ये ऋषभ हैं. दी लल्लनटॉप के नए साथी. अभी इस बरस यूपीएससी में सिविल सर्विसेस का इंटरव्यू देकर आए. नहीं हुआ. कह रहे हैं कि अब नहीं बनना कलेक्टर. हमने पूछा क्यों. अभी तो दो अटैंप्ट बाकी हैं. तो बोले. इंटरव्यू में अनुभव अच्छा नहीं रहा. अंट शंट पूछते रहे. मैकेनिकल में इंजीनियरिंग किया. पर पेपर दिया सोशियोलॉजी से. फिर भी इंटरव्यू में इंजीनियरिंग के सवाल पूछते रहे. नहीं बताया, तो भी खुरेंचते रहे. हमने कहा. जो मन करे सो करो. हर बार तो वही बोर्ड नहीं रहेगा न. और जब तक ब्रेक लेना है. हमारे लिए लिखो. तो लिखा. हमारे कहने पर. यूपीएससी पर ही लिखा. उन हजारों लाखों नौजवान लड़के लड़कियों के लिए लिखा. जो मुखर्जी नगर से लेकर तेलियरगंज तक अपना तेल जला रहे हैं. पढ़िए. और गुनिए. क्योंकि एक नौकरी का अंत दूसरी की शुरुआत भी हो सकता है.
उनके लिए जो टीना डाबी नहीं बन सके या जिनकी कहानियां उनके मन की कविताएं रह गईं...
दस लाख लोगों ने फॉर्म भरे. पांच लाख ने प्रीलिम्स दिया. 15 हज़ार पास होकर मेन परीक्षा में बैठे. 2700 इसमें पास होकर इंटरव्यू में गए. हज़ार लोग फाइनल लिस्ट में आये. डेढ़ सौ वेटिंग लिस्ट में हैं. भाई मजे हैं इनके. लाइफ में जो चाहा, पा गए. बाकी करम कूट रहे हैं. शायद उनके अन्दर वो बात नहीं है. शायद वो चार-पांच सालों में भी ना तो कुछ सीख सके, ना ही कुछ बन पाए. और शायद उनके लिए रास्ते बंद हो गए हैं. उनके लिए तो निश्चित ही जो 30-32 के हो गए हैं. करेंगे क्या अब? पछताएंगे अपनी बेवकूफियों पर. कोई नौकरी ले लिए होते. कुछ तो छोड़ के भी आये हैं. जिनका बैक-अप है वो तो निकल लेंगे बाकी को झाल बजाना पड़ेगा. का भईया? कलेक्टर बनने गए थे, चपरासियो नहीं बने. ये सवाल चैन छीन लेगा. कसम से. बिटिया की शादी ही कर दीजिए. इतनी मेहनत की, की ना, चलिए कोई बात नहीं. ये सलाह भी कम जालिम नहीं है. जिसको मिलती है वही जानता है. और उनका क्या जिनके पिताजी चाय बेचते हैं, रिक्शा चलाते हैं, बाल काटते हैं? बड़े बड़े वादे कर के घर से निकला था लौंडा. शाह फैज़ल के इंटरव्यू देख के. अब क्या मुंह दिखाएगा? अगर लड़की है तब तो क़यामत बरपा होगी.
सच में ऐसा ही है क्या?
अगर कोई कहे कि आप को ये नौकरी मिल जाएगी, वो मिल जायेगी. मोदी जी ने नई स्कीम निकाली है यूपीएससी परीक्षार्थियों के लिए, दिस-दैट-इट-वाज. जूतियाने का मन करता है. जाहिर सी बात है. पर एक जाहिर सी बात से जिंदगी सटक नहीं जाती है.
