साल 1981. 6 अक्टूबर की तारीख. मिस्त्र के राष्ट्रपति अनवर अल-सादात एक परेड का मुआयना कर रहे थे. मौका था 1973 में इजरायल पर मिली जीत की सालगिरह का. परेड में हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे थे लेकिन बन्दूक सिर्फ कुछ ही के पास थी. सादात की जान को खतरा था. इसलिए एहतियात के तौर पर बंदूकों में गोली नहीं भरी थी. सब कुछ सही चल रहा था, तभी सादात के सामने से गुजर रहे कुछ सैनिकों ने उन पर गोली चला दी. अनवर अल-सादात की मौत हो गई. इस हत्या के पीछे इस्लामिक कट्टरपंथियों का हाथ था. इजरायल का दौरा कर दोस्ती का हाथ बढ़ाने वाले सादात पहले राष्ट्रपति थे. और ये बात कट्टरपंथियों को हरगिज मंजूर नहीं थी. इस घटना ने मिडिल ईस्ट की राजनीति को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
अलकायदा चीफ ज़वाहिरी को उड़ाने की पूरी कहानी!
कैसे मिस्त्र की गलियों से निकला एक लड़का अलकायदा का सरगना बन गया?


सादात की हत्या के बाद मिस्त्र में गिरफ्तारियां शुरू हुईं. जो गिरफ्तार हुए उनमें आंख का एक डॉक्टर भी शामिल था. हथियार रखने के जुर्म में डॉक्टर को 3 साल की सजा हुई. जेल से निकलकर उसने मिस्त्र छोड़ दिया. और यहां-वहां भटकता हुआ पहुंचा ओसामा बिन लादेन के पास. ओसामा के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए उसने अल-कायदा को पूरे मिडिल ईस्ट और अफ्रीका तक फैलाया. और साल 2011 में ओसामा की हत्या के बाद खुद अल-कायदा का चीफ बन गया.
हम बात कर रहे हैं अयमान अल-ज़वाहिरी की. जिसे रविवार सुबह एक ऑपरेशन में अमेरिकी ड्रोन स्ट्राइक के जरिये मार गिराया गया.
आज हम जानेंगे-
अल-ज़वाहिरी की पूरी कहानी- कैसे मिस्त्र की गलियों से निकला एक लड़का अलकायदा का सरगना बन गया?
अमेरिकी ने कैसे बिठाई अल-ज़वाहिरी की फील्डिंग?
और अल- ज़वाहिरी का मारा जाना भारत के लिए क्या मायने रखता है?
पहले जानते हैं अल-ज़वाहिरी की कहानी.19 जून, 1951 को मिस्त्र की राजधानी काइरो के मादी इलाके में एक लड़के की पैदाइश हुई. नाम पड़ा अयमान मुहम्मद रबी अल-ज़वाहिरी. परिवार का अच्छा खासा रसूख था. पिता फार्माकोलॉजी यानी औषधशास्त्र के प्रोफ़ेसर थे. चाचा अल-अज़हर नाम की एक इस्लामिक यूनिवर्सिटी में बड़े इमाम हुआ करते थे. नाना सउदी अरब सहित कई देशों में मिस्त्र के राजदूत रह चुके थे.

ज़वाहिरी बचपन से पढ़ाई में अच्छा था. लेकिन साथ ही उस पर कट्टर इस्लामिक विचारधारा का असर भी पड़ रहा था. मिस्त्र में तब सय्यद कुत्ब नाम के एक विचारक का बड़ा प्रभाव था. सय्यद कुत्ब कहता था कि दुनिया सिर्फ दो प्रकार के लोगों में बंटी है. इस्लाम को मानने वाले और काफिर. कुत्ब का कहना था कि जो कट्टर मुसलमान नहीं हैं, वो भी मुसलमान नहीं है. वो मिस्त्र में सेक्युलर सरकार हटाकर इस्लामिक सरकार बनाना चाहता था. नतीज़तन 1966 में सय्यद कुत्ब को फांसी दे दी गई. उससे प्रभावित होकर 15 साल के ज़वाहिरी ने 4-5 लड़कों का एक गुट बनाया और सरकार के खिलाफ काम करने लगा. साथ ही उसने पढ़ाई भी जारी रखी.
