Submit your post

Follow Us

एक पूरी पीढ़ी का महिलाओं के नाम खुला ख़त

5.74 K
शेयर्स

लेडीज,

अभिवादन आप अपने हिसाब से अज्यूम कर लें,
सबसे पहले तो बता दें हम कौन हैं. हम उस पीढ़ी से आते हैं. जिसे सच में नहीं पता कि पहले महिलाओं पर पुरुषों ने कितने अत्याचार किए. क्यों किए या कैसे किए? हम उसका हिस्सा नहीं रहे इसलिए कोई अपराधबोध भी नहीं है. नहीं है माने नहीं है. दलित-दमित-अबला वगैरह सुनने में ही बड़ा पैथेटिक फील देते हैं, और ‘पुरुषप्रधान समाज’ या ‘पितृ सत्ता’ जैसे शब्द हमारे एक्जाम में दो-दो नम्बर की वेटेज रख के आएं. तब भी हम उसका अर्थ न बता पाएंगे, फिर उसका हिस्सा बनने की बात ही और रही.

हम उस पीढ़ी से आये हैं जिनके लिए बच्चियां, लडकियां या औरतें हौव्वा नहीं थीं. मतलब हमारे लिए आप थीं हमेशा से. बगल वाली बेंच पर नर्सरी में हमारे साथ ही टिफ़िन खाया करती थीं. सुंदर से टिफ़िन वाली वो बच्चियां कभी हौव्वा नहीं लगीं. हम हाफ पैंट पहनकर जाते वो ट्यूनिक. तब सर लोगों से ज्यादा मैम की क्लास होती थीं. अच्छी होती थीं उनको सब आता था. डांटती भी कम थीं. कभी-कभी मैम की जगह मम्मी निकल जाता. एक जैसी ही तो होती थीं. पूरी क्लास हंसती मैम मुस्कुरा देतीं. कैसा तो भी लगता था.

इसलिए हम तो कभी ये सोच ही नहीं सकते कि औरतें बस घर में बैठने को हैं. फिर बड़े हुए हमारी पैंट लम्बी हुई सुंदर टिफिन वाली लड़कियां स्कर्ट में आ गईं. अब भी वो टिफ़िन खातीं. जब वो टिफ़िन खातीं. हम मोज़े की गेंद से कहीं गिप्पी-गेंद खेल रहे होते. (हम ये कतई नहीं कह रहे कि वो खेलती नहीं थी.) फर्क बस ये पड़ा था कि अब उनके सामने मार पड़ जाती तो इन्सल्ट ज्यादा महसूस होती.

भूले जा रहे थे. महिला दिवस की शुभकामनाएं.

ये महिला दिवस. गजब दिन है सच में. मतलब ठीक है. होना चाहिए औरतों के लिए भी एक दिन. जनरल नॉलेज का एक जवाब ही तैयार हो जाता है. फेसबुक पर कैची अपडेट्स आते हैं. दुनिया बाकी दिनों में चाहे जैसी हो उस दिन बस दो खेमे में बंटी नजर आती है एक वो जिन्हें लगता है कि हर साल लड़कियां टॉप भी सिर्फ इसलिए कर जाती हैं क्योंकि कॉपीज मैम चेक करती हैं लड़कियों को ज्यादा नम्बर दे डालती हैं. इनका बस चले तो दुनिया भर की बच्चियों को,लड़कियों को. औरतों को सात तहखानों के नीचे बंदकर आएं. इन्हें लड़कियों के हंसने-बोलने, पढ़ने-लिखने, सीखने-समझने, तरक्की करने और सबसे ज्यादा फैसले लेने से भी दिक्कत होती है.

दूसरे वो जिनके लिए महिला सशक्तिकरण का मतलब औरतों के एक हाथ में बोतल और दूसरे में सिगरेट है. इनके अनुसार दुनिया की सारी औरतें तब तक सशक्त नहीं हैं. जब तक लड़कों जैसे खुले में सिगरेट नहीं पीतीं. बिन-ब्याही माएं नहीं बनती. दस-दस बॉयफ्रेंड्स नहीं बनातीं. ऐसा समझिए कि औरतें अपने फैसले लेने को आजाद है जब वो इनके कहे अनुसार अपने फैसले लेने लगें. ऐसे लोगों को नारीविवादी कहते हैं. उनको कोई समझाने नहीं जाएगा ये घोर निजी फैसले हैं. हर किसी के लिए अलग-अलग

हम डिप्लोमैटिक नहीं होना चाहते पर सब जानते हैं निकोटिन सबके लिए खराब होती है. बाकी दारु-बीड़ी या गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड कोई बड़ी बात नहीं है और सशक्तिकरण का पर्याय तो कतई नहीं. हर किसी के दिमाग में अपनी कहानी चल रही है यकीन मानिए आपके सिवा किसी को फर्क नहीं पड़ता आप कितनी पी सकती हैं या आपके कितने बॉयफ्रेंड हैं. लड़ना अच्छी बात है पर परछाईं से नहीं. बॉयफ्रेंड होना, न होना तो बहुत पर्सनल बात है न. फिर और कोई तय करेगा? हंसी आती है!