सच तो ये है कि आप ने जितना पढ़ा है और जितना समझा है, उसके दम पर आप किसी के भक्त तो नहीं रहे, किसी के भी नहीं. आप के पास सही को सही और गलत को गलत कहने का माद्दा है. आप सच और झूठ को पहचान सकते हैं. आत्मज्ञान से नहीं बल्कि सरकारी रिपोर्ट से, अखबार से, अपनी नजरे-इनायत से, सिंहावलोकन से. और ये मजाक नहीं है. आज समाज में हर क्षेत्र में आप जैसे लोगों की जरूरत है. जरा से नंबरों की वजह से आपने मिस किया है पर आपमें काबिलियत की कमी तो नहीं. ये आप भी जानते हैं. नहीं जानते तो दुखी तो नहीं होते. और अगर आप इस काबिलियत का इस्तेमाल अलग अलग क्षेत्रों में करते हैं तो.......? क्या मज़ा आएगा यार! एक बंदा जो सब समझता है और इतनी हैसियत रखता है कि रघुराम राजन को भी सवाल पूछ के परेशान कर सकता है, अगर वो पंचायत में है, बैंक में है, डेयरी लगा रहा है, पढ़ा रहा है वो क्या नहीं कर देगा! आखिर तैयारी तो इसीलिए कर रहे थे ना? स्टेटस और पॉवर के लिए कर रहे थे तो फिर तो जिंदगी भर दौड़ जारी रहेगी. दूसरी बात ये कि जिंदगी की कहानी 22 साल या फिर 30-32 साल में ही ख़त्म नहीं होती. कहानी तो भाई साहब चलती रहती है. रोमन सैनी की कहानी 22 में आईएएस बनने पर ही ख़त्म नहीं हुई. रिजाइन कर के फ्री एजुकेशन शुरू करना एक नया मोड़ था उनकी कहानी में. अभी कहीं सुना मैंने ‘अप्प दीपो भव’. तुम तो हो यार! इतनी रगड़ खाने के बाद भी खड़े हो! रास्ता तो तुम निकाल ही लोगे. अपने लिए ही नहीं, बाकियों के लिए भी. तुम्हारे मन की कविता तुम्हारी कहानी का एक अहम हिस्सा है.
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अगर सिविल सर्विसेज नहीं निकाल पाने से नाखुश हैं तो ये पढ़िए!
अगर आप खुशी को इस परीक्षा से जोड़ के बैठे हैं तो ब्रो, यू आर मिस्टेकेन. ये सही नहीं है. देखिये नीचे:
- एक हज़ार लोग पास हुए हैं.
- तेईस सर्विसेज हैं. एक सौ अस्सी आईएएस बने हैं. सत्तर-अस्सी आईपीएस. और बाकी कुछ-कुछ. कोई पोस्ट ऑफिस में भी है. कोई डिफेन्स एकाउंट्स में. सभी आईएएस ही चाहते होंगे, पोस्ट ऑफिस सोच के तो कोई नहीं गया होगा.
- जो आईएएस बने हैं सबको अपनी पसंद के राज्य नहीं मिलेंगे. पंजाब वाले को तमिलनाडु मिल जाएगा. देशभक्त होगा पर परिवार से दूर रहना थोड़ा अखरता तो है ही यार.
- बाकी सर्विसेज वाले तो और नाखुश हो सकते हैं. दो नंबर से आईएएस बनते बनते रह गए.
इसका मतलब क्या है?
नाखुश तो आप रहेंगे ही. क्योंकि जो चाहते हैं वो मिलता नहीं. पर इसका उल्टा भी उतना ही सही है. मिले न मिले खुश रहना आपके हाथ में हैं. असफलता एक रिजल्ट है. किसी और के द्वारा बताया हुआ. खुश रहना आपकी चीज है. आपके द्वारा चुनी हुई. मतलब खुश रहना आप चुन सकते हैं.
पिछले साल कर्नाटक में एक आईएएस ने आत्महत्या कर ली थी. मनपसंद लड़की से शादी नहीं हुयी तो. एक आईपीएस ने नोएडा में आत्महत्या की थी मनपसंद लड़की से शादी के बाद. बात मिलने या ना मिलने की नहीं है. बात है कि किस कंडीशन में आप कैसे अपने आप को संभालते हैं.
ज्ञान बांटने का मकसद यही है कि भाई, क्षोभ और निराशा में कुछ ऐसा वैसा मत कर लेना. हर इंसान का अपना जीवन होता है. अपनी कहानी होती है. इसको एक रिजल्ट से मत निपटा देना. खुश रहो दोस्त और कमर कस लो. जिंदगी में मौके मिलते रहेंगे. प्रवीण ताम्बे को आईपीएल में देखा है ना?
बस!
