पीयूष बबेले पत्रकार हैं. 2004 से अब तक वे देश के अनेक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता कर चुके हैं. इस दौरान खोजी पत्रकारिता में उन्होंने अपनी विशेष पहचान बनाई है. पत्र पत्रिकाओं और वेबसाइट्स के लिए वह लगातार लिखते रहे हैं. इनमें से बहुत से लेख आजादी के बाद वाले इतिहास के भ्रामक चित्रण के खिलाफ रहे हैं. देश में आम चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है. सारे दल और राजनैतिक गतिविधियां आदर्श आचार संहिता के दायरे में आ चुकी है. ऐसे में यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि नेहरू को क्यों लगता था कि विरोधियों के प्रचार तंत्र के सामने कांग्रेस कमजोर पड़ रही है. पेश है पुस्तक का एक अंश:
अगर बापू ने कांग्रेस को सिरे से ही खत्म कर इसे सामाजिक संगठन में बदलने की बात कही थी, तो नेहरू भी कांग्रेस में आ रही बुराइयों और सुस्ती से अंजान नहीं थे. वे कांग्रेस भंग नहीं करने के निर्णय पर पहुंचे तो इसकी एक वजह यह भी रही होगी कि क्यों छींका फोड़कर बिल्लियों का भाग जगाया जाए? वे लगातार कांग्रेसियों को इस बात से आगाह करते रहे कि कांग्रेसी रास्ता भटक रहे हैं, गफलत में पड़ रहे हैं, आलसी हो रहे हैं. उन्होंने कांग्रेसियों को बार-बार इस बात के लिए फटकार लगाई कि वे अब पहले की तरह आम आदमी से नहीं जुड़े हैं. यानी नेहरू की कोशिश थी कि कांग्रेस पहले की ही तरह ऐसा राजनैतिक संगठन बना रहे, जिसके एजेंडे में सामाजिक कार्यों के लिए भी बराबर की जगह हो. इसकी स्पष्ट झलक उन पत्रों में मिलती है जो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए हर पखवाड़े वे राज्यों के मुख्यमंत्रियों को लिखा करते थे. 3 जून 1949 के ऐसे ही पत्र में नेहरू लिखते हैं: ‘‘इस समय देश के बहुत से भागों में, बहुत सारे समूह सरकार और कांग्रेस के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन कर रहे हैं. दुर्भाग्य की बात यह कि देश के ज्यादातर इलाकों में कांग्रेसी अपनी वह भूमिका नहीं निभा रहे हैं, जो उन्हें निभानी चाहिए थी. सरकार उस तरह काम नहीं कर सकती, जिस तरह कांग्रेस को काम करना चाहिए. इसलिए यह बहुत जरूरी हो गया है कि हम मौजूदा समस्याओं और आलोचनाओं से सकारात्मक ढंग से निबटें. सिर्फ दमन के जरिए किसी बड़ी समस्या से नहीं निबटा जा सकता. हालांकि, जब राज्य की सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाए तो दमन का अपरिहार्य रास्ता भी अपनाना पड़ता है. हमें ऐसे आर्थिक कार्यक्रमों पर काम करना चाहिए और जहां तक संभव हो सके लोगों की दिक्कतें दूर करनी चाहिए. दुर्भाग्य से यह सब एक झटके में तो हो नहीं सकता. इसके अलावा गांव के लोगों से हमें वही पुराना इंसानी और निजी रिश्ता कायम करना होगा, जो रिश्ता एक जमाने में कांग्रेस के लोग बड़े कारगर ढंग से बनाया करते थे. हमारे लोगों को गांव और दूसरी जगहों पर जाना चाहिए. लोगों को हालात के बारे में और हमारी मजबूरियों के बारे में बताना चाहिए. अगर कोई रिश्ता दोस्ताना और इंसानी ढंग से बन जाए तो वह बहुत दूर तक जाता है. लगता है, जमीनी स्तर के ये निजी ताल्लुकात हम खो बैठे हैं. अब बहुत कम लोग उस तरह जमीन पर उतर रहे हैं, जैसे वे पहले उतरा करते थे. नतीजा यह निकलता है कि लोग केवल सरकार के विरोधियों और आलोचकों के संपर्क में आते हैं, जबकि कांग्रेस उन्हें अब सिर्फ एक सरकारी मशीनरी की तरह दिखती है. यह बहुत जरूरी है कि समस्या के इस पहलू पर हमारे मंत्री और कांग्रेस के हमारे साथी तुरंत गौर करें.’’ पत्र के इस अंश से कितना साफ दिखता है कि कांग्रेस भले ही 16 मई 2014 को भारत के लोकतांतिक इतिहास में सबसे बुरी तरह लोकसभा चुनाव हारी हो, लेकिन इस हार के पीछे प्रवृत्तियां वही रहीं, जिनकी ओर नेहरू ने शुरू में ही सचेत कर दिया था. 1949 से 2014 तक का सफर यह बताता है कि भले ही नेहरू कांग्रेसियों को सरकारी मशीन बन कर जमीन से कट जाने के लिए आगाह कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस के लोग काफी हद तक सरकारी मशीन बनते गए. और वे जनता से उस तरह का संवाद नहीं कर पाए, जैसा संवाद कांग्रेस के विरोधी करते रहे हैं. नेहरू भले ही कांग्रेस के खिलाफ होने वाले दुष्प्रचार से चुनाव न हारे हों, लेकिन 1989 में राजीव गांधी और 2014 में मनमोहन सिंह की हार के पीछे एक बड़ी वजह यह रही कि कांग्रेस अपने खिलाफ हो रहे प्रचार का जवाब देने की स्थिति में ही नहीं आ पाई. 4 जून 1949 को मुख्यमंत्रियों को संबोधित एक अन्य पत्र में नेहरू कहते हैं: ‘‘मुझे यह कहना पड़ेगा कि कांग्रेस के लोग सुस्त हो गए हैं. तेजी से बदलती दुनिया में दिमाग के जड़ हो जाने और मुगालते में रहने से ज्यादा खतरनाक कोई चीज नहीं है. हम लोग सरकारी जिम्मेदारियों से दबे हुए हैं. हमें रोज समस्याओं के पहाड़ से टकराना होता है और उन्हें सुलझाने के लिए हम कोई कसर नहीं उठा रखते. बुनियादी मुद्दों के बारे में सोचने के लिए तो हमें वक्त ही नहीं मिलता. कई बार हम ऐसे मुद्दों में उलझ जाते हैं, जो महत्वपूर्ण तो हैं, लेकिन न सिर्फ अप्रासंगिक हैं, बल्कि मौजूदा हालात में बेहद खतरनाक भी हैं. इसीलिए अलगाववादी प्रवृत्तियां और प्रांतवाद, भाषा के आधार पर राज्य, यहां तक कि भाषा का सवाल या कानून या दबाव के जरिए लोगों को ज्यादा नैतिक बनाने जैसे सवाल हमारे दिमागों को घेरे हुए हैं. ऐसा लगता है, जैसे हम सोच रहे हों कि आजादी की लड़ाई तो अब खत्म हो गई है और हमारे पास अब खूब फुर्सत है कि फालतू के मुद्दों पर सिर फुटव्वल करें. आप समझ लीजिए कि हम केवल राजनैतिक रूप से आजाद हुए हैं, आजादी की असली लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. आर्थिक रूप से अभी हम आजाद नहीं हुए हैं और राजनैतिक आजादी के मामले में भी हमें लगातार चौकन्ना रहना है. ...जनता के साथ हमारा (कांग्रेस का) संपर्क खत्म हो रहा है. हम जनता को हल्के में लेते हैं और ऐसा करना हमेशा ही घातक होता है. हम अपनी पुराने नाम और प्रतिष्ठा के बल पर टिके हैं. उसमें कुछ दम है और हम उसी के सहारे आगे बढ़ते रहे हैं. लेकिन पुरानी पूंजी हमेशा नहीं बनी रहेगी. बिना कमाए संचित पूंजी पर जीना अंततः हमें दीवालियेपन की कगार पर ले जाएगा.’’ 