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चाय नहीं पीते थे, सिंघी मछली मन से खाते थे बाबा नागार्जुन

हिंदी-मैथिली के इस महान साहित्यकार के किस्से सुना रहे हैं फिल्ममेकर अविनाश दास.

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फोटो - thelallantop
बाबा नागार्जुन का आज जन्मदिन है. अब ये भी बताना पड़े कि बाबा हिन्दी और मैथिली के लेखक-कवि थे तो कोई बात हुई. हां इतना जान लो ऐसे तो बाबा का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था पर जब हिंदी में लिखते तो नागार्जुन और मैथिली में लिखते तो यात्री हो जाते थे. दरभंगा, बिहार में रहते थे.
अविनाश दास भी दरभंगा के ही हैं. पत्रकार, कवि, लेखक और अब फिल्ममेकर भी. कुल मिलाकर पढ़ने-पढ़ाने का चस्का है. बाबा के साथ अच्छा-खासा वक्त गुजारा है. अब उनके किस्से सुना रहे हैं. आज दूसरी किस्त में 3 किस्से हैं आपके लिए. पढ़ जाओ बिना नजर हटाए, फटाफट.

चाय नहीं पीते थे बाबा नागार्जुन

पान, गुटखा, खैनी, शराब, सिगरेट के सेवन से परहेज करने की हिदायत आजकल सिनेमा शुरू होने से पहले और कई बार तो मध्‍यांतर में भी अनिवार्य तौर पर दी जाती है. शराब की महफिलों में इस जानकारी को कुछ हंसोड़ लोग हंसते-हंसते याद भी करते हैं, फिर जाम से जाम टकराते हैं. अगर कोई ब्रह्मचारी किस्‍म का जीव हुआ, तो मेरे पास ऐसे मौकों पर बाबा से जुड़ा एक प्रसंग याद रहता है और मैं कई बार उसे सुनाता भी हूं. चूंकि उनकी स्‍मृतियों का सिलसिला यहां रख रहा हूं, तो आपलोग भी जानिए. हालांकि बहुत मामूली प्रसंग है. बाबा से मिलने अक्‍सर बल्कि रोज ही लोग आते रहते थे. बाबा के यहां सबको चाय मिलती थी. बाबा तो पीते नहीं थे, पर साथ जरूर देते थे. होता यह था कि वो अपने लिए भी कप मंगवाते थे. उसमें पानी डलवाते थे. फिर किसी का भी कप लेकर उसे फूंकते थे ताकि ऊपर की परत ठंडी हो जाए. फिर उसमें अपनी उंगली की तलछट जरा सा छुआते थे और अपने पानी वाले कप में उस उंगली को डाल देते थे. कहते थे, अब देखिए मैं भी चाय का आनंद उठाऊंगा. सभी प्रफुल्लित हो उठते थे. चूंकि मैं ज्‍यादा उनके साथ रहता था और मुझे बार-बार चाय पीते हुए बाबा देखते थे, तो मुझसे कहते थे, इतनी चाय मत पीया करो. वही करो जो मैं करता हूं. मैं ठिठियाते हुए शोभा चचा की पत्‍नी की ओर देखता था. वो इशारे से कहती थीं, “पिबह पिबह! हमरे ने बनब’ पड़य-ए” (पीयो पीयो, मुझे ही तो बनानी पड़ती है). बाबा भी मुस्‍करा उठते थे. Baba Nagarjuna

