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अफ़गानिस्तान क्रिकेट : यस दे कैन!

इंटरनेशनल क्रिकेट में न्यू एंट्री है अफ़गानिस्तान. एकदम ताज़ी. ओवन से निकली. टीम काफी प्रॉमिसिंग है. प्लेयर्स हर कोशिश कर रहे हैं जीत सकने की.

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फोटो - thelallantop
अफ़गानिस्तान. नाम सुनते ही एक सफ़ेद, लम्बा लबादा ओढ़े, सर पे धारीदार कपड़ा बांधे, जो अक्सर मुंह पर आँख के नीचे काAfghanistan पूरा हिस्सा छुपा लेता है, एक शख्स आँखों के सामने आ जाता है. उसके हाथ में एक बन्दूक भी रहती है. ए.के. 47. वहां से हमने सिर्फ कच्चे मकानों की तस्वीरें देखी हैं. जिनपर गोलियों के निशान मौजूद होते हैं.   कांच के गिलास में पारदर्शी, हल्का पीलापन लिए एक हरा पेय. वहां की ये चाय देखी है. अफ़ीम के कुख्यात खेत, बम फटने की घटनाएं, तालिबानी बर्बरता और अमरीकी ऊँगली के इतर हमें अफ़गानिस्तान से क्या ख़बर मिलती है? हमारी खोपड़ी में हमने अफ़गानिस्तान को इन्हीं बातों तक सीमित कर दिया है. फ़िल्में, अखबार, न्यूज़ चैनल और वीडियो गेम्स इसके लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं. इसी बीच जब 15 लड़कों के एक ग्रुप को टीवी पर जूझते हुए दिखाया जाता है तो दिमाग में बनी ये सभी सीमायें टूटती हुई दिखती हैं. तब मालूम चलता है कि वहां लोग टीवी भी देखते हैं और टीवी पर बम धमाकों की खबरें नहीं क्रिकेट देखते हैं. इंडिया का क्रिकेट. जिसे देख देखकर वहां के लड़कों ने धोनी के जैसे बाल बढ़ाने शुरू कर दिये. जिसे देख कर वो लड़का जो धोनी जैसा बनना चाहता है, अफ़गानिस्तान का विकेट कीपर बन जाता है. अपने यहां का धोनी. Afghanistan Cricket एक प्लेयर जो खेलने आने से महीनों पहले इंग्लिश सीखने लगता है क्यूंकि उसे मालूम था कि वर्ल्ड कप के दौरान उसे इंटरव्यू देने होंगे. अब तक वो सिर्फ पश्तो ही बोलता आया था. एक प्लेयर ऐसा है जो 2014 के एशिया कप खेलने आता है लेकिन उसके एक साल पहले उसे भयानक वक़्त से गुज़ारना पड़ा था. उसके पापा को तालिबानी किडनैप करके ले जाते हैं. बदले में 2 मिलियन डॉलर सरकार से मांगे जाते हैं. Afghanistan Cricketअफ़गान टीम जब ज़िम्बाब्वे के टूर से वापस आयी थी तो एअरपोर्ट से काबुल नेशनल क्रिकेट स्टेडियम तक पहुंचने में 4 घंटे लगे. आम दिनों में ये रास्ता 15 मिनट में कवर हो जाता है. लेकिन ये आम दिन नहीं था. अफ़गान टीम ने ज़िम्बाब्वे को उसके घर में हराकर सीरीज़ जीती थी. कुछ टाइम बाद ये दोबारा हुआ. इस बार अफ़गानिस्तान ने ज़िम्बब्वे को अपने घर शारजाह में हरा दिया था. अफ़गानिस्तान में क्रिकेट मात्र 20 साल पहले आया है. पिछले 30 सैलून से ये देश तालिबान से जूझ रहा है. दो दसह्कों में क्रिकेट के पूरे देश में लिए इतना पैशन बहुत कुछ कहता है. असोसिएट कही जाने वाली टीमों में अफ़गानिस्तान आयरलैंड के बाद सबसे ज़्यादा ताकतवर टीम बनी है. फ़ास्ट बॉलर्स कमाल का काम रहे हैं. लोगों में ये जोश आना तब शुरू हुआ जब उन्होंने अपनी टीम को टीवी पर देखा, 2010 टी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप में. एक छोटे से अंतर के बाद टीम फिर से ऐक्शन में दिखी. इस बार और कर्रे माहौल में. टीम के प्लेयर्स बड़े होते हुए दिख रहे थे. उनके शॉट्स भी, बॉलर्स के रन-अप भी. उसके बाद ज़िम्बाब्वे पर सीरीज़ की जीत ने उन्हें इतना तो ज़रूर सिखा दिया कि जो सोचा है, वो हो सकता है. ओबामा के शब्दों में "YES WE CAN!" वही ओबामा जिसने अपने सैनिक छोड़ रक्खे हैं काबुल की गलियों में. जिसके टैंकों ने कंधार की स्काईलाइन को सपाट कर दिया था. जिसके ड्रोन्स हेरात में बसे एयरबेस से रह रहकर उड़ान भर रहे थे.

