मेरा देश तल रहा है
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है अंकल दुष्यंत ने यह सवाल बहुत पहले पूछा था. दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र तब भी खौल रहा था, अब भी खौल रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि हमारी थिंकिंग अब पॉजेटिव है. यह रक्त नहीं है बाबू, खौलता हुआ तेल है, क्योंकि व्यापार हमारी रग-रग में है. अपने ही तेल में पकौड़े तलकर हम खुद खा रहे हैं और पूरी दुनिया को भी खिला रहे हैं. पेट तो भर ही रहा है, तिजोरी भी भर रही है. हरित क्रांति, आर्थिक उदारीकरण और संचार क्रांति के बाद पकौड़ा क्रांति इस देश की सबसे बड़ी घटना है. लेकिन इसका प्रभाव बाकी क्रांतियों से कई गुना ज्यादा है. पकौड़ा क्रांति ने अर्थ नीति, राजनीति और विदेश नीति को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है. अब पूरी दुनिया में शांति और समृद्धि है. भारत ने विश्व गुरू होने का अपना फर्ज फिर से निभाया है. यह किताब पकौड़ा क्रांति के महानायक बाबू रामभरोसे और उनके साथियों की उपलब्धियों की महागाथा है.
...तो कहानी दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में पकौड़ा टाइकून रामभरोसे के एक भाषण से शुरू होती है. रामभरोसे वही शख्स हैं, जो कभी नोएडा में ठेले पर पकौड़े बेचा करते थे लेकिन पकौड़ों पर दिये गये प्रधानमंत्री के बयान ने उनकी जिंदगी बदल दी. प्रधानमंत्री से रामभरोसे की मुलाकात, ठेले से लेकर पकौड़ा आउटलेट और फिर एक दिन पिज्जा हट और केएफसी जैसे बड़े-बड़े ब्रांड के अधिग्रहण तक की कहानी इतनी दिलचस्प है कि आप एक बार पढ़ना शुरू करते हैं तो फिर रूकने का नाम ही नहीं लेते. देश की मौजूदा सियासत से लेकर भावी राजनीतिक घटनाक्रम का अति नाटकीय और बेहद दिलचस्प खाका इस उपन्यास में मिलता है. एक प्लेट पकौड़े से लेकर शुरू हुई कल्पना की उड़ान जिस तरह आगे बढ़ती है, वह सचमुच अकल्पनीय है. पकौड़ा क्रांति भारत को आर्थिक और सैनिक महाशक्ति बना देता है. पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों को भारत में विलय हो जाता है. मामला यहीं ना रूकता. एक दिन प्रधानमंत्री भारत में पकौड़ा क्रांति लाने वाले बाबू रामभरोसे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी घोषित कर देते हैं. उपन्यास का आखिरी चैप्टर आपको कल्पना की उस दुनिया में ले जाता है, जहां पहुंचकर आपको समझ में नहीं आता कि हंसे, रूककर गहराई से सोचें या सिर्फ मजे लें.
पकौड़ेश्वरम वंदे जगदगुरूम्
1, अप्रैल 2030, श्रीहरिकोटा मंगलमम भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ध्वज
मंगलम पुंडीरकाक्षमंगलाय तनो हरि नासा से आये साइंटिस्ट्स ने भारतीय वैज्ञानिकों के साथ अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर इस पवित्र मंत्र का उच्चारण किया. 202 देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस ऐतिहासिक क्षण के गवाह बनने के लिए अपनी-अपनी सीट पर विराजमान थे. दुनिया पिछले बारह साल में बहुत आगे बढ़ चुकी थी. सहारा मरूस्थल से लेकर अंटार्टटिका तक विश्व का कोई ऐसा कोना नहीं था जो भारत से शुरू हुई पकौड़ा क्रांति के महान प्रभाव से अछूता हो. पूरे विश्व में खुशहाली आ चुकी थी. मृत्यु दर घटने और आर्थिक विकास का नतीजा यह था कि इंसानी आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही थी. अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समुदाय इस बात को लेकर चिंतित था कि आनेवाले समय में मानव जाति का क्या होगा? इस धरती पर रहने लायक सारी जगहें खत्म हो जाएँगी, फिर होमो सीपियंस कहाँ रहेंगे? इस मामले में भी दुनिया को रास्ता एक बार फिर विश्वगुरू भारत ने दिखाया. इसरो का मंगलयान कई बार वहाँ उतर चुका था और मंगल पर जीवन होने के संकेत ग्रहण कर चुका था. मंगलयान ने जो तस्वीरें भेजी थीं, उनसे पता चलता था कि मंगल ग्रह के पास विशाल भूभाग है. बहुत सी वनस्पतियाँ हैं, जलाशय हैं. लेकिन जीवन बहुत कम है, नहीं के बराबर. फिर भी यह तय है कि जीव वहाँ बसते हैं. 