इसके पीछे नीतीश कुमार का वो बयान है, जिसमें उन्होंने कहा है कि नितिन गडकरी के मंत्रालय के तहत शुरू हुई नमामि गंगे परियोजना पूरी तरह से फ्लॉप हो गई है. 24 जून को बिहार की राजधानी पटना में नीतीश ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि गंगा की न तो निर्मलता बची है और न ही अविरलता. उन्होंने गडकरी की जलमार्ग परियोजना को भी फ्लॉप करार दिया है. और ये सब उन्होंने उस कार्यक्रम में कहा है, जिसे केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर आयोजित किया था और इसमें केंद्रीय पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन भी मौजूद थे. इस दौरान नीतीश ने कहा-
'केंद्र सरकार गंगा को लेकर गलत आंकड़े दे रही है. गंगा नदी में काई दिखाई देने लगी है, जैसे जमे हुए पानी में दिखती है. कई जगहों पर गंगा का पानी नाले के पानी जैसा हो गया है.'

नीतीश कुमार ने गंगा सफाई के बहाने नितिन गडकरी और केंद्र सरकार पर हमला बोला है.
नीतीश कुमार ने नितिन गडकरी के बहाने सीधे तौर पर बीजेपी पर निशाना साधा है, लेकिन इससे पहले खुद नितिन गडकरी भी नीतीश कुमार और उनकी सरकार पर निशाना साध चुके हैं. नितिन गडकरी ने नीतीश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि बिहार में जमीन न मिलने की वजह से 2 लाख करोड़ रुपये की सड़क परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं.
लेकिन क्या बात इतनी सीधी है?
शायद नहीं. ऊपरी तौर पर जो लड़ाई नीतीश बनाम गडकरी या फिर जदयू बनाम बीजेपी दिख रही है, दरअसल उस लड़ाई का असली पात्र तो कोई और ही है. इस बात को समझने के लिए अक्टूबर 2005 का वो दिन याद करिए, जब बिहार में चुनाव होने के बाद किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. चुनाव नतीजे ये तो बता रहे थे कि लालू यादव की 15 साल की सत्ता धराशाई हो गई है, लेकिन उस पर काबिज कौन होगा, ये तय होना बाकी था. वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए में नीतीश कुमार बतौर केंद्रीय मंत्री शामिल रह चुके थे, लेकिन 2004 के चुनाव में हार के बाद बीजेपी-जदयू गठबंधन में दरार पड़नी शुरू हो चुकी थी.
इसके बाद भी 2005 में जब 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा के चुनाव हुए तो बीजेपी और जदयू ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था. बीजेपी के खाते में 55 सीटें आई थीं, जबकि जदयू के पास 88 सीटें थीं. राजद 15 साल की सत्ता के बाद 54 सीटों पर सिमट गई थी. अब राजद और लालू को बिहार की सत्ता से बाहर रखने के लिए जदयू और बीजेपी का मिलकर सरकार बनाना ज़रूरी था, लेकिन गठबंधन में पड़ी गांठ इसके आड़े आ रही थी.

जब बीजेपी के बड़े नेता नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने को तैयार नहीं थे, अरुण जेटली ने सबकी बात अनसुनी करके नीतीश को मुख्यमंत्री बनवाया. (Photo : Outlook)
इस गांठ को खोलने का काम किया अरुण जेटली ने, जो उस वक्त बीजेपी के महासचिव थे और बिहार में पार्टी की जिम्मेदारी उनके ही कंधों पर थी. लिहाजा अरुण जेटली ने अपनी पार्टी के ही लोगों की बात अनसुनी करते हुए सीधे नीतीश से संपर्क साधा और उन्हें बीजेपी के समर्थन से बिहार का मुख्यमंत्री बनने का ऑफर दिया. नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बन गए और उनका वो छात्र जीवन का सपना पूरा हो गया, जब एक दिन उन्होंने अपने दोस्तों के सामने कहा था कि सत्ता तो किसी भी तरह से हासिल करूंगा, लेकिन सत्ता हासिल कर अच्छा काम करूंगा. उन्हें सत्ता हासिल हो गई और जिस अरुण जेटली की बदौलत उन्हें यह सत्ता हासिल हुई, उसे वो कभी नहीं भूले.
फिर नीतीश बनाम नितिन गडकरी क्यों?

