इस रिपोर्ट में बात करेंगे कि ये चारों कोड क्या हैं और इनके आम मजदूरों से लेकर सभी नौकरीपेशा लोगों, कंपनियों, ट्रेड यूनियनों के लिए क्या मायने हैं, इस पर तफसील से बात करेंगे. लेकिन यह भी जानते चलें कि देश के 10 श्रमिक संगठनों ने पहले ही नए श्रम कानून और अन्य मुद्दों पर 26 नवंबर को देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन और फिर दो दिन की हड़ताल का ऐलान कर रखा है. ये कोड केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर 1 अप्रैल 2021 से लागू होने थे. करीब 9 राज्यों ने सभी चार कोड पर और 21 राज्यों ने किसी न किसी कोड पर ड्राफ्ट रूल्स भी तैयार कर लिए हैं. लेकिन आगामी चुनावों और ट्रेड यूनियनों के बढ़ते दबाव के बाद इसके ठंडे बस्ते में जाने के संकेत मिलने लगे हैं.
गतिरोध का लुब्ब-ए-लुबाब ये है कि सरकार इन कानूनों को इंडस्ट्री की नजर में ईज ऑफ डुइंग बिजनेस यानी कारोबार आसान बनाने के टैग तले बढ़ाना चाहती है, वहीं श्रम संगठन इसे श्रमिकों के हितों के खिलाफ देख रहे हैं.

तस्वीर- पीटीआई से साभार.
वेज कोडः बदल जाएंगे मजदूरी और सैलरी के ढांचे
इसके पहले कि इस कोड की बारीकियों में जाएं, एक अपडेट जानते जाएं कि देश भर में सैलरी स्ट्रक्चर को रिवाइज करने के साथ ही सरकार पहले पूरे देश के लिए एक अलग नेशनल मिनिमम वेज तय करने वाली थी. इसमें जोनवाइज 4 फ्लोर रेट तय होने थे. हाल ही में सरकार ने साफ किया है कि वह नेशनल मिनिमम वेज थोपने नहीं जा रही है. जहां तक सैलरी स्ट्रक्चर का सवाल है, सबसे अहम प्रावधान यह है कि बेसिक सैलरी कुल वेतन यानी सीटीसी का 50 प्रतिशत होगी.फिलहाल प्राइवेट सेक्टर में इसका कोई एक ढांचा देखने को नहीं मिलता. यहां आम तौर पर बेसिक सैलरी सीटीसी का 25-30 प्रतिशत होती है. इसके दो मायने हैं, वर्कर की टेक होम सैलरी घट जाएगी, लेकिन पीएफ खाते में ज्यादा रकम जाएगी. वहीं, एम्प्लॉयर्स पर पीएफ और ग्रेच्युटी में योगदान का बोझ बढ़ेगा.
विरोध क्यों?
संगठित क्षेत्र में काम करने वालों को लिए इस ढांचे पर क्या ही ऐतराज होगा. असली पेच असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करीब 43 करोड़ दिहाड़ी और अन्य कामगारों के हितों को लेकर है. ट्रेड यूनियनों का कहना है कि उन्हें बेसिक और अलाउंसेज तो दूर, सरकार की ओर से तय न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती. इस कोड के समानांतर सरकार ने जिस नेशनल मिनिमम वेज फ्लोर रेट की बात कही थी, वहां भी एक पेच है.दिल्ली जैसे राज्य में अकुशल मजदूरों के लिए किसी भी राज्य के मुकाबले सबसे ज्यादा 15,908 रुपये मासिक मिनिमम वेज तय है, जबकि कुशल मजदूरों के लिए 19,291 रुपये. लेकिन पड़ोसी यूपी और हरियाणा में यह रेट 30-35 फीसदी तक कम है. नतीजतन, दिल्ली-एनसीआर में पहले ही एक तरह का श्रमिक असंतुलन पैदा हो गया है. एनसीआर की इंडस्ट्रीज रोती हैं कि वर्कर्स का रुझान दिल्ली की तरफ होता है, जबकि बिजली-पानी के मामले में दिल्ली में लिविंग कॉस्ट भी कम है. इससे एनसीआर में लेबर क्रंच पैदा होता है. ऐसी समस्याएं दूसरे राज्यों में भी पेश आ सकती हैं.

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इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोडः विवाद और विरोध की जड़
ट्रेड यूनियनों के विरोध और सरकार के संभावित बैकफुट पर जाने के पीछे इस कोड का बड़ा हाथ है. मौजूदा श्रम कानूनों के तहत 100 से कम वर्कर्स वाली कंपनियों को बिना सरकार को बताए हायर एंड फायर की छूट है. लेकिन अब यह श्रमिक सीमा बढ़ाकर 300 की जा रही है. काम के घंटे बढ़ाने (12 घंटे ) और शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट को वैधानिक जामा पहनाने जैसे प्रावधान भी हैं.विरोध क्यों?
