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सोनिया गांधी को गरिया पुलिस के डंडे खाने वाले क्रांतिकारी, बाबू बैनर्जी

कैंपस किस्सा: DU के सबसे बड़े कवि, इंटेलेक्चुअल, और क्रांतिकारी की कहानी.

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फोटो - thelallantop
इंग्लिश लिटरेचर पढ़ने बंगाल से दिल्ली पूरी फ़ौज आती है. पूछो कि बंगाल में तो खुद जादवपुर और कलकत्ता जैसी यूनिवर्सिटी हैं. फिर इधर क्यों आते हैं. तो कहते हैं कि बंगाल में लिटरेरी क्रिटिसिज्म नहीं पढ़ाते, इसलिए. अब हमारे यूपी में तो लड़के बड़े देहाती टाइप्स होते हैं, यू नो. अंग्रेजी के नाम पर बस रेन एंड मार्टिन से टेंस के रूल रट-रट के पास होते हैं. पूरी जिंदगी 'वॉटर' को 'वाटर' और 'क्लियर' को 'किलियर' कहकर बिता देते हैं. लेकिन ये एक्सेंट सुनने में बड़ा चीप लगता है. एक्सेंट तो आता है बंगाल से. और वहीं से आता है खालिस इंग्लिश मीडियम इंटेलेक्चुअल. अगर एक 'चारमीनार' फूंकने को मिल जाए, तो किसी भी मुद्दे पर बात कर सकता है. Campus Kisse
तो ऐसे ही इंटेलेक्चुअल थे बाबू बैनर्जी. बाबा यानी पिताजी से विरासत में एक नेवी कट का पैकेट, काली छतरी और कोट लेकर दिल्ली आए थे. हमारे साथ एमए करने. कनॉट प्लेस को देखकर पार्क स्ट्रीट याद करते. बुर्जुआ भद्रलोक को एक्स्ट्रा मॉरल बताकर उनमें नुख्स निकालते. घड़ी-घड़ी किसी कवि को कोट करते. रबीन्द्रनाथ को ओवररेटेड बताते. दिल्ली के खाने से चिढ़ते. कोई दरियागंज और कॉलेज स्ट्रीट को कंपेयर कर दे तो सुलग जाते. मजनू का टीला जाकर पोर्क खाते. और वीकेंड पर रम-पान करते.
बाबू दादा दिल से कवि थे. सौंदर्य रस के. लड़की की गर्दन से लटकी चेन में लटका पेंडेंट जिस तरह उसके स्तनों पर आकर रुकता था, उसे तो बाबू दादा लिखते थे. कभी लाल लिपस्टिक वाली लड़की पर लिखते, कभी पीली साड़ी वाली पर. यही उनका तरीका था इश्क की अदायगी का. अल्लाह झूठ न बुलवाए, डिपार्टमेंट की कोई लड़की नहीं थी जो बाबू दादा की फेसबुक लिस्ट में न हो. ये बात अलग है कि लड़कियां दोगुनी स्पीड से उन्हें ब्लॉक भी कर देती थीं. और ब्लॉक होते साथ बाबू की एक नई प्रेम कविता दम तोड़ देती थी. बाबू बैनर्जी के अंदर एक बहुत की क्रांतिकारी आत्मा का निवास था. टी-शर्ट पर चे गुवेरा की तस्वीर, जेब में बॉब मार्ले वाला सिगरेट केस, हाथ में नेरुदा की कविताओं की किताब, मोबाइल में जॉन लेनन का संगीत और होंठों पर बांग्ला एक्सेंट के साथ फैज़ की कोई नज़्म होती थी. बात टीचर्स, स्टूडेंट्स या कर्मचारियों के हक की हो, दादा हमेशा प्रोटेस्ट में शामिल रहते. अलग-अलग प्रोटेस्ट में जाने से अलग-अलग प्रोफाइल पिक्चर्स का स्टॉक भी हो जाता. एक तीर से दो शिकार. सैकड़ों नारे बाबू को मुंह-ज़बानी याद थे. मौके के हिसाब से उन नारों में जुल्मियों का नाम रिप्लेस करते रहते. लेकिन बाबू साहब के अंदर भरी क्रांति का परिचय मिलना अभी बाकी था. हुआ यूं कि डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स की कुछ मांगें थीं. टीचर्स और इन्फ्रास्ट्रक्चर को लेकर. हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट के साथ मीटिंग करना चाहते थे. हेड साहब अपने फ्यूचर की तैयारी के लिए VC साहब और डीन साहिबा की पत्तेचाटी में बिजी थे. स्टूडेंट्स को टाइम नहीं दे रहे थे. बस स्टूडेंट्स भड़के, और करने लगे शोर हेड साहब के ऑफिस के बाहर. लेकिन शोर को कोई दिशा नहीं मिल पा रही थी. तो बाबू साहब की याद आई. उन्हें किसी ने फ़ोन किया, 'दादा आ जाओ, हेड के खिलाफ नारे लगाने हैं.'
