The Lallantop

बाबा नागार्जुन चीखे, बोले बंद करो इसे, बकवास है ये

हिंदी-मैथिली के इस महान साहित्यकार के किस्से सुना रहे हैं फिल्ममेकर अविनाश दास.

Advertisement
post-main-image
फोटो कर्टसी- इयान वुल्फर्ड
बाबा नागार्जुन का आज जन्मदिन है. अब ये भी बताना पड़े कि बाबा हिन्दी और मैथिली के लेखक-कवि थे तो कोई बात हुई. हां इतना जान लो ऐसे तो बाबा का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था पर जब हिंदी में लिखते तो नागार्जुन और मैथिली में लिखते तो यात्री हो जाते थे. दरभंगा, बिहार में रहते थे.
अविनाश दास भी दरभंगा के ही हैं. पत्रकार, कवि, लेखक और अब फिल्ममेकर भी. कुल मिलाकर पढ़ने-पढ़ाने का चस्का है. बाबा के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजारा है. अब उनके किस्से सुना रहे हैं. आज पांचवीं किस्त आपके लिए. पढ़ जाओ बिना नजर हटाए, फटाफट.
Baba Nagarjuna

भारत की मनमोहिनी अर्थव्‍यवस्‍था और बाबा नागार्जुन

जब सोवियत संघ के टुकड़े नहीं हुए थे और भारत में मनमोहिनी अर्थव्‍यवस्‍था का अंदेशा तक नहीं था, हमारे बाजारों में देसी स्‍वाद बचा हुआ था. मेले-ठेले धानी रंग की चूड़ि‍यों जैसे खनकते थे. वामपंथियों में उम्‍मीद बची हुई थी कि समाजवाद आएगा. नब्‍बे में इस उम्‍मीद को झटका लगा, जब सोवियत रूस के टुकड़े हो गए. उसकी भारतीय व्‍याख्‍याएं नई उम्‍मीद के बीजारोपण की तरह शुरू हुई कि भारत में संघर्ष के लक्ष्‍य और तरीके अपनी मौलिकता में खोजने होंगे. लेकिन 91 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने और उदारीकरण को लेकर उनकी प्रतिबद्धता ने देश की उम्‍मीदों को दूसरा झटका दिया. उन दिनों लगभग हर गोष्‍ठी और लेख में उदारीकरण के खिलाफ गुस्‍सा दिखता था. हालांकि मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं कि उदारीकरण की समझ को लेकर हमारे शहर के बुद्धिजीवियों में कितनी गंभीरता थी, लेकिन अगर कोई जुमलों में ही सही, गोष्‍ठी में अपनी बात रखते हुए उदारीकरण शब्‍द बार-बार दोहराता था, तो ऐसा लगता था कि उस शख्‍स के सरोकार कितने पवित्र और ईमानदार हैं. उदारीकरण के जिक्र और परिभाषा के बिना कोई भी लेख सूखा और अधूरा लगता था. सन ‘93 में राहुल सांकृत्‍यायन पर एक गोष्‍ठी दरभंगा की अभिव्‍यक्ति संस्‍था ने पूनम सिनेमा हॉल के पास एक सरकारी स्‍कूल में शाम के वक्‍त रखी. बाबा नागार्जुन उस गोष्‍ठी के अध्‍यक्ष थे. सबसे पहले श्री बाबू ने अपनी बात रखी. श्री बाबू (श्रीनारायण सिंह) हिंदी के प्रोफेसर और शहर के बड़े विद्वान थे. उन्‍होंने नयी भारतीय परिस्थितियों में उदारीकरण के खतरे को समझने के लिए राहुल जी के जीवन और कृतित्‍व का महत्‍व बताया. बाबा के चेहरे पर संतोष की एक बारीक सी रेखा मैंने महसूस की. दूसरे वक्‍ता थे, सकलदेव शर्मा. वह भी हिंदी के प्रोफेसर थे और संस्‍कार भारती के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्‍सा लेते थे. छोटे शहरों में तब अलग-अलग विचारधाराओं के विद्वान आपसी साझेदारी से सांस्‍कृतिक माहौल को जीवंत रखते थे. सकलदेव बाबू ग्‍यारह पन्‍नों का लेख लाये थे. माइक पर आये और उसे पढ़ने लगे, तो मैंने देखा कि बाबा का मन कसैला हो रहा है. पहले तीन पन्‍नों तक उस लेख में राहुल सांकृत्‍यायन का जन्‍म, बचपन और युवावस्‍था का जिक्र था. बाबा का मन उचाट हो गया. कोई नयी बात नहीं, नये आयाम नहीं. बाबा चीख पड़े, “बंद करो इसे. बकवास है. पोथा पढ़ रहा है. आखिरी पारा पढ़ो.” मैंने देखा कि सकलदेव बाबू की पूरी देह कांपने लगी. वे कातर निगाह से बाबा की ओर देखने लगे. बाबा ने फिर कहा, “मैंने कहा न, आखिरी पारा पढ़ो… आखिरी पारा पढ़ो…” सकलदेव बाबू ने फौरन ग्‍यारहवें पन्‍ने का आखिरी पैराग्राफ निकाल कर उसे कांपते हाथों से पढ़ा और वापस अपनी जगह पर आकर धम्‍म से बैठ गए. संचालक और संयोजक कृष्‍णकुमार की आंखें उनके चश्‍मे से बाहर निकल आने को आतुर दिखी. लगा जैसे उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया है कि अब क्‍या होगा. बाबा ने उनसे कहा कि माइक इधर लाओ, अब सिर्फ मैं बोलूंगा. माइक की कमर झुका कर उन्‍होंने बाबा के मुंह के सामने रख दिया. बाबा ने कहा कि श्रीबाबू की बात समझिए कि अभी भारत में क्‍या हो रहा है और नये सिरे से राहुल जी को क्‍यों पढ़ना चाहिए. बायोडाटा बांच कर कुछ नहीं होगा. फिर वे राहुल जी के साथ के अपने कुछ संस्‍मरण सुनाने लगे, लेकिन पांच-सात मिनट होते-होते सांस ने उनकी आवाज का साथ देना छोड़ दिया. वे हांफने लगे और माइक को सामने से हटा दिया. गोष्‍ठी खत्‍म हो गई. बाबा रिक्‍शा पर किसी के साथ बैठ कर घर चले गए और हम दरी उठाने में कृष्‍णकुमार जी की मदद करने लगे. इस वक्‍त भी कुछ लोग वहीं जमे थे, लेकिन कोई किसी से बात नहीं कर रहा था.
अब बाबा के सब किस्से हो गए खत्म हैं. पर तशरीफ ले जाने से पहले मिल लो उस अविनाश दास से जो ये सारे किस्से आपके लिए लेकर आए. बाबा नागार्जुन के साथ अविनाश दास (दाएं)
Baba 1
ये रहीं बाबा नागार्जुन के किस्सों की पिछली चार किस्तें-

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement
Advertisement
Advertisement
Advertisement