किसी के होठों से बांसुरी लगी है. किसी के हाथ में गिटार है. कोई वॉयलिन बजा रही है. तो कोई तबले पर थाप दे रही है. ये नज़ारा है अफगानिस्तान के पहले औरतों के ऑर्केस्ट्रा का. जिन्होंने 19 और 20 जनवरी को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में परफॉर्म करके तालिबानी कट्टरपंथ की बैंड बजा दी है. बेखौफ. बेखटक. जबकि मालूम है तालिबानी कट्टरपंथ उनके साथ कुछ भी कर सकता है.
'तुम जो कर रही हो वो हमारे लिए शर्मनाक है, जहां दिखाई दीं जान से मार दूंगा'
कुछ अफगान लड़कियों ने कट्टरपंथ का बाजा बजा दिया है और बदले में ये धमकियां मिल रही हैं.
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फोटो - thelallantop
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अफगानिस्तान में औरतों का ये पहला ऑर्केस्ट्रा है, जिसमें 35 लड़कियां हैं. इस बैंड को नाम दिया है 'ज़ोहरा'. सभी लड़कियां 13 से 20 साल की हैं. इनमें से अधिकतर लड़कियां गरीब परिवारों की हैं और कुछ तो अनाथ हैं. इन लड़कियों ने स्विट्ज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के स्टेज पर परफॉर्म किया, जहां 3 हज़ार सीईओ और कई देशों के हेड मौजूद थे. 'ज़ोहरा' ग्रुप को कंडक्ट कर रहीं नेगिना खपलवाक का कहना है, 'वह इस प्रोग्राम को देश में महिलाओं की आजादी और तरक्की को समर्पित करना चाहती हैं. कट्टरपंथियों के डर से गुलामों जैसी जिंदगी जी रहीं महिलाओं के लिए यह एक मिसाल बनेगी.'
नेगिना का कहना है, 'अफगान लड़कियों के लिए ये बेहद मुश्किल है. कुछ बाप ऐसे हैं जो अपनी बेटियों को स्कूल भी नहीं जाने देते. मेरी दादी ने मेरे पिता से कहा था अगर तुमने नेगिना से म्यूजिक स्कूल छुड़वाया तो तुम मेरे बेटे नहीं रहोगे. तब मेरी फैमिली ने अपना घर छोड़ दिया और काबुल में जाकर रहने लगे.'अफगानिस्तान, तालिबानी कट्टरपंथ से जकड़ा देश. 1996 से लेकर 2001 तक तालिबानी शासन रहा और मुल्ला उमर देश का धार्मिक नेता बनकर देश को गर्त में धकेल गया. उसने शरिया कानून के बहाने अफगानिस्तान को औरतों के लिए जहन्नुम बना दिया. आज भी वहां की औरतें उस जकड़न में बिंधी पड़ी हैं. म्यूजिक की तरफ औरतों का कदम वहां पर उन्हें मौत की तरफ ले जाता है. अपनों से दूर कर देता है. क्योंकि वहां ये ऐसा गुनाह है, जिसको कट्टरपंथ बर्दाशत नहीं कर पाता. इतना टेरर कि वो म्यूजिक तो बड़ी बात स्कूल जाने के बारे में सोच भी नहीं पाती. लेकिन बदलाव आता है. भले ही देर से आए. और इंटरनेशनल लेवल पर परफॉर्म करके ये ऑर्केस्ट्रा बदलाव ला रहा है. धमकियां मिल रही हैं. जान को खतरा है. मगर ये खूबसूरत अफगान गर्ल बेखौफ अपनी धुनों से कट्टरपंथ पर वार कर रही हैं. ये उन औरतों को हिम्मत दे रही हैं जो खौफ के साए में जी रही हैं. नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ म्यूजिक के फाउंडर और म्यूजिशियन डॉ. अहमद सरमस्त का कहना है कि नेगिना खपलवाक अफगानिस्तान की पहली ऑर्केस्ट्रा कंडक्टर हैं. 'ज़ोहरा' अफगानिस्तान के लिए मिसाल है. जहां कट्टरपंथ की जड़ें मज़बूत हैं. नेगिना बताती हैं कि जिंदगी इतनी आसान नहीं रह गयी थी. शहर में नौकरी समेत कई परेशानियां थीं. लेकिन ये मरने से तो बेहतर ही थीं. नेगिना याद करते हुए दोहराती हैं कि उनके चाचा ने कहा था, "अगर तुम मुझे कहीं दिखाई दी तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा. तुम जो कर रही हो वो हमारे लिए बहुत शर्मनाक है."