नीतीश कुमारने नितिन गडकरी और उनके काम-काज के तरीकों पर सवाल उठाए हैं. गडकरी भी पहले ऐसा कर चुके हैं.
2009 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में भी परिवर्तन हुआ था और केएस सुदर्शन की जगह ले ली थी मोहन भागवत ने. सरसंघचालक बनने के बाद अगस्त 2009 में भागवत से एक टीवी इंटरव्यू में पूछा गया कि राजनाथ सिंह के बाद बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा? टीवी इंटरव्यूवर ने उनके सामने चार नाम रखे थे. ये नाम थे अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू और नरेंद्र मोदी. इंटरव्यू लेने वाले थे अर्णव गोस्वामी और उन्होंने भागवत से पूछा कि क्या कोई पांचवा, छठा या सातवां नाम भी हो सकता है. उस वक्त भागवत ने जवाब दिया था कि ये फैसला पार्टी को करना है, लेकिन पार्टी को इन चार नामों के अलावा भी सोचना चाहिए.
जब राजनाथ सिंह का कार्यकाल खत्म हो गया तो नए अध्यक्ष के तौर पर नितिन गडकरी की नियुक्ति हो गई. वो उस वक्त 52 साल के थे और पार्टी के सबसे कम उम्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. ये सब संघ मुख्यालय से तय हुआ था. कहा जाता है कि संघ की पहली पसंद नरेंद्र मोदी थे, लेकिन मोदी ने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र की राजनीति में आने से इन्कार कर दिया. इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने गडकरी का नाम सुझाया जिसे संघ ने खुशी-खुशी मान लिया.
2012 से शुरू हुई गडकरी की मुश्किल

बतौर बीजेपी अध्यक्ष पहला कार्यकाल खत्म होने से पहले ही गडकरी पर सवाल उठने लगे थे.
नितिन गडकरी के लिए मुश्किलें शुरू हुईं 2012 में, जब उनका कार्यकाल खत्म होने वाला था. इस बात का पता पार्टी के सभी नेताओं को था. उसी दौरान एसएस अहलूवालिया का राज्यसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा था. नितिन गडकरी इस सीट पर लंदन के कारोबारी अंशुमन मिश्रा को उतारना चाहते थे, जो पार्टी के कुछ बड़े चंदा दाताओं में से एक थे. लेकिन पार्टी के ही कुछ नेताओं ने इसका विरोध कर दिया और नितिन गडकरी पर राज्यसभा की सीट बेचे जाने के आरोप लगने लगे. खासा हंगामा होने के बाद गडकरी ने फैसला वापस ले लिया और एक बार फिर से एसएस अहलूवालिया को ही राज्यसभा भेजा गया. इससे अंशुमन मिश्रा नाराज हो गए और उन्होंने पार्टी को खूब भला-बुरा कहा. इस दौरान गडकरी अंशुमन मिश्रा के बचाव में आ गए, जिसकी वजह से अरुण जेटली और उनके जैसे कई और नेता नाराज हो गए.
गडकरी की वजह से ही जेटली 2009 में बीजेपी अध्यक्ष नहीं बन पाए और अब उन्हें मौका भी मिल गया था. इसी दौरान गडकरी का कार्यकाल पूरा हो चला था और पार्टी को नए अध्यक्ष की ज़रूरत थी. नरेंद्र मोदी की वजह से संजय जोशी को गडकरी पार्टी से निकाल चुके थे. इसके बाद भी नागपुर की पूरी लॉबी नितिन गडकरी को दोबारा पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने की कवायद में जुट गई. गडकरी संघ के चहेते थे और इस वजह से संघ भी चाहता था कि गडकरी को दूसरा कार्यकाल मिल जाए. इसके बाद बीजेपी को भी अपने संविधान में संशोधन करना पड़ा. सितंबर 2012 में पार्टी के संविधान में संशोधन हुआ, ताकि गडकरी को दूसरी बार पार्टी का अध्यक्ष बनाया जा सके.
दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए बदला गया था पार्टी का संविधान

