The Lallantop

'जब नफरत की खेती होगी तो कोई एक सुबोध सिंह नहीं रहेगा, हम सभी सुबोध हो जाएंगे'

उत्तर प्रदेश पुलिस के डिप्टी एसपी अभिषेक प्रकाश ने लिखा...

Advertisement
post-main-image
शहीद इंस्पेक्टर सुबोध सिंह.
अभिषेक प्रकाश
अभिषेक प्रकाश

यह आर्टिकल अभिषेक प्रकाश ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा है. उनकी अनुमति से लल्लनटॉप आपके सामने पेश कर रहा है. अभिषेक उत्तर प्रदेश पुलिस में डिप्टी एसपी हैं और भदोही में पोस्टेड हैं. पुलिस सेवा में आने से पहले उन्होंने आकाशवाणी बनारस के लिए भी काम किया है. देश-समाज के मसलों पर लिखते रहे हैं.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement


संविधान की आत्मा ऐसे ही नहीं मरेगी, उसके लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है. और उसके लिए जरूरी है कि एक ऐसी ही भीड़, ऐसा ही उन्माद और ऐसी ही सोच के बीज बो दिए जाएं जो धीरे-धीरे संविधान की हत्या स्वयं कर देंगे. और इसी कड़ी में सुबोध सिंह की हत्या को देखा जाना चाहिए. खैर, सुबोध सिंह कोई एक्टिविस्ट, कोई राजनेता, कोई कलाकार, पत्रकार या उद्यमी नहीं थे जिनके लिए कोई हाय-तौबा मचे. वह इंसान एक पुलिसकर्मी था और मैं जानता हूं कि सभी बड़े महान लोगों की नज़र में पुलिस वाला चोर, बेईमान, राजनेताओं के तलुवे चाटने वाला ही होता है.

खैर पुलिस की नियति ही यही है. पुलिसकर्मी अपनी कमजोरी के साथ-साथ दूसरे विभाग की नाकामियों के बोझ को भी अपने कंधे पर ढोते हैं. पुलिस सभी की आशाओं को कंधा देती है और इसीलिए अपने कंधे तुड़वा बैठती है.
आजकल पुलिस के इक़बाल की बातें बहुत हो रही हैं. मैं भी मानता हूं कि पुलिस का इक़बाल कम हुआ है लेकिन मुझे ये भी बता दीजिए कि इतने कम संसाधनों और राजनीतिक दबाव के बीच किस संस्था का इक़बाल इस देश में मजबूत हुआ है? चाहे शिक्षण संस्थान हों, पत्रकारिता, मेडिकल, विधायिका हो या अन्य कोई भी संस्थान, सभी अपने उद्देश्य को पूरा करने मे असफल ही साबित हो रहे हैं.
लेकिन जो महत्वपूर्ण बात है, वो यह है कि पुलिस को जहां डील करना होता है, उस कार्य की प्रकृति कुछ ज्यादा ही गंभीर होती है, जिसकी परिणति सुबोध सिंह के रूप में भी होती है. अन्य कौन सा विभाग है, जहां के प्रोफेशनल को इस तरह अपनी जान गंवानी पड़ती है? सुबोध सिंह को मारने के पीछे जो भी योजना रही हो, लेकिन इस तरह की घटनाएं हमारे समय का इतिहास लिख रही हैं, जो आगे चलकर हमारे देश के भूगोल को बदलने का माद्दा रखती है. जो गंभीर नही हैं, वह देश के आंतरिक विभाजन को गौर से देख लें कि कौन कहां किसके साथ और क्यों रह रहा है.
खैर हम पुलिसवाले हैं, जो वर्दी पहन लेने के बाद ठुल्ला, चोर-बेईमान और तलवे चाटने वाले हो जाते हैं. लेकिन हम हमेशा ऐसे ही नही रहेंगे, उसके लिए सामान्य मानस को आगे आना होगा, उसके लिए मंदिर-मस्जिद निर्माण से ज्यादा पुलिस सुधार की बातें करनी होंगी! पुलिस ही नहीं, हमारे तथाकथित आकाओं (कुछ लोगों के हिसाब से) से प्रश्न करना होगा कि पुलिस रिफॉर्म को क्यों नहीं आगे बढ़ाया जा रहा? मैं सलाम करता हूं अभिषेक को, जो अपने पिता के मरने के बाद भी हिंसा व नफरत की भाषा को नहीं फैला रहा. सच कहूं, तो तस्वीर में भी उससे नज़र नहीं मिला पा रहा! पुलिस एक परिवार है और अभिषेक जैसे सभी हमारे अपने हैं.
खैर, बुलंदशहर की भयावहता को मैं केवल थोड़ी बहुत ही कल्पना में उतार पा रहा हूं, क्योंकि इस तरह की एक घटना मेरे क्षेत्र में भी घटित हुई थी, जब एक गाय को काट कर फेंक दिया गया था! उस समय भीड़ की मानसिकता क्या होती है, इसका अंश भर अंदाजा हमें है, लेकिन यह भी सच है कि जिस भीड़ का सामना मैंने किया उसमें नफरत का स्पेस इतना नहीं था. लेकिन नफ़रत की खेती जब लगातार होगी तो बीज वृक्ष बनेगा ही, तब कोई एक सुबोध सिंह नहीं रहेगा, हम सभी 'सुबोध' हो जाएंगे. हो सकता है कि कोई गोली हमारा भी इन्तज़ार कर रही हो.


Video: बुलंदशहर में SHO सुबोध कुमार सिंह के मारे जाने की पूरी कहानी

Advertisement
Advertisement
Advertisement