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भीमा कोरेगांव की असली कहानी, जो न दलित चिंतकों ने बताई, न मराठों ने

क्या सच में 500 महारों ने 28,000 की पेशवाई सेना को धूल चटा दी थी?

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एंग्लो-मराठा युद्ध की तस्वीर (फोटो क्रेडिट: विकी पीडिया )

भीमा कोरेगांव की लड़ाई पर अक्सर चर्चा होती रहती है. एक तरफ दलित आंदोलन के लोग हैं, जो कि इस लड़ाई को ब्राह्मण पेशवा के खिलाफ दलितों की निर्णायक जंग कहते हैं. वहीं कुछ मराठा संगठन इस लड़ाई में मराठा सेना की जीत के दावे करते हैं. दरअसल दोनों ही दावे तथ्यों से काफी दूर हैं.

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सन 1885 में इंडियन सिविल सर्विस के एक अधिकारी थे जेम्स कैम्पबेल. वो उस समय बॉम्बे प्रेसिडेंसी के तहत आने वाले इलाकों की बुनियादी जानकारी गजेटियर की शक्ल में छाप रहे थे. इसी साल पूना डिस्ट्रिक्ट का भी 3 भागों वाला गजेटियर छपा था. इस गजेटियर में भीमा कोरेगांव का पूरा ब्योरा मिलता है.

पूना से 19 किलोमीटर दूर शिरूर तालुका में से एक नदी निकलती है - भीमा. इसी के किनारे कोरेगांव नाम का छोटा सा कस्बा बसा हुआ है. 1818 की पहली जनवरी के रोज ये कस्बा जंग का मैदान बना हुआ था. जंग के नतीजों पर बहस के बावजूद ये कस्बा आज महाराष्ट्र के दलितों के लिए किसी तीर्थस्थल से कम नहीं है. तो आखिर पहली जुलाई, 1818 को हुआ क्या था? इसके कई ब्यौरे हमारे पास मौजूद हैं जिसके हिसाब से कहानी कुछ इस तरह से बनती है.

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भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में याद में बना विजय स्तंभ
भीमा-कोरेगांव की लड़ाई की याद में बना विजय स्तंभ
 

17 नवंबर, 1817 के रोज पूना का शनिवार वाडा पेशवा बाजीराव के हाथों से चला गया. पूना को छोड़कर बाजीराव कोंकण की तरफ निकल गया. इधर पूना का शनिवार वाडा कर्नल बर्र के हाथों छोड़कर कंपनी के जनरल स्मिथ ने पेशवा की सेना का पीछा करना शुरू किया. स्मिथ को डर था कि संख्या में कम होने की वजह से कोंकण में कंपनी के जवान भारी-भरकम पेशवाई सेना से पार नहीं पा सकेंगे. ऐसे में उसने बर्र को निर्देश दिया कि वो पूना से कुछ जवान कोंकण भेज दे. अगर पूना पर फिर से हमला होता है, तो वो पास ही के तालुके शिरूर से कंपनी के जवानों को बुला ले.

इधर पेशवा को खबर मिली कि कोंकण की तरफ से जनरल पुलित्जर के नेतृत्व में कंपनी की सेना उसकी तरफ बढ़ रही है, उसने दूसरी दफा अपना रास्ता बदला. अब पेशवा कोंकण के बजाय नासिक की तरफ बढ़ रहा था. रास्ते में उसे पता लगा कि नासिक के रास्ते में स्मिथ से मुठभेड़ हो सकती है. ऐसी स्थिति में पेशवा ने तीसरी बार अपना रास्ता बदला और फिर से पूना की तरफ कूच किया.

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इधर कर्नल बर्र को अपने खुफिया तंत्र से सूचना मिली कि पेशवा फिर से पूना की तरफ लौट रहा है. ऐसे में उसने शिरूर से और आदमी बुलाने में ही भलाई समझी. 31 दिसंबर, 1817 के रोज शिरूर से कंपनी की बॉम्बे नेटिव इन्फेंट्री की दूसरी बटालियन के 500 जवान, 300 घुड़सवार, मद्रास तोपखाने के 24 जवान और दो 6-पौंडर तोप के साथ कुल मिलाकर 834 लोगों का लश्कर पूना की तरफ बढ़ा. पूरी रात चलने के बाद इस लश्कर ने करीब 28 मील की दूरी तय की और सुबह करीब 10 बजे भीमा नदी के किनारे कोरेगांव पहुंचा. इस पूरे लश्कर की कमान थी कैप्टन फ्रांसिस एफ स्टोंटन के हाथ में. 3 जनवरी, 1818 को शिरूर से लिखे पत्र में स्टोंटन ने इस युद्ध का ब्योरा इस तरह से दिया है-


 

"पूना की तरफ बढ़ते हुए मैं सुबह 10 बजे कोरेगांव पहुंचा. मेरा आगे का रास्ता पेशवा की सेना ने रोक रखा था. 20,000 घुड़सवार, 8,000 पैदल जवान और दो तोपों के साथ पेशवा की सेना नदी के दूसरे किनारे पर आक्रमण के लिए तैयार खड़ी थी. इसके बाद मैंने कोरेगांव रुककर मुकाबला करने का निर्णय लिया. मैंने अपनी दो तोपों को जरूरी पोजीशन पर तैनात किया.

दुश्मन ने मेरे इरादों को भांपते हुए अरबों की तीन टुकड़ियों को हम पर हमला करने के लिए भेजा. पेशवा का तोपखाना भी उनकी मदद के लिए तैनात था. मैं माफ़ी के साथ कहना चाहता हूं कि गांव के नक्शे की बेहतर जानकारी की वजह से इन लोगों ने हमारी सबसे मजबूत पोजीशंस पर कब्जा जमा लिया. हम पूरे दिन अपनी खोई हुई पोजीशन को फिर से हासिल ना कर सके. रात करीब 9 बजे हम आखिरकार उन्हें पीछे धकेलने में कामयाब रहे."