अरविंद केजरीवाल और अंजली दमानिया ने नितिन गडकरी के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए थे.
लेकिन इसी दौरान गडकरी और उनकी कंपनी विवादों में आ गई. सितंबर 2012 में जब गडकरी को दोबारा पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने के लिए पार्टी के संविधान में संशोधन किया गया, उसी दौरान एक एंटी करप्शन एक्टिविस्ट अंजली दमानिया ने आरोप लगाया कि गडकरी महाराष्ट्र में हुए सिंचाई घोटाले में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के खिलाफ कुछ नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि अजीत और वो एक दूसरे के कारोबारी हित देखते रहे हैं. अगले ही महीने उस वक्त के ऐक्टिविस्ट और अब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने गडकरी की कंपनी को बांध बनाने के लिए 100 एकड़ खेती की जमीन सौंप दी है. केजरीवाल ने कहा कि गडकरी नेता नहीं कारोबारी हैं और वो अपने कारोबार के लिए पार्टी का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसके तुरंत बाद ही अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन आरोपों को खारिज़ कर दिया.

संघ और पार्टी दोनों ही सफाई देते रहे, लेकिन गडकरी का नुकसान हो चुका था.
लेकिन नुकसान हो चुका था. इसी बीच मीडिया में गडकरी की कंपनी पूर्ति समूह के घोटालों में शामिल होने की खबर आई. पूर्ति समूह चीनी का उत्पादन करने वाली कंपनी थी, जो विदर्भ में थी. कंपनी बिजली बनाने से लेकर एथनॉल तक बनाती थी. आरोप लगा कि इस कंपनी में कोऑपरेटिव बैंक के पैसे लगे हैं. इसके अलावा ये भी सामने आया कि रिजेंसी एक्वीफिन नाम की कंपनी ने गडकरी की कंपनी के चार करोड़ रुपये के शेयर खरीदे और गडकरी ने उस कंपनी को 26 लाख रुपये उधार दिए. पूर्ति कंपनी घाटे में चल रही थी, जिसने बाद में रिजेंसी इक्वीफिन को 95 लाख रुपये का लोन दिया.
इसके अलावा गडकरी की एक कंपनी को 164 करोड़ रुपये का लोन देने की भी बात सामने आई, जबकि उस कंपनी की कुल संपत्ति ही 36,000 रुपये की थी. ये पैसे ग्लोबल सेफ्टी विजन कंपनी की तरफ से दिए गए थे, जिसके मालिक दत्तात्रेय पांडुरंग माहिष्कर थे. ये वो आदमी थे, जिन्होंने महाराष्ट्र में गडकरी के मंत्री रहते हुए कई सड़कें बनवाई थीं. इनकी कंपनी में शरद पवार के भी शेयर थे. इन सारे आरोपों पर सफाई देने के लिए खुद नितिन गडकरी सामने आए और कहा कि कुछ भी गलत नहीं हुआ है और वो हर तरह की जांच के लिए तैयार हैं. इसके बाद भी मीडिया में अलग-अलग तरह से नेता गडकरी, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी और कारोबारी गडकरी की अलग-अलग खबरें छपने लगीं. इसकी वजह से गडकरी का नुकसान हो चुका था. संघ और बीजेपी दोनों ही गडकरी के बचाव में लगे हुए थे, लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
एमजी वैद्य ने बताया था मोदी का हाथ

