प्रभात रंजन राइटर हैं. किताब लिखी है ‘कोठागोई’. सीतामढ़ी, बिहार से हैं और पढ़ाते हैं डीयू के जाकिर हुसैन कॉलेज में. एक ब्लॉग भी चलाते हैं. लिटरेचर का. जानकी पुल के नाम से. इनकी एक और किताब आई है पालतू बोहेमियन. इनसे prabhatranja@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. हिंदी में ऐसे लेखक अधिक नहीं हैं जिनकी रचनाएं आम पाठकों और आलोचकों के बीच सामान रूप से लोकप्रिय हो. ऐसे लेखक और भी कम हैं जिनके पैर किसी विचारधारा की बेड़ी से जकड़े ना हो. मनोहर श्याम जोशी के लेखन,पत्रकारिता को अपने शोध-कार्य का विषय बनाने की ‘रिसर्च स्कोलर्स’ में होड़ लगी थी. प्रभात रंजन ने न सिर्फ जोशी जी के लेखन पर अपना शोध-कार्य बखूबी किया बल्कि उनके साथ बिताए गए समय को इस संस्मरण की शक्ल देकर एक बड़ी ज़िम्मेदारी पूरी की है. हिंदी फ़िल्मों और डेली सोप ओपेरा के लीजेंड्री राइटर मनोहर श्याम जोशी के जीवन से जुड़े अनेक वृत्तांत इस पुस्तक में हैं जो काफ़ी दिलचस्प हैं.
बहरहाल, बात जोशी जी के लखनऊ दिनों की हो रही थी, तो उन दिनों लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों में लखनऊ के तीन मूर्धन्य लेखक यशपाल, अमृतलाल नागर और भगवती चरण वर्मा मौजूद रहते थे. उन तीनों की मौजूदगी में उन्होंने अपनी कहानी 'मैडिरा मैरून' सुनाई और उस कहानी से उनकी पहचान बन गई. मैं किस्से सुनता रहा लेकिन किस्सों में मुझे यह समझ में नहीं आ रहा था कि इनमें मेरे अच्छे कथाकार बनने के क्या गुर छिपे हुए थे! शायद मेरे चेहरे पर बेरुखी के भाव या कहिए, ऊब के भाव को उन्होंने ताड़ लिया होगा इसलिए सारे किस्सों के अन्त में उन्होंने सार के रूप में बताना शुरू किया, 'हबीबुल्ला होस्टल में रहते हुए मैंने एक बात यह सीखी कि अच्छा लेखक बनना है तो बहुत पढ़ना चाहिए. उन दिनों मेरा एक मित्र था सरदार त्रिलोक सिंह. वह बहुत पढ़ाकू था. दुनिया-भर के लेखकों को पढ़ता रहता था. उसने मुझे कहा कि तुम जिस तरह से बोलते हो, अगर उसी तरह से लिखना शुरू कर दोगे तो लेखक बन जाओगे. इसके लिए उसने मुझे सबसे पहले अमेरिकी लेखक विलियम सारोयां की कहानियां पढ़ने की सलाह दी. तो तुम्हारे लिए पहली सलाह यह है कि अमेरिकन सेंटर के पुस्तकालय के मेंबर बन जाओ. वहां एक से एक पुरानी किताबें मिलती हैं और समकालीन पत्र-पत्रिकाएं भी आती हैं. तुम्हारा दोनों तरह के साहित्य से अच्छा परिचय हो जाएगा.' कहानी लिखने की दिशा में आखिर में उन्होंने पहली सलाह यह दी, 'देखो, दो तरह की कहानियां होती हैं: एक तो वह, जो घटनाओं पर आधारित होती हैं, जिनमें लेखक वर्णनों, विस्तारों से जीवन्त माहौल बना देता है. डिटेल्स के साथ इस तरह की कहानियां लिखना मुश्किल काम होता है. तुम्हारी कहानी को पढ़कर मुझे साफ लगा कि अभी इस तरह की कहानियां लिखना तुम्हारे बस का नहीं है. न तो तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई वैसी है, न ही लेखक का वह धैर्य, जो एक-एक कहानी लिखने में महीनों-सालों का समय लगा दे सकता है. दूसरी तरह की कहानियां लिखना कुछ आसान होता है. एक किरदार उठाओ और उसके ऊपर कॉमिकल, कारुणिक रूप से लिख दो.' फिर कुछ देर रुककर बोले, 'उदय प्रकाश को ही देख लो. वह दोनों तरह की कहानियां लिखने में महारत रखता है. लेकिन उसको अधिक लोकप्रियता दूसरी तरह की कहानियां लिखने से मिलती है, जिसमें वह अपने आसपास के लोगों का कॉमिकल खाका खींचता है. मैं यह नहीं कहता कि उस तरह की कहानियां लिखनी चाहिए लेकिन आजकल हिन्दी कहानियां इस दिशा में भी बड़ी सफलता से दौड़ रही हैं.' उसके बाद उन्होंने हंसते हुए कहा, 'और तो और, तुम अपनी कहानी में भाषा का रंग भी नहीं जमा पाए. अगर भाषा होती तो कहता, निर्मल वर्मा की तरह लिखो.' लेकिन फिलहाल तो कुछ नहीं है. कहानी-चर्चा के बाद उन्होंने भाषा-चर्चा शुरू कर दी. मनोहर श्याम जोशी कोई शब्द लिखने से पहले कोश जरूर देखते थे. उन्होंने मुझसे पूछा, 'हिन्दी लिखने के लिए किस कोश का उपयोग करते हो?' मैं बगलें झांकने लगा क्योंकि कोश के नाम पर तब मैं बस फादर कामिल बुल्के के 'अंग्रेजी-हिन्दी कोश' को ही जानता था. उसकी जो प्रति मेरे पास थी, वह मैंने खरीदी नहीं थी बल्कि मेरे चचेरे भाइयों ने करीब दस साल उपयोग के बाद मुझे दे दी थी. हिन्दी लिखने के लिए भी कोश देखते रहना चाहिए, यह बात मुझे पहली बार तब पता चली जब मैं हिन्दी में पी-एच.