नागार्जुन बाबा कभी मां से सिंघी मछली और कभी खिचड़ी बनाने को कहते

सन ‘91 की सेंसस (जनगणना) में जब दरभंगा के अस्‍थायी स्‍थानीय सेंसस ऑफिस से माल-असबाब (फर्नीचर) की नीलामी हो रही थी, पहली बार मेरे घर पंखा आया था. कुछ कुर्सियां आयी थीं. एक बड़ी और दो छोटी बेंच आयी थी. बाबूजी के घरेलू ट्यूशन में वह काम आ गया था. सुबह-सुबह विद्यार्थियों की छोटी-सी टोली आती थी पढ़ने. तो एक सुबह जब हम बाबा के साथ शाहगंज (बेंता) वाले अपने घर के सामने उतरे, तो नीलामी में खरीदी हुई कुर्सी पर बैठे बाबूजी उठ कर आये और उन्‍होंने बाबा के पांव छूए. उनकी देखादेखी बेंच पर बैठे सारे विद्यार्थी उठ कर आये और कतार में लग कर उनके पांव छूए. बाबा ने कहा, “लक्ष्‍मी बाबू, अहां के कुटिया मे त’ साक्षात बिद्या के बास अछि…” (लक्ष्‍मी बाबू, आपकी कुटिया में तो साक्षात विद्या विराजती है…). मेरे बाबूजी का नाम लक्ष्‍मीकांत दास है. बाबा उनसे संस्‍कृत और मैथिली के प्राचीन साहित्‍य बात करते थे. मुझे तब तक अंदाजा नहीं था कि मेरे बाबूजी भी अनुरागी साहित्यिक चित्त के व्‍यक्ति हैं. बाद में भी ऐसा नहीं लगा या शायद वे मुझे कभी ऐसी चर्चाओं के योग्‍य नहीं समझ पाये. वे बाबा से कुरेद-कुरेद कर मैथिली के पुराने मुहावरों के बनने की कथा पूछते और बाबा बड़े मनोरंजक तरीके से पूरी कहानी कहते. उनमें से कुछ भी याद रह जाता, तो आज मेरी भोथरी मेधा में थोड़ी धार नजर आती. खैर, हफ्ते में एक बार तो अवश्‍य ही बाबा के आने-जाने का सिलसिला चल पड़ा. उन्‍हें मेरे घर में अच्‍छा लगता था. जितना उनकी सांस उनका साथ देती थी, मेरी बहनों और मां के साथ बैठ कर बातें करते थे. मां को कभी सिंघी मछली और कभी खिचड़ी बनाने को कहते थे. मुझे पहली बार पता चला कि बाबा ज्‍योतिष विद्या भी जानते हैं, जब मेरी ममेरी बहन बेबी दीदी मेरे यहां थोड़े दिनों के लिए आई. उनके पति उन्‍हें छोड़ कर ऑस्‍ट्रेलिया में दूसरी शादी कर चुके थे और वो अपने अस्तित्‍व और अपने हक के लिए लड़ रही थीं. हासिल शायद कुछ भी नहीं हुआ, पर बाबा ने उनका हाथ देख कर कहा कि खुद पर भरोसा रखो, तो सब ठीक हो जाएगा. आज जब किसी घरेलू समारोह में दीदी मिलती हैं, तो बाबा का जिक्र भी नहीं करती.

जब गोपालगंज के डीएम जी कृष्‍णैया की हत्‍या हुई

हमारे शहर में हिंदी के एक प्राध्‍यापक थे. सीएम आर्ट्स कॉलेज में. सामाजिक न्‍याय के पक्षधर थे, लिहाजा सुलझे विचार के थे. हालांकि बाल उलझे रहते थे और उनकी लंबाई सुमित्रा नंदन पंत जितनी थी. जतन से सहेजे हुए वे बाल उड़ते जा रहे थे, पर बचे बालों की लंबाई कतरने से वे हमेशा कतराया करते. आप सब शायद उनके नाम से परिचित हों, रामधारी सिंह दिवाकर. फणीश्‍वरनाथ रेणु के पड़ोसी गांव के थे. मैं पहली बार उनसे हंस के माध्‍यम से परिचित हुआ, रांची में. शायद ‘90-’91 में. हंस में उनकी कहानी छपी थी. जब दरभंगा आया, उनसे मिलने पहुंचा. तब मैं इंटर में पढ़ता था. उन्‍होंने पूछा, क्‍या करते हो. मैंने बताया कि कविता लिखता हूं. उनकी सख्‍त प्रतिक्रिया थी, पहले बीए कर लो फिर कविता करना. साहित्यिक सक्रियता के प्रति निरुत्‍साहित करने वाला उनका भाव मेरे लिए लंबे समय तक रहा. उनसे ही जुड़ा यह प्रसंग है. एक दिन दोपहर में मैं बाबा के यहां था, तो दिवाकर जी पहुंचे. वे काफी उत्तेजित थे. उसी दिन गोपालगंज के जिलाधिकारी (डीएम) जी कृष्‍णैया की हत्‍या बड़े नाटकीय ढंग से हुई थी. वे बाबा के पास बैठे. चाय आई. चाय पीते हुए उन्‍होंने बाबा से इस घटना का जिक्र किया. कहा, बाबा इस पूरे घटनाक्रम पर मेरे मन में एक कहानी उमड़-घुमड़ रही है. जल्‍दी से जल्‍दी लिखना चाहता हूं. बाबा ने दिवाकर जी का हाथ पकड़ा और कहा, अभी रुक जाइए. इस मामले को पकने दीजिए. कम से कम बीस साल बीत जाने दीजिए, फिर कहानी का ओर-छोर समझ में आएगा. तात्‍कालिक उत्तेजना में कविता तो लिखी जा सकती है, पर कहानी के लिए धीरज चाहिए. नहीं तो सच (सत्‍य) के साथ अनर्थ होने का खतरा रहता है. दिवाकर जी को बाबा की बात समझ में आई. वे शांत चित्त होकर बाबा के घर से लौटे. यह बात सन ‘94 की है और अब बीस साल हो चुके हैं. हालांकि आरोपी आनंद मोहन अभी भी जेल में हैं, लेकिन उस घटना से जुड़े काफी कथा-तत्‍व अब सबके सामने है.
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