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एक लड़की का दी लल्लनटॉप को खुला खत

हम भी आपकी ही पीढ़ी के अंग हैं लेकिन स्कूल में टिफिन खाने से लेकर जीन्स पहनने तक हमने खुद को समाज कि निगाहों में हौव्वा ही पाया है.

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सांकेतिक तस्वीर.
कुछ वक्त पहले आशीष दैत्य ने औरतों के नाम एक खुला खत लिखा था. 2019 के महिला दिवस पर हमने उसे फिर आपके सामने पेश किया था. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य एमफिल कर रहीं आंचल बावा ने आशीष के खत का जवाब दिया है. ये खत मेरा रंग डॉट इन पर 'एक पूरी पीढ़ी का लल्लनटॉप के नाम खुला ख़त' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ था. हमने इस खत को पढ़ा. पढ़कर हमें लगा कि यही लोकतंत्र की खूबसूरती है. इसमें बात रखने की भी आज़ादी है और ऐतराज की भी. हमें लगता है कि आंचल का ये खत आप तक पहुंचना चाहिए. सो हम आंचल की इजाज़त से ये खत प्रकाशित कर रहे हैं. पढ़िए.
लल्लनटॉप, अभिवादन आप भी अपने हिसाब से ही अज़्यूम कर लें. सबसे पहले तो माफ़ी क्योंकि वो क्या है न हम आपके हिसाब से 'गज़ब का दिन' और 'केवल जनरल नॉलेज का प्रश्न' मतलब 'महिला दिवस' मनाने में बहुत बिजी थे. और पोस्ट मॉडर्निज़्म के टाइम में 'पोस्ट' तो जैसे फैशन हो गया है. इसलिए हम खुशी-खुशी में 'पोस्ट महिला दिवस' भी मना डाले और फिर आज जाकर आपको लिखने का समय पाएं हैं. प्रयास करेंगे कि आपको आपकी भाषा में ही लिखें क्योंकि आपकी खुली चिट्ठी यानी 'ओपन लेटर' से ये समझ लिए हैं कि आप इतिहास, समाजशास्त्र, राजीनीति, साहित्य कुछ नहीं जानते. जानते हैं तो बस लिखना. अब आपको हम भी बता दें कि हम कौन हैं. हम भी उसी पीढ़ी की पैदाइश हैं, जिस पीढ़ी ने यह ओपन लेटर आपकी तरफ से पेश किया है. इतिहास में महिलाओं पर पुरुषों द्वारा अत्याचार हुआ. किस अनुपात में हुआ और किन तरीकों से हुआ यह हम भी आपको बताना नहीं चाहते क्योंकि इतिहास का पेपर तो हम लिखने बैठे नहीं हैं. और न ही यह चाहते हैं कि आप किसी भी प्रकार के अपराधबोध में रहें. आपने लिखा 'दलित-दमित-अबला', तो दलित के विषय में हम कुछ नहीं बोलेंगे क्योंकि वह एक विशेष जाति सूचक हो जाएगा. वैसे भी हमारे विषय में आप कुछ नहीं जानते, तो दलित महिला के विषय में तो क्या ही जानिएगा. लेकिन 'दमित -अबला' न तो हम कल ही थे और न ही आज हैं. भले ही हमें आधे से भी बेहद कम भागीदारी ही समाज में क्यों न दी गई हो.
अब आपके लिए बेशक ही पुरुष-प्रधान या पितृ-सत्ता 'एक्जाम में दो-दो नम्बर की वेटेज रख के आएं' लेकिन हमारी परिधि पर खड़ी पहली से अंतिम हर महिला के लिए आज भी यह समाज का क्रूर सत्य ही है. हम भी आपकी पीढ़ी के अंग हैं लेकिन स्कूल में टिफिन खाने से लेकर जीन्स पहनने तक हमने खुद को समाज कि निगाहों में हौव्वा ही पाया है. तब भी जब हम केवल सड़क पर खुल कर हंस रही थीं. पर आपको यह समझ थोड़ी आएगा क्योंकि माहवारी आपको आई नहीं और न ही आपके कपड़ों पर लगे दागों को घूर कर हंसा गया.