नितिन गडकरी पर लगे आरोपों के लिए संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी एमजी वैद्य ने सीधे तौर पर मोदी को जिम्मेदार ठहराया था.
इसी दौरान संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी एमजी वैद्य ने एक ब्लॉग के जरिए लिखा कि गडकरी के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान के पीछे नरेंद्र मोदी का हाथ है, क्योंकि मोदी खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना चाहते हैं. उसी दौरान बीजेपी के नेता रहे रामजेठमलानी ने गडकरी के इस्तीफे की मांग कर डाली और कहा कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनना चाहिए. एमजी वैद्य ने लिखा था कि नरेंद्र मोदी को लगता है कि गडकरी के रहते हुए वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बन सकते हैं, इसलिए वो रामजेठमलानी का इस्तेमाल कर गडकरी को बदनाम कर रहे हैं.

गडकरी के खिलाफ खबरें लिखने वाले एक न्यूज चैनल के पत्रकार ने दावा किया कि इससे संबंधित कागजात उसे एक फाइव स्टार होटल में मिले थे. कागजात खुद अरुण जेटली ने दिए थे.
लेकिन अभी तक ये साफ नहीं हो पाया था कि आखिर गडकरी पर जो आरोप लगे हैं, उन्हें सामने लाने वाला कौन है. कारवां पत्रिका के मुताबिक मुंबई के न्यूज़ एक्स चैनल में काम करने वाले पत्रकार गणेश कानाते ने बताया-
'पूर्ति समूह से जुड़े कागजात के बारे में सिर्फ तीन लोग ही जानते थे. इनमें से एक थे जहांगीर पोचा जो चैनल के एडिटर थे, दूसरी उनकी पत्नी थीं रंजना जेटली, जो अरुण जेटली की भतीजी थीं और तीसरा मैं था. हम तीनों एक फाइव स्टार होटल में अरुण जेटली से मिले, जहां मुझे ये कागजात दिए गए. मैंने उन्हें पढ़ा और मुझे वो सच लगे, जिसके बाद मैंने खबर की.'हालांकि बाद में कानाते ने माना कि उस वक्त उन लोगों का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि उन आरोपों का कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया था.
बचाव में खड़ा रहा संघ

बीजेपी के साथ ही संघ भी गडकरी का बचाव करता रहा, लेकिन ये किसी काम न आया. गडकरी को इस्तीफा देना पड़ा.
इन सबके बीच बीजेपी और आरएसएस के मोहन भागवत और मनमोहन वैद्य नितिन गडकरी के बचाव में पूरी तरह से खड़े थे. लेकिन 22 जनवरी 2013 को इन्कम टैक्स विभाग की कई टीमों ने पूर्ति समूह के कई ठिकानों पर छापेमारी की. दूसरी बार पार्टी का अध्यक्ष बनने चले गडकरी और पार्टी की साख पर ये बट्टे जैसा था. उसी दिन लालकृष्ण आडवाणी और संघ के महासचिव भैयाजी जोशी ने मुंबई में गडकरी से मुलाकात की और उन्हें इस्तीफा देने के लिए कहा. इसके एक घंटे के अंदर ही गडकरी ने इस्तीफा दे दिया. और फिर संघ के चहेते रहे राजनाथ सिंह पार्टी के नए अध्यक्ष बन गए.
महाराष्ट्र पर भारी पड़ गई दिल्ली की राजनीति
और इस तरह से दिल्ली के अरुण जेटली महाराष्ट्र के नितिन गडकरी पर भारी पड़ गए. अरुण जेटली का पूरा सियासी करियर ही दिल्ली में रहा. वकालत और राजनीति दोनों ने उन्हें दिल्ली की मीडिया और खास तौर से अंग्रेजी मीडिया में ऊंचा रसूख दिया, जिसका उन्होंने भरपूर फायदा उठाया. वहीं नितिन गडकरी जब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने तो उन्होंने बयान दिया था कि वो दिल्ली में कभी भी रात नहीं गुजार पाए थे. पार्टी की बैठक में शामिल होने के लिए वो दिन में मुंबई से दिल्ली आते थे और बैठक खत्म होने के बाद वो फिर से मुंबई निकल जाते थे. दिल्ली में तीन साल रहकर भी गडकरी वो जगह नहीं बना पाए जो अरुण जेटली ने हासिल की थी और शायद यही वजह थी कि अरुण जेटली खेल कर गए और गडकरी को वापस मुंबई जाना पड़ा.
अब लौटते हैं बिहार में, जहां से सब शुरू हुआ