1974 में उसने मेडिकल स्कूल से ग्रेजुएशन पूरा किया. 3 साल आर्मी में बिताए और फिर 1978 में सर्जरी में मास्टर्स की डिग्री लेकर डॉक्टर बन गया. इसके बाद उसने एक क्लिनिक खोलकर अपनी प्रैक्टिस शुरू की. साथ ही अल जिहाद नाम का एक संगठन भी चलाता रहा.
1981 में उसे पहली बार जेल हुई. वही मामला जो हमने शुरू में बताया, राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या के मामले में अल-ज़वाहिरी भी पकड़ा गया. लेकिन हथियार रखने के जुर्म में उसे सिर्फ 3 साल की सजा हुई. 1984 में जेल से बाहर निकलकर उसने मिस्त्र छोड़ दिया और सऊदी अरब चला गया. यहां जेद्दा में उसने अपनी प्रैक्टिस शुरू की. इसी दौर में वो पाकिस्तान भी गया. जहां सोवियत-अफ़ग़ान जंग का उस पर ख़ासा असर हुआ.
ओसामा और अल-ज़वाहिरी की मुलाक़ात कैसे हुई, इसको लेकर अलग-अलग ब्योरे मिलते हैं.
CIA की रिपोर्ट के अनुसार ओसामा और ज़वाहिरी की मुलाक़ात पेशावर में हुई थी. वहीं कुछ जगह बताया जाता है कि दोनों जेद्दाह के एक अस्पताल में मिले थे.
1988 में ओसामा ने अल-कायदा की शुरुआत की. अल-ज़वाहिरी उसका दायां हाथ और पर्सनल डॉक्टर बन गया. मिस्त्र में अल-ज़वाहिरी के साथ जेल में कुछ वक्त काट चुके मोंटेसर अल-जय्यत ने एक किताब लिखी है, रोड टू अल-कायदा. इस किताब में अल-जय्यत बताते हैं कि अल-ज़वाहिरी संगठन का असली मास्टरमाइंड था. संगठन और प्लानिंग की जिम्मेदारी उसी की थी. जबकि ओसामा अल-कायदा का चेहरा था और पैसे का इंतज़ाम भी वही करता था.
1990 में दोनों ने मिलकर यमन और सूडान में आतंकी कैंम्प शुरू किए. शुरुआत में अल-ज़वाहिरी का फोकस मिस्त्र पर था. 1993 में उसने मिस्त्र के प्रधानमंत्री पर हमला करवाया. इसमें प्रधानमंत्री तो बच निकले लेकिन 21 लोग मारे गए, जिनमें 12 साल की एक लड़की भी थी. इसके बाद 1995 में उसने पाकिस्तान स्थित मिस्त्र के दूतावास पर फिदायीन हमला करवाया.
इन हमलों से तंग आकर मिस्त्र की खुफिया एजेंसियों ने उसकी जासूसी शुरू कर दी. इसके लिए 14 साल के दो लड़कों को काम पर लगाया गया. लेकिन सूडान की पुलिस ने दोनों लड़कों को पकड़कर अल-ज़वाहिरी के हवाले कर दिया. अल-ज़वाहिरी ने न सिर्फ दोनों की हत्या की, बल्कि इसका वीडियो भी जारी किया.