वही ओबामा जिसके देश को अभी क्रिकेट खेलना सीखना बाकी है. तब, जब अफ़गानिस्तान दुनिया के टॉप 10 टी-ट्वेंटी खेलने वाले देशों में शामिल हो चुका है.

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Afghan Cricket इंटरनेशनल स्टेज पर अफ़गानिस्तान की शुरुआत किसी फेयरी-टेल का हिस्सा नहीं थी. ऑस्ट्रेलिया में हुए वर्ल्ड कप में हर मैच में वो जीतते-जीतते हार रहे थे. Afghan Cricketज़िम्बाब्वे के खिलाफ़ हुई सीरीज़ में मिली जीत ने उन्हें टी-20 में नौंवी और वन-डे में दसवीं रैंक पे पहुंचा दिया. टीम के साथ दिक्कत ये है कि असोसियेट टीम होने की वजह से बड़ी टीमों से इसका मैच नहीं हो पाता. उसके लिए इन्हें वर्ल्ड कप वगैरह का इंतज़ार करना पड़ता है. जब देश में क्रिकेट नहीं था, लोग फुटबॉल खेलते थे. काफ़ी कुछ अमरीका से उधार लिया गया था. लिहाज़ा फुटबाल को सबसे बड़ा गेम होना समझा जा सकता था. 2012 में हुए ओलंपिक गेम्स ने ताईक्वान्डो को पॉपुलर बना दिया. लेकिन फिर धीरे-धीरे क्रिकेट अपनी जगह बनाता गया और देश का सबसे बड़ा खेल बन गया. देश में कैसा भी माहौल हो, क्रिकेट टीम और उससे जुड़े लोगों को कोई भी दिक्कत नहीं हुई है. खुद खिलाडियों का कहना है कि वो देश में सुरक्षित महसूस करते हैं. लोग उन्हें पहचानते हैं और गजब का प्यार देते हैं. हाल ही में तीन अफ़गान डोमेस्टिक प्लेयर्स अपना रास्ता भटक गए और गाड़ी से तालिबान के द्वारा कंट्रोल किये जा रहे इलाके में चलते चले गए. उन्हें बंधक बना लिया गया. तालिबानियों को जब मालूम पड़ा कि वो देश के लिए क्रिकेट खेलते हैं और काबुल जा रहे थे तो उन्हें उनके घर छोड़ दिया गया. अफ़गानिस्तान में इससे ज़्यादा इज़्ज़त किसी भी शख्स को क्या ही मिलेगी? अफ़गान पठान कीपर मोहम्मद शहज़ाद पेशावर के एक रिफ्यूजी कैम्प में पले बढ़े हैं. ओपेनिंग बैट्समैन जो शॉट्स खेलना बखूबी जानते हैं और बहुत हद तक पसंद भी करते हैं. अपने दूसरे और तीसरे वन-डे मैच में सेंचुरियां मारी हैं. ICC Intercontinental Cup में कनाडा के ख़िलाफ़ 494 रन को चेज़ करते हुए डबल सेंचुरी मार दी. मैच अफ़गानिस्तान ने जीता. Mohammad Shahzad अहमद का मोटो है - लूज़ बॉल मारो, अच्छी बॉल जाने दो. धोनी को अपना हीरो मानने वाले शहज़ाद, धोनी से मिलने की बात बताते हुए कहते हैं "मैं धोनी से 2010 में मिला. मैं उन्हें 2007 से देखता आ रहा था. वो अपने होटल के चौथे फ्लोर पर रह रहे थे और उन्होंने मुझे चाय पीने के लिए अपने रूम में बुलाया. मेरे लिए वो बहुत अजीब सी सिचुएशन थी. मेरा हीरो मेरे लिए चाय निकाल रहा था." खुद को इमोशनल बताने वाले शहज़ाद कहते हैं कि उन्हें कोई भी उकसा सकता है. किसी भी पठान को कोई भी जल्दी उकसा सकता है. अफ़गानिस्तान के साथ सबसे अच्छी बात ये है कि उसके प्लेयर्स ताकतवर हैं. यहां शरीर की ताक़त की ही बात हो रही है. बांग्लादेश को अपने शुरूआती दिनों में इस दिक्कत का सामने करना पड़ा था. उसके प्लेयर्स थोड़े हलके थे. इस लिहाज़ से उन्हें अच्छा खासा टाइम लगा उस जगह पहुंचने में जहां वो अभी हैं. लेकिन अफ़गानिस्तान के पास वो पहले ही मौजूद है.