नीतीश कुमार अरुण जेटली को कभी नहीं भूल सकते. और यही वजह है कि वो केंद्र सरकार पर भले ही कुछ कहें, जेटली और उनके काम को वो हमेशा सराहते रहे हैं.
नीतीश कुमार अरुण जेटली का एहसान नहीं भूल सकते. अरुण जेटली के लिए वो कुछ भी कर सकते हैं, क्योंकि उन्हीं की बदौलत उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी. गडकरी मोदी के बाद सबसे ताकतवर माने जाने लगे हैं, जिससे दिल्ली के नेताओं मे नाराजगी है. इन दिल्ली के नेताओं में जेटली का भी नाम है, जो वाया नीतीश कुमार नितिन गडकरी पर निशाना साध सकते हैं. और नीतीश के इस हालिया बयान को अरुण जेटली की नज़दीकी से जोड़कर देखा जाना लाजिमी है.
क्या हो रहा है बिहार में, जिसकी वजह से इस पुराण की ज़रूरत पड़ी?
2019 में लोकसभा के चुनाव हैं. 2015 में बीजेपी से अलग होकर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ चुके नीतीश कुमार 2017 में घरवापसी कर चुके हैं. इसके बाद भी सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है. नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और बीजेपी के बीच सीटों के बंटवारे पर जो पेच फंसा हुआ है, उससे गठबंधन के टूटने तक की नौबत आ गई है.
बिहार में 40 सीटें हैं और गठबंधन में चार पार्टियां

बिहार में लोकसभा सीटों के बंटवारे पर पेच फंसा हुआ है. बीजेपी और जदयू अपने-अपने हिसाब से सीट शेयर चाहते हैं, लेकिन बात बनती नहीं दिख रही है.
बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं. लोकसभा चुनाव में गठबंधन के तौर पर एनडीए के पास बिहार में चार पार्टियां हैं-बीजेपी, जदयू, लोजपा और आरएलएसपी. 2014 में जब जदयू गठबंधन में नहीं थी, तो चुनाव में बीजेपी को 22, जदयू को दो, लोजपा को छह और आरएलएसपी को तीन सीटें मिलीं. अब बीजेपी उसी 2014 के लिहाज से सीट शेयर करना चाहती है. लेकिन नीतीश कुमार 2015 में हुए विधानसभा चुनाव के लिहाज से सीटों का बंटवारा चाहते हैं. बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू को 71 सीटें मिली थीं, जबकि बीजेपी के खाते में सिर्फ 53 सीटें आई थीं. इसी प्रदर्शन का हवाला देकर नीतीश कुमार अपनी पार्टी के लिए कम से कम 25 सीटें चाहते हैं. हालांकि नीतीश कुमार की इस मांग के पीछे 2014 का लोकसभा चुनाव भी है, जब वो एनडीए से अलग नहीं हुए थे.
बीजेपी और जदयू जब 2013 में एनडीए में एक साथ थीं, तो 2014 के चुनाव के लिए जदयू को 25 और बीजेपी को 15 सीटें देने की बात पक्की हो गई थी. 2009 के लोकसभा चुनाव में भी यही फॉर्म्यूला अपनाया गया था. लेकिन इसी बीच नीतीश कुमार एनडीए से अलग हो गए और ये गठबंधन नहीं हो पाया. अब नीतीश उस पुराने फॉर्म्यूले को दोहराना चाहते हैं, जबकि 2014 में अपने प्रदर्शन की बदौलत बीजेपी नीतीश को 15 सीटें देने को तैयार नहीं है.
पल-पल बदल रही है बिहार की राजनीति