इस हत्या के चलते सूडान में अल-ज़वाहिरी और उसके ग्रुप के खिलाफ विरोध उठा तो उसे काबुल में शरण लेनी पड़ी. 1996 में उसने चेचन्या में घुसने की कोशिश की. जिसके चलते 6 महीने उसे रूस की कैद में रहना पड़ा. 1997 में उसने मिस्त्र में एक और हमला करवाया. जिसमें 58 विदेशी सैलानी मारे गए. इन हमलों के चलते साल 1999 में मिस्त्र में उसे फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन तख्ते तक पहुंचने के लिए वो कभी उनके हाथ नहीं आया.
1998 तक अल-ज़वाहिरी अपना अलग संगठन चलाता रहा. फिर ओसामा के कौल पर उसने अपने संगठन का अल-कायदा में विलय कर दिया. उसी साल अलकायदा ने एक घोषणापत्र जारी किया. जिसे अलकायदा और अमेरिका की दुश्मनी की शुरुआत माना जाता है. इस पत्र में कहा गया, दुनिया में जहां भी अमेरिकी मिलें, उन्हें मार दो.
इस घोषणापत्र के रिलीज होने के 6 महीने बाद अमेरिकी दूतावासों पर आतंकी हमले हुए. केन्या और तंजानिया में अमेरिकी दूतावासों पर हमले में 223 लोगों की जान गई. इस हमले के पीछे अलकायदा और ओसामा बिन लादेन का हाथ था, ये बात CIA को अल-ज़वाहिरी के एक फोन रिकॉर्ड से पता चली.
साल 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ. अमेरिका ने अलकायदा के 22 मोस्ट वांटेड आतंकियों की लिस्ट जारी की. इसमें सबसे ऊपर ओसामा और उसके बाद दूसरे नंबर पर अल-ज़वाहिरी का नाम था. अमेरिका ने उसके ऊपर करीब 200 करोड़ रूपये का इनाम रखा था.

2001 में अमेरिकी हमले के बाद अल-ज़वाहिरी को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ना पड़ा. साल 2003 तक वो अलकायदा के रिलीज किए वीडियो में ओसामा के साथ दिखता था. अमेरिकी इंटेलिजेंस के हिसाब से उसने पाकिस्तान के कबीलाई इलाकों में शरण ले रखी थी. इसके बाद अमेरिकी सुरक्षा बलों और अल-ज़वाहिरी के बीच चूहे बिल्ली के खेल का एक लम्बा दौर शुरू हुआ.
फिर हुई अल-जवाहिरी की कई मौतों में से एक मौत. जून 2006 में अमेरिका ने दावा किया कि अल-ज़वाहिरी एक अटैक में मारा गया है. लेकिन जल्द ही ज़वाहिरी ने वीडियो रिलीज़ कर बताया कि वो सही सलामत है.
इसके बाद अल-जवाहिरी सुर्ख़ियों में आया साल 2011 में. उस साल अमेरिकन नेवी सील्स ने पाकिस्तान के एबटाबाद में एक ऑपरेशन में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया. अल-ज़वाहिरी ओसामा का दायां हाथ था. इसलिए जब कई महीने तक अलकायदा के नए लीडर की घोषणा नहीं हुई, तो सबको लगा कि अल-ज़वाहिरी भी मर चुका है. उसने एक बार फिर वीडियो रिलीज़ कर सबको गलत साबित किया. 28 मिनट के इस वीडियो में अल-ज़वाहिरी ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा, ‘हम सब लादेन हैं. लादेन मरने के बाद भी अमेरिका का पीछा नहीं छोड़ेगा’. उसने अलकायदा की कमान अपने हाथ में ले ली. उसी साल एक और घटना घटी जिसने अल-ज़वाहिरी के नई मुश्किलें पैदा कर दी.
सीरिया में गृह युद्ध की शुरुआत के साथ ही उदय हुआ इस्लामिक स्टेट का. जो अलकायदा से भी क्रूर और कट्टर था. साथ ही वो सोशल मीडिया के जरिए अपना सन्देश दुनिया भर में पहुंचा रहा था. इस्लामिक स्टेट शिया मुसलमानों को भी निशाना बना रहा था और अल-ज़वाहिरी इसके सख्त खिलाफ था. नतीजा हुआ कि अलकायदा और इस्लामिक स्टेट के बीच तनातनी बढ़ती गई. और मिडिल ईस्ट में अलकायदा का असर कम होता गया.