दादा कमोड पर बैठे नित्यकर्म निपटा रहे थे. जाने ख़त्म भी कर पाए या नहीं, लेकिन अगले 5 मिनट के अंदर रिक्शा लेकर डिपार्टमेंट जरूर पहुंच चुके थे. स्टूडेंट्स ग्रुप बनाकर खड़े ही थे, कि बरामदे के दूसरे छोर से आवाज आई, 'HOD वापस जाओ.' स्टूडेंट्स ने सुर मिलाया, 'वापस जाओ, वापस जाओ'. 15 मिनट की नारेबाजी के बाद हेड साहब बाहर आए. मौका बातचीत का था. दादा पीछे हो लिए. और बगल वाली लड़की से झुक से धीरे से पूछे, 'प्रोटेस्ट किस बात की हो रही है?'
लेकिन ऐसे छोटे-मोटे सेटअप में प्रोटेस्ट करने का क्या मजा. जबतक एक बार जेल न जाओ. महान लोगों के जेल गए बिना कभी किसी देश में क्रांति आई है? लोग कहा करते थे बाबू बैनर्जी ने कलकत्ते में खूब लट्ठ खाए थे क्रांति के पीछे. इतने कि कलकत्ते के स्टूडेंट सर्किल में किंवदंतियों का हिस्सा बन चुके थे. तो दिल्ली आकर दादा कुछ बड़ा करना चाहते थे. तब शीला दीक्षित की सरकार थी. और हर संडे की तरह जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन था. जाने किस चीज को लेकर. पर उससे दादा को क्या फर्क पड़ना था. उन्हें तो बस दरकार थी ऐसी प्रोफाइल पिक्चर की जिसमें पीछे ज्यादा पब्लिक दिखे. तो दादा ने अपना प्रेस किया हुआ कॉटन कुरता निकाला. इंटेलेक्चुअल लुक के लिए उसकी क्रीज बिगाड़कर उसे थोड़ा गींज दिया. और धूप ढलते ही जंतर मंतर पहुंच गए. वॉर्म अप होने के लिए नेवी कट पी रहे थे. कि एक पिल्ला वहां आ गया. साथ वाले जनाब ने कहा, 'ये कुत्ते का पिल्ला फिर यहां आ गया.' दादा की हिंदी कमजोर थी. साथ वाले की बात सुनी. और पिल्ले का अर्थ निकाला 'बच्चा'. ठीक ही तो था, कुत्ते का बच्चा. और उसी समय दादा के मन में एक नए नारे ने जन्म लिया. विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ. और दादा सबसे आगे जाकर चीखे, 'सोनिया माता के पिल्ले को एक धक्का और दो.' फ्रीडम ऑफ़ स्पीच देश में बहुत है. लेकिन इतनी भी नहीं कि आप परोक्ष रूप से सोनिया गांधी को गाली दे दें, और पब्लिक आपके सुर में सुर मिलाए. पीछे वाली पब्लिक चुप. दादा ने फिर से आवाज उठाई, 'सोनिया माता के पिल्ले को-' और उनके कंधे पर धांय से लट्ठ बजा. फिर फुर्सत से पीटे गए. समझ गए कि नारे में कुछ झोल है. रात को शरीर सुजा के लौटे. तो साथियों ने बताया आप सोनिया गांधी को गरिया आए हैं.
दादा ने दर्द भुलाने के लिए रम का सेवन किया. और तीन नई लड़कियों को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी.
फेयरवेल के दिन दादा ने हिंदी में चुटकुला सुना दिया था स्टेज पर. तबसे उन्हें कई लोगों ने ब्लॉक कर रखा है. सुना है आजकल नाम बदलकर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजते हैं.

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