बिहार में एनडीए में बीजेपी, जदयू, लोजपा और आरएलएसपी चार दल हैं और सभी को लोकसभा सीटें चाहिए.
नीतीश कुमार जिस सीट शेयरिंग के फॉर्म्यूले की बात कर रहे हैं, वो तब का है, जब उस गठबंधन में लोजपा और आरएलएसपी शामिल नहीं थे. साथ ही बिहार में जदयू बीजेपी से बड़ी पार्टी थी. 2014 के चुनाव ने सारे समीकरण बदल दिए हैं. लिहाजा नीतीश की मांगों को मानना बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों के लिए नामुमकिन जैसा ही है. नीतीश को भी इस बात का अंदाजा है, शायद इसीलिए वो 21 जून को आयोजित योग के कार्यक्रम से भी दूर रहे और मध्यप्रदेश के साथ ही छत्तीसगढ़ में भी अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी.
कहीं इन फैसलों के पीछे पीके तो नहीं?

प्रशांत किशोर ने ही जदयू और राजद को मिलाया था और बिहार में बहार के नारे के साथ नीतीश को सत्ता में वापस लेकर आए थे. अब एक बार वो फिर से सक्रिय दिखने लगे हैं.
सियासी गुणाभाग में एक अकेला शख्स जोज माहिर माना जाता है, उसे सियासत के लोग पीके के नाम से जानते हैं. पीके यानि प्रशांत किशोर, जिन्होंने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू और राजद को एक मंच पर लाकर बीजेपी का विजयी रथ रोक दिया था. पीके अपनी रणनीति में कामयाब रहे थे, लेकिन 20 महीने के अंदर ही नीतीश कुमार राजद पर आरोप लगाकर अलग हो गए और फिर बीजेपी के साथ सरकार बना ली. लेकिन अब एक बार फिर पीके सक्रिय हैं. पिछले 10 दिनों में पीके पटना और दिल्ली में नीतीश कुमार से मिल चुके हैं और माना जा रहा है कि इसी वजह से नीतीश कुमार इतने सख्त फैसले ले रहे हैं. नीतीश कुमार पीके की रणनीति को परख चुके हैं, लिहाजा उन्हें पीके पर भरोसा करने में कोई दिक्कत भी नहीं है. वहीं पीके ही पहले ऐसे शख्स हैं, जिनकी वजह से जदयू और बीजेपी के बीच खींचतान हो चुकी है. 2015 के चुनाव में जदयू की जीत के बाद प्रशांत किशोर को बिहार में राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया था, जिसका बीजेपी ने विरोध किया था. लंबे समय तक चले गतिरोध के बाद नीतीश कुमार ने पीके को राज्यमंत्री पद से हटा दिया था.
अब आगे क्या?
जदयू का 8 जुलाई को दिल्ली में राष्ट्रीय अधिवेशन है. वहां पर पार्टी कोई फैसला ले सकती है. हालांकि नीतीश कुमार फिलहाल बीजेपी की ओर से पहल किए जाने का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन बीच-बीच में केंद्र सरकार की आलोचना, सरकार के चार साल पूरा होने पर कसा गया तंज, रह-रहकर विशेष राज्य की मांग और फिर केंद्र सरकार के सबसे सफल मंत्रियों में से एक गडकरी के मंत्रालय और उनके काम-काज पर सवालिया निशान उठाकर नीतीश कुमार ने संकेत तो दे ही दिए हैं.
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