अलकायदा अब सिर्फ कुछ ही इलाकों तक सीमित रह गया था. साल 2015 में संगठन को मजबूत करने के लिए अल-ज़वाहिरी ने एक नया दांव चला. उसने ओसामा के बेटे हमजा बिन लादेन को दुनिया के सामने इंट्रोड्यूस किया. इस दांव से ज़वाहिरी को लग रहा था कि अलकायदा के काडर में नई ऊर्जा का संचार होगा. लेकिन कुछ ही वक्त में ये गुब्बारा भी फुस हो गया. दुनिया के लिए इस्लामिक स्टेट अब आतंक का मुख्य चेहरा था. साल 2017 में हमजा बिन लादेन अफ़ग़ानिस्तान में एक हमले में मारा गया.
एक-एक कर अल-ज़वाहिरी के सारे कमांडर गायब हो रहे थे. अबु अल-खैर अलकायदा में दूसरे नंबर का कद रखता था. अल-ज़वाहिरी की बढ़ती उम्र को देखते हुए उसे ही अगला वारिस माना जाता था. लेकिन 2017 में सीरिया में एक ड्रोन स्ट्राइक में उसे भी मार डाला गया. इसके बाद अगला नंबर आया अब्दुल्ला अहमद का. जिसे 2020 में तेहरान में इजरायली सुरक्षा बलों ने मार डाला.
2011 से 2020 के बीच अल-ज़वाहिरी का कद लगातार घटता गया. उसके वीडियो भी पहले ही तरह सुर्खी नहीं बना रहे थे. अल-ज़वाहिरी इंतज़ार कर रहा था कि इस्लामिक स्टेट के खात्मे के बाद वो अपने संगठन का विस्तार करेगा. लेकिन इसके लिए उसे एक ठिकाने की जरुरत थी. जहां वो अपने संगठन का विस्तार कर सके. अफ़ग़ानिस्तान एक मुफीद जगह थी. लेकिन वहां अमेरिका ने कब्ज़ा कर रखा था. अल जवाहिरी का आख़िरी वीडियो इसी साल मई में रिलीज हुआ था, जिसमें वो कश्मीर में जिहाद की बात कह रहा था.
पैदा होने से लेकर अब तक अल-ज़वाहिरी की जन्मकुंडली आपको बता दी. अब जानिए अमेरिका ने ज़वाहिरी की फील्डिंग कैसी लगाई. कहानी कुछ-कुछ ओसामा को मारने के लिए किए गए ऑपरेशन से मिलती है. शुरू से समझते हैं.
तो हुआ यूं कि इस साल की शुरुआत में CIA को खबर मिली कि अल-ज़वाहिरी का परिवार काबुल शिफ्ट हो रहा है. CIA को शक था कि अल-ज़वाहिरी भी वहीं मौजूद होगा. पता चला कि परिवार को काबुल के शेरपुर इलाके में रखा गया है. यहां कभी विदेशी राजनयिकों के रहने के क्वार्टर हुआ करते थे. अब अल-कायदा के सीनियर कमांडर यहां रहते हैं.
CIA के सूत्रों ने इस घर पर निगरानी रखना शुरू किया. संभव है ड्रोन से जासूसी भी हुई होगी. फरवरी के आसपास CIA को पहली बार अल-ज़वाहिरी के बालकनी में दिखाई देने का पता चला. कुछ और महीने रेकी करने के बाद CIA अधिकारियों ने ऊपर बात पहुंचाई. राष्ट्रपति जो बाइडन के दो सलाहकारों ने अपने लेवल पर इस जानकारी को परखा और फिर मई में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सलिवन को इसकी सूचना दी गई. सलिवन ने अपने लेवल पर एक ऑपरेशन का खाका तैयार कर राष्ट्रपति को खबर दी.