अफ़गान प्लेयर्स जब किसी गेंद को मारते हैं तो गेंद हवा में रहते-रहते थक जाती है. साथ ही बॉलर भी हैं जो 140 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से बॉल फेंक लेते हैं.


लेकिन जो उन्हें कमज़ोर बनाता है वो है उनकी फील्डिंग. फील्डिंग भी नहीं, बल्कि फ़ील्ड में उनकी ऐक्टिवनेस. अपनी फील्डिंग में आये झोलों को अगर वो संभाल सकें तो 20 ओवर में 10 से 20 रन तो वो आसानी से बचा ही सकते हैं. Afghan Cricket हालांकि ये सब कुछ पा लेना उतना भी आसन काम नहीं है. कितनी ही टीमें हैं जो इन सभी क्वालिटी को पाने के लिए खपी जा रही हैं. लेकिन अफ़गानिस्तान से इतनी उम्मीदें इसलिए हैं क्यूंकि उनमें वो बात दिखती है जो ये विश्वास दिलाती है कि वो ये सारी चीज़ें पा सकते हैं. और इसके लिए ये काफ़ी ज़रूरी है कि अफ़गानिस्तान ज़्यादा से ज़्यादा इंटरनेशनल टीमों के साथ मैच खेलें. जितने मैच वो खेलेंगे, उन्हें उस स्टेज पर खेलते रहने की आदत पड़ेगी और वो और भी बेहतर काम कर सकते हैं. अफ़गानिस्तान को दरअसल रमाकांत आचरेकर स्टाइल की कोचिंग की ज़रुरत है. आचरेकर जी ने ही सचिन तेंदुलकर और कई और प्लेयर्स को कोच किया है. रमाकांत आचरेकर की स्टाइल ये थी कि वो नेट प्रैक्टिस में काफ़ी ज़्यादा विश्वास नहीं रखते थे. उनका कहना था कि स्किल बढ़ती है मैच खेल कर. साथ ही मैच खेलने की आदत भी पड़ती है और प्लेयर्स खुद को उस माहौल में ढाल भी सकते हैं. इस तरीके से कोई भी प्लेयर्स जल्दी ही हार्ड और टफ क्रिकेट भी खेल सकता है.

फिलहाल अफ़गानिस्तान को सबसे ज़्यादा जिस मन्त्र की ज़रुरत है वो है - "Yes We Can!"

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