलेब्रिटी बनाती हैं. पर ये किस्सा है एक ऐसे कवि, गीतकार, फिल्मकार का, जो इन तीनों से ही मरहूम रहा. पर आज भी उसके लिखे गीत और कविताएं हमें सुकून बख्शती हैं. बल्कि हमें वो गीत किसी दैवीय रचना की तरह लगते हैं, इसलिए उन गीतों के बारे में हम सोचते ही नहीं कि ये लिखे किसने हैं. उस गीतकार का नाम है गोपाल सिंह नेपाली. नेपाली नाम के साथ इसलिए जुड़ा है क्योंकि बाप-दादे नेपाल से आए थे. गोपाल सिंह नेपाली पैदा हुए देहरादून में. और उनकी जिंदगी गुजरी बिहार के बेतिया और मुंबई में. पिता जी फौज में थे, तो जल्दी-जल्दी होता था ट्रांसफर. जिसकी वजह से गोपाल को देश में कई जगहों पर घूमने का मौका मिला. दादा जी बेतिया के राज छापेखाने में काम करते थे. पढ़ाई-लिखाई का कुछ-कुछ माहौल भी था. 7

प्रेमचंद को चौंकाने वाला कवि

जब नेपाली की भेंट प्रेमचंद से हुई तो कहा जाता है कि प्रेमचंद ने नेपाली से कविता सुनने को कहा. नेपाली ने जब कविता सुनाई तो कविता की मैच्योरिटी पर प्रेमचंद के मुंह से निकला,
बरखुर्दार क्या पेट से ही कविता सीखकर पैदा हुए हो?
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जयशंकर प्रसाद बाथरूम सिंगर बनते तो नेपाली के गीत गाते

ऐसा ही एक किस्सा और मशहूर है. एक बार नेपाली किसी म्यूचुअल फ्रेंड के लिंक से मिलने गए थे, जयशंकर प्रसाद से. बिन बताए ही पहुंच गए थे. जयशंकर प्रसाद उस वक्त नहा रहे थे. तो जयशंकर प्रसाद को जब उनके आने का पता चला तो उन्होंने उन्हें बैठने को कहा. उस वक्त जयशंकर प्रसाद नहाते हुए एक कविता गा रहे थे- पीपल के पत्ते गोल-गोल, कुछ कहते रहते डोल-डोल. कुछ देर बाद जब जयशंकर प्रसाद नहाकर आए तो उन्होंने नेपाली से उनका परिचय पूछा. इस पर म्युचुअल वाले फ्रेंड ने बताया कि यही है वो कवि है, जिसकी कविता आप अभी नहाते हुए गुनगुना रहे थे. 9

संघर्ष का नाम गोपाल सिंह नेपाली

नेपाली ने दसवीं की परीक्षा तो दी थी, पर पास नहीं की थी. पर एक्सपीरियेंस के बहुत रिेच थे. इन्हीं एक्सपीरिंयेंसेस ने उन्हें सिखाया, जिंदगी का फलसफा, उनकी लिखी इस लाइन में गूढ़ फलसफा देखिए-
'सुंदर का ध्यान कहीं सुंदर'
6 वो एक जर्नलिस्ट भी थे और जर्नलिस्ट के तौर पर वो 4 मैग्जीन के एडिटर के रहे. ये 4 मैग्जीन थीं, रतलाम टाइम्स, चित्रपट, सुधा और योगी. 1944 में नेपाली फिल्मों में लिखने के लिए मुंबई चले गए. फिल्मों में अपनी मौत के वक्त 1963 तक फिल्मों में काम करते रहे. 2

मुंबई में गीत लिखे, फिल्में बनाईं और हमें दिए बेहतरीन गीत

मुंबई चले गए तो वहां रहने के दौरान नेपाली ने करीब चार दर्जन फिल्मों के लिए गीत भी रचा था. उसी दौरान इन्होंने ‘हिमालय फिल्म्स’ और ‘नेपाली पिक्चर्स’ की स्थापना की थी. निर्माता-निर्देशक के तौर पर नेपाली ने तीन फीचर फिल्मों-नजराना, सनसनी और खुशबू का निर्माण भी किया था. जिन फिल्मों के लिए उन्होंने गाने लिखे वो हैं- 'नाग पंचमी', 'नवरात्रि', 'नई राहें', 'जय भवानी', 'गजरे', 'नरसी भगत' नरसी भगत में ही नेपाली ने दर्शन दो घनश्याम जैसा बेहतरीन भजन लिखा था. कानों में ठंडक पड़ी न. अभी सुनाएंगे. स्टोरी तो खत्म कर लो. तब तक ये पढ़ो- 3

डैनी बॉयल पर केस हो गया नेपाली को नहीं जानता था

नकुल सिंह नेपाली जो कि गोपाल सिंह नेपाली के बेटे हैं ने स्लमडॉग मिलेनियर फिल्म बनाने वालों के खिलाफ बांबे हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर दी थी. उनका कहना था कि फिल्म बनाने वाले डैनी बॉयल ने दर्शन दो घनश्याम गाना सूरदास का बता दिया था जबकि उनका कहना था कि ये गाना उनके पिता यानी गोपाल सिंह नेपाली का लिखा हुआ है. 10 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने बहुत से देशभक्ति वाले गीत और कविताएं लिखीं. सावन, कल्पना, नीलिमा और नवीन कल्पना करो उनकी ऐसी ही कविताएं हैं. कहते हैं बॉर्डर पर जाकर भी उन्होंने कविता पाठ किया. 4 उनका सारा जीवन संघर्षों में बीता. कविताओं की ओर चले तथाकथित बड़े पढ़े-लिखे कवि उनकी पढ़ाई का मजाक उड़ाया करते थे. फिल्मों में चले गए तो साहित्य के लिए हो गए अछूत. पर वो था सच्चा आवाम का शायर. देशप्रेम के रंग में डूबा, जनकवि, ग्लैमर और पैसों से दूर. इसलिए सारी जिंदगी उनकी गुजरी अपनी जगह के लिए लड़ते. शायद ये पंक्तियां उन्होंने खुद के लिए ही लिखी होंगीं-
''अपनेपन का  मतवाला था  भीड़ों  में  भी मैं खो न सका चाहे जिस दल में मिल जाऊं इतना सस्ता मैं हो न सका''
जाते- जवाते दर्शन दो घनश्याम नाथ भी सुन लीजिए. https://www.youtube.com/watch?v=jeoTEwlza1Y

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