जोगिन्दर शर्मा याद है? 2007 का फाइनल? आखिरी ओवर. मिस्बाह ने शॉट खेला. श्री ने कैच लिया और इंडिया ट्वेंटी-ट्वेंटी का चैंपियन बन गया. फिर क्या हुआ उनके साथ? करियर आगे नहीं बढ़ पाया था. अब जोगिन्दर बाबू हरियाणा सरकार में पुलिस ऑफिसर हैं. चोर पकड़ते हैं. हरभजन सिंह वाले एसपी नहीं. सही में पकड़ने जाते हैं. पर वो खुश हैं. अगर वो चाहे तो नाखुश रह सकते हैं आईपीएल देखकर.
आप का चुनाव आपके हाथ में है.
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एक ओपन लैटर उनके नाम, जो तीन बार यूपीएससी का एग्जाम दे चुके और अभी भी लिस्ट में नहीं हैं..
दोस्तों! क्या ये सच है कि ये तुम्हारा तीसरा अटेम्प्ट था? और लिस्ट में नाम नहीं है? ठीक से देख लिया? नॉट फाउंड. माइक्रोसॉफ्ट की जॉब छोड़ के आये थे? या बैंक की? या जॉब के साथ तैयारी कर रहे थे? या छूछे थे? वर्जिन? जॉब थी ही नहीं कभी. ब्रेकअप भी हो गया होगा. क्या पूछना. घर से पैसे ले रहे थे? ये तुम्हारा पर्सनल मैटर है.
अब क्या इरादा है? लाइफ की तो लग गयी. शोक संतप्त रिश्तेदारों की सलाह और मोटीवेशनल कोट्स भी दम तोड़ चुके होंगे. नजदीकी दोस्त जो तुम्हारे ही पैसे से रम पीकर तुम्हीं को गाली देकर चले गए होंगे. कहीं तुम उनमें से तो नहीं जिनको ऊपर लिखी लक्ज़री नहीं मिली है लाइफ में? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारी कहानी भी उतनी ही मत्त्वपूर्ण है जितनी की उन संघर्षशील टॉपरों की जिनकी कहानी से लाखों इंस्पायर होते हैं? तुम भी उतने ही इंस्पायरिंग हो. चलो चाहे जो भी हो. इस पॉइंट पर सबकी कहानी एक जैसी है. ईगो सबका हर्ट हुआ है. मेहनत का नतीजा पक्ष में नहीं आया. उम्मीदें धराशायी हो गयीं हैं. सपने काल कवलित हो गए. आत्म विश्वास स्खलित हो गया है. यूपीएससी देने के पहले तुम वैसे थे, अब ऐसे हो गए हो. और इसी देश में कोई कोई है जो जब चाहे जिस चीज की, एंटायर सब्जेक्ट की डिग्री निकाल देता है. भाई, यूं. यूं. चुटकी में. अपनी कोई औकात है कि नहीं दोस्त? इन चीजों को पढ़ के बुरा नहीं मानते. समाज में ऐसी चीजें होती रहेंगी. इसीलिए तो यूपीएससी एग्जाम लेती है. जिम्मेदार पदों के लिए. आपको तो पता ही होगा कि ये एग्जाम ईमानदारी, सत्यता, साहस, और नैतिकता को टेस्ट करता है. आपमें ये गुण परीक्षा के साथ ही ख़त्म तो नहीं हो गए होंगे. तैयारी के दौरान आपने इन सारे गुणों को आत्मसात किया होगा. जाति, धर्म, लिंग, क्षेत्र से ऊपर उठकर आपने सब कुछ देखा होगा. और ये चीज आपको देश के लिए एसेट बनाती है. देश में जिस तरह के हालात हैं क्या आपको अपनी जरूरत महसूस नहीं होती लोगों के बीच? आप कहेंगे तभी तो तैयारी की. यही बात. आप सिविल सर्विसेज या जहां भी जाएंगे. हिला के रख देंगे. शायद बाद में कभी आप रघुराम राजन की तरह सरकार में किसी रॉकस्टार की तरह एंट्री मार सकते हैं. कोई नहीं जानता. भरोसा रखिए. आपके जज्बे को सलाम. आप भी इसकी इज्जत कीजिए.
आपका
प्रशंसक