1 जुलाई को बाइडन के सामने ऑपरेशन का प्रेजेंटेशन दिया गया. इस प्रेजेंटेशन में अल-ज़वाहिरी की बिल्डिंग और आसपास के इलाके का मॉडल था. राष्ट्रपति ने कुछ चीजें पक्का की. मसलन तालिबान के किसी अधिकारी को चोट तो नहीं आएगी, या सामान्य लोगों की जान को तो कोई खतरा नहीं है. जब सब कुछ पक्का हो गया तो बाइडन ने जुलाई के आख़िरी हफ्ते में ऑपरेशन को हरी झंडी दे दी. इसके बाद सारा काम ड्रोन्स का था.
भारतीय समयानुसार रविवार सुबह सात बजकर 18 मिनट पर बिल्डिंग पर दो मिसाइल दागी गई. हेल फायर नाम की ये मिसाइल धमाका नहीं करती. बल्कि इससे चाकू जैसे तेज़ धार के हथियार निकलते हैं. इस तरह इस मिसाइल के हमले में आसपास के लोगों को नुकसान होने की संभावना कम रहती है. जिस समय मिसाइल का हमला हुआ अल-ज़वाहिरी बालकनी में खड़ा था. निशाना इतना अचूक था कि अल-ज़वाहिरी के अलावा किसी को खरोंच तक नहीं आई. इसके बाद सोमवार रात राष्ट्रपति बाइडन प्रेस से मुखातिब हुए. और उन्होंने इस ऑपरेशन की जानकारी दी. उन्होंने कहा,
“शनिवार को मेरे निर्देश पर अफगानिस्तान के काबुल में सफलतापूर्वक ड्रोन स्ट्राइक की गई, इसमें अलकायदा के सरगना अयमान अल-ज़वाहिरी की मौत हो गई. अब न्याय मिल गया है.”
उन्होंने आगे कहा,
“अमेरिका अपने नागरिकों की रक्षा करता रहेगा. आज हमने साफ कर दिया है कि चाहे कितना भी समय लगे...कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहां छिपने की कोशिश करते हैं. हम आपको ढूंढ निकालेंगे.”

तालिबान की तरफ से भी इस हमले की पुष्टि की गई. तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे 'अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों' का उल्लंघन बताया.
तालिबान जिस सिद्धांत के उल्लंघन की बात कर रहा है. वो 2020 में अमेरिका और तालिबान के बीच हुए दोहा समझौते से जुड़ा है. दोहा में तय हुआ था कि अमेरिका अफ़ग़निस्तान से बाहर निकल जाएगा. और तालिबान पर किसी भी तरह का मिलिट्री एक्शन नहीं लेगा. लेकिन इस समझौते में एक शर्त ये थी कि तालिबान आतंकी गुटों को पनाह नहीं देगा. खासकर अल-कायदा को. अल-ज़वाहिरी को काबुल में पनाह देकर तालिबान ने इस समझौते की शर्त को तोड़ दिया. इसलिए अमेरिकी ने हमला करने में देर नहीं की.
न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार इस ऑपरेशन के बाद हक्कानी नेटवर्क के कुछ लोग बिल्डिंग में गए और उन्होंने अल-ज़वाहिरी की मौजूदगी के निशान मिटाने की कोशिश की. हालांकि अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इस बार बात पक्की है. CIA ने आधिकारिक तौर पर अल-ज़वाहिरी को मृत घोषित कर दिया है.
अल-ज़वाहिरी की मौत अमेरिका के लिए एक बड़ी जीत कही जा सकती है. लेकिन इससे कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं. जो बाइडन की विपक्षी रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं ने कहा, इस घटना से पता चलता है कि अल-कायदा दोबारा अपना सर उठा रहा है.