2018 में कांग्रेस वाकई दीवालियेपन के कगार पर आ गई है. लोकसभा में उसके पास महज 48 सीटें हैं. देश में पंजाब इकलौता बड़ा राज्य है, जहां उसकी सरकार बची है. एक-एक कर सारे बड़े राज्य उसके हाथ से निकल गए. खुद नेहरू का गृहराज्य उत्तर प्रदेश सत्ता के लिहाज से ही नहीं, वोट बैंक के लिहाज से भी 29 साल से कांग्रेस के हाथ से फिसला हुआ है. अपनी हालत सुधारने के लिए दिसंबर 2017 में कांग्रेस ने अपना अध्यक्ष बदला. सोनिया गांधी की करीब दो दशक तक चली अध्यक्षता के बाद उनके पुत्र राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया है. राहुल लगातार उस मुहावरे को खोजने में लगे हैं, जो पार्टी को इस मुल्क में पुरानी लोकप्रियता दिला सके. लेकिन वह चीज जो किसी भी राजनैतिक जीत के लिए पहली जरूरत है, वह अब भी नजर नहीं आ रही है. और वह चीज है- जोश. तो कांग्रेस जोश कहां से लाए? तो कांग्रेस क्या करे? क्या नेहरू ने इन हालात के बारे में भी पहले से कुछ कह रखा है. शायद हां, 2 फरवरी 1950 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू कहते हैं: ‘‘तो हमें क्या करना चाहिए! अव्वल बात तो यह कि हम अपने दिमागों को जड़ और काम करने के ढंग को घमंडी न होने दें. इससे बड़ा खतरा और कुछ नहीं है. हमें आम जनमानस की नब्ज पकड़नी होगी और उनका भरोसा हासिल करना होगा. हम ऐसा तभी कर पाएंगे, जब हम अंत तक काम करते रहें और उन कामों के कुछ नतीजे हासिल हों. जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि हमें न सिर्फ जनता के लिए काम करना है, बल्कि जनता के साथ काम करना है. हमें हर वर्ग का सहयोग चाहिए, लेकिन उसमें भी सबसे पहले हमें आम आदमी का सहयोग हासिल करना होगा.’’ यहां नेहरू कांग्रेस को जमीन पर जाने की हिदायत दे रहे हैं और बार-बार समझा रहे हैं कि अगर जड़ों से कट गए तो फिर कहीं के नहीं रहेंगे. इसके बाद नेहरू कांग्रेस को एक और बड़े संकट से आगाह कर रहे हैं. वह संकट है बड़े मुद्दों पर एआईसीसी का ढुलमुल रवैया और बड़े नेताओं का धीरे-धीरे पार्टी से बाहर होते जाना. इस समय तक सरदार पटेल दुनिया से विदा हो चुके थे. वहीं आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव, जय प्रकाश नारायाण और राम मनोहर लोहिया जैसे नेता न सिर्फ पार्टी से छोड़ चुके थे, बल्कि देश के पहले आम चुनाव में कांग्रेस का मुख्य विपक्ष बनने वाले थे. 2 जून 1951 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू कहते हैं: ‘‘लोकतंत्र में इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता कि सरकार या जनता आत्ममुग्ध हो जाए. दुर्भाग्य की बात है कि ऊंची आवाज में बात करने के अलावा हर मामले में हमारे अंदर आत्ममुग्धता और उदासीनता घर करती जा रही है. हमारी कांग्रेस की राजनीति भी काफी हद तक हवा-हवाई होती जा रही है. इस बात की खूब चर्चा हो रही है कि लोग कांग्रेस से जा रहे हैं और खासकर बड़े लोग कांग्रेस छोड़ रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद किसी भी बड़े मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से बहस नहीं हो रही है. कोई सोचता होगा कि जब देश के सामने इतने बड़े-बड़े मुद्दे हैं तो ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी में उन पर जोरदार बहस होनी चाहिए, लेकिन अब एआइसीसी ढुलमुल तरीके से मिलती है और अपना रूटीन काम करती रहती है. वहां इस बारे में चर्चा नहीं होती कि वह कौन-कौन सी बड़ी दिक्कतें हैं, जो देश को और कांग्रेस को बीमार कर रही हैं. लगता है, कहीं कुछ बड़ी गड़बड़ हो गई है. धीरे-धीरे हमारी राजनीति पार्लर वैरायटी होती जा रही है. मैं आशा करता हूं कि हम अपने आप को इस शिकंजे से निकाल लेंगे, क्योंकि यह किसी भी अच्छे काम के लिए बहुत बुरा है.’’ जो बात नेहरू समझा रहे थे, वह उनके किसी उत्तराधिकारी ने नहीं समझी. और समझी भी तो इस संकट का कोई तोड़ नहीं खोज पाया. यह समस्या थी बड़े नेताओं के कांग्रेस से बाहर जाने की. लेकिन कांग्रेस से बड़े नेताओं के बाहर होने का असली सिलसिला इंदिरा गांधी के समय शुरू हुआ. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इंदिरा गांधी के समय एक तरह से बड़े नेताओं ने इंदिरा को ही कांग्रेस से बाहर कर दिया था. उसके बाद इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (इंदिरा) बनाई. और आज जो कांग्रेस हमें दिखाई देती है, वह इंदिरा की बनाई कांग्रेस ही है, हालांकि उसका नाम एक बार फिर से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हो गया है. फिर अगर, जिस तरह नेहरू बड़े नेताओं के पार्टी से निकलने को लेकर फिक्रमंद थे, बाद का नेतृत्व भी अगर उसी तरह फिक्रमंद होता, तो शायद आज कांग्रेस का सूरतेहाल कुछ और होता. जरा देश के राजनैतिक क्षितिज पर नजर दौड़ाएं तो भारजीय जनता पार्टी और उसके गोत्र की पार्टियों के अलावा ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के बागी नेताओं से ही बनी हैं. कश्मीर में पीडीपी के संस्थापक मुफ्ती मुहम्मद सईद पहले कांग्रेसी ही थे. उड़ीसा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक पिछले 18 साल से मुख्यमंत्री हैं. बीजू पटनायक किसी जमाने में कांग्रेस के दिग्गज नेता हुआ करते थे. तमिलनाडु में काबिज दोनों पार्टियां के कामराज की पूजा करती हैं, कामराज को भी इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेस से अलग होना पड़ा था. कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर की सरकार है, लेकिन उसके संस्थापक एच डी देवगौड़ा भी कभी कांग्रेसी थे. महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार प्रदेश में कांग्रेस के स्तंभ थे. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद तो पुरानी कांग्रेसी हैं ही, उन्होंने अपनी पार्टी का नाम तक तृणमूल कांग्रेस ही रखा है. आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस का तो नाम ही कांग्रेस के मुख्यमंत्री रहे वाइएसआर राजशेखर रेड्डी के नाम पर पड़ा है. यानी कांग्रेस में हो रहे जिस विघटन की ओर नेहरू बहुत पहले ध्यान दिला रहे थे, उस पर कांग्रेस के बाद के नेतृत्व ने बहुत ध्यान नहीं दिया. आज कांग्रेस की हालत यह है कि वह अपने कुनबे से छिटके, लोगों की पार्टियों को गठबंधन के लिए मनाती घूम रही है. नेहरू के बाद के कांग्रेस नेतृत्व ने काफी हद तक इस बात की अनदेखी की कि कांग्रेस कहने को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है, लेकिन असल में वह एक पार्टी न होकर बहुत सी क्षेत्रीय अस्मिताओं का जमघट है. अगर वह क्षेत्रीय नेताओं को संतुलित नहीं रखेगी तो देर-सवेर खतरे में पड़ेगी. कांग्रेस आज पूरी तरह उस शिकंजे में है, जिससे बचने के लिए नेहरू बार-बार आगाह कर रहे थे.
किताब का नामः नेहरू मिथक और सत्य