आप तो हमारे स्कूल कि उन सहेलियों तक को नहीं जानते, जो आपकी ही की पीढ़ी और आप ही की उम्र की हैं. जो बारह पढ़ने के बाद दोबारा स्कूल में नहीं दिखीं. जो इस समय अपने भविष्य की आंच पर कहीं रोटियां सेंक रही हैं. हमारी पीढ़ी से पिछली पीढ़ियों ने सब बुरा ही नहीं किया, कुछ अच्छा भी किया है. अगर 18 वर्ष की उम्र में विवाह का प्रावधान नहीं होता, तो शायद इनका पांच या आठ तक पढ़ना भी मुश्किल हो जाता. हां, बच्चियां बेशक प्यारी होती हैं. सच है मगर उनके साथ होने वाला बलात्कार भी उतना ही बड़ा सच है. यकीन न आए तो अपनी ही बहन साइट 'ऑड नारी' को खोलकर देखिएगा. शायद आप पृथ्वी के किसी अन्य महाद्वीप से पधारे हैं. भारत के लिए पाहुन हैं क्या जी? या अभी-अभी बस आंख खोले और ले लैपटॉप लिखने बैठ गए. तभी आप पितृसत्ता का अर्थ नहीं जानते, तो भला दंश क्या ही जानिएगा.
शुक्रिया कि आपने हमें कम से कम इंसान की नज़र से तो देखा तभी 'स्पेशल ट्रीट' नहीं करना चाहते. यह हमें बेहद पसंद आया लेकिन आप यह भी लिखने से नहीं चूके कि '…बहुत सुन्दर होती हैं आप सब. आपकी हैण्डराइटिंग अच्छी होती है, आप लोग अटेंशन सीकिंग नहीं होती हैं'. काश आप हमारी सुंदरता को न लिख कर हमारी बौद्धिकता पर भी आते लेकिन वह शायद अभी तक आपको अपने आस-पास नज़र नहीं आई. कोई बात नहीं. अब अपनी आंखों के साथ दिमाग भी खोल डालिए और अगले महिला दिवस पर महिलाओं की वैचारिक क्षमता और बुद्धिमता पर कुछ लिख डालियेगा. वैसे 'बिगड़ी हुई लड़कियों' को 'शिक्षा' देने के मामले में आप पुरानी पीढ़ी जैसे ही निकले. जैसे हम खुद नहीं समझ सकते कि हमारे लिए क्या भला है या क्या बुरा है. यह Patronizing या प्रतिपालक व्यवहार आपके भीतर पितृसत्ता का संस्कारिक रूप बचे रहने का सुराग देता है.
अब आपको महिला दिवस पर दुनिया दो खेमों में बंटी नज़र आती है. सच बोलें हमें भी आती है लेकिन हर रोज़. एक और बात सुन लीजिए कि आपके 'ओपन लेटर' की फीलिंग ताज़ा-ताज़ा उभरते मध्यवर्गीय (उपभोक्ता टाइप) लड़के की फीलिंग है, जो अभी देश में पांच प्रतिशत की आबादी भी नहीं रखता. लेकिन आपकी एक बात एक दम सही है कि, '…पूरे समूह में लपेटकर हमें भी लंपट-ठरकी या बलात्कारी ठहरा दिया जाता है'. हम भी मानते हैं यह गलत है. पूर्णतः गलत. लेकिन यह भी एक सत्य है कि हम हमारे साथ पढ़ने, उठने-बैठने वाले हर पुरुष पर विश्वास रखते हैं. हमने पिछले कुछ ही सालों में इस तरह घुलना-मिलना शुरू किया है. और हम ये पूरी तरह मानते हैं कि हर पुरुष लम्पट-ठरकी या बलात्कारी नहीं होता. आपको भी एक बात माननी होगी कि 'महिला दिवस' कोई पुरुष विरोधी दिवस नहीं. यह एक बहुत बड़े सांस्कृतिक और सामाजिक नवाचार का प्रतिफल है. यह तब तक जारी रहेगा जब तक हमें दुनिया में बराबरी न मिल जाए और आपको लिखना न पड़े कि '…ब्रा की स्ट्रैप देख हमारा कौमार्य भंग नहीं हो जाता. स्लीवलेस टॉप और साढ़े छह इंच की स्कर्ट देख हारमोन नहीं फड़फड़ाने लगते. लड़की को लड़के का हाथ पकड़ के जाते देख हमारी पुतलियां चौड़ी नहीं होतीं..' जब यह सब जस्टिफिकेशन बंद हो जाएंगे, दुनिया दो खेमों में नज़र आना भी खत्म हो जाएगी. खैर यह सिर्फ आपके ओपन लेटर के जवाब तक ही सीमित है लेकिन आज भी पितृसतात्मक समाज जो आपके लिए महज़ दो नंबर का प्रश्न है, उसमें महिलाओं की स्थिति, समस्याएं और मांगें आपकी सोच से बेहद परे है. आपके आस-पास की ही पीढ़ी का आपके ही जितना ही महत्वपूर्ण, सक्षम और विचारवान हिस्सा.
वीडियो देखें: एक कविता रोज- सीलमपुर की लड़कियां

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