गौरतलब है कि पिछले साल जब जो बाइडन ने अफगानिस्तान से बाहर निकलने की घोषणा की थी तो आतंरिक तौर पर उनका काफी विरोध हुआ था. तब बाइडन ने तर्क दिया था कि अलक़ायदा के खात्मे के बाद अफ़ग़ानिस्तान में फौज रखने का कोई तुक नहीं रह जाता है. अल-ज़वाहिरी के मारे जाने से इस बात की भी पुष्टि हुई है कि अलकायदा दोबारा अफ़ग़ानिस्तान में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रहा है. यहां पर एक सवाल और लाजमी हो जाता है कि आखिर तालिबान अलकायदा से रिश्ता रख के अमेरिका की दुश्मनी क्यों मोल ले रहा है. तो इसका जवाब है एक पुरानी शपथ.
अरबी भाषा का एक शब्द है ‘बयाह’ जिसका अर्थ होता है एक नेता के प्रति वफादारी की प्रतिज्ञा लेना. इसको बैत भी कहा जाता है. इसका मतलब ये होता है कि हम आपको अपना लीडर मानते हैं. मुस्लिम धर्म के जानकार बताते हैं कि ये अरब का पुराना रिवाज़ रहा है. जब अरब के कबीले का कोई सरदार चुना जाता था तो लोग उसके पास जाकर बैत लिया करते थे. ये हुआ बैत का इतिहास. अब वापस अपने विषय पर लौटते हैं.
बैत वाला रिवाज़ आज कई जिहादी संगठनों के बीच प्रचलित है. बैत को जिहादी समूहों और उनके सहयोगियों के बीच निष्ठा की नींव मानी जाती है. एक नेता बैत की पेशकश करता है और दूसरा उसे मानता है. माने एक समय में एक लीडर होगा. और दूसरे को उसकी आज्ञा माननी होगी.
ऐसा ही हुआ था 1990 में, उस वक्त ओसामा बिन लादेन ने तालिबान के सर्वेसर्वा मुल्ला उमर को बैत दी थी. उसके बाद से कई बार बैत बदली गई है. अल-कायदा एकमात्र जिहादी समूह नहीं है जो अफगानिस्तान में तालिबान को बैत की पेशकश करता है. पाकिस्तानी तालिबान लम्बे समय से अफ़गान तालिबान को बैत देते आया है, और जब अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी हुई तब भी पाकिस्तानी तालिबान ने उसे वापस बैत दी.
कड़ी जुडती है साल 2011 से, इस साल लादेन की मौत होती है. लादेन के बाद अलकायदा की कमान अल-ज़वाहिरी को मिलती है. अल-ज़वाहिरी ने अल-कायदा और उसकी क्षेत्रीय शाखाओं की ओर से मुल्ला उमर को बैत दे दी. फिर 2015 में मुल्ला उमर की मौत के बाद अल-ज़वाहिरी ने तालिबानी नेता मुल्ला अख्तर मोहम्मद मंसूर को बैत दी. दोनों गुटों के बीच सब सही चल रहा था. लेकिन अल-ज़वाहिरी की तालिबान के प्रति इस वफादारी में मोड़ आया साल 2016 में. मई 2016 में अमेरिकी हवाई हमले में मंसूर की मौत हो जाती है. फिर तालिबान की कमान मिलती है हिबतुल्लाह अखुंदजादा को. लेकिन अल-ज़वाहिरी ने अखुंदजादा को बैत नहीं दी.
इसके बाद लग रहा था कि अलकायदा और तालिबान के रिश्ते पर असर पड़ेगा. लेकिन ताजा हुई घटना से पता चलता है कि तालिबान और अलकायदा के रिश्ते पहले जैसे ही हैं.