 

1885 के पूना गजेट में मिले ब्योरे के हिसाब से अरब, गोसावी और मराठों की एक-एक टुकड़ी ने कंपनी सेना पर हमला बोला था. हर टुकड़ी में करीब 600 जवान शामिल थे. इन तीन टुकड़ियों ने मिलकर कंपनी सेना को गांव के एक कोने में धकेल दिया था. रात भर चले युद्ध में कंपनी के सैनिकों के पास ना तो खाना था और ना ही पानी. पेशवा के अरब सैनिकों ने कंपनी की दो में से एक तोप को अपने कब्जे में ले लिया. तोपखाने पर कब्जे में लेफ्टिनेंट चिजोम मारा गया. अरब सैनिकों ने उसका सिर काटकर पेशवा के पास भिजवा दिया.

6 फीट 7 इंच के लेफ्टिनेंट पेटीनसन के नेतृत्व में काउंटर अटैक से कंपनी सेना की स्थिति थोड़ी सुधरी और वो अपनी तोप को फिर से हासिल करने में कामयाब रहे. हालांकि इस कोशिश में लेफ्टिनेंट पेटीनसन बुरी तरह घायल हो गया.

इस बीच पेशवा को सूचना मिली कि स्मिथ अपनी सेना के साथ चाकन पहुंच चुका है. पेशवा ने कोरेगांव से हटने का निर्णय लिया और अपने लश्कर के साथ जेजुरी की तरफ बढ़ गया. स्टोंटन ने अपने खत में इस बात का जिक्र करते हुए लिखा है,

 

"2 तारीख की सुबह हमने उस पोस्टों पर पोजीशन ले ली जिन पर कल रात तक दुश्मन का कब्जा था. लेकिन दुश्मन ने हमारे ऊपर हमले का कोई प्रयास नहीं किया."

एक बेनतीजा युद्ध

भीमा-कोरेगांव की लड़ाई असल में किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई. पेशवा बहुत कमजोर स्थिति में था. ऐसे में वो किसी बिना मतलब के युद्ध में खुद की ताकत को नहीं झोंकना चाहता था. ऊपर से स्मिथ के आने की खबर मिलने के बाद उसने अपना ठिकाना बदलने में ही भलाई समझी.

स्टोंटन पूना में कर्नल बर्र की मदद के लिए शिरूर से निकला था. इस मुठभेड़ के बाद उसने शिरूर लौट जाने का निर्णय लिया. 3 तारीख को शिरूर से लिखे खत में उसने अपने इस कदम का स्पष्टीकरण देते हुए लिखा है कि उसके जवानों को 48 घंटे से खाना नहीं मिला था. ऐसे में वो आगे किसी मुठभेड़ की स्थिति में नहीं पड़ना चाहता था चुनांचे उसने शिरूर लौट जाने का फैसला लिया. सिर्फ मारने वालों के आंकड़े के हिसाब से यह युद्ध कंपनी के पक्ष में जाता है. कंपनी के कुल 111 जवान मारे गए थे, 149 जवान घायल हुए थे.

वी. लोंगर ने अपनी पुस्तक Forefront for Ever: The History of the Mahar Regiment में इस युद्ध में मारे गए भारतीय सैनिकों का जिक्र किया है. इस किताब के मुताबिक युद्ध में कुल 22 महार, 16 मराठा और 8 राजपूत सैनिक कंपनी की तरफ से लड़ते हुए मारे गए. कंपनी के दस्तावेजों में करीब 500 से 600 पेशवा सैनिकों के मारे जाने या घायल होने का अनुमान है.


1950 में अपने जन्मदिन पर महार रेजिमेंट के जवानों के साथ अम्बेडकर
1950 में अपने जन्मदिन पर महार रेजिमेंट के जवानों के साथ अम्बेडकर
 

भीमा-कोरेगांव दलितों का अस्मिता केंद्र कैसे बना?

भीमराव अम्बेडकर के पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सूबेदार थे. उनके जन्म के 1 साल बाद मई 1892 में ब्रिटिश शासन ने सेना के लिए मार्शल रेस थ्योरी को अमल में लाना शुरू किया और मई 1892 से महार रेजिमेंट में नई भर्ती बंद कर दी गई. अम्बेडकर महार जाति से आते थे. महाराष्ट्र की इस जाति का सैनिक इतिहास शिवाजी के समय से शुरू होता है. शिवाजी दौर से आखिरी पेशवा तक महार मराठा सेना का हिस्सा रहे थे और किले की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर होती थी. पहले विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य को सैनिकों की जरूरत पड़ी. इस समय महार रेजिमेंट को फिर से शुरू किया गया. लेकिन 1918 में युद्ध के बंद होने के बाद महार रेजिमेंट को फिर से बंद कर दिया गया.

1927 में अम्बेडकर ने पहली दफा अंग्रेजों के सामने सेना में महारों को बहाल करने की मांग रखी. इस सिलसिले में वो पहली बार भीमा-कोरेगांव आए. यहां उन्होंने महार युवकों से अपनी क्षत्रिय परम्परा को जारी रखने की अपील की. इसके बाद वो कई दफा भीमा-कोरेगांव आए. 1941 में अपने एक भाषण में अम्बेडकर ने भीमा-कोरेगांव का जिक्र करते हुए कहा कि इस जगह महारों ने पेशवा को हराया था. ये अम्बेडकर थे, जिनकी वजह से भीमा-कोरेगांव दलित अस्मिता का केंद्र बन गया.

 


 



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