नेगिना का उद्देश्य है कि वो स्कॉलरशिप जीते और देश से बाहर जाकर पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई करे. फिर अपने वतन वापस आए और नेशनल ऑर्केस्ट्रा को कंडक्ट करे.
तालिबानी शासन के ख़त्म होने के 15 साल बाद भी लड़कियों को वो आज़ादी नहीं है जो लड़कों को है. और अफगानिस्तान प्रोग्रेसिव होने का दावा करता है. वहां की एक नेशनल रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में कुल 19 परसेंट लड़कियां ही स्कूल जा रही थीं. जो पूरी दुनिया में सबसे कम है.
तालिबान ने अपने दौर में ये पाबंदियां लगाई थीं
तालिबान ने 1996 में शासन में आने के बाद जेंडर के आधार पर कड़े कानून बनाए. इन कानूनों ने सबसे ज्यादा औरतों को गुलाम बना दिया. इनमेंः-नेगिना कहती हैं, "अगर आप खुद अपने पैरों पर खड़ी नहीं होती हैं तो आपका कोई फ्यूचर नहीं है. मैं दूसरी लड़कियों के लिए मार्गदर्शक बन जाना चाहती हूं. ताकि उन्हें कुछ करने का हौसला मिले."
अफगानी आदमियों के लिए बढ़ी हुई दाढ़ी और औरतों के लिए बुर्का पहनने का फरमान जारी कर दिया था.
टीवी, म्यूजिक, सिनेमा पर पाबंदी लगा दी गई थी. और दस साल से ज्यादा उम्र की लड़कियों पर स्कूल जाने पर रोक लगा दी गई.
लड़कियों के लिए सभी स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के दरवाजे बंद कर दिए गए थे.
अफगानी औरत को जॉब करने की इजाज़त नहीं रह गई थी.
अकेले घर से निकलने पर औरतों का बहिष्कार करने को मंजूरी थी.
किसी भी आदेश को न मानने पर औरतों को बेरहमी से पीटने और मारने की सूरत थी.

Source Reuters
इस ग्रुप में वो बच्चियां भी शामिल हैं जो स्ट्रीट वर्कर रहीं. 18 साल की ज़रीफा वॉयलिन बजाती हैं और वो न्यूयॉर्क में भी परफॉर्म कर चुकी हैं. और दावोस में सेकेंड कंडक्टर रहीं. वो एक शिया हजारा गर्ल हैं. ज़रीफा कहती हैं, "यहां रहना बेहद मुश्किल है. हर मिनट आपकी जिंदगी खतरे में है. आप नहीं जानते कि अगला बम धमाका कहां हो जाए."
लेकिन ज़रीफा बे खौफ हैं. वो इस सबके बावजूद म्यूजिक को नहीं छोड़ना चाहतीं. ज़रीफा कहती हैं कि "मेरी मां को स्कूल जाने का मौका नहीं मिला. लेकिन हमारी जनरेशन देश के लिए कुछ कर रही है. कुछ बदलाव ज़रूर आएगा."
ज़रीफा येल यूनिवर्सिटी या हार्वर्ड में पढ़ने की तमन्ना रखती हैं. वो कहती हैं, "मैं खूब पढ़ना चाहती हूं और वापस अपने वतन आकर पॉजिटिव सोच को बढ़ावा देना चाहती हूं."
वीडियो भी देख लीजिए:
https://www.youtube.com/watch?v=4o6TAInZHtc
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