2028 में लौटकर आये मंगलयान पर खरोंच जैसे कुछ निशान मिले. बहुत समय तक अध्ययन के बाद इसरो के वैज्ञानिक इस निष्कर्ष तक पहुंचे कि यह एक संदेश है, जो मंगल के लोगों ने पृथ्वी वासियों को भेजा है. संदेश बहुत अस्पष्ट था. दुनिया भर के विशेषज्ञों ने इस गुत्थी को सुलझाने की कोशिश की. उकेरी गई चीज़ की तस्वीर ली गई उसे अलग-अलग कोण से घुमाया गया तो `हीदेहषांविह और `मनुजंव्यहेदी ’ की दो आकृतियां निकलकर सामने आईं. वैज्ञानिकों की समझ में कुछ नहीं आया. फिर काशी के प्राच्य विद्या विशेषज्ञों की मदद ली गई. उन्होंने बहुत दिमाग़ लगाया और अंतत: जो परिणाम सामने आया उससे पूरी दुनिया की आँखें फटी रह गईं। यह देवभाषा संस्कृत का सबसे शुद्ध रूप था, जिसमें दो-तीन मात्राएं अतिरिक्त लगी थीं. इन मात्राओं को निकालकर अक्षरों का संयोजन करने पर दो वाक्य बनते थे- हविषां देहि और व्यंजनम् देही. मतलब हविषा यानी ईंधन यानी भोजन मांग रहे हैं, मंगल ग्रह वासी. अगर उन्हे कोई उत्तम पकवान भेजा जाये तो धरतीवासियों से उनके संबंध सुदृढ़ होंगे और हो सकता है एक दिन वे पृथ्वी वालों को अपने ग्रह पर ज़मीन देने को भी तैयार हो जायें. मंगल ग्रहवासियों से संपर्क करना संपूर्ण धरतीवासियों का सामूहिक उत्तरदायित्व था, जिसे भारत के प्रधानमंत्री श्री रामभरोसे के नेतृत्व में पूरा किया जा रहा था. इस धरती की सबसे नायाब चीज़ यानी पकौड़ी मंगलयान में भरकर भेजी जा रही थी और वह भी भारतीय प्रधानमंत्री के हाथ की बनी. यान पर जहां मंगलवासियों द्वारा उकेरे गये संदेश प्राप्त हुए थे, ठीक उसी के बगल में वैज्ञानिकों ने उसी शैली के संस्कृत में लिखा- हे मंगलवासी! अस्य लोकस्य विशालमतस्य प्रजातंत्रस्य पक्कवाटिका: स्वीकुरु. अर्थात— हे मंगलवासी! आप इस लोक के सबसे बड़े प्रजातंत्र के पकौड़े स्वीकार कीजिये. मंगलयान तैयार था. मंगलयान जब पहली बार भेजा गया था, तब उसकी यात्रा की लागत हवाई जहाज के बराबर थी. धीरे-धीरे लागत घटती गई और राजधानी एक्सप्रेस के किराये के बराबर जा पहुँची. लागत जब कोलकाता के ट्राम भाड़े तक आ गई तो देश के विजनरी प्रधानमंत्री रामभरोसे ने वैज्ञानिकों और नीति आयोग से पूछा कि मंगलयान को अपने देश में यातायात के साधन के रूप क्यों इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है? सुझाव पंसद आया और इसे 2040 तक अमल में लाने की योजना पर काम शुरू हो गया. लेकिन श्रीहरिकोटा में आज जो हो रहा था कि उसका अपना महत्व था. इसरो के वैज्ञानिक कंट्रोल में रूम तैयार थे. नासा वाले पोजीशन ले चुके थे. दुनिया भर के वैज्ञानिक और अध्येता दम साधकर देख रहे थे. नागपुर वाले वेदपाठी महापंडित ने शंख फूंका... पूं...ऊ...ऊ... ऊ… पाकिस्तान से आये तिलकधारी मौलानाओं ने घड़ियाल बजाने शुरू किये. ग्यारह हज़ार नारियल एक साथ फोड़े गये और मंगलायन चल पड़ा पकौड़े लेकर. थोड़ी देर बाद कंट्रोल रूम के वैज्ञानिको ने यह सूचना दी कि मिशन कामयाब हो गया है. मंगलयान सफलतापूर्वक अपनी मंजिल की ओर बढ़ रहा है. दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों ने गले लगकर एक-दूसरे को बधाई दी. लेकिन भारत के प्रधानमंत्री श्री रामभरोसे बहुत गंभीर थे. परियोजना की सफलता को लेकर वे और ज्यादा आश्वस्त होना चाहते थे. उन्होंने इसरो के निदेशक को पास बुलाया और पूछा- पकौड़े के साथ चटनी रखवा दी थी ना दोनों तरह की? इसरो के निदेशक ने जवाब में थंप्स अप किया. पास खड़े नासा के डायरेक्टर ने एचआरडी और साइंस एंड टेक्नोलॉजी मिनिस्टर सपना मल्होत्रा से कहा- कितने परफेक्शनिस्ट हैं आपके प्रधानमंत्री! सपना ने मुस्कुरा कर जवाब दिया- हां बिल्कुल अपने गुरु की तरह. ~पकौड़ेश्वरम वंदे जगदगुरूम्~
पुस्तक का नाम: प्रजातंत्र के पकौड़े