अब एक सवाल का जवाब और. अल कायदा का अगला चीफ कौन होगा?मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अलकायदा का अगला चीफ सैफ अल-आदेल बन सकता है. ज़वाहिरी की ही तरह आदेल भी मिस्त्र का नागरिक है. अलकायदा से जुड़ने से पहले सैफ मिस्त्र की सेना में कर्नल के पद पर तैनात था.उसे विस्फोटकों का विशेषज्ञ माना जाता है. सैफ भी FBI की मोस्ट वांटेड लिस्ट में शामिल है. और उस पर नैरोबी और तंज़ानिया में अमेरिकी दूतावासों पर हमले का आरोप है. अमेरिका ने उसके सर पर 80 करोड़ रूपये का इनाम रखा है.
आखिर में समझते हैं, अल-ज़वाहिरी की मौत के भारत के लिए क्या मायने हैं?
हमने बताया कि इसी साल मई में अल-ज़वाहिरी का आख़िरी वीडियो रिलीज हुआ था. अल-ज़वाहिरी के इस वीडियो में भारत पर ख़ास जोर दिया गया था. कर्नाटक में हुए हिजाब मामले पर टिप्पणी करते हुए उसने कहा,
“भारत के मुसलमानों को वहां की हिन्दूपरस्त सरकार के खिलाफ विद्रोह कर देना चाहिए”.
चूंकि अलकायदा बाकी दुनिया में सिमटता जा रहा है, इसलिए भारत को लेकर अल-कायदा का ये रुख चिंता में डालने वाला है. इस बीच तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद लगातार डर बना हुआ है कि अफ़ग़ानिस्तान की जमीन से भारत पर आतंकी हमला हो सकता है. अल-ज़वाहिरी की अफ़ग़ानिस्तान में मौजूदगी से इन आशंकाओं को बल मिला है.
इसी साल जून में संयुक्त राष्ट्र की तरफ से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि अलकायदा के करीब 400 आतंकी अफ़ग़निस्तान में ट्रेनिंग ले रहे हैं. इसी रिपोर्ट के अनुसार तालिबान के सत्ता में आने के बाद जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों को भी अफ़ग़ानिस्तान में ठिकाना मिला है. भारत तालिबान को लेकर उहापोह की स्थिति में है. भारत की तरफ से वहां लगातार राशन और बाकी जरियों से मदद भेजी जा रही है. लेकिन इन सब के साथ भारत के लिए ये भी जरूरी है कि हम तालिबान के साथ रिश्तों पर ध्यान दें. और अपने सामरिक पार्टनर्स के साथ मिलकर तालिबान पर दबाव डालें, ताकि अफ़ग़ानिस्तान के धरती से भारत के खिलाफ आतंक की कोशिश न हो.
अब चलते हैं सुर्खी परआज की पहली और एकमात्र सुर्खी है मालदीव से. मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह भारत के चार दिवसीय दौरे पर हैं. आज दोपहर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की. इसके बाद मालदीव और भारत के बीच 6 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए. क्या हैं ये समझौते?
इन समझौतों के तहत भारत विभिन्न प्रोजेक्स के लिए मालदीव को 800 करोड़ रूपये देगा. साथ ही दोनों देशों के बीच क्षमता निर्माण, साइबर सुरक्षा, आवास, आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे में सहयोग बढ़ाने को लेकर बात हुई. प्रधानमंत्री मोदी ने इस मौके पर कहा, ‘भारत और मालदीव की साझेदारी दोनों देशों के हित में हैं. भारत किसी भी मौके पर मालदीव की मदद के लिए आगे रहेगा.’
वहीं मालदीव के प्रधानमंत्री सोलिह ने कहा मालदीव भारत का सच्चा दोस्त है और भारत के साथ रिश्ता हमेशा हमारी प्राथमिकता रहेगा
चीन में अरबपतियों के इतने पैसे क्यों डूब रहे हैं?



