श्रम संगठनों की दलील है कि बड़े कॉरपोरेट के साथ ही अब देश की ज्यादातर कंपनियां और एम्प्लॉयर इस श्रेणी में आ जाएंगे. उनका कहना है कि इससे एक तरह से पूरे देश में श्रमिकों के शोषण और बेरोजगारी की खुली छूट मिल जाएगी.इसके अलावा इस कोड में ट्रेड यूनियनों का वजूद भी खतरे में दिख रहा है. यह कोड ट्रेड यूनियनों के गठन, अधिकार और मेंबरशिप को भी नए सिरे से परिभाषित और रेग्युलेट करने की बात करता है. कोड के मुताबिक यूनियन बनाने के लिए कुल श्रमिकों का 10 फीसद या कम से कम 100 श्रमिकों की जरूरत होगी और इसमें बाहरी उद्योग या संस्थान का कोई व्यक्ति मेंबर नहीं हो सकेगा.
जानकारों का कहना है कि प्राइवेट सेक्टर में इतने मेंबर जुटाना भी मुश्किल होगा. मिनिमम वेज के निर्धारण में भी ट्रेड यूनियनों को हटा दिया गया है. पे कमिशनों का प्रभाव भी नहीं के बराबर रह सकता है. हालांकि कोड कहता है कि अकेला कर्मचारी भी अपनी मांगों और मसलों के निपटारे के लिए मैनेजमेंट से बात कर सकता है और कोर्ट जा सकता है.
सोशल सिक्योरिटी कोड - सारे कॉलर ब्लू या व्हाइट नहीं होते
इसके तहत सरकार ने तमाम तरह के सरकारी स्कीमों के लाभार्थियों के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करने और एक विशेष कोड जारी करने की बात कही है. वर्कर्स सोशल सिक्योरिटी और मैटर्निटी लाभ से जुड़े सभी 9 कानूनों को भी एक कोड में समाहित करने की कोशिश है. श्रमिकों के वेतन का डिजिटल भुगतान करना होगा. साल में एक बार सभी श्रमिकों का हेल्थ चेकअप भी अनिवार्य होगा. पहले साल में न्यूनतम 240 दिन का काम करने के बाद ही हर 20 दिन पर एक छुट्टी (ईएल) का अधिकार था, अब इसकी एलिजिबिलिटी 180 दिन काम करने के बाद ही शुरू हो जाएगी. शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वालों को भी ग्रेच्युटी का फायदा मिलेगा.
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विरोध क्यों?
मजदूर संगठन इस कोड को भी सब्जबाग बता रहे हैं. उनका दावा है कि अब तक सोशल सिक्योरिटी स्कीमों में केवल 11 करोड़ श्रमिक ही कवर्ड हैं और कोड का लाभ भी ज्यादा से ज्यादा उन्हीं को मिलेगा. जबकि असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, कृषि मजदूरों के एक्सेस का कोई ठोस प्रावधान या गारंटी नहीं है.कोड ऑन ऑक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन
यह कोड कारखानों और दूसरी जगहों पर कामकाज का माहौल सेफ और लेबर फ्रेंडली करने की बात करता है. उनके लिए लेबर आइडेंटिफिकेशन नंबर का भी प्रावधान है, ताकि एक जगह से काम छोड़ने और दूसरी जगह जाने के बाद भी वर्कर को तात्कालिक सहायता मिलती रहे. साथ ही फैक्ट्रियों में बुनियादी सुविधाएं और काम की जगहों पर सुरक्षा उपायों और सहूलियतें मुहैया कराने की बात कही गई है.विरोध क्यों?
इस सवाल पर ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने दी लल्लनटॉप से कहा,‘कोरोना के दौरान हम माइग्रेंट वर्कर्स की दुर्दशा देख चुके हैं. वर्कर्स की सोशल सिक्योरिटी, सेफ्टी और हेल्थ के लिए पहले से कई प्रावधान हैं और आईएलओ के दिशानिर्देश भी. लेकिन जिस सरकार ने 2015 के बाद से इंडिया लेबर कॉन्फ्रेंस की सालाना बैठक ही नहीं बुलाई है, उस पर हम भरोसा नहीं करते कि वह इन कोड्स का लाभ गली-मोहल्ले के श्रमिकों तक पहुंचा पाएगी.’अमरजीत कौर ने कहा कि श्रम कानूनों के कोडिफिकेशन से पहले श्रमिक संगठनों को भरोसे में नहीं लिया गया. बाद में काफी विरोध के बाद हर कोड पर एक मीटिंग की गई, लेकिन सुझावों को तवज्जों नहीं दी गई.