बुरा लगता है जब पूरे समूह में लपेटकर हमें भी लंपट-ठरकी या बलात्कारी ठहरा दिया जाता है. उम्मीद की जाती है सिर झुकाकर ‘हओ’ कह देंगे. कई तो मान भी लेते हैं. ये उनकी चारित्रिक दुर्बलता है. उनके लिए लड़कियों का जींस पहन लेना ही बवाल होता था. पर हम नहीं मानेंगे. हमें स्टैंड लेना आता है. गलत को गलत कहना आता है. घटिया नॉनवेज जोक्स पढ़कर घिन आती है. बीवी वाले जोक्स पर भी. ब्रा की स्ट्रैप देख हमारा कौमार्य भंग नहीं हो जाता. स्लीवलेस टॉप और साढ़े छह इंच की स्कर्ट देख हार्मोंस नहीं फड़फड़ाने लगते. लड़की को लड़के का हाथ पकड़ के जाते देख हमारी पुतलियां चौड़ी नहीं होतीं. हमने हमेशा से अपने आस-पास ये सब देखा है. अब फर्क पड़ना बंद हो गया है आम बाते हैं ये. जितना आम हमारा होना या आपका होना,हम बड़ी गजब पीढ़ी से आते हैं. हमारे कैनवास वाले जूतों के ऊपर मम्मी के कहने पर बांधा काला धागा होता है.

तो महिला दिवस पर ये कि अच्छा है आप लोग हैं हमारे आस-पास. मम्मी-बुआ-मैम-गर्लफ्रेंड-पड़ोसन-सहयात्री-सहकर्मी किसी भी रूप में. बहुत सुन्दर होती हैं आप सब. आपकी हैण्डराइटिंग अच्छी होती है,आप लोग अटेंशन सीकिंग नहीं होती हैं. हम आपकी बराबरी नहीं कर सकते पर आपको कुछ स्पेशल ट्रीट भी न करेंगे. क्योंकि सच में जरुरत बस इसी की होती है. आप तो समझती हैं.

आपके आस-पास की एक पीढ़ी.


वीडियो- ज्योतिबा फुले की किताब ‘गुलामगिरी’ का वो हिस्सा जो आज के समय में बहुत जरूरी है

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें
An open letter to women on international Womens Day

गंदी बात

साइकल, पौरुष और स्त्रीत्व

एक तस्वीर बड़े दिनों से वायरल है. जिसमें साइकल दिख रही है. इस साइकल का इतिहास और भूगोल क्या है?

महिलाओं का सम्मान न करने वाली पार्टियों में आखिर हम किसको चुनें?

बीजेपी हो या कांग्रेस, कैंडिडेट लिस्ट में 15 फीसद महिलाएं भी नहीं दिख रहीं.

लोकसभा चुनाव 2019: पॉलिटिक्स बाद में, पहले महिला नेताओं की 'इज्जत' का तमाशा बनाते हैं!

चुनाव एक युद्ध है. जिसकी कैजुअल्टी औरतें हैं.

सर्फ एक्सेल के ऐड में रंग फेंक रहे बच्चे हमारे हैं, इन्हें बचा लीजिए

इन्हें दूसरों की कद्र न करने वाले हिंसक लोगों में तब्दील न होने दीजिए.

अपने गांव की बोली बोलने में शर्म क्यों आती है आपको?

ये पोस्ट दूर-दराज गांव से आए स्टूडेंट्स जो डीयू या दूसरी यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं, उनके लिए है.

बच्चे के ट्रांसजेंडर होने का पता चलने पर मां ने खुशी क्यों मनाई?

आप में से तमाम लोग सोच सकते हैं कि इसमें खुश होने की क्या बात है.

'मैं तुम्हारे भद्दे मैसेज लीक कर रही हूं, तुम्हें रेपिस्ट बनने से बचा रही हूं'

तुमने सोच कैसे लिया तुम पकड़े नहीं जाओगे?

औरत अपनी उम्र बताए तो शर्म से समाज झेंपता है वो औरत नहीं

किसी औरत से उसकी उम्र पूछना उसका अपमान नहीं होता है.

आपको भी डर लगता है कि कोई लड़की फर्जी आरोप में आपको #MeToo में न लपेट ले?

तो ये पढ़िए, काम आएगा.

#MeToo मूवमेंट इतिहास की सबसे बढ़िया चीज है, मगर इसके कानूनी मायने क्या हैं?

अपने साथ हुए यौन शोषण के बारे में समाज की आंखों में आंखें डालकर कहा जा रहा है, ये देखना सुखद है.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.