डी. कर रहा था. मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई की थी. हिन्दी के कुछ मूर्धन्यों से शिक्षा पाई थी लेकिन किसी ने भी मुझे या हिन्दी पढ़ने वाले दूसरे लोगों को भाषा के बारे में किसी प्रकार का ज्ञान नहीं दिया था. हिन्दी भाषा के अलग-अलग रूपों के बारे में पहला ज्ञान मुझे हिन्दी के एक ऐसे लेखक से मिला जिन्होंने ग्रेजुएशन से आगे पढ़ाई भी नहीं की और ग्रेजुएशन तक उन्होंने जिन विषयों की पढ़ाई की थी, उनमें हिन्दी नहीं थी. उन्होंने बड़ा मौलिक सवाल उस दिन मुझसे किया, 'तुम हिन्दी पट्टी वाले अपनी अंग्रेजी ठीक करने के लिए तो डिक्शनरी देखते हो लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि हिन्दी भाषा को भी ठीक करने के लिए कोश देखना चाहिए.' दिलचस्प बात यह है कि जोशी जी ने अपने जीवनकाल में एक भी उपन्यास या रचनात्मक साहित्य ऐसा नहीं लिखा, जो तथाकथित शुद्ध खड़ी बोली हिन्दी में हो. लेकिन 'आउटलुक', 'दैनिक हिन्दुस्तान' में उनके जो स्तम्भ प्रकाशित होते थे और उनमें अगर एक शब्द भी गलत छप जाता था तो वे सम्पादक से जरूर लड़ते थे. मुझे याद है कि 'आउटलुक' में उन्होंने एक बार अपने स्तम्भ में 'वह' लिखा, जिसे उस पृष्ठ के सम्पादक ने 'वो' कर दिया. बस, इतनी-सी बात पर उन्होंने तत्कालीन सम्पादक आलोक मेहता को इतनी बड़ी शिकायती चिट्ठी लिखी थी कि मैं हैरान रह गया था. भला इतनी छोटी-सी बात पर भी कोई इतना नाराज हो सकता है? भाषा को लेकर उनका मत स्पष्ट था. उनका मानना था कि साहित्यिक कृति तो लोग अपनी रुचि से पढ़ते हैं और पत्र-पत्रिकाओं को भाषा सीखने के उद्देश्य से. इसलिए उनकी भाषा की शुद्धता के ऊपर पूरा ध्यान देना चाहिए. लेकिन जब भी भाषा की शुद्धता को ध्यान में रखकर रचनात्मक साहित्य लिखा जाता है तो वह लद्धड़ साहित्य हो जाता है. उस दिन उन्होंने कई उदाहरण दिए लद्धड़ साहित्य के लेखक के रूप में. वे कहते थे कि भाषा से ही तो साहित्य जीवन्त हो उठता है. उदाहरणस्वरूप उन्होंने पहले अपने गुरु अमृतलाल नागर का नाम लिया. कहा कि भाषा पर उनकी इतनी जबर्दस्त पकड़ थी कि कानपुर शहर के दो मोहल्लों के बोलचाल के फर्क को भी अपनी भाषा में दिखा देते थे. जो भाषा की भंगिमाओं को नहीं जानते, वे साहित्य में भाषा की शुद्धता को लेकर अड़े रहते हैं, जबकि हिन्दी का मूल स्वभाव इसका बांकपन है. यह कभी भी एलीट समाज की भाषा नहीं बन सकती. यह अभी भी मूल रूप से उन लोगों की भाषा है जो एक ही भाषा जानते हैं अर्थात एकभाषी हैं. मुझे याद है कि जब लखनऊ से अखिलेश के सम्पादन में 'तद्भव' नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ तो उसमें मनोहर श्याम जोशी ने धारावाहिक रूप से 'लखनऊ : मेरा लखनऊ' संस्मरण-शृंखला लिखना शुरू किया. 'तद्भव' के हर अंक में प्रूफ की गलतियां बहुत रहती थीं. इसको लेकर उन्होंने एक पत्र 'तद्भव' के सम्पादक को लिखा जो पत्रिका में प्रकाशित भी हुआ. उस पत्र में उन्होंने अशुद्धियों को भाषा का 'डिठौना' कहा था, जो न हों तो भाषा को नजर लग सकती है. उस दिन उन्होंने कहा कि हिन्दी जिस दिन पूर्ण रूप से शुद्ध भाषा हो जाएगी, अपने मूल यानी लोक से कट जाएगी और मर जाएगी! मतलब यह कि उन्होंने मुझे कथ्य, भाषा, शैली- हर लिहाज से असफल लेखक साबित किया. मैं बहुत दुखी था और मन-ही-मन सोच रहा था कि मेरे समकालीनों में इतने लोगों की कहानियां, कविताएं मार-तमाम छपती रहती हैं, कई पुरस्कृत भी हो चुके थे, उनमें से किसी में उनको किसी तरह की कमी नहीं दिखाई देती थी. बस, मेरे लेखन में ही दिखाई दे रही थी. मन में निराशा तो बहुत थी लेकिन मन-ही-मन यह संकल्प भी कर लिया कि एक दिन मैं इनसे भी बड़ा लेखक बनकर दिखाऊंगा. लेकिन ऊपर से 'जी-जी' के अलावा कुछ और नहीं कह पाया.
किताब का नामः पालतू बोहेमियन
























